महबूब

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मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं...

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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दीदार...

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दीदार...
मेरे मौला !
न तू मुझसे ग़ाफ़िल
न मैं तुझसे ग़ाफ़िल
तू मुझ में है
और मैं तुझ में...
दरमियां हमारे
कोई पर्दा न रहा
मैंने
कायनात के हर ज़र्रे में
तेरा दीदार किया है...
-फ़िरदौस ख़ान

तारीख़ 8 जनवरी 2017... इस्लामी हिजरी 1437, 9 रबीउल आख़िर,
दिन इतवार... वक़्त इशराक़... जगह दिल्ली...

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गुर्दे की पत्थरी का इलाज

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शहद, नींबी के रस और ज़ैतून के तेल को एक-एक चम्मच आधे गिलास पानी में मिला लें और निहार मुंह पी लें. इंशा अल्लाह 15 से 20 दिन में पत्थरी रेत बनकर निकल जाएगी.



गुर्दे की पत्थरी का रूहानी इलाज
Treatment for kidney stones





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शुगर का इलाज...

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शुगर का इलाज
100 बादाम (कोई कड़वा न हो)
100 काली मिर्च के दाने
100 छोटी हरी इलायची (छिलके समेत)
100 नीम के पत्ते धुले हुए (ख़ुश्क कर लें)
250 ग्राम काले चने भुने हुए (छिलके समेत)

ये सारी चीज़ें पीस लें. दिन में किसी भी वक़्त आधा छोटा चम्मच खा लें. इंशा अल्लाह शुगर का यक़ीनी ख़ात्मा हो जाएगा.
Treatment for kidney sugar


Treatment for kidney sugar

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निस्बते-क़ुरआन

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जो लोग क़ुरआन को सिर्फ़ इसलिए नहीं खोलते, क्योंकि वे पढ़ना नहीं जानते, तो वे क़ुरआन पढ़ें.
दक्षिण अफ़्रीका में एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग मौलाना यूनुस साहब दावत-ए-हक़ दे रहे थे. जो शख़्स उनकी ख़िदमत में था, रात को उसका इंतक़ाल हो गया. जब बुज़ुर्ग को ख़बर दी गई, तो वह जनाज़े के साथ हो लिए. आप फ़रमाते हैं- जब क़ब्रिस्तान पहंचे, तो देखा कि उसकी क़ब्र से मुश्क की ख़ुशबू आ रही है. मैयत को दफ़नाने के बाद आप लौटे, तो आपने मक़ामी साथी से कहा कि अपनी बीवी को मरने वाले के घर भेजो और पता करो कि वह कौन सा आमाल था, जिसकी वजह से उसकी क़ब्र से मुश्क की ख़ुशबू आ रही है.

लिहाज़ा ऐसा ही हुआ. लौट कर उस साथी की बीवी ने ख़बर दी कि उसकी बीवी ने बताया कि वह क़ुरआन पढ़ना नहीं जानता था.  बस अलहम्द और क़ुल की सूरह ही जानता था और नमाज़ भी इन्हीं से ही पढ़ता था. हां, मगर वह रोज़ क़ुरआन लेकर बैठता और आयतों पर उंगली घुमाते हुए कहता- अल्लाह ये सही है, आगे-आगे उंगली घुमाता जाता और कहता जाता- अल्लाह ये भी सही है. इस तरह पूरा क़ुरआन ख़त्म होने पर मीठा लाता. क़ुरआन सिर पर रखकर कहता- अल्लाह तू भी सही है, तेरा दीन भी सही है, ये क़ुरआन भी सही है.  बस मैं ग़लत हूं. बस तू, इस किताब में मेरे हिस्से की जो हिदायत है, मुझे नसीब करके ग़लती माफ़ कर दे.

दोस्तों ! वो पढ़ना नहीं जानता था, मगर क़ुरआन की निस्बत, उसके शौक़, उसकी तड़प का अल्लाह ने ये सिला दिया कि उसकी क़ब्र को मुश्क की ख़ुशबू से महका दिया. अल्लाह हम सबको क़ुरआन पढ़ने की तड़प अता फ़रमा. उसमें जो हिदायत हमारे हिस्से की है, हमें नसीब कर दे, सारे आलम को हिदायत नसीब कर दे. आमीन
कबीर अली

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नमाज़

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  • "नमाज़ के वक़्त तवाफ़ काबा रुक सकता है" तो तेरा कारोबार और काम क्यों नहीं ?
  • इबलीस ने एक सजदे से इंकार क्या था, वो भी इंसान को... और हम अल्लाह का बुलावा अज़ान सुनकर भी नमाज़ नहीं पढ़ते, तो कितने सजदों से इंकार कर रहे हैं, कभी तो सोचिए...

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नमाज़ में की जाने वाली कुछ ग़लतियां

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इमाम के पीछे नमाज़ी का ऊंचे स्वर में क़ेराअत करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ों में ज़ोर ज़ोर से क़ेराअत करके दूसरे नमाज़ियों की नमाज़ में ख़लल डालते हैं. इमाम के पीछे सूरत ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर देंगे मानो वह यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उन्होंने उसे कंठस्थ कर रखा है. हालांकि नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सुन लो! तुम में से हर एक नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. इसलिए बिल्कुल कोई दूसरे को कष्ट न पहुंचाए, न कोई किसी के सामने अपनी आवाज़ को ऊंचा करे.” (अबू-दाऊद)
नमाज़ के बीच विभिन्न प्रकार की हरकतें करना
कुछ नमाज़ी अपनी नमाज़ों में श्रद्धा का ख़्याल किए बिना नमाज़ में विभिन्न प्रकार की हरकतें करते रहते हैं. कोई हाथ की घड़ी में देख रहा है, कोई दाढ़ी पर हाथ फेर रहा है, कोई कपड़े से मिट्टी झाड़ रहा है, कोई नाक से खेल रहा है, तो कोई पीठ खुजला रहा है इत्यादी. लगता ही नहीं कि वह अपने मालिक और संसार के सृष्टिकर्ता के सामने खड़े हुए हैं. ज़रा सोचिए कि उनमें से यदि कोई दुनिया के किसी बड़े आदमी के सामने खड़ें होते, तो ऐसी हरकतें कर सकते थे? कदापि नहीं, तो फिर अपने मालिक के सामने ऐसा क्यों.
आयतों के संदर्भ को समझे बिना इमाम की क़ेराअत पर रोना चिल्लाना
नमाज़ में कुछ आयतें जहन्नम, यातना और प्रलोक से सम्बन्धित होती हैं, जिन्हें सुन कर एक व्यक्ति का ह्रदय विनर्म पड़ जाता और आंखों से आंसू जारी हो जाते हैं और यह अच्छी बात है, लेकिन कुछ लोग हर नमाज़ में रोना और चीख़ना शूरू कर देते हैं, चाहे पढ़ी जाने वाली आयतें जन्नत और जहन्न से सम्बन्धित हों अथवा हैज़ या निफास से सम्बन्धित. विदित है कि इससे दूसरे नमाज़ियों को परेशानी होती है.
परागंदा छवि में मस्जिद आना
 निर्धनता कोई ऐब नहीं, कितने निर्धन साफ़-सुथरे कपड़े पहन कर मस्जिद जाते हैं, जबकि कितने ऐसे सुखी और सम्पन्न लोगों का हाल यह होता है कि जब बाज़ार जाएं, तो बड़े बन-संवर कर जाएं, लेकिन मस्जिद आना हो, तो फक़ीराना और परागंदा छवि बना लेते हैं. हालांकि ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं.
नमाज़ियों के आगे से गुज़रना
कुछ नमाज़ी नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और उन लोगों का बिल्कुल लिहाज़ नहीं करते, जो अपनी छूटी हुई नमाज़ें अदा कर रहे होते हैं. यदि उन्हें नमाज़ियों के आगे से गुज़रने के पाप का सही ज्ञान हो जाए, तो कदापि ऐसा न करें और नमाज़ी की नमाज़ समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते रहें. नबी सल्ल. ने फ़रमायाः “यदि नमाज़ी के सामने से गुज़रने वाला यह जान ले कि उसका क्या पाप है, तो उसका चालीस (वर्ष) तक प्रतीक्षा में खड़े रहना उसके लिए बेहतर है.”  (सहीह बुख़ारी)
नमाज़ में आसमान की ओर निगाह उठाना
नबी सल्ल. ने इस बात से मना फ़रमाया कि नमाज़ी नमाज़ की स्थिति में अपनी निगाह आसमान की ओर उठाए, बल्कि आपने सख़्ती से फ़रमाया कि ऐसा करने वालों की निगाहें उचक न ली जाएं. (मुस्नद अहमद)
आपने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि नमाज़ में खड़े होते समय एक व्यक्ति की निगाह उसके सज्दे के स्थान पर टिकी होनी चाहिए, जबकि कुछ नमाज़ी नमाज़ में कभी छत की ओर देखते होते हैं, मानो अल्लाह को देख रहे हैं, तो कुछ लोग दाएं बाएं झाँक रहे होते हैं।
लम्बे स्वर में खींच कर देर तक आमीन कहना
जहरी नमाज़ों में ऊंची आवाज़ से आमीन कहना अल्लाह के रसूल सल्ल. की सुन्नत है, क्योंकि फ़रिश्ते भी इस पर आमीन कहते हैं और जिसकी आमीन फ़रिश्तों की आमीन से सहमत हो गई, उसके पाप क्षमा कर दिए जाते हैं. इसलिए होना यह चाहिए कि आमीन एक साथ कही जाए और ऊंचे स्वर में ताकि सुनी जा सके, जबकि देखा यह जाता है कि कुछ लोग बिल्कुल आमीन कहते ही नहीं, जबकि दूसरे कुछ लोग इतना लम्बा “आमीन” कहते हैं कि सब लोगों के आमीन से फ़ारिग़ होने के बावजूद वह आमीन को खींचते रहते हैं, जिससे अन्य नमाज़ियों को तकलीफ़ होती है.
नाफ़ के नीचे अथवा गर्दन के निकट हाथ बांधना
नमाज़ में हाथ बांधने के सम्बन्ध में सब से सही बात यह है कि दोनों हाथ सीने पर बांधे जाएं, इस प्रकार कि दायां हाथ बायें हाथ पर नाफ़ से ऊपर और छाती के नीचे हो.
हल्ब बिन ताई रज़ि. बयान करते हैं कि “मैंने नबी सल्ल. को देखा कि हाथों को सीने पर बांधे हुए थे.” (मुस्नद अहमद) लेकिन कुछ लोग इसके विपरीत नाफ़ के नीचे हाथ बांधते हैं, तो कुछ लोग गर्दन के बिल्कुल क़रीब और इन परिस्थितियों में आप स्वंय उनकी परेशानी का अनुभव कर सकते हैं.
पेशाब या पाख़ाना को रोक कर नमाज़ पढ़ना
एक ही वज़ू से बहुत सी नमाज़ें पढ़ने के कुछ इच्छुक कभी कभी पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने लगते हैं, जबकि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमाया है. यदि किसी को ऐसी सूरत पेश आ जाए कि जमाअत खड़ी हो चुकी हो और उसे शौचालय जाने की आवश्यकता हो, तो वह पहले शौचालय जा कर अपनी ज़रूरत पूरी करे. नबी सल्ल. का फ़रमान है- ” जब खाना उपस्थित हो, तो नमाज़ नहीं होती और न उस समय जब पेशाब या पाख़ाना उसे धकेल (निकलने के लिए ज़ोर लगा) रहा हो”. (मुस्लिम)
इसलिए अल्लाह के रसूल सल्ल. के आदेश की मुख़ालफ़त करने की बजाय पहले शौचालय से फ़ारिग़ हो जाएं फिर नमाज़ शुरू करें, ताकि पूरी श्रद्धा से नमाज़ पढ़ सकें.
सफ़ों को बराबर न करना
सामान्य रूप में यह देखने को मिलता है कि नमाज़ी अपनी नमाज़ों में सफ़ें सीधी करने का ज़्यादा ख़्याल नहीं करते और अपने बीच में ख़ाली जगह छोड़ कर खड़े होते हैं. हालांकि यह तरीक़ा प्यारे नबी सल्ल. की नमाज़ के तरीक़े के विपरीत है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सफ़ें ठीक कर लो, कंधे बराबर कर लो, सफ़ के बीच ख़ाली रह जाने वाले स्थान को भर लो, अपने भाइयों के लिए नरम हो जाओ और शैतान के लिए जगह न छोड़ो. जो व्यक्ति सफ़ को मिलाएगा अल्लाह उसको मिलाएगा और जो व्यक्ति सफ़ को तोड़ेगा अल्लाह उसको तोड़ेगा.” (अबू दाऊद)
एक मस्जिद में एक ही समय दो जमाअत करना
मस्जिद में प्रत्येक उपस्थितगणों का एक इमाम के पीछे नमाज़ की अदाएगी को जमाअत कहते हैं. लेकिन कभी- कभार यह देखने को मिलता है कि पहली जमाअत समाप्त होने के बाद दो-दो जमाअतें एक ही मस्जिद में एक ही समय क़ायम कर ली जाती हैं. और यह कभी तो इमाम की ग़लती के कारण होता है कि इमाम की आवाज़ धीमी होने के कारण देर से आने वालों को पता न चल सका कि दूसरी जमाअत खड़ी हुई है और कभी मुक़तदी की गलती के कारण होता है कि जल्दी दाख़िल होने के कारण यह विश्वास प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की कि जमाअत खड़ी हुई है, और इस तरह दूसरी जमाअत खड़ी कर ली.
रुकू में कमर और घुटने सीधा न रखना
 कुछ नमाज़ी रुकू के बीच या तो सर को नीचे झुकाए रखते हैं या फिर सर को बहुत ऊंचा रखते हैं, यह दोनो शक्लें ग़लत हैं. हालांकि सर को न ज़्यादा झुकाया जाए और न ज़्यादा उठाकर रखा जाए, बल्कि कमर और सर दोनों बराबर होना चाहिए कि यदि उस पर पानी बहाया जाए तो ठहर जाए. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “एक व्यक्ति साठ वर्ष नमाज़ें पढ़ता है, लेकिन उसकी एक नमाज़ भी स्वीकार नहीं की जाती, इसलिए कि वह कभी रुकू ठीक करता है, तो सजदा सही नहीं करता और अगर सजदा ठीक करता है तो रुकू सही नहीं करता.” (अत्तरगीब वत्तरहीब)
कुछ नमाज़ी रुकू की स्थिति में घुटने पर दोनों हाथ रखने की बजाए जांघ पर रखते हैं, जबकि कुछ दूसरे घुटने से बिल्कुल नीचे टख़ने के क़रीब तक दोनों हाथों को ले जाते हैं, जो कि ग़लत है. सही तरीक़ा यह है कि रुकू की स्थिति में कमर को बिल्कुल सीधा रखा जाए और दोनों हथेलियां घुटने पर टिकी हुई हों.
सजदे की स्थिति में कोहनियों को ज़मीन पर बिछाना या हथेलियों को बिल्कुल सीधा खड़ा रखना
 सजदे में कुछ लोग कोहनियों को ज़मीन पर बिछा लेते हैं. हालांकि नबी सल्ल. ने इस तरीक़े को कुत्ते से तशबीह देते हुए फ़रमाया कि “कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते के समान ज़मीन पर न फैलाए”.। (बुख़ारी, मुस्लिम) जबकि कुछ लोग अपनी हथेलियों को मोड़े हुए बिल्कुल खड़ा रखते हैं, जबकि सही तरीका़ यह है कि हथेलियां ज़मीन पर रखी जाएं इस प्रकार कि उंगलियां मिली हुई हों और क़िबला की ओर हों और कोहनियां ज़मीन से उठी हुई हों. उसी प्रकार पैर की उंगलियां भी क़िबला की ओर हों.
सलाम फेरते ही ज़ोर से बातें करने लगना
कुछ नमाज़ी सलाम फेरने के बाद यह भूल जाते हैं कि वह मस्जिद में हैं और अपने साथी के साथ वार्ता और हंसने- हंसाने में लग जाते हैं मानो किसी चाय की दुकान में बैठे हों. हालांकि उस समय कितने नमाज़ी अपनी नमाज़े पूरी कर रहे होते हैं, कितने सुन्नतें पढ़ रहे होते हैं. यदि कोई ऐसी स्थिति में उन्हें टोक दे, तो दिल मैला कर लेते हैं.
नियत का ज़बान से अदा करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ में देर से आते हैं और ज़ोर से तकबीर कहते हुए नमाज़ में दाख़िल होते हैं, बल्कि कुछ लोग नियत के शब्द भी ज़बान से अदा करते हैं ” मैं इमाम के पीछे चार रकअत ज़ुहर की नमाज़ अदा करने की नियत करता हूं, मुंह मेरा क़िबला की ओर, अल्लाहु अकबर” हालांकि ऊंची आवाज़ से “अल्लाहु अकबर”कहना या नियत के शब्द ज़बान से बोलना प्यारे नबी सल्ल. और आपके साथियों से प्रमाणित नहीं. और इसलिए भी कि नियत दिल के संकल्प का नाम है. अतः जबान से नियत के शब्द बोलने की आवश्यकता ही नहीं. अल्लामा इब्ने तैमिया रहि. फ़रमाते हैं-
“ज़बान से नियत करना शास्त्र और बुद्धि दोनों के विपरीत है, शास्त्र के विपरीत इसलिए कि यह बिदअत है. और बुद्धि के विपरीत इसलिए कि उसकी उदाहरण ऐसे ही है जैसे कोई खाना खाना चाहता हो, तो कहे “मैं नियत करता हूं अपने हाथ को इस बर्तन में रखने की, मैं इससे एक लुक़मा लूंगा, फिर उसको मुंह में रखूंगा, फिर उसको चबाऊंगा, अंततः उसको निग़ल लूंगा, ताकि मैं तुष्टि पा सकूं. विदित है कि कोई बुद्धिमान इस प्रकार के शब्द नहीं बोलेगा, क्योंकि नियत करना इस बात का प्रमाण है कि नियत करने वाले को मआमले का पूरा-पूरा ज्ञान है- जब आदमी को पता है कि वह क्या कर रहा है, तो पक्की बात है कि उसने इस काम की नियत भी ज़रूर की होगी.”   (फतावा इब्ने तैमिया 1/232)
प्याज़ अथवा लहसुन खाकर मस्जिद जाना और डकार लेते रहना
यदि प्रत्येक नमाज़ी नहीं, तो अधिकतर लोग यह जानते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने प्याज़ या लहसुन आदि खाकर मस्जिद आने से मना किया है, ताकि वह अपने मुंह से निकलने वाली गंध से फ़रिश्तों और इंसानों को कष्ट पहुंचाने का कारण न बने. (मुस्लिम) उसके बावजूद आप कितने लोगों को देखेंगे कि वह मस्जिद में डकार लेकर अपने मुंह की गंध से दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं.

नमाज़ में इमाम का अनुसरण न करना
जमाअत की नमाज़ में न तो इमाम से आगे निकलना चाहिए और न ही इमाम के बिल्कुल पीछे रहना चाहिए कि इमाम सज्दा से उठ जाए और वह अभी सजदे ही में हो, इमाम रुकू में चला जाए और वह अभी क्याम ही में हो. क्योंकि यह तरीक़ा अल्लाह के नबी सल्ल. के आदेश के विपरीत है जिसमें आया है कि “इमाम इसलिए बनाया गया है, ताकि उसकी ताबेदारी की जाए”. सही तरीक़ा यह है कि इमाम के साथ रुकू, सजदा और क्याम किया जाए, ताकि वास्तव में जमाअत की नमाज़ कही जा सके. और जो कोई लम्बा रुकू या सजदा करने का इच्छुक हो वह नफ्ली नमाज़ों में जैसे चाहे कर सकता है.
ख़ुतब-ए-जुमा के समय बात करना
जुमा का ख़ुतबा नमाज़ का ही भाग है, इसलिए जुमा के दिन मस्जिद में बैठ कर इमाम का ख़ुतबा ख़ामोशी के साथ सुनना चाहिए, लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग अज्ञानता के कारण देर से आने वालों को सलाम करते हैं, तो कुछ लोग बच्चों को नसीहत करते हैं, जबकि कुछ लोग ख़तीब की बात पर टिप्पणी कर रहे होते हैं, मानो वह मस्जिद में नहीं किसी सिनेमा हॊल में हैं.
नमाज़ में जंभाई लेना
जंभाई ज़ाहिर में थकान और सुस्ती की निशानी होती है, इसका कारण जो भी हो हम में से हर व्यक्ति किसी विद्वान से भेंट करते समय उसे दूर करने का सम्भवतः प्रयास करता है. तो फिर उस समय इसका ज़्यादा ही ख़्याल रखना चाहिए, जबकि नमाज़ी नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “जब नमाज़ के बीच किसी को जंभाई आ रही हो, तो सम्भवतः उसे रोक ले, क्योंकि जंभाई द्वारा शैतान अन्दर प्रवेश करता है.” (सहीह मुस्लिम, सहीह बुख़ारी) और जब शैतान नमाज़ी के अन्दर प्रवेश कर गया, तो फिर नमाज़ की ख़ैर नहीं, उसी प्रकार जंभाई लेने वाले पर शैतान हंसता है, इसलिए जिस हद तक सम्भव हो सके नमाज़ में जंभाई को रोकने का प्रयास करना चाहिए.
मुक़तदी के खड़ा होने का स्थान
पहली सफ़ पूरी होने के पश्चात मस्जिद में आने वाले जब दूसरी अथवा तीसरी सफ़ बनाना चाहते हों, तो कोई दायीं ओर की श्रेष्टा वाली हदीस के आधार पर इमाम के दायीं ओर खड़ा होने का प्रयास करते हैं, तो कोई बायीं ओर खड़े हो जाते हैं कि उस तरफ़ पंखा चल रहा होता है. हालांकि सही तरीक़ा यह है कि इमाम के बिल्कुल पीछे नई सफ़ बनाई जाए, चाहे इमाम के खड़ा होने की जगह बीच सफ़ हो या सफ़ का किनारा हो.
इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा की क़ेराअत ज़ोर से करनी
इमाम के पीछे जहरी नमाज़ों में सूरः फ़ातिहा पढ़ने की गुंजाइश ज़रूर है, परन्तु इमाम के साथ ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने लगना जिसके कारण दूसरे नमाज़ियों को कष्ट हो, किसी स्थिति में उचित नहीं. इसलिए जो लोग जमाअत में सूरह फ़ातिहा पढ़ें उन्हें चाहिए कि धीमी आवाज़ में पढ़ें, ताकि उनके साथ खड़े होने वाले नमाज़ी को तकलीफ़ न हो.

साभार ipcblogger  

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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर (अपनी जगह पर) बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर 2 रकअत (इशराक़ की) नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."
हज़रत हसन बिन अली रज़ि.से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत (इशराक़ की नमाज़) पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.



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हज़रत अली अलैहिस्सलाम

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सुनहरे अक़वाल
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं-

* जो शख़्स दुनिया में कम हिस्सा लेता है, वो अपने लिए राहत का सामान बढ़ा लेता है. और जो दुनिया को ज़्यादा समेटता है, वो अपने लिए तबाहकुन चीज़ों का इज़ाफ़ा कर लेता है...

* अपने ख़्यालों की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे अल्फ़ाज़ बन जाते हैं
अपने अल्फ़ाज़ की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे आमाल बन जाते हैं
अपने आमाल की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारा किरदार बन जाते हैं
अपने किरदार की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि तुम्हारा किरदार तुम्हारी पहचान बन जाता है


* लम्बी दोस्ती के लिए दो चीज़ों पर अमल करो
1. अपने दोस्त से ग़ुस्से में बात मत करो
2. अपने दोस्त की ग़ुस्से में कही हुई बात दिल पर मत लो

किसी मुकम्मल शख़्स की तलाश में मुहब्बत न करो, बल्कि किसी अधूरे को मुकम्मल करने के लिए मुहब्बत करो...

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बैत होना (मुरीद होना)

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हम चिश्तिया सिलसिले से ताल्लुक़ रखते हैं... तक़रीबन दस साल पहले हम बैत हुए थे... बैत होने के बारे में एक तहरीर पेश है-
सूफ़िया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके ज़रिये तालिम व तरबियत, रशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है.
बैअत-ए-शैख़ अल्लाह के हुक्म से और हुज़ुरे अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल से साबित है. अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है कि बेशक जो तुम्हारे हाथों में बैअत करते हैं हक़ीक़तन वो अल्लाह के हाथों पर बैअत करते हैं, अल्लाह का हाथ उनके हाथों पर है. बैअत का अमल हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल "बैअत-अर-रिज़वान" से बतरिकए ऊला साबित है. कुछ अहले-इल्म में नज़दीक बैअत वाजिब है और कुछ ने बैअत को सुन्नत कहा है. बल्कि एक गिरोह कसीरा ने इसे सुन्नत ही कहा है.
बैअत की कई क़िस्में होती हैं- जैसे बैअत-ए-इस्लाम, बैअत-ए-ख़िलाफ़त, बैअत-ए-हिजरत, बैअत-ए-जिहाद, बैअत-ए-तक़वा वग़ैरह. लेकिन तज़किया-ए-नफ़्स और तसफ़िया-ए-बातिन के लिए जो सूफ़िया किराम बैअत करते हैं, वो कुरबे इलाही का ज़रिया बनते हैं और तसव्वुफ़ में इसी बैअत को "बैअत-ए-शैख़" कहते हैं.
जब कोई बैअत व इरादत का चाहने वाला हाज़िर होता है और इज़हारे-ग़ुलामी व बन्दगी के लिए हल्क-ए-मुरीदैन में शामिल होना चाहता है, तो उसको का हाथ अपने हाथ में लेकर हल्क-ए-इरादत और तरीक-ए-ग़ुलामी में दाख़िल किया जाता है.
फिर तालिब से पूछते हैं कि वो किस ख़ानवाद-ए-मारफ़त (क़ादिरिया, चिश्तिया, अबुलउलाई वग़ैरह) में बैअत कर रहा है और उससे सुनते हैं वो किस ख़ानवाद- ए-तरीकत में दाख़िल हुआ. शिजर-ए-मारफ़त के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के ज़रिये अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फ़क़ीर को क़ुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो-जान से मैंने कुबूल किया, इस इक़रार के बाद उसे तालिमन कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअते-मुहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़दम जमाए रखना. (फ़िलहम्दोअलिल्लामह अला जुल्क)
अकाबिरों के नज़दीक वसीला से तवस्स‍ले मुर्शिद ही है. हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीम, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीस और शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दीस देहलवी साहेबान का भी यही मानना है. यहां तक कि वहाबियों के सरगना इस्माइल देहलवी का भी यह कहना है कि- 'क़ुरआन में सूरे बनी इसराइल के रुकूअ 6 में रब तआला ने शख़्स अकरब अलीउल्लाइह के लिए वसीले ही के लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया है.'
इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह के मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसी है, जिसके हासिल करने की हिदायत, अल्लाह तआला ने क़ुरआन में फ़रमाई.

Courtesy : qhizr

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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