डॉ. फ़िरदौस ख़ान का परिचय

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक इस्लामी विदुषी, शायरा, कहानीकार, लेखिका, पटकथा लेखिका, निबंधकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं। उन्हें ‘लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी’ के नाम से जाना जाता है। उनके लेखन की ख़ासियत ये है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में बयां करती हैं। उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है। उन्हें जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है। उनका कलाम गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, और कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है। 

साहित्य 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं। वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने ‘फ़हम अल क़ुरआन’ लिखा है, जो उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है। वे कहती हैं- “हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं। हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया। उन्हें देखकर हमारी दिलचस्पी इबादत में हो गई। साथ ही बहुत कम उम्र से रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई। फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की। दरअसल, हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है।” 

उन्होंने सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था। यह किताब चर्चा में बनी हुई है। भक्ति और सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं। 

उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था। वे बताती हैं- “जब हम छठी जमात में पढ़ते थे। तब एक नज़्म लिखी थी। अम्मी और अब्बू को नज़्म सुनाई, तो उन्हें बहुत पसंद आई। अब्बू ने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई। नज़्म ख़ूब सराही गई। इस तरह लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है। सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया। 

उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा.

मीडिया 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र, आकाशवाणी और देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में कई सालों तक काम किया है। वे दूरदर्शन केन्द्र के समाचार अनुभाग की प्रख्यात सम्पादक और आकाशवाणी की मनोरंजन प्रसारक रह चुकी हैं।
वे कहती हैं- “आकाशवाणी से हमारा दिल का रिश्ता है। रेडियो सुनते हुए ही बड़े हुये। बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ। रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था। उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे। पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हुई हैं।  आज भी रेडियो से उतना ही लगाव है। इसी तरह दूरदर्शन के साथ भी हमारी ख़ूबसूरत यादें वाबस्ता हैं। बचपन में जब दूरदर्शन देखते थे, तब ये सोचा भी नहीं था कि कभी हम ख़ुद इसका हिस्सा बनेंगे। नवम्बर 2002 में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक के तौर पर दूरदर्शन से जुड़ना हुआ। वह वक़्त भी ज़िन्दगी का बहुत ख़ूबसूरत और यादगार वक़्त रहा।“    

इसके अलावा उन्होंने कई समाचार चैनलों में भी अपनी प्रतिभा का योगदान दिया है। उन्होंने कई वृत्तचित्र, टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटक भी लिखे हैं। वे देश और विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, समाचार और फ़ीचर एजेंसियों के लिए लिखती हैं। देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं।

मुशायरे और कवि सम्मेलन
डॉ. फ़िरदौस ख़ान मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं। कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली है। वे बताती हैं- “जब सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज के सम्पादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘गीतकार’ में गीत प्रकाशित हुआ, तो दूर-दूर से मुशायरों और कवि सम्मेलनों के लिए आमंत्रण आने लगे। भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने का भी मौक़ा मिला। इसके अलावा अनेक गोष्ठियों में भी हिस्सा लिया।”      

सम्मान
उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है। न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया था। राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन द्वारा उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ पत्रकार’ अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें दो डॉक्टरेट की मानद उपाधियां भी शामिल हैं। वे कहती हैं- “हमारे अल्फ़ाज़, हमारे जज़्बात और ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि हमारे लफ़्ज़ ही हमारी पहचान हैं। पाठक हमारे लिखे को पसंद करते हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।” 

अनुवाद 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान कई भाषाओं की जानकार हैं। वे उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखती हैं। विदेशों में उनकी अंग्रेज़ी कवितायें बहुत पसंद की जाती हैं। उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम् का पंजाबी अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ। वे राजकीय महाविद्यालय हिसार की पंजाबी की पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। उन्होंने राहुल गांधी पर एक नज़्म भी लिखी, जो ख़ूब सराही गई।   

ब्लॉग 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ब्लॉग भी लिखती हैं। उनके कई ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन करीम का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है। ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है। ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है। ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है। ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है। ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का ब्लॉग है। 
 
देश सेवा  
डॉ. फ़िरदौस ख़ान देश सेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन के तौर पर कई साल काम किया है। इसके अलावा वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं।   

देश के सुप्रसिद्ध लेखकों और पत्रकारों ने उनके बारे में कई बार लिखा है। हाल ही में प्रकाशित श्री यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक ऐसी लेखिका के रूप में शामिल किया गया है, जो अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं और समाज को एक नई दिशा दे रही हैं।    

अपनी अभिलाषाओं के बारे में वे कहती हैं- “हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला। ज़मीन चाही, तो आसमान मिला। इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की ‘चाह’ ही नहीं रही।” वे अपने बारे में कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…












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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

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फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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