अक़ीदत के फूल...

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अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...
अक़ीदत के फूल...
मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम
प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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और क़ब्र तंग होती गई

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फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

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शुगर का देसी इलाज...

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गिलोय की बेल के पत्ते खाने से शुगर का स्तर कम हो जाता है... हमारी एक हमसाई की शुगर का स्तर हमेशा 250 से ज़्यादा रहता था... वो हमारे घर से हर रोज़ गिलोय के पत्ते ले जाया करती थीं... उन्होंने लगातार तीन माह निहार मुंह गिलोय का पत्ता चबाकर पानी पी लिया... अब उनकी शुगर नियंत्रित हो गई... शुगर के अलावा बुख़ार, हड्डियों के दर्द, कैंसर, पेट और आंखों आदि की बीमारी में गिलोय बेहद फ़ायदेमंद है...

हमारे घर गिलोय की बहुत-सी बेलें हैं... बहुत लोग इसके पत्ते ले जाते हैं... गिलोय की बेल तक़रीबन हर जगह पाई जाती है... एक बार लगाने पर ये कई साल तक पत्तों से भरी रहती है... गिलोय की बेल किसी भी नर्सरी में मिल सकती है... पार्क में भी मिल सकती है... सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर भी ये बेल ख़ूब देखी जा सकती है... हो सके, तो इसे अपने घर में ज़रूर लगाएं... इसे गमले में भी उगाया जा सकता है...

गिलोय का वैज्ञानिक नाम तिनोस्पोरा कार्डीफ़ोलिया है... इसे मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुंडलिनी गुडूची भी कहा जाता है... फ़ारसी में इसे गिलाई कहते हैं... अंग्रेज़ी में गुलंच, मराठी में गुलबेल, कन्नड़ में अमरदवल्ली, तेलगू में गोधुची, तमिल में शिन्दिल्कोदी और गुजराती में गालो में आदि नामों से जाना जाता है... गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल और बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाए जाते है... मान्यता है कि देव और दानवों के युद्ध के दौरान जहां-जहां अमृत कलश की बूंदे गिरीं, वहां-वहां गिलोय की बेल उग आई...
-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत सरमद रहमतुल्लाह अलैहि

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फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों के क़रीब हज़रत साहब का मज़ार है... हम अकसर वहां जाते हैं... बहुत सुकून मिलता है... वहां से उठने को दिल नहीं करता...
फ़िलिस्तीन में जन्मे हज़रत सरमद, हज़रत अबुल क़ासिम उर्फ़ हरे-भरे सब्ज़वारी के मुरीद हैं... हज़रत सरमद से वाबस्ता एक वाक़िया पेश कर रहे हैं...
एक रात बादशाह औरंगज़ेब ने ख़्वाब में देखा कि जन्नत में एक बहुत ही ख़ूबसूरत और आलीशान महल है, जिस पर लिखा है- "शहज़ादी ज़ैबुन्निसा का ख़रीदा हुआ महल."
औरंगज़ेब उसमें जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन महल के पहरेदार उन्हें महल के अंदर नहीं जाने देते. अगली सुबह बादशाह ने अपनी 12 साल की बेटी ज़ैबुन्निसा से पूछा कि जन्नत का महल क्या है? इस पर बेटी ने जवाब दिया कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों के पास हज़रत सरमद एक मिट्टी का घरौंदा बनाकर बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा, "मैं जन्नत का महल बनाता हूं."   मैंने एक हुक़्क़ा तम्बाक़ू के बदले उस महल को ख़रीद लिया. ये बात सुनकर बादशाह बेचैन हो गए. अगले जुमे को वे जामा मस्जिद गए और हज़रत सरमद से पूछा, "जन्नत का एक महल हमें भी ख़रीदना है." हज़रत सरमद ने जवाब दिया, ख़रीद-फ़रोख़्त हर रोज़ नहीं होती."

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एक मुख़्तसर और पुरअसरार क़िस्सा...

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एक नेक और मालदार शख़्स ने अपना क़िस्सा लिखा है कि एक दिन मेरा दिल बहुत बैचैन हुआ. हर चंद कोशिश की कि दिल बहल जाए, परेशानी का बोझ उतरे और बेचैनी कम हो. मगर वह बढती ही गई. बिला आख़िर तंग आकर बाहर निकल गया और बेमक़सद इधर-उधर घूमने लगा. इसी दौरान एक मस्जिद के पास से गुज़रा, तो देखा कि दरवाज़ा खुला है. फ़र्ज़ नमाज़ों में से किसी का वक़्त नहीं था. मैं बेसाख़्ता मस्जिद में दाख़िल हुआ कि वज़ू करके दो चार रकअत नमाज़ अदा करता हूं, मुमकिन है दिल को राहत मिले. वज़ू के बाद मस्जिद में दाख़िल हुआ, तो एक साहब को देखा, ख़ूब रो-रोकर गिड़गिड़ाकर दुआ मांग रहे हैं और काफ़ी बेक़रार हैं. ग़ौर से इनकी दुआ सुनी तो क़र्ज़ा उतारने की फ़रियाद में थे. उनको सलाम किया, मुसाफ़ा हुआ, क़र्ज़े का पूछा बताने लगे कि आज अदा करने की आख़िरी तारीख़ है. अपने मालिक से मांग रहा हूं. उनका क़र्ज़ा चंद हज़ार रुपये का था. वो मैंने जेब से निकाल कर दे दिए. उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और मेरे दिल की बेचैनी सुकून में बदल गई. मैंने अपना विज़िटिंग कार्ड निकालकर पेश किया कि आइंदा जब ज़रूरत हो, मुझे फ़ोन कर लें. ये मेरा पता है और ये मेरा फ़ोन नम्बर है. उन्होंने बग़ैर देखे कार्ड को वापस कर दिया और फ़रमाया, "न जनाब ये नहीं. मेरे पास उनका पता मौजूद है, जिन्होंने आज आपको भेजा है.  मैं किसी का पता जेब में रखकर उनको नाराज़ नहीं कर सकता."
अनुवाद : रियाज़ अहमद



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हज़रत इब्राहिम-बिन-अदहम

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फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत इब्राहिम-बिन-अदहम पहले बलख़ के बादशाह थे. मगर सूफ़ियाना रंग उन पर इस तरह चढ़ा कि उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर फ़क़ीर की ज़िन्दगी अपना ली. बलख़ छोड़कर वे मक्का आ गए और वहीं लकड़ियां काटकर अपना गुज़ारा करने लगे. लकड़ियां बेचकर उन्हें जो कुछ मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते. उनका जीवन त्याग और जन कल्याण की एक बेहतरीन मिसाल है.

जब वे बलख़ के बादशाह थे, तो एक दिन छत पर सोते वक़्त उन्हें आहट सुनाई दी. इस पर उनकी नींद खुल गई और उन्होंने पूछा कि कौन है? तभी जवाब मिला कि तेरा परिचित. उन्होंने पूछा कि वह यहां क्या कर रहा है, तो जवाब मिला कि वह ऊंट ढूंढ रहा है. उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि छत पर ऊंट भला कैसे मिल सकता है? इस पर जवाब मिला कि जब तू बादशाह रहते हुए अल्लाह को पाने की कामना कर सकता है, तो फिर छत पर ऊंट भी मिल सकता है. उनका दिल अल्लाह की इबादत की तरफ़ लगाने वाले हज़रत ख़िज्र (देवदूत) थे. इसी तरह एक दिन जब इब्राहिम-बिन-अदहम अपने दरबार में बैठे थे, तो तभी हज़रत ख़िज्र वहां आए और इधर-उधर कुछ ढूंढने लगे. इस पर बादशाह ने पूछा कि वे क्या तलाश रह हैं? हज़रत ख़िज्र ने जवाब दिया कि मैं इस सराय में ठहरना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि यह सराय नहीं, बल्कि उनका महल है. हज़रत ख़िज्र ने सवाल किया कि इससे पहले यहां कौन रहता था. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके पूर्वज यहां रहते थे. फिर हज़रत ख़िज्र ने कहा कि इस स्थान पर इतने लोग रहकर जा चुके हैं, तो यह सराय ही है. यह कहकर वे चले गए.

जब बादशाह को उनकी बात का मतलब समझ आया, तो वे जंगल में चले गए. वहां उनकी मुलाक़ात एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग से हुई, जिन्होंने उन्हें इस्मे- आज़म की तालीम दी. वे हमेशा अल्लाह की इबादत में मशग़ू रहते. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हज़रत ख़िज्र से हुई, जिन्होंने बताया कि वे बुज़ुर्ग उनके भाई इलियास हैं. इसके बाद उन्होंने हज़रत ख़िज्र से दीक्षा ली.

एक बार की बात है कि बादशाह शिकार के लिए जंगल में गए. जब उन्होंने हिरण का शिकार करने के लिए हथियार उठाया, तो वह बोल पड़ा और उनसे कहने लगा कि क्या अल्लाह ने उन्हें यह जीवन दूसरों को सताने के लिए ही दिया है? हिरण की बात सुनकर उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कभी किसी को भी कष्ट न पहुंचाने का वादा करते हुए मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया. दरअसल, जड़ या बेज़ुबान चीज़ों का बोलना इंसान के ज़मीर की आवाज़ होती है, जो उसे किसी भी ग़लत काम को करने से रोकती है. जो व्यक्ति अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका अनुसरण करता है, वे बुराई के रास्ते पर जाने से बच जाता है. मगर जो लोग ज़मीर की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे मानवता को त्यागकर पशुवत प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो बाद में समाज और स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध होती है.

इब्राहिम-बिन-अदहम का राजपाट से मोह भंग हो गया था. वे अपनी पत्नी और दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर जंगल की तरफ़ चले गए. वहां उन्होंने एक लकड़हारे को अपने शाही वस्त्र देकर उसके मामूली कपड़े ले लिए. इन्हीं कपड़ों को धारण कर वे आगे की यात्रा पर निकल पड़े. घूमते-घूमते वे नेशापुर पहुंच गए और वहां की एक गुफ़ा में अपना डेरा जमाया. इस गुफ़ा में उन्होंने नौ साल तक अल्लाह की इबादत की. इसी दौरान हफ़्ते में एक दिन वे जंगल से लकड़ियां काटते और उन्हें बाज़ार में बेचकर जो कुछ मिलता उसके कुछ हिस्से से रोटी ख़रीदते और बाक़ी हिस्सा ज़रूरतमंदों में बांट देते.

वे मुरीदों को हमेशा यह हिदायत करते थे कि कभी किसी औरत या कमसिन लड़के को नज़र भरकर नहीं देखना और हज के दौरान तो बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि तवाफ़ में बहुत-सी औरतें और कमसिन लड़के भी शरीक होते हैं. एक बार तवाफ़ की हालत में एक लड़का सामने आ गया और न चाहते हुए भी उनकी निगाहें उस पर जम गईं. तवाफ़ के बाद मुरीदों ने कहा कि अल्लाह आप पर रहम करे, क्योंकि आपने हमें जिस चीज़ से रोकने की हिदायत की थी, आप ख़ुद उसमें शामिल हो गए. क्या आप इसकी वजह बयान कर सकते हैं?

उन्होंने फ़रमाया कि जब मैंने बल्ख़ छोड़ा था उस वक़्त मेरा बेटा छोटा बच्चा था और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह वही बच्चा है. इसके बाद उनके एक मुरीद ने बच्चे को तलाश किया और उससे उसके वालिद के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह बलख़ के बादशाह इब्राहिम-बिन-अदहम का बेटा है, जो बरसों पहले सल्तनत छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए कहीं चले गए हैं. मुरीद ने उनके बेटे और बीवी को इब्राहिम-बिन-अदहम से मिलवाया. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को गले से लगाया, तो उसकी मौत हो गई. जब मुरीद ने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ग़ैब से आवाज़ आई थी कि तू हमसे दोस्ती का दावा करता है और फिर अपने बेटे से भी मुहब्बत जताता है. यह सुनकर उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह ! या तो बेटे की जान ले ले या फिर मुझे मौत दे दे. अल्लाह ने बेटे के हक़ में दुआ क़ुबूल की.

एक बार की बात है कि इब्राहिम-बिन-अदहम दजला नदी के किनारे बैठे अपनी गुदड़ी सील रहे थे. तभी किसी आदमी ने आकर उनसे पूछा की बलख़ की सल्तनत छोडक़र आपको क्या मिला? उन्होंने एक सुई दरिया में डाल दी और इशारा किया. तभी हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक सोने की सुई लेकर सामने आ गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें तो केवल अपनी ही सुई चाहिए. फिर एक छोटी मछली मुंह में सुई लेकर सामने आ गई. उन्होंने उस आदमी को बताया कि सल्तनत छोड़ने के बाद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि इंसान को हक़ीक़त में किस चीज़ की ज़रूरत होती है.

एक बार उन्होंने पानी के लिए कुएं में डोल डाला, तो उसमें सोना भरकर आ गया. दोबारा डालने पर डोल चांदी से भरा हुआ मिला और तीसरी बार डाला, तो उसमें हीरे और जवाहारात भरे हुए थे. चौथी बार डोल कुएं में डालते वक़्त उन्होंने कहा कि उन्हें तो सिर्फ़ पानी ही चाहिए. इसके बाद डोल पानी से भरा हुआ मिला. उन्होंने उस आदमी को समझाया कि धन-दौलत और एश्वर्य नश्वर हैं. मनुष्य का जीवन इनके बिना भी गुज़र सकता है, लेकिन अल्लाह की इबादत और जन सेवा ही मनुष्य के हमेशा काम आती है. अल्लाह भी दूसरों के लिए जीने वाले लोगों को ही पसंद करता है. वे कहते थे कि अल्लाह पर हमेशा यक़ीन रखना चाहिए, क्योंकि वे कभी किसी को मायूस नहीं करता.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

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ग़ुज़ारिश : ज़रूरतमंदों को गोश्त पहुंचाएं

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ईद-उल-अज़हा का महीना शुरू हो चुका है... जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं... तीन दिन तक एक ही घर में कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं... इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है... एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है... जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं...
ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती... ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... राहे-हक़ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक गोश्त पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं...
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक पहुंचाएं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है...

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें हैं.
पहली शर्त
वे बहीमतुल अनआम (चौपायों) में से हों,  और वे ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है- "और हर उम्मत के लिए हमने क़ुर्बानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर किया है, ताकि वे उन बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों) पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है." (सूरतुल हज्ज : 34)
बहीमतुल अनआम (पशु) से मुराद ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं. अरब के बीच यही जाना जाता है, इसे हसन, क़तादा, और कई लोगों ने कहा है.

दूसरी शर्त
वे जानवर शरीअत में निर्धारित आयु को पहुंच गए हों. इस प्रकार कि भेड़ जज़आ हो, या दूसरे जानवर सनिय्या हों, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है- "तुम मुसिन्ना जानवर ही क़ुर्बानी करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे लिए कठिनाई हो, तो भेड़ का जज़आ़ क़ुर्बानी करो." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है.)

मुसिन्ना : सनिय्या या उस से बड़ी आयु के जानवर को कहते हैं, और जज़आ उससे कम आयु के जानवर को कहते हैं.
ऊंट में से सनिय्या : वह जानवर है जिस के पांच साल पूरे हो गए हों.
गाय में से सनिय्या : वह जानवर है जिसके दो साल पूरे हो गए हों.
बकरी में से सनिय्या : वह जानवर है जिसका एक साल पूरा हो गया हो.
और जज़आ : उस जानवर को कहत हैं, जो छह महीने का हो.

अत: ऊंट, गाय और बकरी में से सनिय्या से कम आयु के जानवर की क़ुर्बानी करना शुद्ध नहीं है, भेड़ में से जज़आ से कम आयु की कु़र्बानी नहीं है.

तीसरी शर्त
वे जानवर उन दोषों (ऐबों और कमियों) से मुक्त (ख़ाली) होने चाहिए, जिनके होते हुए वे जानवर क़ुर्बानी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, औ वे चार दोष हैं-
1. स्पष्ट कानापन : और वह ऐसा जानवर है जिसकी आंख धंस गई (अंधी हो गई) हो, या इस तरह बाहर निकली हुई हो कि वह बटन की तरह लगती हो, या इस प्रकार सफ़ेद हो गई हो कि साफ़ तौर पर उसके कानेपन का पता देती हो.
2. स्पष्ट बीमारी : ऐसी बीमारी जिसकी निशानियांपशु पर स्पष्ट हों जैसे कि ऐसा बुख़ार जो उसे चरने से रोक दे और उसकी भूख को मार दे, और प्रत्यक्ष खुजली जो उसके गोश्त को ख़राब कर दे या उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर दे,  और गहरा घाव जिस से उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए, इत्यादि.
3. स्पष्ट लंगड़ापन : जो पशु को दूसरे दोषरहित पशुओं के साथ चलने से रोक दे.
4. ऐसा लंगड़ापन जो गूदा को समाप्त करन वाला हो, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि क़ुर्बानी के जानवरों में किस चीज़ से बचा जाए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से संकेत करते हुए फ़रमाया : "चार : लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन स्पष्ट हो, काना जानवर जिसका कानापन स्पष्ट हो, रोगी जानवर जिसका रोग स्पष्ट हो, तथा लागर जानवर जिस की हड्डी में गूदा न हो. इसे इमाम मालिक ने मुवत्ता में बरा बिन आज़िब की हदीस से रिवायत किया है, और सुनन की एक रिवायत में बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि उन्होंने कहा- अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीच खड़े हुए और फ़रमाया- "चार चीज़ें (दोष और ख़ामियां) क़ुर्बानी के जानवर में जाइज़ नहीं हैं." और आप ने पहली हदीस के समान ही उल्लेख किया. इसे अल्बानी ने इर्रवाउल गलील (1148) में सही कहा है.

ये चार दोष और ख़ामियां क़ुर्बानी के जानवर के पर्याप्त होने में रुकावट हैं (अर्थात् इनमें से किसी भी दोष से पीड़ित जानवर की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है), इसी तरह जिन जानवरों में इन्हीं के समान या इन से गंभीर दोष और ख़ामियां होंगी उन पर भी यही हुक्म लागू होगा, इस आधार पर निम्नलिखित जानवरों की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है-
1. वह जानवर जो दोनों आंख का अंधा हो.
2. वह जानवर जिसका पेट अपनी क्षमता से अधिक खाने के कारण फूल गया हो, यहां तक कि वह पाखाना कर दे, और ख़तरे से बाहर हो जाए.
3. वह जानवर जो जने जाने के समय कठिनाई से पीड़ित हो जाए, यहां तक कि उस से ख़तरा टल जाए.
4. ऊंचे स्थान से गिरने या गला घुटने आदि के कारण मौत के ख़तरे का शिकार जानवर यहां तक कि वह ख़तरे से बाहर हो जाए.
5. किसी बीमारी या दोष के कारण चलने में असमर्थ जानवर.
6. जिस जानवर का एक हाथ या एक पैर कटा हुआ हो.

जब इन दोषों और ख़ामियों को उपर्युक्त चार नामज़द (मनसूस) ख़ामियों के साथ मिलाया जाए, तो उन ख़ामियों (ऐबों) की संख्या जिनके कारण क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है, दस हो जाती है. ये छह ख़ामियां और जो पिछली चार ख़ामियों से पीड़ित हो.

चौथी शर्त
वह जानवर क़ुर्बानी करने वाले की मिल्कियत (संपत्ति) हो, या शरीअत की तरफ़ से या मालिक की तरफ़ से उसे उस जानवर के बारे में अनुमति प्राप्त हो. अत: ऐसे जानवर की क़ुर्बानी शुद्ध नहीं है जिसका आदमी मालिक न हो जैसे कि हड़प किया हुआ, या चोरी किया हुआ, या झूठे दावा द्वारा प्राप्त किया गया जानवर इत्यादि, क्योंकि अल्लाह तआला की अवज्ञा के द्वारा उस का सामीप्य और नज़दीकी प्राप्त करना उचित नहीं है.
तथा अनाथ के संरक्षक (सरपरस्त) के लिए उसके धन से उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी करना वैध है. अगर उसकी परम्परा है और क़ुर्बानी न होने के कारण उसके दिल के टूटने का भय है.
तथा वकील (प्रतिनिधि) का अपने मुविक्कल के माल से उसकी अनुमति से क़ुर्बानी करना उचित है.

पांचवीं शर्त
उस जानवर के साथ किसी दूसरे का हक़ (अधिकार) संबंधित न हो, चुनांचे उस जानवर की क़ुर्बानी मान्य नहीं है, जो किसी दूसरे की गिरवी हो.

छठी शर्त
शरीअत में क़ुर्बानी का जो सीमित समय निर्धारित है उसी में उसकी क़ुर्बानी करे, और वह समय क़ुर्बानी (10 ज़ुलहिज्जा) के दिन ईद की नामज़ के बाद से अय्यामे तश्रीक़ अर्थात् 13वीं ज़ुलहिज्जा के दिन सूर्यास्त तक है. इस तरह बलिदान के दिन चार हैं- नमाज़ के बाद से ईद का दिन, और उस के बीद अतिरिक्त तीन दिन. जिसने ईद की नमाज़ से फ़ारिग़ होने से पहले, या तेरहवीं ज़ुलहिज्जा को सूरज डूबने के बाद क़ुर्बानी की, तो उसकी क़ुर्बानी शुद्ध और मान्य नहीं है , क्योंकि इमाम बुख़ारी ने बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "जिसने ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी की, तो उसने अपने घर वालों के लिए गोश्त तैयार किया है, और उस का धार्मिक परंपरा से (क़ुर्बानी की इबादत) से कोई संबंध नहीं है." तथा जुनदुब बिन सुफ़यान अल-बजली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा- "मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास उपस्थित था, जब आप ने फ़रमाया- "जिसने -ईद की- नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुर्बानी कर दी, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुर्बानी करे." तथा नुबैशा अल-हुज़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "तश्रीक़ के दिन खाने, पीने और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को याद करने के दिन हैं." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है)

किन्तु यदि किसी कारणवश तश्रीक़ के दिन (13 ज़ुलहिज्जा) से विलंब हो जाए, उदाहरण के तौर पर बिना उसकी कोताही के क़ुर्बानी का जानवर भाग जाए और समय बीत जाने के बाद ही मिले, या किसी को क़ुर्बानी करने के लिए वकील (प्रतिनिधि) बना दे और वकील भूल जाए यहां तक कि क़ुर्बानी का समय निकल जाए, तो उज़्र के कारण समय निकलने के बाद क़ुर्बानी करने में कोई बात नहीं है, तथा उस आदमी पर क़ियास करते हुए जो नमाज़ से सो जाए या उसे भूल जाए, तो वह सोकर उठने या उसके याद आने पर नमाज़ पढ़ेगा.

निर्धारित समय के अंदर दिन और रात में किसी भी समय क़ुर्बानी करना जाइज़ है, जबकि दिन में क़ुर्बानी करना श्रेष्ठ है, तथा ईद के दिन दोनों ख़ुत्बों के बाद क़ुर्बानी करना अफज़ल हैं, तथा हर दिन उसके बाद वाले दिन से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भलाई की तरफ़ पहल और जल्दी करना पाया जाता है.

साभार islamqa



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महबूब

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मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहता हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहता हूं…
-फ़िरदौस ख़ान

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सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

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بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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इस बलॊग में इस्तेमाल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं
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