सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

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दस बीबियों की कहानी

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
कहते हैं, ये एक मौजज़ा है कि कोई कैसी ही तकलीफ़ में हो, तो नीयत करे कि मेरी मुश्किल ख़त्म होने पर दस बीबियों की कहानी सुनूंगी, तो इंशा अल्लाह मुसीबत से निजात मिलेगी और हाजत पूरी होगी.

मुश्किलों को दूर करो सुन कर कहानी सैयदा
बीबियों मांगो दुआ देकर सदा-ए-सैयदा
आफ़तें टल जाएंगी नाम से उन बीबियों के
लम्हा-लम्हा देखेंगी आप मौजज़ा सैयदा

दस बीबियों की कहानी
एक शहर में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई बहुत अमीर था और छोटा भाई बहुत नादार व मुफ़लिस था. वह अपनी मुफ़लिसी और नादारी से बहुत आज़िज़ आ गया था. वह अपनी बीवी से कहने लगा, यहां कब तक फ़िक्र व फ़ाक़ा की मुसीबत सहें. अब मैं परदेस जाता हूं. शायद मुझको कहीं नौकरी मिल जाए और ये मुसीबत के दिन कट जाएं.

यह कहकर वह शख़्स अपनी बीवी से रुख़्सत होकर रोज़गार की तलाश में परदेस चला गया. अब यहां उसकी बीवी बहुत परेशान थी. दिल में कहने लगी, ऐ पालने वाले ! तू ही रज़्ज़ाक़ है. अब मेरा शौहर भी चला गया. अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा, सिवाय तेरी ज़ात पाक के. ये मोमिना जब बहुत मजबूर हो गई, तो अपने शौहर के बड़े भाई के घर गई और अपने सब हालात बयान किए. तमाम हाल सुनकर उस शख़्स ने अपनी बीवी से कहा, ये मेरी भावज आई है. तुम इससे घर का काम कराओ. ये तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की ख़िदमत करेगी. तुम जो कुछ अपने खाने से बचे, इसे दे दिया करो. ग़र्ज़ कि ये मोमिना अपने शौहर के भाई के घर के तमाम काम करती. सारा दिन बच्चों की ख़िदमत करती. उस पर भी अमीर की बीवी उसे ताने देती और अपने आगे का बचा हुआ खाना उस ग़रीब को देती. इसी तरह एक मुद्दत गु़ज़र गई. हर रात ये मुसीबतज़द मोमिना अपने शौहर की वापसी की दुआ मांगती थी. इसी हालत में एक शब ये मोमिना रोते-रोते सो गई. उसने ख़्वाब में देखा कि एक बीबी नक़ाब पोश तशरीफ़ लाईं और फ़रमाया कि ऐ मोमिना तू अपने शौहर के लिए इस तरह परेशान न हो. इंशा अल्लाह तेरा शौहर सही सलामत तुझसे आकर मिलेगा. तू जुमेरात के दिन दस बीबियों की कहानी सुन, और जब तेरा शौहर आ जाए, तो मीठी रोटी का मलीदा बनाकर उसके दस लड्डू बनाना और उस पर दस बीबियो की नियाज़ देना.
इस औरत ने सवाल किया कि आप कौन हैं और आपका नाम क्या है और इन दस बीबियों के नाम क्या हैं, जिनकी नियाज़ दिलाऊं.

तब जनाब सैयदा ने फ़रमाया, मेरा नाम सैयदा ताहिरा फ़ातिमा ज़ोहरा दुख़्तर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है और नौ बीबियों के नाम हैं-
हज़रत मरियम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सायरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत आसिया (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत हाजरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत ज़ैनब (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा सोग़रा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा कूबरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सकीना (रज़ि अल्लाहु अन्हा). इन्हें ज़िन्दगी बहुत मुसीबतें सहनी पड़ीं और इन बीबियों ने सब्र किया. जो शख़्स इनकी तुफ़ैल में अल्लाह से जो भी हाजत तलब करेगा, ख़ुदावंद आलम उसकी हाजत पूरी करेगा.

कहानी यह है. एक दिन जनाब अमीरुल मोमेनीन ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना मेहमान किया. उस दिन घर में फ़ाक़ा था. आप थोड़ा-सा जौ का आटा कहीं से क़र्ज़ लाए और जनाब सैयदा को देकर कहा कि आज रसूले-ख़ुदा मेरे मेहमान हैं. जनाब सैयदा ने उसकी छह रोटियां पकाईं. मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तशरीफ़ लाए और दस्तरख़्वान पर बैठे. जनाब सैयदा ने एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को दी और पांच पंजतन पाक ने खाईं. जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो जनाब सैयदा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से अर्ज़ किया कि मुझे भी सरफ़राज़ फ़रमाएं. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली. इसी तरह नवासों हज़रत इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने भी अपने नाना हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दावत दी. शेरे-ख़ुदा हज़रत अली हर रोज़ सामान क़र्ज़ पर लाते. जनाब सैयदा अनाज पीसतीं और उसकी छह रोटियां पकातीं. एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को देतीं और पांच रोटियां पंजतन पाक नोश फ़रमाते.

हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की दावत के बाद जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि हज़रत फ़ज़ा दरवाज़े पर खड़ी हैं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दरयाफ़्त किया कि फ़ज़ा कुछ कहना चाहती हो. इस पर हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि कनीज़ इस क़ाबिल नहीं कि आपको दावत दे, लेकिन मैं भी उम्मीदवार हूं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली.
अगले दिन शाम को मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जनाब सैयदा के घर तशरीफ़ लाए. सबने उठकर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इस्तक़बाल किया. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि आज फ़ज़ा का मेहमान हूं.
हज़रत फ़ज़ा ने किसी से इसका ज़िक्र नहीं किया था. घर में फ़ाक़ा था. हज़रत अली ने कहा कि पहले से कह देतीं, तो सामान मुहैया करा देता. हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि आप परेशान न हों, अल्लाह मुसब्बेबल असबाब है. हज़रत फ़ज़ा एक गोशे में गईं और सजदे में गिर गईं. वह अल्लाह से दुआ करने लगीं, या क़ाज़ी अलहाजात, इस तंग दस्ती और नादारी में तू आलम दाना है. तेरे महबूब को मेहमान किया है. तुझे वास्ता आल मुहम्मद का मुझे शर्मिन्दा न करना. उन्होंने सजदे से सर उठाया, तो क्या देखती हैं कि जन्नत की हूरें खानों का तबाक़ लिए खड़ी हैं. हज़रत फ़ज़ा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने खाने का तबाक़ रखा और सबने मिलकर खाना खाया. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि ये खाना कहां से आया. गोया आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पहले से ही जानते थे. हज़रत जिब्राईल रास्ते में ही आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बता गए थे. लेकिन आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ये ज़ाहिर करना था कि हमारे घर की कनीज़ें भी अल्लाह को ऐसी प्यारी हैं कि उनके सवाल को भी अल्लाह रद्द नहीं करता.
अल्लाह के खज़ाने में किसी चीज़ की कमी नहीं है. अल्लाह पर यक़ीन रखने से सबकुछ मिल जाता है.

जब मोमिना ख़्वाब से बेदार हुई, तो वह दिन जुमेरात का था. वह अपने मुहल्ले में गई और कहने लगी कि मैंने ऐसा ख़्वाब में देखा है. तुम लोग पास बैठकर जनाब सैयदा की कहानी सुन लिया करो. मुहल्ले की औरतें उसके पास आकर जमा हो गईं. उस मोमिना ने दस बीबियों की कहानी पढ़नी शुरू की. नौ दिन गुज़र गए. जब दसवां दिन आया, तो मोमिना क्या देखती है कि उसका शौहर सही सलामत माल व ज़र के साथ उसके दरवाज़े पर खड़ा है.

वह बहुत ख़ुश हुई और फ़ौरन ग़ुस्ल कर मीठी रोटी का मलीदा बनाया और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलवाई. उसने नियाज़ के लड्डू तक़सीम किए. सबने बड़े ऐहतराम से लड्डू लिए. उसके बाद मोमिना एक लड्डू लेकर अपने शौहर की भावज के पास गई. उस मग़रूर औरत ने ये कहकर लड्डू वापस कर दिया कि हम ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें नहीं खाते. हमारे घर से ये लड्डू ले जाओ. वह लड्डू वापस ले आई और लड्डू खाकर अल्लाह का शुक्र अदा किया.

अब इस मग़रूर औरत का हाल सुनिए. रात को वह औरत सो गई. सुबह को क्या देखती है कि उसके बच्चे मर गए और सब सामान ग़ायब हो गया. ये देखकर उसके हवास जाते रहे. दोनों मियां-बीवी रोने लगे. जब कई वक़्त गुज़र गए, तो भूख से उनका बुरा हाल हो गया. घर में गेहूं की भूसी मिली. उस औरत ने सोचा कि इसे पकाकर खा लें. जैसे ही उसने भूसी को हाथ लगाया, उसमें बराबर के कीड़े नज़र आने लगे. जब उसके शौहर ने ये माजरा देखा, तो कहने लगा कि मेरी बहन के घर चलो, वहां खाना मिल जाएगा. घर बंद करके दोनों मियां-बीवी पैदल ही चल पड़े. चलते-चलते उनके पैरों में छाले पड़ गए. रास्ते में उन्हें चने का हराभरा खेत नज़र आया. शौहर ने अपनी बीवी से कहा कि तुम यहां बैठ जाओ, मैं चने की कुछ बालियां तोड़ लाऊं, ताकि उनको खाकर ताक़त आ जाए. ये कहकर वह बहुत-सी चने की बालियां तोड़ लाया. मगर जैसे ही उसकी बीवी ने चने की बालियों को हाथ लगाया, वे सूखकर घास बन गईं. दोनों घास को फेंक कर आगे चल पड़े. कुछ दूर चलने के बाद उन्हें रास्ते में बहुत बड़ा गन्ने का खेत नज़र आया. मियां-बीवी दोनों ही भूख और प्यास से बेताब थे. गन्ने को देखकर वे बेक़रार हो गए. शौहर बहुत से गन्ने तोड़ लाया और बीवी के हाथ में दिए. बीवी का हाथ लगते ही गन्ने भी घास बन गए. वे दोनों बहुत घबरा गए और घास को फेंक कर आगे चल दिए.

कुछ वक़्त बाद ये शख़्स बीवी के साथ अपनी बहन के घर पहुंच गया. उसकी बहन ने उनके लिए बिछौना बिछाया. जब दोनों ने आराम कर लिया, तो उसकी बहन ने उन्हें लाकर खाना दिया. ये लोग कई दिन के भूखे थे. खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए. जैसे ही उसकी बीवी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा, तो क्या देखती है कि खाने में से सख़्त बदबू आ रही है. खाना सड़ गया है. ये दोनों अपना सर पकड़ कर बैठ गए और कहने लगे कि अल्लाह हम कब तक भूखे-प्यासे रहेंगे. भूख से जान निकले जा रही है. उन्होंने खाने को दफ़न कर दिया. रात जिस तरह गुज़री, उन्होंने गुज़ारी. सुबह हुई, तो शौहर ने कहा कि यहां का बादशाह मेरा दोस्त है. उसके पास चलें, देखें इस मुसीबत के आलम में वह हमारी क्या मदद करता है.

दोनों बादशाह के पास गए. जब वे बादशाह के हुज़ूर में पहुंचे, तो बादशाह ने उन्हें पहचान लिया. उन्हें अलग कमरा दिया गया. बादशाह ने उनसे कहा कि तुम दोनों ग़ुस्ल करके आराम करो. बादशाह ने हुक्म दिया कि हमारे मेहमानों को सात रंग का खाना भेजो. बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ उनके लिए सात रंग का खाना लाया गया. दोनों खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए और दस्तरख़्वान पर आकर बैठ गए. वह औरत जिस खाने को हाथ लगाती, वह खाना सड़ जाता. ग़र्ज़ कि तमाम खाना सड़ गया और उसमें कीड़े नज़र आने लगे. उसका शौहर हैरान हो गया कि ये क्या माजरा है. अगर हम बादशाह से शिकायत करेंगे, तो बादशाह नाराज़ होगा कि ताज़ा खाना भेजा और तुम हमको बदनाम करते हो. वह बहुत घबराया और बीवी से कहने लगा कि अब मैं क्या करूं. इतना बहुत सा खाना सड़ गया. बादशाह कहेगा कि इन लोगों ने जादू कर दिया है.

अलग़र्ज़ दोनों खाना लेकर बाहर आए और ज़मीन में दफ़न कर दिया. शौहर बहुत हैरान था कि ये सब क्या हो रहा है. औरत भी बहुत घबराई हुई थी. वह सेहन में आकर बैठ गई. उसने देखा कि बादशाह की लड़की ग़ुस्ल के लिए जा रही है. बादशाह की बीवी ने कहा कि वह भी ग़ुस्ल करेगी. ग़र्ज़ ये है कि दोनों ग़ुस्ल के लिए जाने लगीं. उन दोनों ने अपने चंदन हार उतार के खूंटी पर टांग दिए. ज्यूं ही उन्होंने हार टांगे, फ़ौरन खूंटी हार निग़ल गई. ये माजरा देखकर उन्हें बेहद हैरानी हुई. वह औरत घबरा कर अपने शौहर के पास आई और कहने लगी कि अब ख़ुदा ख़ैर करे. उसके शौहर ने पूछा कि क्या हुआ? तब उसने चंदन हार का सारा वाक़िया सुनाया और कहा कि अब यहां से चलो, कहीं बादशाह इस इल्ज़ाम में हमें जेल भेज दे या क़त्ल करा दे. दोनों मियां-बीवी बग़ैर इत्तला किए वहां से चल दिए. चलते-चलते वे एक दरिया के किनारे पहुंचे. दोनों वहां जाकर बैठ गए. शौहर बीवी से कहने लगा कि नहीं मालूम हमसे ऐसी क्या ख़ता हुई है, जो हम पर ऐसा अज़ाब नाज़िल हुआ है.
यह सुनकर बीवी कहने लगी कि जब तुम्हारा भाई मुलाज़िमत के लिए परदेस गया था और उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था. तब तुम्हारी भावज बहुत परेशान रहती थी. उस वक़्त उसने ख़्वाब में देखा था कि एक नक़ाब पोश बीबी तशरीफ़ लाई और उन्होंने फ़रमाया कि तू दस बीबियों की कहानी सुन ले, जब तेरा शौहर आ जाए, तो दस बीबियों की नियाज़ दिलाना. जब तुम्हारा भाई आ गया, तो तुम्हारी भावज ने मीठी रोटी का मलीदा उसके दस लड्डू बनाए और दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. तुम्हारी भावज ने नियाज़ के लड्डू सबको तक़सीम किए और एक लड्डू मेरे लिए भी लेकर आई. लेकिन मैंने वह लड्डू ये कहकर लेने से मना कर दिया कि मैं ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें खाने वाली नहीं हूं. इस पर तुम्हारी भावज लड्डू वापस ले गई. ये गुनाह मुझसे ज़रूर हुआ है और तब से ही यह मुसीबत हम पर नाज़िल हुई है.

शौहर ने कहा कि ऐ कमबख़्त ! तूने ऐसे ग़ुरूर और तकब्बुर के अल्फ़ाज़ कहे. तू जल्दी से तौबा कर और मुआफ़ी मांग, ताकि हमको इस मुसीबत से निजात मिल सके. उस औरत ने ग़ुस्ल किया, नमाज़ पढ़ी और रो-रोकर अपनी ग़लती की मुआफ़ी मांगी और दुआ की कि ऐ बिन्ते रसूल ! इस मुसीबत के आलम में मेरी मदद कीजिए. इसके बाद उसने नहर से रेत निकाली और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. अल्लाह के करम और पाक बीबियों की तुफ़ैल में वे लड्डू मोती चूर के हो गए. उन्होंने लड्डू खाए, पाने पिया और अल्लाह का शुक्र अदा किया.

शौहर ने कहा कि अब घर चलो, हमारी ख़ता मुआफ़ हो गई. अब वे घर आकर क्या देखते हैं कि घर असली हालत में है. ग़ल्ला वग़ैरह जिस तरह भरा हुआ, था वैसा ही भरा हुआ है. नौकर घर के काम में मशग़ूल हैं. बच्चे ज़िन्दा हो गए. वे क़ुरान की तिलावत कर रहे हैं. मां-बाप को देखकर बच्चे बहुत ख़ुश हुए.

ऐ मेरी पाक बीबियों ! जिस तरह आपने इस औरत की ख़ता मुआफ़ की, उसी तरह हम सबकी ख़तायें मुआफ़ हों और दिल की मुरादें पूरी हों.
आमीन
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बाज़ार में मिलने वाली दस बीबियों की कहानी की किताबों में बहुत सी ग़लतियां हैं. इसलिए हमने  इसे दुरुस्त करके यहां पेश किया है.
-फ़िरदौस ख़ान

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पढ़ें, अमल करें और सवाब हासिल करें

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क़यमात के रोज़ इंसान एक-एक नेकी के लिए तरसेगा... उस वक़्त हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र होगी... कोई किसी को मांगने पर भी नेकी न देगा... इसलिए बेहतर यही है कि इंसान अपने आमाल से नेकियां हासिल करे, जो उसकी मग़फ़िरत का ज़रिया बन सकें...
पेश हैं कुछ तस्बीह, जिन्हें पढ़कर आप सवाब हासिल कर सकते हैं.

1. सवाल : क्या आज आप ने जन्नत में एक महल बनाया?
जवाब: दस बार सूरह इख़लास पढ़कर [अहमद]

2. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में खजूर के 100 दरख़्त लगाए ?
जवाब:  100 बार सुब्हानल्लाहिल-अज़ीम वबिहम्दिही पढ़कर. [तिर्मिजी]

3. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में 400 दरख़्त लगाए ?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर, पढ़कर. [इब़्न माजह]

4. सवाल : क्या आज आपने एक क़ुरआन मजीद पढ़ने का सवाब कमाया?
जवाब: तीन बार सूरह इख़लास पढ़कर. [मुस्लिम]

5. सवाल: क्या आज आपने करोड़ों नेकियां कमाईं?
जवाब: मोमिनों के लिए दुआ-ए-मग़फ़ित करके. [तबरानी]

6. सवाल: क्या आज आपने जन्नत मे एक घर बनाया?
जवाब: नमाज़ के लिए सफ़ की ख़ाली जगह को भरकर. [इब्न माजह]

7. सवाल: क्या आज आपने एक हज का सवाब कमाया?
जवाब: फ़र्ज़ नमाज़ के लिए घर से अच्छी तरह वज़ू करके जाकर. [अबु दाऊद]

8. सवाल: क्या आज आपने ज़मीन और आसमान की ख़ाली जगह भरकर नेकियां कमाईं?
जवाब: 100 बार ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़कर. [अहमद]

9. सवाल: क्या आज आपने अल्लाह की राह में 100 घोड़े देने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर. [अहमद]

10. सवाल: क्या आज आपने मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में 100 ऊंट क़ुर्बान करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्लाहु अकबर पढ़कर. [अहमद]

11. सवाल: क्या आज आपने 100 ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह पढ़कर. [अहमद]

12. सवाल: क्या आज आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत हासिल करने वाला अमल किया?
जवाब: सुबह व शाम दस-दस बार दुरूद शरीफ़ पढ़कर. [तबरानी]

13. सवाल: क्या आज आपने वह अमल किया, जिस जैसा अमल क़यामत के दिन लेकर आने वाला कोई न होगा सिवाय उसके जो इस जैसा अमल करे?
जवाब: 100 बार सुब्हानल्लाही वबिहम्दिही पढ़कर. [मुस्लिम]

14. सवाल: क्या आज आपने पूरी रात इबादत करने का सवाब कमाया?
जवाब: नमाज़-ए-इशा और नमाज़-ए-फ़ज्र बा जमाअत पढ़कर. [मुस्लिम]

15. सवाल : क्या आज आपने वज़ू के बाद वह दुआ पढ़ी, जिसके सवाब को क़यामत के दिन तक कोई चीज़ नहीं मिटा सकती?
जवाब: सुब्हाना कल्लाहुम्मा वबिहम्दिका अश-हदू अन ला इलाहा इल्ला अन्ता अस्तग़फ़िरूका वातुबू इलैक. [हाकिम]

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.




आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए. 
फ़िरदौस ख़ान


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रमज़ान और शबे-क़द्र

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels:: , , ,


रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है. शबे क़द्र का अर्थ होता है " सर्वश्रेष्ट रात " ऊंचे स्थान वाली रात " लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात, शबे-क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।
निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. " (सुराः कद्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।
इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। " और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।" (सुराः कद्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। " (सुराः कद्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। " यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। " हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।...... " (सुराः अद् दुखान)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। " (सुराः अद् दुखानः5 )
(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।
मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। " जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?
यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।
शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया " शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।" ( तब्रानी )
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है " शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।" ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।" ( सही मुस्लिम )
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी" अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन...

Courtesy jiwankatha

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रजब की फ़ज़ीलत...

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माहे-रजब में दिन में रोज़ा रखने और रात में इबादत करने का सवाब सौ साल के रोज़े रखने के बराबर होता है... हो सके, तो इबादत करें... पता नहीं अगली मर्तबा ये मौक़ा मिले या न मिले...
अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

रजब इस्लामी साल का सातवां महीना है. यह बड़ा अज़मत वाला महीना है और इसमें नेकियों का सवाब दोगुना हो जाता है. रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है. इस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेशुमार रहमते और मग़फ़िरत की बारिश करता है. इस माह में बंदों की इबादतें और दुआएं क़ुबूल की जाती हैं. रजब को ताजीम यानी आदर का माह कहा जाता है. इस महीने की ताज़ीम करे, गुनाहों से दूर रहें, तौबा अस्तग़फ़ार करते रहें, अल्लाह तआला की इबादत करें, सदक़ा और ख़ैरात ज़्यादा ज़्यादा करें.

हज़रत सैयदुना अल्लामा सफ़्फ़ुरी रहमतुल्लाह अलैह रमाते हैं- रजब-उल-मुरज्जब बीज बोने का, शाबान-उल-मुअज़्ज़म आब-पाशी (यानि पानी देने) का और रमज़ान-उल-मुबारक फ़सल काटने का महीना है. लिहाज़ा जो रजब-उल-मुरज्जब में इबादत का बीज नहीं बोता और शाबान-उल-मुअज़्ज़म में आंसुओं से सैराब नहीं करता, वह रमजान-उल-मुबारक में फ़सले-रहेमत क्यूं कर काट सकेगा? मज़ीद फ़रमाते हैं : रजब-उल-मुरज्जब जिस्म को, शाबान-उल-मुअज़्ज़म दिल को और रमज़ान-उल-मुबारक रूह को पाक करता है. (Nuzhat-ul-Majalis, jild 1, safha 209)

अल्लाह तआला के नज़दीक 4 महीने खुसूसियात के साथ हुरमतवाले हैं. जुल कदा, जुल हिज्जाह, मुहर्रम और रजब.
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जिसने माहे-हराम (यानी हुरमतवाले महीने में) में तीन दिन जुमेरात, जुमा और हफ़्ता (यानि सनीचर) का रोज़ा रखा, उसके लिए दो साल की इबादत का सवाब लिखा जाएगा. (Al Mu’jam-ul-Awsat lit-Tabrani, jild 1, safha 485, Hadees 1789)

हज़रत सैयदुना अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- जन्नत में एक नहर है, जिसे रजब कहा जाता है, जो दूध से ज़्यादा सफ़ेद और शहद से ज़्यादा मीठी है. जो कोई रजब का एक रोज़ा रखे, तो अल्लाह तआला उसे इस नहर से सैराब करेगा. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 367, Hadees 3800)

ताबई बुज़ुर्ग हज़रत सैयदुना अबु क़िलाला रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- रजब के रोज़ादारों के लिए जन्नत में एक महल है. (Shu’ab ul-Imaan, jild 3, safha 368, Hadees 3802)

हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने भी रजब का रोज़ा रखा
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-  जिसने रजब का एक रोज़ा रखा, तो वह एक साल के रोज़ों की तरह होगा. जिसने सात रोज़े रखे, उसपर जहन्नुमम के सातों दरवाज़े बंद कर दिए जाएंगे. जिसने आठ रोज़े रखे, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएंगे. जिसने दस रोज़े रखे, वह अल्लाह से जो कुछ मांगेगा अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाएगा. और जिसने 15 रोज़े रखे, तो आसमान से एक मुनादी निदा (यानी ऐलान करने वाला ऐलान) करता है कि तेरे पिछले गुनाह बख़्श दिए गए, तू अज़ सर-ए-नौ अमल शुरू करके तेरी बुराइयां नेकी से बदल दी गईं. और जो ज़्यादा करे, तो अल्लाह उसे ज़्यादा दे. और रजब में नूह अलैहि सलाम कश्ती में सवार हुए, तो ख़ुद भी रोज़ा रखा और हमराहियों को भी रोज़े का हुक्म दिया. उनकी कश्ती 10 मुहर्रम तक 6 माह बरसरे-सफ़र रही. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 368, Hadees 3801)

परहेज़गारी से एक रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत
हज़रत शेख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह नक़ल करते हैं कि सुल्ताने-मदीना सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- माहे रजब हुरमत वाले महीनों में से है और छठे आसमान के दरवाज़े पर इस महीने के दिन लिखे हुए हैं. अगर कोई शख़्स रजब में एक रोज़ा रखे और उसे परहेज़गारी से पूरा करे, तो वह दरवाज़ा और वह (रोज़ेवाला) दिन उस बंदे के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत तलब करेंगे और अर्ज़ करेंगे- या अल्लाह तआला इस बंदे को बख़्श दे और अगर वह शख़्स बग़ैर परहेज़गारी के रोज़ा गुज़ारता है, तो फिर वह दरवाज़ा और दिन उसकी बख़्शीश की दरख़्वास्त नहीं करेंगे और उस शख़्स से कहते हैं- ऐ बंदे तेरे नफ़्स ने तुझे धोका दिया. (Ma-Sabata bis-Sunnah, safha 234, fazail Shahr-e-Rajab-lil Khallal, safha 3-4)

रसूले-अकरम ने फ़रमाया है कि रजब का महीना ख़ुदा के नज़दीक अज़मत वाला महीना है. इस माह में जंग करना हराम है. रिवायत है कि रजब में एक रोज़ा रखने वाले को ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल होती है . ख़ुदा का ग़ज़ब उससे दूर हो जाता है और जहन्नुम के दरवाज़े में एक दरवाज़ा उसके लिए बंद हो जाता है.
इमाम मूसा काजिम (अस ) फ़रमाते हैं कि रजब माह में एक रोज़ा रखने से जहन्नुम की आग एक साल की दूरी तक हो जाती है. जो इस माह में तीन रोज़े रखे, तो उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है .

इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) से रवायत है कि रसूले-अकरम ने फ़रमाया कि रजब मेरी उम्मत के लिए अस्तग़फ़ार का महीना है. इसलिए इस माह ख़ुदा से ज़्यादा से ज़्यादा मग़फ़िरत चाहो. ख़ुदा बड़ा मेहरबान है.
रसूले-अकरम फ़रमाते हैं कि रजब को असब भी कहते हैं, क्योंकि इस माह में ख़ुदा कि रहमत बहुत ज़्यादा बरसती है. इसलिए इस माह कसरत से अस्तग़फ़ार भेजो. जो इस माह के आख़िर में एक रोज़ा रखेगा, ख़ुदा उसको मौत की सख़्तियों, मौत के बाद की हौल्नकी और क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ रखेगा.
जो इस माह के आख़िर में दो रोज़े रखेगा, वह पुले-सरात से आसानी से गुज़र जाएगा.
जो तीन रोज़े रखेगा, उसे क़यामत की सख़्तियों से महफूज़ रखा जाएगा और उसको जहन्नुम की आज़ादी का परवाना अता होगा.

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या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...

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फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है.

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है. मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं.

ख़ुशनूदी ख़ान कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़नदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता. रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों का चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं.
ज़ीनत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं.
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं. यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि. अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं.

हदीस
जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते. ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है.
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं. रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने. दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक़्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे. रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है. लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं. आधी रात तक बाज़ार सजते हैं. इस दौरान सबसे ज़्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है. दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है. इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं. अलविदा जुमे को भी नये कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है. हर बार नये डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं. नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है. दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है. इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं. ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज़्यादा होते हैं. इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है. शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है.

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है. रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं. चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता. बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं. सोने की चूड़ियां तो अमीर तबक़े तक ही सीमित हैं. ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज़्यादा आकर्षित करती हैं. बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है. कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज़्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज़्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं.

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं. इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है. इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है. रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है. इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है. रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है. पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं. अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं. इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं. रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है.

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत अक़ीदत के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिन्दुस्तान की बात ही कुछ और है. विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं. कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं. रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते. उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा. भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं. यही जज़्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं.

तस्वीर गूगल से साभार

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रमज़ान और ईद का चांद

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1. अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया- महीना 29 दिन का हो सकता है, जब तक चांद ना देख लो रोज़ा न रखो, और अगर आसमान में बादल हों, तो शाबान के 30 दिन पूरे करो. (मतलब शाबान के महीने के 30 दिन पूरे हो जाने के बाद रमज़ान शुरू करो. (सहीह बुख़ारी, जिल्द 3, किताब 31, हदीद # 131).

2. अबू हुरैरह (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया- चांद देखकर रोज़ा रखो और चांद देखकर रोज़ा ख़त्म करो. और जब आसमान में बादल हों (चांद के देखने की कोई शरई गवाही ना मिले) तो 30 दिन के रोज़े पूरे करो (सहीह मुस्लिम, हदीस # 2378).

चांद ना देखे जाने पर शरई गवाही
3. इकरिमा (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि एक बार लोगों में रमज़ान के चांद में मुताल्लिक़ संदेह हुआ और इरादा किया कि ना ही तरावीह पढ़ी जाए और ना ही रोज़ा रखा जाए. एक बद्दू “अल हर्राह” से आया और चांद देखने की गवाही दी. उसको अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास लाया गया. अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया- क्या तुम गवाही देते हो कि अल्लाह एक है और मैं अल्लाह का रसूल हूं? उसने (बद्दू) कहा कि “हां” मैं गवाही देता हूं. और गवाही देता हूं कि मैंने चांद देखा. अल्लाह के नबी ने बिलाल (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) को हुक्म दिया कि तरावीह और रोज़े की ऐलान कर दिया जाए.
4. अबू उमैर इब्न अनस (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास कुछ सुवार (लोग) आए और अर्ज़ किया कि या रसूलुल्लाह हमने चांद एक दिन पहले देखा. इस पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लोगों को रोज़ा तोड़ने का हुक्म दिया. (अबू दाऊद हदीस # 1153).

चांद ना देखे जाने पर ईद
5. अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि कुरय्ब ने कहा- उम्म फद्ल ने अपने बेटे को हज़रते-मुआविया (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) के पास सीरिया भेजा.
मैं (फद्ल) सीरिया में था कि रमज़ान के महीने की आमद हो गई. मैंने (फद्ल ने) रमज़ान का चांद जुमे की रात को देखा. और मैं मदीने वापस रमज़ान के आख़िर में आया.
अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने मुझसे रमज़ान का चांद देखे जाने के बारे में दरयाफ़्त किया कि तुमने रमज़ान का चांद कब देखा? मैंने कहा कि हमने चांद जुमे की रात को देखा. फ़रमाया कि क्या आपने खुद से चांद देखा? मैंने जवाब दिया कि हां मैंने ख़ुद देखा और लोगों ने भी देखा और रोज़ा रखा. मुआविया (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने भी रखा.
इस पर अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने कहा, लेकिन हमने तो चांद हफ़्ते (Saturday) की रात को देखा, इसलिए हम 30 पूरे करेंगे या जब तक हम शव्वाल का चांद ना देख लें. मैंने कहा कि क्या मुआविया का चांद देखना आपके लिए काफ़ी नहीं? इस पर उन्होंने (इब्न अब्बास) कहा, नहीं, ये वो तरीक़ा है जो हमें रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बताया. (सहीह मुस्लिम, हदीस # 2391)

तस्वीर गूगल से साभार

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शबे-बारात...

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शबे-बारात... यानी इबादत की रात... यह इबादत की रात है और अगले दिन रोज़ा रखकर अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने का दिन...
कहते हैं कि आज रात को उन लोगों का नाम ज़िन्दा लोगों की फ़ेहरिस्त से काट दिया जाता है, जो अगली शबे-बारात से पहले मरने वाले हैं... हो सकता है कि इनमें एक नाम हमारा भी हो और हम अगली शबे-बारात न देख पाएं...
इसलिए हम आप सबसे उन सब चीज़ों के लिए मुआफ़ी चाहते हैं, जिनसे आपका दिल दुखा हो... हम इस दुनिया से किसी भी तरह का कोई बोझ लेकर नहीं जाना चाहते... बस एक ऐसी लड़की के तौर पर यादें छोड़ कर जाना चाहते हैं, जिसने जानबूझ कर कभी किसी का दिल न दुखाया हो, किसी के साथ हक़तल्फ़ी न की हो... किसी का बुरा न किया हो... बस इतना ही... ज़िन्दगी से, इस दुनिया से हमें और कुछ नहीं चाहिए... हमारे लिए यही बहुत है...
आज दूसरों से माफ़ी मांगने के साथ ही क्यों न हम भी उन सभी लोगों को दिल से मुआफ़ कर दें, जिन्होंने हमारा दिल दुखाया है, हमारे साथ बुरा किया है, हमारी हक़तल्फ़ी की है ... भले ही वो हमसे माफ़ी न मांगें...
माफ़ी मांगने से इंसान छोटा नहीं होता, लेकिन मुआफ़ कर देने से ज़रूर बड़ा हो जाता है...
आप सबको इबादत की रात मुबारक हो..
दुआओं में याद रखना...
-फ़िरदौस ख़ान

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इल्मे-सीना

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इल्मे-सीना के बारे में बहुत कम लोग जानना चाहते हैं... दरअसल, इल्मे-सीना आपको किताबों में नहीं मिलता... इसे समझना पड़ता है... और इसे समझने के लिए एक रौशन ज़ेहन और वसीह दिल चाहिए...
जिस तरह पानी को साफ़ रखने के लिए साफ़ बर्तन की ज़रूरत होती है, उसी तरह इल्मे-सीना के लिए भी दिल का साफ़ होना बेहद ज़रूरी है... इसके लिए एक ऐसा दिल चाहिए, जो ख़ुदग़र्ज़ न हो, कमज़र्फ़ न हो... इतनी समझ चाहिए कि इंसान समझ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत है...
 इसके लिए ऊंच-नीच, जात-पांत और किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठना होगा... ख़ुदा की मख़लूक से नफ़रत करके ख़ुदा को नहीं पाया जा सकता...
कबीर चचा कह गए हैं-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय...
यक़ीन करें, जिसने प्रेम के ढाई आखर पढ़ लिए और समझ लिए, उसका बेड़ा पार हो गया...

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हज़रत अली अलैहिस्सलाम

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सुनहरे अक़वाल
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं-

* अपने ख़्यालों की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे अल्फ़ाज़ बन जाते हैं
अपने अल्फ़ाज़ की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे आमाल बन जाते हैं
अपने आमाल की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारा किरदार बन जाते हैं
अपने किरदार की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि तुम्हारा किरदार तुम्हारी पहचान बन जाता है
* अपनी सोच को पानी के कतरों से भी ज़्यादा साफ़ रखो, क्योंकि जिस तरह क़तरों से दरिया बनता है उसी तरह सोच से ईमान बनता है.

* जो शख़्स दुनिया में कम हिस्सा लेता है, वो अपने लिए राहत का सामान बढ़ा लेता है. और जो दुनिया को ज़्यादा समेटता है, वो अपने लिए तबाहकुन चीज़ों का इज़ाफ़ा कर लेता है...
* जिसकी अमीरी उसके लिबास में हो, वो हमेशा फ़क़ीर रहेगा और जिसकी अमीरी उसके दिल में हो वो हमेशा सुखी रहेगा.
* ख़ालिक से मांगना शुजाअत है. अगर दे तो रहमत और न दे तो हिकमत. मखलूक से मांगना ज़िल्लत है. अगर दे तो एहसान और ना दे तो शर्मिंदगी.

* लम्बी दोस्ती के लिए दो चीज़ों पर अमल करो
- अपने दोस्त से ग़ुस्से में बात मत करो
- अपने दोस्त की ग़ुस्से में कही हुई बात दिल पर मत लो

* किसी मुकम्मल शख़्स की तलाश में मुहब्बत न करो, बल्कि किसी अधूरे को मुकम्मल करने के लिए मुहब्बत करो...
* अगर किसी का जर्फ़ आज़माना हो, तो उसको ज़्यादा इज़्ज़त दो. वह आला ज़र्फ़ हुआ तो आपको और ज़्यादा इज़्ज़त देगा और कम ज़र्फ़ हुआ तो ख़ुद को आला समझेगा.
* अगर किसी के बारे मे जानना चाहते हो तो पता करो के वह शख्स किसके साथ उठता बैठता है

* हमेशा उस इंसान के क़रीब रहो जो तुम्हे ख़ुश रखे, लेकिन उस इंसान के और भी क़रीब रहो जो तुम्हारे बग़ैर ख़ुश ना रह पाए
* ख़ूबसूरत इंसान से मुहब्बत नहीं होती, बल्कि जिस इंसान से मुहब्बत होती है वो ख़ूबसूरत लगने लगता है.
* इल्म की वजह से दोस्तों में इज़ाफ़ा होता है, दौलत की वजह से दुशमनों में इज़ाफ़ा होता है.
* दौलत, हुक़ूमत और मुसीबत में आदमी के अक़्ल का इम्तेहान होता है कि आदमी सब्र करता है या ग़लत क़दम उठाता है.
* दौलत को क़दमों की ख़ाक बनाकर रखो, क्यूकि जब ख़ाक सर पर लगती है तो वो क़ब्र कहलाती है.
* सब्र एक ऐसी सवारी है, जो सवार को अभी गिरने नहीं देती.
* ऐसा बहुत कम होता है कि जल्दबाज़ नुक़सान न उठाए, और ऐसा हो ही नहीं सकता कि सब्र करने वाला नाक़ाम हो.
* सब्र से जीत तय हो जाती है.

* झूठ बोलकर जीतने से बेहतर है सच बोलकर हार जाओ.
* जब तुम्हरी मुख़ालफ़त हद से बढ़ने लगे, तो समझ लो कि अल्लाह तुम्हें कोई मुक़ाम देने वाला है.
* जहा तक हो सके लालच से बचो, लालच में ज़िल्लत ही ज़िल्लत है.
* मुश्किलतरीन काम बेहतरीन लोगों के हिस्से में आते हैं, क्योंकि वो उसे हल करने की सलाहियत रखते हैं.
* कम खाने में सेहत है, कम बोलने में समझदारी है और कम सोना इबादत है.
* अक़्लमंद अपने आप को नीचा रखकर बुलंदी हासिल करता है और नादान अपने आप को बड़ा समझकर ज़िल्लत उठाता है.
* किसी की आंख तुम्हारी वजह से नम न हो, क्योंकि तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा .
* तुम्हारा एक रब है फिर भी तुम उसे याद नहीं करते, लेकिन उस के कितने बंदे हैं फिर भी वह तुम्हे नहीं भूलता.
* सूरत बग़ैर सीरत के एसा फूल है, जिसमे कांटे ज़्यादा हों और ख़ुशबू बिलकुल न हो.
* कभी भी किसी के ज़वाल को देखकर ख़ुश मत हो, क्योंकि तुम्हे पता नहीं है मुस्तक़बिल में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है.
* आज का इंसान सिर्फ़ दोलत को ख़ुशनसीबी समझता है और ये ही उसकी बदनसीबी है.

* बात तमीज़ से और एतराज़ दलील से करो, क्योंकि जबान तो हैवानो में भी होती है मगर वह इल्म और सलीक़े से महरूम होते हैं.
लफ्ज़ आपके गुलाम होतें हैं. मगर सिर्फ़ बोलने से पहले तक, बोलने के बाद इंसान अपने अल्फ़ाज़ का ग़ुलाम बन जाता है. अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त इस तरह करो, जिस तरह तुम अपने माल की करते हो. एक लफ़्ज़ ज़लील कर सकता है और आपके सुख को ख़त्म कर सकता है.


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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

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फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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