ज़कात से मदद

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रमज़ान में सब अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक़ ज़कात निकालते हैं... फ़ितरा निकालते हैं... इसके अलावा भी राहे-हक़ में पैसे ख़र्च करते हैं... हमने देखा है कि अकसर लोग इस बात को तरजीह देते हैं कि मस्जिद में ख़ूबसूरत टाइल्स लगवा दी जाएं, एसी लगवा दिया जाए...

बेशक मस्जिद में ख़ूबसूरत टाइल्स लगवाएं, एसी लगवाएं...  हमारा अपना मानना है कि क्यों न हम इन पैसों से उन लोगों की भी मदद करें, जो बेसहारा हैं, मजबूर हैं, बेबस हैं, जिनके यहां कोई कमाने वाला नहीं है, जो मेहनत-मशक़्क़त करके भी मुश्किल से ज़िन्दगी गुज़ार रही हैं... अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों ख़ासकर ऐसी मज़लूम औरतों का पता लगाकर इन पैसों से उनकी इतनी मदद कर दी जाए कि वे दो वक़्त भरपेट खाना खा सकें, अपना इलाज करा सकें, ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद सकें...

इसके अलावा जिन इलाक़ों में नल यानी हैंडपंप नहीं हैं, वहां नल लगवा दिए जाएं, ताकि लोगों को पानी मिल सके...

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ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels::

सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com

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एक मुबारक तारीख़

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एक मुबारक तारीख़... एक रूहानी तारीख़, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते... तआरुफ़ 
4 अप्रैल 2022, हिजरी 2 रमज़ान 1443

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 
 إلهي كفى بي عِزًّا أن أكون لك عَبدًا، وكفى بي فخرًا أن تكون لي رَبًّا، أنت كما أُحب فاجعلني كما تُحب. 
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
इलाही कफ़ा बी इज़्ज़न, अन अकुना लका अबदन
वा कफ़ा बी फ़ख़रन, अन तकुना लि रब्बन 
अंता कमा उहिब्ब, फ़जअलनी कमा तोहिब
आमीन या रब्बुल आलेमीन 
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है.
ऐ मेरे रब ! मेरी इज़्ज़त के लिए यही काफ़ी है कि मैं तेरा बन्दा हूं. और मेरे फ़ख़्र करने के लिए ये काफ़ी है कि तू मेरा परवरदिगार है. तू वैसा ही है, जैसा मैं चाहता हूं. बस तू मुझे ऐसा बना दे, जैसा तू चाहता है.
आमीन या रब्बुल आलेमीन

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शब-ए-मेराज

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इस्लामी कलेंडर के रजब माह की 27 तारीख़ मुसलमानों के लिए अज़ीम मुक़ाम रखती है. इस तारीख़ को हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह) से मुलाक़ात के लिए गए थे.  इसी रात में आपकी उम्मत को नमाज़ का अज़ीम तोहफ़ा अता किया गया. एक हदीस में बताया गया है कि अगर नबी की मेराज अल्लाह से मुलाकात है, तो मोमिन की मेराज नमाज़ है.
इस तारीख़ को रात में इबादत और दिन में रोज़ा रखा जाता है, यानी आज की रात इबादत की रात है और कल रोज़ा रखा जाएगा. शब-ए-मेराज की फ़ज़ीलत को जितना बयां किया जाए, कम है.

मिस्बाह में शेख़ ने इमाम अबू जाफ़र जवाद (अस) से नक़ल किया है. फ़रमाया- रजब महीने में एक रात उन सब चीज़ों से बेहतर है, जिन पर सूरज चमकता है और वह 27 रजब की रात है, जिसकी सुबह रसूले आज़म (स:अ:व:व) मब'उस ब रिसालत हुए. हमारे पैरोकारों में जो इस रात अमल करेगा, तो उसको 60 साल के अमल का सवाब हासिल होगा. मैंने अर्ज़ किया, "इस रात का अमल क्या है?" आप (अस) ने फ़रमाया : नमाज़े-ईशा के बाद सो जाएं और फिर आधी रात से पहले उठकर 12 रकअत नमाज़ 2-2 रकअत करके पढ़ें और हर रकअत में सुरह अल-हम्द के बाद क़ुरान की आख़िरी मुफ़स्सिल सूरतों (सुरह मोहम्मद से सुरह नास) में से कोई एक सुरह पढ़ें. नमाज़ का सलाम देने के बाद यह सारी सुरतें पढ़े-
सुरह हम्द 7 मर्तबा
सुरह फ़लक़ 7 मर्तबा
सुरह नास 7 मर्तबा
सुरह तौहीद 7 मर्तबा
सुरह काफ़ेरून 7 मर्तबा
सुरह क़द्र 7 मर्तबा
आयतल कुर्सी 7 मर्तबा

अगले साल शब-ए-मेराज पर हम हों, न हों... इसलिए मेराज की रात और दिन इबादत में गुज़ार दें, अपनी ज़िन्दगी में से कुछ वक़्त तो अपने ख़ुदा के लिए रखें. अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन

-फ़िरदौस ख़ान

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सूफ़ियाना बसंत पंचमी

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फ़िरदौस ख़ान
बसंत पंचमी को जश्ने बहारा भी कहा जाता है, क्योंकि बसंत पंचमी बहार के मौसम का पैग़ाम लाती है. सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाई जाती है. बसंत का पीला साफ़ा बांधे मुरीद बसंत के गीत गाते हैं. बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पर पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं. पीले फूलों की भी चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
आज बसंत मना ले सुहागन
आज बसंत मना ले  
अंजन–मंजन कर पिया मोरी
लंबे नेहर लगाए
तू क्या सोवे नींद की माटी
सो जागे तेरे भाग सुहागन
आज बसंत मना ले
ऊंची नार के ऊंचे चितवन
ऐसो दियो है बनाय
शाहे अमीर तोहे देखन को
नैनों से नैना मिलाय
आज बसंत मना ले, सुहागन
आज बसंत मना ले  

कहा जाता है कि ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाने की यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) को अपने भांजे हज़रत सैयद नूह के विसाल से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने मुर्शिद की यह हालत देखी न गई. वे उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. एक दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. नीले आसमान पर सूरज दमक रहा था. उसकी सुनहरी किरनें ज़मीन पर पड़ रही थीं. उन्होंने रास्ते में सरसों के खेत देखे. सरसों के पीले फूल बहती हवा से लहलहा रहे थे. उनकी ख़ूबसूरती हज़रत अमीर ख़ुसरो की निगाहों में बस गई और वे वहीं खड़े होकर फूलों को निहारने लगे. तभी उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास कुछ हिन्दू श्रद्धालु हर्षोल्लास से नाच गा रहे हैं. यह देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में पूछा तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वे भी अपने पीर मुर्शिद, अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुलदस्ते बनाए और कुछ पीले फूल अपने साफ़े में भी लगा लिए. फिर वे अपने पीर भाइयों और क़व्वालों को साथ लेकर नाचते-गाते हुए अपने मुर्शिद के पास पहुंच गए. अपने मुरीदों को इस तरह नाचते-गाते देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. और इस तरह बसंत पंचमी के दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो को उनकी मनचाही मुराद मिल गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो हर साल बसंत पंचमी मनाने लगे. 
अमीर ख़ुसरो को सरसों के पीले फूल इतने भाये कि उन्होंने इन पर एक गीत लिखा-   
सगन बिन फूल रही सरसों
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार
और गोरी करत सिंगार
मलनियां गेंदवा ले आईं कर सों
सगन बिन फूल रही सरसों
तरह तरह के फूल खिलाए
ले गेंदवा हाथन में आए
निज़ामुद्दीन के दरवज़्ज़े पर
आवन कह गए आशिक़ रंग
और बीत गए बरसों
सगन बिन फूल रही सरसों

ग़ौरतलब है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) चिश्ती सिलसिले के औलिया हैं. उनकी ख़ानकाह में बंसत पंचमी की शुरुआत होने के बाद दूसरी दरगाहों और ख़ानकाहों में भी बंसत पंचमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी. इस दिन मुशायरों का भी आयोजन किया जाता है, जिनमें शायर बंसत पंचमी पर अपना कलाम पढ़ते हैं.
हिन्दुस्तान के अलावा पड़ौसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी बंसत पंचमी को जश्ने बहारा के तौर पर ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)    

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एक मुबारक तारीख़

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels::


एक मुबारक तारीख़... एक रूहानी तारीख़, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते... सजदा 
1 फ़रवरी  2021 हिजरी 18 जुमादा अल आख़िर 1442
काला कमली वाले पर लाखों सलाम 
इस मुबारक मौक़े पर अपने प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित हमारा एक कलाम
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में पेश कर रहे हैं-
रहमतों की बारिश...
मेरे मौला !
रहमतों की बारिश कर
हमारे आक़ा
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर
जब तक
कायनात रौशन रहे
सूरज उगता रहे
दिन चढ़ता रहे
शाम ढलती रहे
और रात आती-जाती रहे
मेरे मौला !
सलाम नाज़िल फ़रमा
हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और आले-नबी की रूहों पर
अज़ल से अबद तक...
-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत मूसा और क़साब का क़िस्सा

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फ़िरदौस ख़ान   
 हमारी अम्मी हमें बहुत सी दुआएं दिया करती थीं. उनकी एक दुआ ऐसी थी, जिसे सुनकर हमारे चेहरे पर भी उसी तरह मुस्कान खिल उठती थी, जिस तरह अल्लाह के बन्दे क़साब का चेहरा खिल उठा था, जब उनकी मां ने उन्हें एक अज़ीम दुआ दी थी.  
हज़रत मूसा और क़साब का क़िस्सा कुछ इस तरह है. एक दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार!  जन्नत में मेरे साथ कौन होगा? उनके इस सवाल पर इरशाद हुआ कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम!  तुम्हारे साथ जन्नत में एक क़साब होगा. 
ये सुनने के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम क़साब की तलाश में निकल पड़े. एक जगह उन्होंने क़साब को देखा, जो गोश्त बेच रहा था. उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा और ख़ामोशी से उसे देखते रहे.  आख़िरकार शाम का वक़्त हुआ. आपने देखा कि अब तक उसने अपना कारोबार ख़त्म कर लिया था. उसने गोश्त का एक टुकड़ा उठाया और उसे एक कपड़े में रखकर अपने घर की तरफ़ चल दिया.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसका मेहमान बन जाने की उससे इजाज़त मांगी. वह इसके लिए ख़ुशी-ख़ुशी राज़ी हो गया और उन्हें अपने घर ले गया. इसके बाद क़साब ने गोश्त पकाया और रोटियां भी बनाईं.
फिर उसने एक प्याले में थोड़ा सा शोरबा निकाला और रोटियां लेकर एक हुजरे में चला गया.
वहां एक ज़ईफ़ औरत आराम फ़रमा रही थीं. उसने उन्हें सहारा देकर उठाया और बड़े प्यार से खाना खिलाने लगा. इसके बाद फिर वापस उन्हें आराम करने के लिए लिटा दिया. उस वक़्त उसके कान में इस ज़ईफ़ औरत ने कुछ कहा, जिसे सुनकर क़साब के चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ गई. फिर वह हुजरे से बाहर आ गया. 
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ये सब माजरा देख रहे थे. उन्होंने क़साब से पूछा कि वह कौन हैं और उन्होंने तुम्हारे कान में ऐसा क्या कहा, जिससे तुम्हारे चेहरे पर एकदम से मुस्कान खिल उठी. क़साब ने उन्हें  बताया कि ऐ अजनबी मेहमान ! ये ज़ईफ़ औरत मेरी मां है. जब मैं अपना कारोबार ख़त्म करके शाम को घर आता हूं, तो खाना पकाकर सबसे पहले मैं इन्हें खिलाता हूं और इनकी ख़िदमत करता हूं. इसके बाद ही मैं अपना और कोई काम करता हूं.
हर रोज़ मेरी मां ख़ुश होकर मुझे दुआ देती है और आज तो उन्होंने ऐसी दुआ दी, जिसे सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई. वे कह रहीं थीं- अल्लाह तुझे जन्नत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ रखे. बस मैं उनकी इसी बात को सुनकर मुस्कुरा रहा था और अपने दिल में सोच रहा था- या मेरे मौला, कहां में एक गुनाहगार और कहां अल्लाह के नबी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम.
क़साब की बात सुनकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा कि मैं ही अल्लाह का नबी मूसा हूं. तुम्हारी मां सच कहती हैं. तुम जन्नत में मेरे साथ रहोगे. 
सच ! मां की दुआएं कभी ज़ाया नहीं होतीं. 

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कुफ़्र और दीन

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हमें किसी को काफ़िर नहीं कहना चाहिए. क्या मालूम ख़ुदा की नज़र में वही मोमिन हो, वो ख़ुदा को बहुत अज़ीज़ हो. इसी से मुताल्लिक़ एक वाक़िया पेश कर रहे हैं.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम एक दिन जंगल जा रहे थे. वहां उन्होंने एक चरवाहे की आवाज़ सुनी, जो बुलंद आवाज़ से कह रहा था- ऐ मेरे जान से प्यारे ख़ुदा ! तू कहां है? मेरे पास आ, मैं तेरे सिर में कंघी करूं, तेरा लिबास मैला हो गया है, तो धोऊं, तेरे मोज़े फट गए हों, तो वह भी सीऊं, तुझे ताज़ा-ताज़ा दूध पिलाऊं, तू बीमार हो जाए, तो तेरी तीमारदारी करूं, अगर मुझे मालूम हो कि तेरा घर कहां है, तो तेरे लिए रोज़ घी और दूध लाया करूं, मेरी सब बकरियां तुम पर क़ुर्बान ! अब तो आ जा.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उसके क़रीब गए और कहने लगे- अरे अहमक़ ! तू ये बातें किससे कर रहा है? 
चरवाहे ने जवाब दिया- उससे कर रहा हूं, जिसने तुझे और मुझे पैदा किया और ये ज़मीन आसमान बनाए.
ये सुन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ग़ज़बनाक होकर कहा- अरे बद बख़्त ! तू इस बेहूदा बकवास से कहीं का ना रहा. बजाय मोमिन के तू तो काफ़िर हो गया. ख़बरदार ! ऐसी बेमानी और फ़िज़ूल बकवास बंद कर. तेरे इस कुफ़्र की बदबू सारी दुनिया में फैल गई. अरे बेवक़ूफ़ ! ये दूध लस्सी हम मख़लूक़ के लिए है, कपड़ों के मोहताज हम हैं, हक़ तआला इन हाजतों से बेनयाज़ है. ना वो बीमार पड़ता है, ना उसे तीमारदारी की ज़रूरत है, ना उसका कोई रिश्तेदार है. तौबा कर और उससे डर. 
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब में भरे हुए ये अल्फ़ाज़ सुनकर चरवाहे के औसान ख़ता हो गए और वो ख़ौफ़ से थर-थर कांपने लगा. चेहरा ज़र्द पड़ गया. वह  बोला- ऐ ख़ुदा के जलील-उल-क़द्र नबी ! तूने ऐसी बात कही कि मेरा मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया और मारे नेदामत के मेरी जान हलाक़त में पड़ गई.
ये कहते ही चरवाहे ने सर्द आह खींची अपना गिरेबान तार-तार किया और दीवानों की तरह अपने सर पर ख़ाक उड़ाता हुआ ग़ायब हो गया.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम हक़ तआला से हमकलाम होने के लिए कोहे-तूर पर गए, तो ख़ुदा ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! तूने मेरे बंदे को हमसे जुदा क्यों किया? तू दुनिया में जुदाई के लिए आया है या मिलाप के लिए? ख़बरदार ! इस काम में एहतियात रख. मैंने अपनी मख़लूक़ में हर शख़्स की फ़ितरत अलग बनाई है  और हर फ़र्द को दूसरों से जुदा अक़ल बख़्शी है. जो बात एक के हक़ में अच्छी है, वो दूसरे के लिए बुरी है. जो एक के हक़ में तिरयाक़ का असर रखती है, वही दूसरे के लिए ज़हर है. एक के हक़ में नूर और दूसरे के हक़ में नार, हमारी ज़ात पाकी और नापाकी से मुबर्रा है. ऐ मूसा ! ये मख़लूक़ मैंने इसलिए पैदा नहीं फ़रमाई कि उससे मेरी ज़ात को कोई फ़ायदा पहुंचे, उसे पैदा करने का मक़सद ये है कि उस पर मैं अपने कमालात की बारिश करूं. जो शख़्स जिस ज़बान में भी मेरी हम्द-ओ-सना करता है, उससे मेरी ज़ात में कोई कमीबेशी वाक़े नहीं होती, ज़िक्र करने वाला ख़ुद ही पाक साफ़ होता है. मैं किसी के क़ौल और ज़ाहिर पर निगाह नहीं रखता, मैं तो बातिन और हाल देखता हूं. ऐ मूसा ! ख़िर्द-मंदों के आदाब और हैं, दिलजलों और जान हारों के आदाब और हैं.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब ख़ुदा का ये इताब आमेज़ ख़िताब सुना, तो सख़्त पशेमान हुए और बारगाहे-इलाही में निहायत नेदामत और शर्मसारी से मुआफ़ी मांगी. फिर उसी इज़्तिराब और बेचैनी में उस चरवाहे को ढ़ूढने जंगल में गए.
सहरा-ओ-बियाबान की ख़ाक छान मारी, लेकिन चरवाहे का कहीं पता ना चला. इस क़द्र चले कि पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन तलाश जारी रखी. आख़िर आप उसे पा लेने में कामयाब हुए. चरवाहे ने उन्हें देखकर कहा- ऐ मूसा ! अब मुझसे क्या ख़ता हुई है कि यहां भी आ पहुंचे? 
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया- ऐ चरवाहे ! मैं तुझे मुबारक देने आया हूं. तुझे हक़ तआला ने अपना बंदा फ़रमाया और इजाज़त अता की कि जो तेरे जी में आए बिला-तक़ल्लुफ़ कहा कर.  तुझे किसी अदब-ओ-आदाब क़ायदे-ज़ाबते की ज़रूरत नहीं, तेरा कुफ़्र असल दीन है, और दीन नूर-ए-जां. तुझे सब कुछ माफ़ है, बल्कि तेरे सदक़े में तमाम दुनिया की हिफ़ाज़त होती है.
चरवाहे ने आंखों में आंसू भरकर कहा- ऐ पैग़म्बर-ए-ख़ुदा ! अब मैं इन बातों के क़ाबिल ही कहां रहा हूं कि कुछ कहूं. मेरे दिल का ख़ून हो चुका है, अब मेरी मंज़िल बहुत आगे है, तूने ऐसी ज़र्ब लगाई कि हज़ारों लाखों साल की राह तय कर चुका हूं. मेरा हाल बयान के क़ाबिल नहीं और ये जो कुछ मैं कह रहा हूं इसे भी मेरा अहवाल मत जान.
मौलाना रूमी इस हिकायत से हासिल ये निकालते हैं कि "ऐ शख़्स ! जो तू हक़ तआला की हमद-ओ-सना बयान करता है, क्या समझता है? तू तो इब्तिदा से इंतिहा तक नाक़िस और तेरा हाल-ओ-क़ाल भी नाक़िस, ये महज़ उस परवरदिगार रहमान-ओ-करीम का करम है कि वो तेरे नाक़िस और हक़ीर तोहफ़े को क़बूल फ़रमाता है.

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रब से गुफ़्तगू

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मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत गुनाहगार हूं.
जवाब मिला : अल्लाह की रहमत से मायूस न हो. अल्लाह सब गुनाह बख़्श देगा. बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला और बड़ा मेहरबान है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे तेरी मदद कैसे मिलेगी ?
जवाब मिला : सब्र और नमाज़ से मदद लिया करो.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे दिल को सुकून नहीं है.
जवाब मिला : बेशक अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून और इत्मीनान मिलता है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत तन्हा हूं.
जवाब मिला : बेशक हम तुम्हारी शह रग से भी ज़्यादा क़रीब हैं.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे कोई याद नहीं करता.
जवाब मिला : तुम हमें याद करो, हम तुम्हें याद करेंगे.

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अम्बिया इकराम

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दुनिया में कुल कितने अम्बिया इकराम आएं ? और उनमें से किन अम्बिया का ज़िक्र क़ुरआन में है ? जानिए
कमोबेश 124000 अम्बिया इकराम इस रूए ज़मीन पर आए, जिनमे से 313 या 315 ही रसूल हैं और बाक़ी नबी.  नबी उसे कहते हैं, जिसे वही आती हो, लेकिन तबलीग़ पर मामूर हो या ना हो और रसूल वह होता है जिस पर वही भी आती है और उसे तबलीग़ का हुक्म भी होता है.
इनमें से 26 रसूलों का ज़िक्र नाम के साथ क़ुरआन में आया है.
01. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम
02. हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम
03. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम
04. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम
05. हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम
06. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम
07. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
08. हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम
09. हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम
10. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम
11. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम
12. हज़रत ज़लकिफ़ली अलैहिस्सलाम
13. हज़रत शुऐबअलैहिस्सलाम
14. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
15. हज़रत हारुन अलैहिस्सलाम
16. हज़रत अलयसअ अलैहिस्सलाम
17. हज़रत इलियास अलैहिस्सलाम
19. हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम
20. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम
21. हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम
22. हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम
23. हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम
24. हज़रत यहया अलैहिस्सलाम
25. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
26. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और 3 का ज़िक्र इशारे के तौर पर हुआ
01. हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम
02. हज़रत यूशा अलैहिस्सलाम
03. हज़रत ख़िज्र अलैहिस्सलाम
इन तमाम नबियों में 5 बहुत ज़्यादा मर्तबे वाले हुए
1. हज़रत मुहम्मदसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
2. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
3. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
4. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
5. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम

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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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