Rest in Peace

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जब कोई किसी की मौत की ख़बर सुनता है, तो उसके लिए कुछ लफ़्ज़ बोलता है, जिसे आप ख़िराजे-अक़ीदत कह सकते हैं...
बात इस्लाम को मानने वाले की करते हैं... जब कोई मुसलमान, किसी मुसलमान के मरने की ख़बर सुनता है, तो वह कहता है-
ಯಹ್
إِنَّا لِلّهِ وَإِنَّـا إِلَيْهِ رَاجِعون
यानी Inna Lillahi Wa inna Ilayhi Rajioon
यानी हम बेशक ख़ुदा से ताल्लुक़ रखते हैं और हमें उसी के पास लौट कर जाना है...
(क़ुरआन सूरह अल-बक़रा 2:156 )

मुसलमान जब किसी ऐसे ग़ैर मुस्लिम की मौत की ख़बर सुनता है, जिसे जलाया गया है, वह तो कहता है-
فِي نَارِ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا
यानी Fee nari jahannama khalidin fihaa
यानी वह दोज़ख़ की आग में है...
(क़ुरआन : सूरह अल-बैयिनह 98:‍6)

दोज़ख़ में हर तरफ़ आग ही आग होगी, क़ुरआन में कई जगह दोज़ख़ का ज़िक्र किया गया है.

अब बात अहले-किताब यानी ईसाइयों की... ईसाई जब किसी ईसाई की मौत की ख़बर सुनता है, तो कहता है-
Rest in Peace
यानी सुकून से आराम करो...
Rest in Peace की जगह RIP भी लिखा जाता है...
आजकल ग़ैर ईसाई भी Rest in Peace या RIP का ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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गर्म कपड़े

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हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ें वहीं अच्छी लगती हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है...

सबसे ख़ास बात... किसी को अपने कपड़े या दूसरी चीज़ें देते वक़्त इस बात का ख़्याल ज़रूर रखें कि जिन्हें चीज़ें दी जा रही हैं, उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास न हो... कपड़े ज़्यादा पुराने, फटे हुए या फिर रंग से बेरंग हुए न हों...  चीज़ें ऐसी होनी चाहिए, जिनका इस्तेमाल किया जा सके...

ख़ुदा को वो लोग बहुत पसंद हैं, जो उसके बंदों से मुहब्बत करते हैं...
फ़िरदौस ख़ान

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61 सूर: अल-सफ़

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 14 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ें आसमानों में हैं और ज़मीन में हैं, सब ख़ुदा की तस्बीह करती हैं, और वह ग़ालिब हिकमत वाला है
2. ऐ ईमानदारों तुम ऐसी बातें क्यों कहा करते हो, जो किया नहीं करते
3. ख़ुदा के नज़दीक ये ग़ज़ब की बात है कि तुम ऐसी बात कहो, जो करो नहीं
4. ख़ुदा उन लोगों से मुहब्बत करता है, जो उसकी राह में इस तरह परा बांध के लड़ते हैं, गोया वे सीसा पिलाई दीवारें हों
5. और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि भाइयों तुम मुझे क्यों तकलीफ़ देते हो, हालांकि कि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे पास ख़ुदा का भेजा पैग़म्बर हूं, तो जब वे टेढ़े हुए तो ख़ुदा ने भी उनके दिलों को टेढ़ा ही रहने दिया और ख़ुदा बदकार लोगों को मंज़िले-मक़सूद तक नहीं पहुंचाता
6. और जब मरियम के बेटे ईसा ने कहा, ऐ बनी इसराईल में तुम्हारे पास ख़ुदा का भेजा हुआ हूं और जो किताब तौरेत मेरे सामने मौजूद है, उसकी तस्दीक करता हूं, और एक पैग़म्बर जिनका नाम अहमद होगा, मेरे बाद आएंगे, उनकी ख़ुशख़बरी सुनाता हूं, जब वे पैग़म्बर उनके पास रौशन मौजिज़े लेकर आए, तो कहने लगे कि ये तो खुला जादू है
7. और जो शख़्स इस्लाम की तरफ़ बुलाया जाए और वह इसे क़ुबूल करने के बदले ख़ुदा पर झूठ बोले, उससे बढ़कर ज़ालिम और कौन होगा, और ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मंज़िले-मक़सूद तक नहीं पहुंचाता
8. ये लोग अपनी फूंक से ख़ुदा के नूर को बुझाना चाहते हैं, हालांकि ख़ुदा अपने नूर को पूरा करके रहेगा, अगरचे कुफ़्फ़ार बुरा ही क्यों न मानें
9. वह वही है, जिसने अपने पैग़म्बर को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा, ताकि उसे और तमाम दीनों पर ग़ालिब करे, अगरचे मुशरेकीन बुरा ही क्यों न मानें
10. ऐ ईमानदारों क्या हम ऐसी तिजारत बता दें, जो तुम्हें आख़िरत के तकलीफ़देह अज़ाब से निजात दे
11. ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाओ और अपने माल व जान से ख़ुदा की राह में जेहाद करो, अगर तुम समझो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
12. तो वह भी इसके एवज में तुम्हारे गुनाह बख़्श देगा और तुम्हें उन बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बहती हैं और पाक़ीज़ा घरों में, जो हमेशा रहने वाली जन्नत में हैं, यही तो बड़ी कामयाबी है
13. और एक चीज़ जिसे तुम प्यारे हो, उस ख़ुदा की तरफ़ से मदद मिलेगी और कामयाबी हासिल होगी, और मोमिनीन को इसकी ख़ुशख़बरी दे दो
14. ऐ ईमानदारों ख़ुदा के मददगार बन जाओ, जिस तरह मरियम के बेटे ईसा ने हवारियों से कहा था कि ख़ुदा की तरफ़ मेरे मददगार कौन लोग हैं, तो हवारीन बोल उठे थे कि हम ख़ुदा के अनसार हैं, तो बनी इसराईल में से एक गिरोह ईमान लाया और एक गिरोह काफ़िर रहा, तो जो लोग ईमान लाए, हमने उन्हें उनके दुश्मनों के मुक़ाबले में मदद दी, तो आख़िर वही ग़ालिब रहे
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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रहमतों की बारिश

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मेरे मौला !
रहमतों की बारिश कर
हमारे आक़ा
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर
जब तक
कायनात रौशन रहे
सूरज उगता रहे
दिन चढ़ता रहे
शाम ढलती रहे
और रात आती-जाती रहे
मेरे मौला !
सलाम नाज़िल फ़रमा
हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और आले-नबी की रूहों पर
अज़ल से अबद तक...
-फ़िरदौस ख़ान

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बेरी के दरख़्त के अनोखे राज़...

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हर बेरी के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेरी के पत्तों के ज़रिये जादू, सहर का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेरी के पत्तों से मैयत को नहलाना.  इसमें अनोखे राज़ हैं. असल में बेरी के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सदरतुल मन्तहा कहते हैं. इसके इर्द-गिर्द फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वो सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर अर्शे-माला पर जाते हैं...

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ग़ुज़ारिश : ज़रूरतमंदों को गोश्त पहुंचाएं

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ईद-उल-अज़हा का महीना शुरू हो चुका है... जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं... तीन दिन तक एक ही घर में कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं... इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है... एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है... जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं...
ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती... ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... राहे-हक़ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक गोश्त पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं...
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक पहुंचाएं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है...

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सबके लिए दुआ...

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels:: , ,


मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन


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62 सूर: अल-जुमा

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है, सब ख़ुदा की तस्बीह करती हैं, जो बादशाह पाक ज़ात ग़ालिब हिकमत वाला है
2. वही तो है, जिसने जाहिलों में उन्हीं में का एक रसूल भेजा, जो उनके सामने उसकी आयतें पढ़ते और उन्हें पाक करते, और उन्हें किताब और अक़्ल की बातें सिखाते हैं, अगरचे इसके पहले तो ये लोग खुली गुमराही में थे
 3. और उनमें से उन लोगों की तरफ़ भेजा, जो अभी तक उनसे मुलहिक़ नहीं हुए और वह तो ग़ालिब हिकमत वाला है
4. ख़ुदा का फ़ज़ल है, जिसको चाहता है अता फ़रमाता है और ख़ुदा तो बड़े फ़ज़ल का मालिक है
5. जिन लोगों पर तौरेत लादी गई है, उन्होंने उसके बोझ को न उठाया, उनकी मिसाल गधे जैसी है, जिस पर बड़ी-बड़ी किताबें लदी हों, जिन लोगों ने ख़ुदा की आयतों को झुठलाया, उनकी भी क्या बुरी मिसाल है और ख़ुदा ज़ालिमों को उनकी मंज़िल तक नहीं पहुंचाता
6. तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख़्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं,  तो अगर तुम सच्चे हो, तो मौत की तमन्ना करो
7. और ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं, कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है
8. तुम कह दो कि मौत जिससे तुम लोग भागते हो, वह तो ज़रूर तुम्हारे सामने आएगी, फिर तुम पोशीदा और ज़ाहिर के जानने वाले ख़ुदा की तरफ़ लौटा दिए जाओगे, फिर जो कुछ भी तुम करते थे, तुम्हें बता देगा
9. ऐ ईमान वालों, जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाएगी, तो ख़ुदा की याद की तरफ़ दौड़ पड़ो और ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़ दो, अगर तुम समझते हो, तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
10. फिर जब नमाज़ हो चुके, तो ज़मीन में जहां चाहे जाओ और ख़ुदा के फ़ज़ल की तलाश करो और ख़ुदा को बहुत याद करते रहो, ताकि तुम दिली मुरादें पाओ
11. और जब ये लोग सौदा बिकता या तमाशा होता देखें, तो उसकी तरफ़ टूट पडए और तुम्हें खड़ा हुआ छोड़ दें, तुम कह दो कि जो चीज़ ख़ुदा के यहां है, वह तमाशे और सौदे से कहीं बेहतर है और ख़ुदा सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाला है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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63 सूर: अल-मुनाफ़िक़ून

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 मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जब तुम्हारे पास मुनाफ़ि़क़ीन आते हैं, तो कहते हैं कि हम तो इक़रार करते हैं कि आप यक़ीनन ख़ुदा के रसूल हैं, और ख़ुदा भी जानता है कि तुम यक़ीनी उसके रसूल हो, लेकिन ख़ुदा ज़ाहिर किए देता है कि ये लोग बिल्कुल झूठे हैं
2. इन लोगों ने अपनी क़समों को सिपर बना रखा है, तो इसी के ज़रिये लोगों को ख़ुदा की राह से रोकते हैं, बेशक ये लोग बुरे काम करते हैं
3. इस तरह ज़ाहिर से ईमान लाए, फिर काफ़िर हो गए, उनके दिलों पर मोहर लगा दी गई है, तो अब ये समझते ही नहीं
4. और जब तुम उन्हें देखोगे, तो तनासुबे-आज़ा की वजह से उनका डील-डौल तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा, और गुफ़्तगू करेंगे तो ऐसी कि तुम तवज्जो से सुनो, मगर अक़्ल से ख़ाली, गोया दीवार से लगाई हुई बेकार लकड़ियां हैं, हर चीख़ की आवाज़ को समझते हैं कि उन्हीं पर आ पड़ी, ये लोग तुम्हारे दुश्मन हैं, तुम इनसे बचो, ख़ुदा इन्हें मार डाले, ये कहां बहके फिरते हैं
5. और जब उनसे कहा जाता है कि आओ रसूलअल्लाह तुम्हारे लिए मग़फ़िरत की दुआ करें, तो वे लोग अपने सर फेर लेते हैं, और तुम उन्हें देखोगे कि तकब्बुर करते हुए मुंह फेर लेते हैं
6. तुम उनकी मग़फ़िरत की दुआ मांगो या न मांगो, उनके हक़ में बराबर है, क्योंकि ख़ुदा तो उन्हें हरगिज़ बख़्शेगा नहीं, ख़ुदा बदकारों को उनकी मंज़िल तक नहीं पहंचाता
7. ये वही लोग हैं, जो कहते हैं कि जो रसूले-ख़ुदा के पास रहते हैं, उन पर ख़र्च न करो, यहां तक कि ये लोग ख़ुद तितर-बितर हो जाएं, हालांकि सारे आसमान और ज़मीन के ख़ज़ाने ख़ुदा ही के पास हैं, मगर मुनाफ़िक़ीन नहीं समझते
8. ये लोग तो कहते हैं कि अगर हम लौट कर मदीने पहुंचे, तो इज़्ज़तदार लोग ज़लील को ख़ुद निकाल बाहर कर देंगे, हालांकि इज़्ज़त तो ख़ास ख़ुदा और रसूल और मोमिनीन के लिए है, लेकिन मुनाफ़िक़ीन नहीं जानते
9. ऐ ईमान वालों, तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद तुम्हें ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल न करे, और जो ऐसा करेंगे, तो वे लोग घाटे में रहेंगे
10. और हमने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसमें से इससे पहले ख़ुदा की राह में ख़र्च कर डालो कि तुम में से किसी की मौत आ जाए, इसकी नौबत न आए कि कहने लगे कि परवरदिगार तूने मुझे थोड़ी सी मोहलत और क्यों न दी, ताकि ख़ैरात करता और नेक लोगों में से हो जाता
11. और जब किसी की मौत आती है, तो ख़ुदा उसे हरगिज़ मोहलत नहीं देता, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उससे ख़बरदार है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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64 सूर: अत-ताग़ाबून

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 18 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है, सब ख़ुदा ही की तस्बीह करती हैं, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए सज़ावार है, और वही हर चीज़ पर क़ादिर है
2.  वही तो है, जिसने तुम लोगों को पैदा किया, कोई तुम में काफ़िर है और कोई मोमिन, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उसे देख रहा है
3.  उसी ने सारे आसमान और ज़मीन को हिकमत और मसलेहत से पैदा किया, और उसी ने तुम्हारी सूरतें बनाईं, तो सबसे अच्छी सूरतें बनाईं, और तुम्हें उसी की तरफ़ लौट कर जाना है
4. जो कुछ सारे आसमान और ज़मीन में है, वह सब जानता है, और जो कुछ तुम छुपाकर कर या सरेआम करते हो, उससे भी वाक़िफ़ है और ख़ुदा तो दिल के राज़ तक से आगाह है
5. क्या तुम्हें उनकी ख़बर नहीं पहुंची, जिन्होंने तुमसे पहले कुफ़्र किया, उन्होंने दुनिया में अपने कामों की सज़ा भुगती और आख़िरत में तो उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
6. ये इस वजह से है, क्योंकि उनके पास रौशन मौजिज़े और पैग़ाम लेकर पैग़म्बर आए थे, तब वे लोग कहने लगे कि क्या आदमी हमारे रहनुमा बनेंगे, ग़र्ज़ ये कि लोग काफ़िर बन बैठे और ख़ुदा ने भी उनकी परवाह न की, और ख़ुदा तो बेपरवाह सज़ावारे हम्द है
7. काफ़िरों का ख़्याल ये है कि ये लोग दोबारा न उठाए जाएंगे, तुम कह दो वहां अपने परवरदिगार की क़सम, तुम ज़रूर उठाए जाओगे, फिर तुम जो काम करते रहे, वह तुम्हें बता देगा, और ये तो ख़ुदा पर आसान है
8. तुम ख़ुदा और उसके रसूल पर उसी नूर पर ईमाल लाओ, जिसे हमने नाज़िल किया है, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उससे ख़बरदार है
9. जब वह क़यामत के दिन तुम सबको जमा करेगा, फिर यही हार जीत का दिन होगा और जो शख़्स ख़ुदा पर ईमान लाए और नेक काम करे, वह उससे उसकी बुराइयां दूर कर देगा और उसको जन्नत के उन बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, वह उनमें हमेशा आबाद रहेगा, यही तो बड़ी कामयाबी है
10. और जो लोग काफ़िर हैं, और हमारी आयतों को झुठलाते रहे, ये लोग जहन्नुमी हैं और हमेशा उसी में रहेंगे, यह बुरी जगह है
11. और जब कोई मुसीबत आती है, तो ख़ुदा के हुक्म से, और जो शख़्स ख़ुदा पर ईमान लाता है, तो ख़ुदा उसके क़ल्ब की हिदायत करता है, और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
12. और ख़ुदा का हुक्म मानो और रसूल का हुक्म मानो, फिर अगर तुमने मुंह फेरा, तो हमारे रसूल पर सिर्फ़ पैग़ाम को बयान करके पहुंचा देना फ़र्ज़ है
13.  ख़ुदा के सिवा कोई माबूद नहीं और मोमिनों को ख़ुदा ही पर यक़ीन करना चाहिए
14. ऐ ईमान वालों, तुम्हारी बीवियों और तुम्हारी औलादों में से कुछ तुम्हारे दुश्मन हैं, तो तुम उनसे बचकर रहो, और अगर तुम माफ़ कर दो, दरगुज़र करो और बख़्श दो, तो ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
15. तुम्हारे माल और तुम्हारी औलादें बस आज़माश हैं और ख़ुदा के यहां तो बड़ा अज्र है
16. जहां तक तुमसे हो सके, ख़ुदा से डरते रहो और उसकी सुनो और मानो, और अपनी बेहतरी के लिए उसकी राह में ख़र्च करो, और जो शख़्स अपनी नफ़्स की हिरस से बचा लिया गया, तो ऐसे ही लोग मुरादें पाने वाले हैं
17. अगर तुम ख़ुदा को भला क़र्ज़ दोगे, तो वह उसे तुम्हारे लिए दोगुना कर देगा, और तुमको बख़्श देगा, और ख़ुदा तो बड़ा क़द्रदान और बुर्दबार है
18. पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला ग़ालिब हिकमत वाला है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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