खाना...

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एक बुज़ुर्ग फ़रमाते हैं कि मैं एक मस्जिद में नमाज़ अदा करने गया. वहां मैंने देखा कि एक मालदार ताजिर (व्यापारी) बैठा हैं और क़रीब ही एक फ़क़ीर दुआ मांग रहा हैं-
"या अल्लाह तआला, आज मैं इस तरह का खाना और इस क़िस्म का हलवा खाना चाहता हूं".
ताजिर ने ये दुआ सुनकर बदगुमानी करते हुए कहा- "अगर ये मुझसे कहता तो मैं इसे ज़रूर खिलाता, मगर ये बहाना साज़ी कर रहा है और मुझे सुनाकर अल्लाह तआला से दुआ कर रहा है, ताकि मैं सुनकर इसे खिला दूं, वल्लाह मैं तो इसे नहीं खिलाऊंगा".
वो फ़क़ीर दुआ से फ़ारिग़ होकर एक कोने में सो गया. कुछ देर बाद एक शख़्स ढका हुआ तबाक़ लेकर आया और दायें बायें देखता हुआ फ़क़ीर के पास गया और उसे जगाने के बाद वो तबाक़ ब सद आजिज़ी उसके सामने रख दिया. ताजिर ने ग़ौर से देखा, तो ये वही खाने थे जिनके लिए फ़क़ीर ने दुआ की थी. फ़क़ीर ने ख़्वाहिश के मुत़ाबिक़ इसमें से खाया और बाक़ी खाना वापस कर दिया.
ताजिर ने खाना लाने वाले शख़्स को अल्लाह तआला का वास्ता देकर पूछा- "क्या तुम इन्हें पहले से जानते हो"?
खाना लाने वाले शख़्स ने जवाब दिया- "ब खुदा, हरगिज़ नहीं, मैं एक मज़दूर हूं, मेरा जमाई और बेटी साल भर से इन खानों की ख़्वाहिश रखते थे, मगर मुहैया नहीं हो पाते थे. आज मुझे मज़दूरी में एक मिस्क़ाल (यानी साढ़े चार माशा) सोना मिला, तो मैंने उससे गोश्त वग़ैरह ख़रीदा और घर ले आया. मेरी बीवी खाना पकाने में मसरूफ़ थी कि इस दौरान मेरी आंख लग गई. आंखें तो क्या सोईं, सोई हुई क़िस्मत अंगड़ाई लेकर जाग उठी. मुझे ख़्वाब में सरवरे-दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का जलवा-ए-ज़ैबा नज़र आ गया और हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने अपने मुबारक लबों को जुम्बिश दी और फ़रमाया-
"आज तुम्हारे इलाक़े में अल्लाह तआला का एक वली आया हुआ है. उसका क़याम मस्जिद में है, जो खाने तुमने अपने बीवी बच्चों के लिए तैयार करवाए हैं, उन खानों की उसे भी ख़्वाहिश है. उसके पास ले जाओ वो अपनी ख़्वाहिश के मुत़ाबिक़ खाकर वापस कर देगा, बक़िया में अल्लाह तआला तेरे लिए बरकत अता फ़रमाएगा और मैं तुम्हारे लिए जन्नत की ज़मानत देता हूं".
नींद से उठकर मैंने हुक्म की तामील की, जिसे तुमने भी देखा.
वो ताजिर कहने लगा- "मैंने इन्हें इन्हीं खानों के लिए दुआ मांगते सुना था. तुमने इन खानों पर कितनी रक़म ख़र्च की"?
उस शख़्स ने जवाब दिया- "मिस्क़ाल भर सोना".
उस ताजिर ने पेशकश की- क्या ऐसा हो सकता हैं कि मुझसे दस मिस्क़ाल सोना ले लो और उस नेकी में मुझेभी हिस्सेदार बना लो"?
उस शख़्स ने कहा- "ये नामुमकिन है".
ताजिर ने इज़ाफ़ा करते हुए कहा- "अच्छा मैं तुझे बीस मिस्क़ाल सोना दे देता हूं".
उस शख़्स ने अपने इंकार को दोहराया. फिर उस ताजिर ने सोने की मिक़दार बढ़ाकर पचास फिर सौ मिस्क़ाल कर दी, मगर वो शख़्स अपने इंकार पर डटा रहा और कहने लगा- "वल्लाह, जिस शै की ज़मानत रसूले-अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दी है, अगर तू उसके बदले सारी दुनिया की दौलत भी दे दे फिर भी मैं उसे फ़रोख़्त नहीं करूंगा, तुम्हारी क़िस्मत में ये चीज़ होती, तो तुम मुझसे पहले कर सकते थे".
ताजिर निहायत नादिम और परेशान होकर मस्जिद से चला गया, गोया उसने अपनी क़ीमती चीज़ खो दी हो.

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रमज़ान और शबे-क़द्र

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रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है. शबे क़द्र का अर्थ होता है " सर्वश्रेष्ट रात " ऊंचे स्थान वाली रात " लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात, शबे-क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।
निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. " (सुराः कद्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।
इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। " और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।" (सुराः कद्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। " (सुराः कद्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। " यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। " हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।...... " (सुराः अद् दुखान)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। " (सुराः अद् दुखानः5 )
(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।
मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। " जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?
यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।
शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया " शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।" ( तब्रानी )
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है " शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।" ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।" ( सही मुस्लिम )
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी" अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन...

Courtesy jiwankatha

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रमज़ान की फ़ज़ीलत

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या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...

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फ़िरदौस ख़ान
मरहबा सद मरहबा आमदे-रमज़ान है
खिल उठे मुरझाए दिल, ताज़ा हुआ ईमान है
हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है
या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है...
माहे-रमज़ान इबादत, नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं, जिनमें कलमा, नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है.

इबादत
रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को 'तरावीह' कहते हैं. इसका वक्त रात में इशा की नमाज़ के बाद फ़ज्र की नमाज़ से पहले तक है. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रमज़ान में क़ियामुल्लैल में बेहद दिलचस्पी ली. आपने फ़रमाया कि ''जिसने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) हासिल करने की नीयत से रमज़ान में क़ियामुल्लैल किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे.''उन्होंने फ़रमाया कि ''यह ऐसा महीना है कि इसका पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत है, दरमियानी हिस्सा मग़फ़िरत है और आख़िरी हिस्सा जहन्नुम की आग से छुटकारा है.'' रमज़ान के तीसरे हिस्से को अशरा भी कहा जाता है. आपने फ़रमाया कि ''रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ (विषम) रातों में लैलतुल क़द्र की तलाश करो.'' लैलतुल क़द्र को शबे-क़द्र भी कहा जाता है. शबे-क़द्र के बारे में क़ुरआन में कहा गया है कि यह हज़ार रातों से बेहतर है, यानि इस रात में इबादत करने का सवाब एक हज़ार रातों की इबादत के बराबर है. मुसलमान रमज़ान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख़ को पूरी रात इबादत करते हैं.

ख़ुशनूदी ख़ान कहती हैं- इस महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ, इसलिए रमज़ान बहुत ख़ास है. हर मुसलमान के लिए यह महीना मुक़द्दस और आला है. हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त इबादत में गुज़ारना चाहिए. वैसे भी रमज़ान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज़्यादा ही मिलता है. वे कहती हैं कि शबे-क़द्र को उनके ख़नदान के सभी लोग रातभर जागते हैं. मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं.

वहीं, ज़ुबैर कहते हैं कि काम की वजह से पांचों वक़्त क़ी नमाज़ नहीं हो पाती, लेकिन रमज़ान में उनकी कोशिश रहती है कि नमाज़ और रोज़ा क़ायम हो सके. दोस्तों के साथ मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ने की बात ही कुछ और है. इस महीने की रौनक़ों को देखकर कायनात की ख़ूबसूरती का अहसास होता है. रमज़ान हमें नेकियां और इबादत करने का सबक़ देता है और हमें अल्लाह के क़रीब करता है.

ज़ायक़ा
माहे-रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार व्यंजनों की भरमार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ व्यंजनों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होता. रमज़ान का ख़ास व्यंजन हैं फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. अमूमन रोज़ा खजूर के साथ खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों का चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ व्यंजन शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ोरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़ान पर की शोभा बढ़ाते हैं.
ज़ीनत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगाना ज़्यादा पसंद करते हैं.
रमज़ान में रोटी बनाने वालों का काम बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है. दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं. यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रुमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि. अमूमन इस इलाके क़े होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं.

हदीस
जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं. हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते. ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है.
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं.
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

ख़रीददारी
रमज़ान में बाज़ार की रौनक़ को चार चांद लग जाते हैं. रमज़ान में दिल्ली के मीना बाज़ार की रौनक़ के तो क्या कहने. दुकानों पर चमचमाते ज़री वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक़्क़ाशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच ख़रीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे. रमज़ान में तरह-तरह का नया सामान बाज़ार में आने लगता है. लोग रमज़ान में ही ईद की ख़रीददारी शुरू कर देते हैं. आधी रात तक बाज़ार सजते हैं. इस दौरान सबसे ज़्यादा कपड़ों की ख़रीददारी होती है. दर्ज़ियों का काम बढ़ जाता है. इसलिए लोग ख़ासकर महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं. अलविदा जुमे को भी नये कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ने का दस्तूर है. हर बार नये डिज़ाइनों के कपड़े बाज़ार में आते हैं. नेट, शिफ़ौन, जॉरजेट पर कुन्दन वर्क, सिक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को ख़ासा आकर्षित करता है. दिल्ली व अन्य शहरों के बाज़ारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है. इसके अलावा सदाबहार चिकन का काम भी ख़ूब पसंद किया जाता है। पुरानी दिल्ली के कपड़ा व्यापारी शाकिर अली कहते हैं कि बाज़ार में जिस चीज़ का मांग बढ़ने लगती है हम उसे ही मंगवाना शुरू कर देते हैं. ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज़्यादा होते हैं. इसलिए माहे-रमज़ान में शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है. शादियों में आज भी पारंपरिक पहनावे ग़रारे को ख़ासा पसंद किया जाता है.

चूड़ियों और मेहंदी के बिना ईद की ख़रीददारी अधूरी है. रंग-बिरंगी चूड़ियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं. चूड़ियों के बग़ैर सिंगार पूरा नहीं होता. बाज़ार में तरह-तरह की चूड़ियों की बहार है, जिनमें कांच की चूड़ियां, लाख की चूड़ियां, सोने-चांदी की चूड़िया, और मेटल की चूड़ियां शामिल हैं. सोने की चूड़ियां तो अमीर तबक़े तक ही सीमित हैं. ख़ास बात यह भी है कि आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूड़ियां ही ज़्यादा आकर्षित करती हैं. बाज़ार में कांच की नगों वाली चूड़ियों की भी ख़ासी मांग है. कॉलेज जाने वाली लड़कियां और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूड़ियां ज़्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज़ करती हैं और टूटती भी नहीं हैं, जबकि कांच की नाज़ुक चूड़ियां ज़्यादा दिनों तक हाथ में नहीं टिक पातीं.

इसके अलावा मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमज़ान की रौनक़ को और बढ़ा देती हैं. इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है. इत्र जन्नतुल-फ़िरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का ख़ूब पसंद किया जाता है. रमज़ान में मिस्वाक से दांत साफ़ करना सुन्नत माना जाता है. इसलिए इसकी मांग भी बढ़ जाती है. रमज़ान में टोपियों की बिक्री भी ख़ूब होती है. पहले लोग लखनवी दुपल्ली टोपी ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन अब टोपियों की नई वैरायटी पेश की जा रही हैं. अब तो लोग विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों से सराबोर पारंपरिक टोपी भी पसंद कर रहे हैं. इसके अलावा अरबी रुमाल भी ख़ूब बिक रहे हैं. रमज़ान के मौक़े पर इस्लामी साहित्य, तक़रीरों, नअत, हम्द,क़व्वालियों की कैसेट सीटी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है.

यूं तो दुनियाभर में ख़ासकर इस्लामी देशों में रमज़ान बहुत अक़ीदत के साथ मनाया जाता है, लेकिन हिन्दुस्तान की बात ही कुछ और है. विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में मुसलमानों के अलावा ग़ैर मुस्लिम लोग भी रोज़े रखते हैं. कंवर सिंह का कहना है कि वे पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखते आ रहे हैं. रमज़ान के दौरान वे सुबह सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते. उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोज़ों को ज़रूर क़ुबूल करेगा. भारत देश की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर त्योहार मनाते हैं. यही जज़्बात गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरक़रार रखते हैं.

तस्वीर गूगल से साभार

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इस्लाम के स्तंभ

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हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
इस्लाम पाँच स्तंभों पर आधारित है जिन्हें पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस फरमान के द्वारा स्पष्ट किया है :"इस्लाम की नीव पाँच चीज़ों पर आधारित है: इस बात की शहादत देना कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा पूज्य (मा’बूद) नहीं, और यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पैगंबर हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज्ज करना और रमज़ान के महीने के रोज़े रखना।" (बुखारी हदीस संख्याः 8)
इस्लाम अक़ीदा (आस्था, विश्वास) और शरीअत (नियम, क़ानून, शास्त्र) का नाम है जिस में अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल और हराम (वैध और अवैद्ध), नैतिकता, शिष्टाचार, उपासना के कार्य, मामलात, अधिकारों और कर्तव्यों और क़ियामत के दृश्यों को स्पष्ट किया है। जब अल्लाह तआला ने इस धर्म को अपने पैग़म्बर के हाथ पर परिपूर्ण कर दिया, तो इसे इस बात के लिए पसंद कर लिया कि यह क़ियामत आने तक सर्व मानव जाति के लिए जीवन का दस्तूर बन जाये : "आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दीं और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसन्द कर लिया।" (सूरतुल-माईदा:3)
यह इस्लाम के स्तंभ और उसके सिद्धांत हैं जिन पर वह आधारित है :
पहला स्तंभ : शहादतैन (दो गवाहियाँ अर्थात "ला-इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" की गवाही) :
इस का मतलब यह है कि मनुष्य यह विश्वास रखे कि अकेला अल्लाह ही परमेश्वर (पालनकर्ता) स्वामी, नियंत्रक, उत्पत्तिकर्ता और प्रदाता है, और उसके उन सभी सुंदर नामों और सर्वोच्च गुणों को साबित करे जिन्हें अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है, या उन्हें उसके लिए उसके रसूल ने साबित किया है, और यह आस्था और विश्वास रखे कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है :"वह (अल्लाह) आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला है, उसके औलाद कहाँ हो सकती है? जब कि उसकी कोई बीवी नहीं है वह हर चीज़ का बनाने वाला और जानने वाला है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है, उस के सिवाय कोई माबूद नहीं, हर चीज़ का बनाने वाला है, इसलिए उसी की इबादत करो और वह हर चीज़ का निगराँ है।" (सूरतुल अंआम : 101-102)
तथा मनुष्य यह आस्था रखे कि अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना रसूल बनाकर भेजा है, और आप पर क़ुर्आन अवतरित किया है और आप को तमाम लोगों तक इस दीन को पहुँचाने का आदेश दिया है, तथा यह आस्था रखे कि अल्लाह और उसके रसूल से महब्बत करना और उनका आज्ञापालन करना हर एक पर वाजिब है, और अल्लाह से महब्बत करना रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और ताबेदारी के बिना परिपूर्ण नहीं हो सकता: "कह दीजिए अगर तुम अल्लाह तआला से महब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी (अनुसरण) करो, स्वयं अल्लाह तआला तुम से महब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा और अल्लाह तआला बड़ा माफ करने वाला और बहुत मेहरबान (दयालू) है।" (सुरत-आल इम्रान: 31)
दूसरा स्तंभ : नमाज़
इसका मतलब यह है कि आदमी यह अक़ीदा रखे कि अल्लाह ने हर बालिग बुद्धिमान मुसलमान पर दिन और रात में पाँच वक्त की नमाज़ें अनिवार्य की हैं जिसे वह पवित्रता की हालत में अदा करेगा, चुनाँचि वह अपने रब के सामने हर दिन पाकी हासिल करके नम्रता और खुशू के साथ खड़ा होता है, अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करता है, उसके फज्ल़ (अनुकम्पा) का सवाल करता है, उस से अपने गुनाहों की माफी माँगता है, उस से जन्नत का प्रश्न करता है और जहन्नम से पनाह मांगता है।
दिन और रात में अनिवार्य नमाज़ें पाँच हैं : फज्र, ज़ुह्र, अस्र, मग्रिब और इशा। इसी तरह कुछ मस्नून (ऐच्छिक) नमाज़ें भी हैं जैसे क़ियामुल्लैल, तरावीह की नमाज़, चाश्त के वक्त की दो रक्अतें और इनके अलावा दूसरी सुन्नत नमाज़ें।
नमाज़, चाहे फज़Z हो या नफ्ल, सभी मामलों में केवल अकेले अल्लाह की ओर वास्तविक रूप से ध्यानगम्न (मुतवज्जिह) होने का प्रतिनिधित्व करता है, अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा समस्त मुसलमानों को जमाअत के साथ उसकी पाबन्दी करने का आदेश दिया है : "नमाज़ों की हिफाज़त करो विशेषकर बीच वाली नमाज़ की, और अल्लाह तआला के लिए विनम्रता के साथ (बा-अदब) खड़े रहा करो।" (सूरतुल बक़रा : 238)
पाँच समय की नमाज़ें दिन और रात में प्रत्येक पुरूष और स्त्री पर अनिवार्य हैं : "नि:सन्देह नमाज़ मुसलमानों पर निश्चित और नियत समय पर अनिवार्य की गई हैं।" (सूरतुन्निसा :103)
और जिस ने नमाज़ छोड़ दिया, उस आदमी का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं, अत: जिस ने जान बूझ कर उसे छोड़ दिया उस ने कुक्र किया जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "(लोगो !) अल्लाह की ओर ध्यान करते हुए उस से डरते रहो और नमाज़ को कायम रखो और मुश्रिकों (मूर्तिपूजकों) में से न हो जाओ।" (सूरतुर्रूम :31)
इस्लाम धर्म आपसी सहयोग, भाईचारे और प्यार पर आधारित है, इस्लाम ने इन नमाज़ों और इनके अलावा अन्य नमाज़ों के लिए एकत्र होने को इन्हीं प्रतिष्ठाओं (उद्देश्यों) को प्राप्त करने के लिए वैध किया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जमाअत की नमाज़ अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्ताईस दर्जा श्रेष्ठ है।" (मुस्लिम हदीस नं.:650)
कठिनाई और आपदा के समय नमाज़ बन्दे के लिए सहायक है, अल्लाह तआला का फरमान है : "और सब्र और नमाज़ के द्वारा मदद हासिल करो। और वास्तव में यह बहुत भारी है, लेकिन अल्लाह से डरने वालों के लिए नहीं।" (सूरतुल बक़रा :45)
पाँच दैनिक नमाज़ें गुनाहों को मिटा देती हैं, जैसा कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :"तुम्हारा क्या विचार है अगर तुम में से किसी के दरवाजे़ पर नदी हो जिस में वह प्रति दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर पर कुछ गंदगी (मैल) बाक़ी रहे गी? लोगों ने उत्तर दिया : उसकी गंदगी (मैल-कुचैल) बाकी नहीं रह जाये गी। आप ने फरमाया : तो इसी के समान पाँच दैनिक नमाज़ें भी हैं इनके द्वारा अल्लाह तआला गुनाहों को मिटा देता है।" (मुस्लिम हदीस नं.: 677)
मिस्जद में नमाज़ पढ़ना स्वर्ग में प्रवेश करने का कारण है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जो आदमी सुबह या शाम को मिस्जद में आता है तो अल्लाह तआला उसके लिए स्वर्ग में मेहमानी की व्यवस्था करता है जब भी वह सुबह या शाम के समय आता है।" (मुस्लिम हदीस नं. :669)
नमाज़ बन्दे को उसके उत्पत्तिकर्ता (खालिक़) से जोड़ती और मिलाती है, तथा वह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आँख की ठंढक थी। जब भी आप को कोई गंभीर मामला पेश आता था तो नमाज़ की तरफ भागते थे, अपने रब (प्रभु) से चुपके चुपके बातें करते, उस से विनती करते, उस से क्षमा मांगते और उसके फज्ल़ व मेहरबानी (दया और अनुकंपा) का प्रश्न करते।
विनम्रता और भय के साथ पढ़ी जाने वाली नमाज़ मुसलमान को उसके पालनहार (प्रभु) से क़रीब कर देती है, बेहयाई (अश्लीलता) और बुरे कामों से रोकती है जैसा कि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है :"आप पर जिस किताब की वह्य (प्रकाशना, ईश्वाणी) की गई है उसकी तिलावत कीजिये और नमाज़ स्थापित कीजिये, नि:सन्देह नमाज़ बेहयाई (अश्लीलता) और बुरी बातों से रोकती है।" (सूरतुल अंकबूत : 46)
तीसरा स्तंभ : ज़कात :
अल्लाह तआला ने लोगों को रंग, नैतिकता, व्यवहार, ज्ञान, कर्मों और जीविकाओं में भिन्न-भिन्न पैदा किया है, चुनाँचि उन्हीं में से कुछ को धन्वान और कुछ को निर्धन बनाया है, ताकि धन्वान की कृतज्ञता के द्वारा और निर्धन की धैर्य के द्वारा परीक्षा करे।
जब मोमिन लोग आपस में भाई-भाई हैं और यह भाईचारा, करूणा, हमदर्दी, स्नेह, दया, प्यार और मेहरबानी पर आधारित है, इसीलिए अल्लाह तआला ने मुसलमानों पर ज़कात को अनिवार्य किया है जो उनके मालदार लोगों से लेकर उनके निर्धन और दरिद्र लोगों में बांट दिया जायेगा, अल्लाह तआला का फरमान है : "आप उनके मालों में से सद्क़ा ले लीजिए जिस के द्वारा आप उन्हें पाक व साफ कर दीजिए, और उनके लिए दुआ कीजिए, बेशक आप की दुआ उनके लिए इत्मेनान का कारण है।" (सूरतुत्तौबा : 103)
ज़कात, धन को पवित्र करता और उस में बढ़ोतरी करता है, आत्मा को कंजूसी और लोभ (लालच) से पाक करता है, गरीबों और मालदारों के बीच प्यार को मज़बूत बनाता है, जिस के कारण कीना-कपट (द्वेष) समाप्त हो जाता है, शान्ति फैलती है और उम्मत को सौभाग्य प्राप्त होता है।
जो भी आदमी सोना, चाँदी या अन्य धातुओं और व्यापार के सामान में से निसाब भर (वह न्यूनतम राशि जिस पर ज़कात अनिवार्य होती है) का मालिक हो और उस पर एक साल बीत जाये, तो उस पर अल्लाह तआला ने चालीसवाँ हिस्सा (2.5%) ज़कात निकालना अनिवार्य किया है, जहाँ तक कृषि उपज और फलों का संबंध है तो यदि उसकी सिंचाई बिना खर्च के हुई है तो उस में दसवाँ भाग और अगर खर्च के द्वारा उसकी सिंचाई हुई है तो उस में बीसवाँ भाग उसकी कटाई के समय ज़कात निकालना अनिवार्य है, और पशुओं के ज़कात की मात्रा का विवरण किक्ह की किताबों में है। अत: जो इसे निकाले गा अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मिटा देगा, उसके धन में बरकत देगा और उसके लिए बहुत बड़ा अज्र (पुण्य) संग्रहित करके रखे गा, अल्लाह तआला का फरमान है : "तुम नमाज़ की अदायगी करो और ज़कात (धर्मदान) देते रहो, और जो भलाई तुम अपने लिये आगे भेजो गे सब कुछ अल्लाह के पास पा लोगे, बेशक अल्लाह तआला तुम्हारे अमल को देख रहा है।" (सूरतुल बक़रा : 110)
ज़कात को रोक लेना और उसकी अदायगी न करना उम्मत के लिए आपदाओं, मुसीबतों और बुराईयों को न्योता देता है, ज़कात रोकने वालों को अल्लाह तआला ने क़ियामत के दिन कष्टदायक अज़ाब की धमकी दी है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का फरमान है : "और जो लोग सोने चाँदी का खज़ाना रखते हैं और उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च नहीं करते उन्हें कष्टदायक सज़ा की सूचना पहुँचा दीजिए। जिस दिन उस खज़ाना को जहन्नम की आग में तपाया जायेगा, फिर उस से उन के माथे और पहलू और पीठें दागी जायेंगी (उन से कहा जायेगा) यह है जिसे तुम ने अपने लिए खज़ाना बना कर रखा था, तो अपने खज़ानों का मज़ा चखो।" (सूरतुत्तौबा : 34)
ज़कात को गुप्त रखना उसे लोगों के सामने ज़ाहिर करने से बेहतर है जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "अगर तुम सदक़ात (दान-पुण्य) को ज़ाहिर करो, तो वह अच्छा है, और अगर तुम उसे छिपा कर गरीबों को दे दो, तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है, और अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को मिटा देगा, और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उस से अवगत है।" (सूरतुल बक़रा : 27)
जब मुसलमान ज़कात निकाले तो उसके लिए उसे केवल उन्हीं चीज़ों में खर्च करना जाईज़ है जिनका अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 60)
चौथा स्तंभ : रमज़ान का रोज़ा रखना
रोज़ा रखने की नीयत (इच्छा) से फज्र के उदय होने से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों जैसे खाना पीना और संभोग से रूका रहना रोज़ा या 'सौम' कहलाता है।
ईमान के अंदर सब्र (धैर्य) का स्थान शरीर में सिर के समान है। अल्लाह तआला ने इस उम्मत पर साल भर में एक महीना रोज़ा रखना अनिवार्य किया है ताकि वह अल्लाह से डरे, अल्लाह की हराम की हुई चीज़ से बचाव करे और सब्र करने और अपने नफ्स को नियंत्रण में करने का आदी बने, दानशीलता, उदारता, आपसी सहयोग, हमदर्दी और दया में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करे। अल्लाह तआला का फरमान है : "ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े रखना अनिवार्य किया गया है जिस प्रकार तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम संयम और भय अनुभव करो।" (सूरतुल बक़रा: 183)
रमज़ान का महीना एक महान महीना है जिस में अल्लाह तआला ने क़ुर्आन अवतरित किया, और इस में अच्छे कर्म, दान (खैरात) और उपासनाओं के अज्र व सवाब (बदले) कई गुना बढ़ा दिये जाते हैं, इस महीने में लैलतुल-क़द्र भी है, जो एक हज़ार महीने से बेहतर है, इस महीने में आकाश (स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं और नरक के द्वार बंद कर दिये जाते हैं, और शैतानों को जकड़ दिया जाता है।
अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीना का रोज़ा रखना हर बुद्धिमान व्यस्क मुसलमान पुरूष एंव स्त्री पर अनिवार्य किया है, जैसाकि अल्लाह ताअला का फरमान है : "रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शक है और जिसमें मार्गदर्शन की और सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर की निशानियाँ हैं, तुम में से जो व्यक्ति इस महीना को पाए उसे रोज़ा रखना चाहिए। और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे, अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है, वह चाहता है कि तुम गिनती पूरी कर लो और अल्लाह के प्रदान किए हुए मार्गदर्शन के अनुसार उसकी बड़ाई बयान करो और उसके शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) रहो।" (सूरतुल बक़रा: 185)
अल्लाह के पास रोज़े का सवाब (बदला) बहुत महान है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "आदम के बेटे का हर कर्म कई गुना कर दिया जाता है, नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ा दिया जाता है, अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल का फरमान है कि सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा, वह (रोज़ादार) अपनी शह्वत और अपने खाने को मेरे कारण त्याग देता है।" (मुस्लिम)
पाँचवाँ स्तंभ : हज :
अल्लाह तआला ने मुसलमानों के लिए एक क़िब्ला नियुक्त कर दिया है जिसकी ओर वे अपनी नमाज़ों और प्रार्थनाओं में चेहरा करते हैं चाहे वे कहीं भी हों, और वह मक्का मुकर्रमा में अल्लाह का प्राचीन घर है : "आप अपना मुँह मिस्जदे हराम की तरफ फेर लें और आप जहाँ कहीं भी हों आप अपना मुँह उसी ओर फेरा करें।" (सूरतुल बक़रा : 144)
जब मुसलमानों के घर एक दूसरे से दूर हैं और इस्लाम उन्हें एकजुट होने और एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने का आह्वान करता है, जिस प्रकार कि नेकी और संयम के काम पर एक दूसरे का सहयोग करने, हक़ की वसीयत करने, अल्लाह की ओर बुलाने और अल्लाह के शआइर की ता'ज़ीम (सम्मान) करने की ओर बुलाता है, इसी कारण अल्लाह तआला ने हर बुद्धि वाले सामर्थी व्यस्क मुसलमान पर अपने प्राचीन घर की ज़ियारत करना, उसका तवाफ करना (परिक्रमा करना) अनिवार्य किया है, तथा हज्ज के मनासिक (कार्यकर्म) को उसी प्रकार अदा किया जायेगा जैसाकि अल्लाह और उसके रसूल ने बयान किया है। अल्लाह तआला ने फरमाया : "अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान : 97)
हज्ज एक ऐसा मौसम है जिस में मुसलमानों की एकजुटता, ताक़त और गौरव स्पष्ट होकर सामने आता है, चुनाँचि उनका रब (पालनहार) एक ही है, किताब एक है, पैगंबर एक है, उम्मत एक है, इबादत एक है और पोशाक एक ही है।
हज्ज के कुछ आदाब (शिष्टाचार) और शर्तें हैं जिन पर मुसलमान के लिए अमल करना अनिवार्य है, जैसे कि ज़ुबान, कान और आँख की अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों से सुरक्षा करना, नीयत का खालिस होना, खर्च का पाक (हलाल) होना, अच्छी नैतिकता से सुसज्जित होना, और हज्ज को खराब करने वाली सभी चीज़ों से दूर रहना जैसे कि कामुक बातें, नाफरमानी और लड़ाई झगड़ा, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है : "हज्ज के कुछ जाने पहचाने महीने हैं, अत: जिस ने इन महीनों में हज्ज को फर्ज़ कर लिया, तो हज्ज में कामुकता की बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवहेलना) और लड़ाई-झगड़ा नहीं है, तुम जो भलाई (सवाब) का काम करोगे अल्लाह उसे जानने वाला है, और अपने साथ रास्ता का खर्च ले लिया करो, सब से बेहतर रास्ता का खर्च तो अल्लाह का डर है, और ऐ बुद्धिमानों! मुझ से डरते रहा करो।" (सूरतुल बक़रा :197)
जब मुसलमान हज्ज को शुद्ध धार्मिक तरीक़े पर अदा करता है, और वह अल्लाह के लिए खालिस होता है, तो वह उसके गुनाहों का कफ्फारा (प्रायश्चित) बन जाता है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने हज्ज किया और उसमें संभोग और उस से संबंधित कामुक चीज़ों और अवज्ञा से बचा रहा, तो वह उस दिन के समान वापस लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।" (बुखारी हदीस नं.: 15210)
Courtesy islamqa

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अल्लाह और रोज़ेदार

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एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहिवसल्लम) की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें , भूखे पेट,  इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा.
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों  का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.
एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहिवसल्लम) की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें , भूखे पेट, इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा.
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.

नोट : ये तहरीर राहे-हक़ के लिए भाई  Sahil Khan​  ने भेजी है. जज़ाक अल्लाह.
तस्वीर गूगल से साभार

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रमज़ान और ईद का चांद

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1. अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया- महीना 29 दिन का हो सकता है, जब तक चांद ना देख लो रोज़ा न रखो, और अगर आसमान में बादल हों, तो शाबान के 30 दिन पूरे करो. (मतलब शाबान के महीने के 30 दिन पूरे हो जाने के बाद रमज़ान शुरू करो. (सहीह बुख़ारी, जिल्द 3, किताब 31, हदीद # 131).

2. अबू हुरैरह (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया- चांद देखकर रोज़ा रखो और चांद देखकर रोज़ा ख़त्म करो. और जब आसमान में बादल हों (चांद के देखने की कोई शरई गवाही ना मिले) तो 30 दिन के रोज़े पूरे करो (सहीह मुस्लिम, हदीस # 2378).

चांद ना देखे जाने पर शरई गवाही
3. इकरिमा (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि एक बार लोगों में रमज़ान के चांद में मुताल्लिक़ संदेह हुआ और इरादा किया कि ना ही तरावीह पढ़ी जाए और ना ही रोज़ा रखा जाए. एक बद्दू “अल हर्राह” से आया और चांद देखने की गवाही दी. उसको अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास लाया गया. अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया- क्या तुम गवाही देते हो कि अल्लाह एक है और मैं अल्लाह का रसूल हूं? उसने (बद्दू) कहा कि “हां” मैं गवाही देता हूं. और गवाही देता हूं कि मैंने चांद देखा. अल्लाह के नबी ने बिलाल (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) को हुक्म दिया कि तरावीह और रोज़े की ऐलान कर दिया जाए.
4. अबू उमैर इब्न अनस (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास कुछ सुवार (लोग) आए और अर्ज़ किया कि या रसूलुल्लाह हमने चांद एक दिन पहले देखा. इस पर रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लोगों को रोज़ा तोड़ने का हुक्म दिया. (अबू दाऊद हदीस # 1153).

चांद ना देखे जाने पर ईद
5. अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) से रिवायत है कि कुरय्ब ने कहा- उम्म फद्ल ने अपने बेटे को हज़रते-मुआविया (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) के पास सीरिया भेजा.
मैं (फद्ल) सीरिया में था कि रमज़ान के महीने की आमद हो गई. मैंने (फद्ल ने) रमज़ान का चांद जुमे की रात को देखा. और मैं मदीने वापस रमज़ान के आख़िर में आया.
अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने मुझसे रमज़ान का चांद देखे जाने के बारे में दरयाफ़्त किया कि तुमने रमज़ान का चांद कब देखा? मैंने कहा कि हमने चांद जुमे की रात को देखा. फ़रमाया कि क्या आपने खुद से चांद देखा? मैंने जवाब दिया कि हां मैंने ख़ुद देखा और लोगों ने भी देखा और रोज़ा रखा. मुआविया (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने भी रखा.
इस पर अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि अल्लाहु तअला अन्ह) ने कहा, लेकिन हमने तो चांद हफ़्ते (Saturday) की रात को देखा, इसलिए हम 30 पूरे करेंगे या जब तक हम शव्वाल का चांद ना देख लें. मैंने कहा कि क्या मुआविया का चांद देखना आपके लिए काफ़ी नहीं? इस पर उन्होंने (इब्न अब्बास) कहा, नहीं, ये वो तरीक़ा है जो हमें रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बताया. (सहीह मुस्लिम, हदीस # 2391)

तस्वीर गूगल से साभार

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अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत होना

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ऐसा नहीं है कि ज़िन्दगी के आंगन में सिर्फ़ ख़ुशियों के ही फूल खिलते हैं, दुख-दर्द के कांटे भी चुभते हैं... कई बार उदासियों का अंधेरा घेर लेता है... ऐसे में कुछ चीज़ें हुआ करती हैं, जो उम्मीद की रौशनी बनकर हिम्मत बढ़ाती हैं... और हाथ थाम कर रौशनी की सिम्त ले चलती हैं... क़ुरान की ऐसी ही एक आयत है-
ﻻ ﺗَﻘْﻨَﻄُﻮﺍ ﻣِﻦ ﺭَّﺣْﻤَﺔِ ﺍﻟﻠَّﻪِ
La Taqnatu Min Rahmatillah
Don't Lose Hope In ALLAH's Mercy
यानी अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत होना

जब भी मन उदास होता है, तो इसे याद कर लेते हैं...

यक़ीनन आपके पास भी ऐसा कुछ होगा, जो मुसीबत में आपका सहारा बनता हो...
चाहें, तो शेयर कर सकते हैं...
(हमारी डायरी से)

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हज़रत इब्राहिम-बिन-अदहम

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फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत इब्राहिम-बिन-अदहम पहले बलख़ के बादशाह थे. मगर सूफ़ियाना रंग उन पर इस तरह चढ़ा कि उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर फ़क़ीर की ज़िन्दगी अपना ली. बलख़ छोड़कर वे मक्का आ गए और वहीं लकड़ियां काटकर अपना गुज़ारा करने लगे. लकड़ियां बेचकर उन्हें जो कुछ मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते. उनका जीवन त्याग और जन कल्याण की एक बेहतरीन मिसाल है.

जब वे बलख़ के बादशाह थे, तो एक दिन छत पर सोते वक़्त उन्हें आहट सुनाई दी. इस पर उनकी नींद खुल गई और उन्होंने पूछा कि कौन है? तभी जवाब मिला कि तेरा परिचित. उन्होंने पूछा कि वह यहां क्या कर रहा है, तो जवाब मिला कि वह ऊंट ढूंढ रहा है. उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि छत पर ऊंट भला कैसे मिल सकता है? इस पर जवाब मिला कि जब तू बादशाह रहते हुए अल्लाह को पाने की कामना कर सकता है, तो फिर छत पर ऊंट भी मिल सकता है. उनका दिल अल्लाह की इबादत की तरफ़ लगाने वाले हज़रत ख़िज्र (देवदूत) थे. इसी तरह एक दिन जब इब्राहिम-बिन-अदहम अपने दरबार में बैठे थे, तो तभी हज़रत ख़िज्र वहां आए और इधर-उधर कुछ ढूंढने लगे. इस पर बादशाह ने पूछा कि वे क्या तलाश रह हैं? हज़रत ख़िज्र ने जवाब दिया कि मैं इस सराय में ठहरना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि यह सराय नहीं, बल्कि उनका महल है. हज़रत ख़िज्र ने सवाल किया कि इससे पहले यहां कौन रहता था. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके पूर्वज यहां रहते थे. फिर हज़रत ख़िज्र ने कहा कि इस स्थान पर इतने लोग रहकर जा चुके हैं, तो यह सराय ही है. यह कहकर वे चले गए.

जब बादशाह को उनकी बात का मतलब समझ आया, तो वे जंगल में चले गए. वहां उनकी मुलाक़ात एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग से हुई, जिन्होंने उन्हें इस्मे- आज़म की तालीम दी. वे हमेशा अल्लाह की इबादत में मशग़ू रहते. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हज़रत ख़िज्र से हुई, जिन्होंने बताया कि वे बुज़ुर्ग उनके भाई इलियास हैं. इसके बाद उन्होंने हज़रत ख़िज्र से दीक्षा ली.

एक बार की बात है कि बादशाह शिकार के लिए जंगल में गए. जब उन्होंने हिरण का शिकार करने के लिए हथियार उठाया, तो वह बोल पड़ा और उनसे कहने लगा कि क्या अल्लाह ने उन्हें यह जीवन दूसरों को सताने के लिए ही दिया है? हिरण की बात सुनकर उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कभी किसी को भी कष्ट न पहुंचाने का वादा करते हुए मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया. दरअसल, जड़ या बेज़ुबान चीज़ों का बोलना इंसान के ज़मीर की आवाज़ होती है, जो उसे किसी भी ग़लत काम को करने से रोकती है. जो व्यक्ति अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका अनुसरण करता है, वे बुराई के रास्ते पर जाने से बच जाता है. मगर जो लोग ज़मीर की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे मानवता को त्यागकर पशुवत प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो बाद में समाज और स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध होती है.

इब्राहिम-बिन-अदहम का राजपाट से मोह भंग हो गया था. वे अपनी पत्नी और दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर जंगल की तरफ़ चले गए. वहां उन्होंने एक लकड़हारे को अपने शाही वस्त्र देकर उसके मामूली कपड़े ले लिए. इन्हीं कपड़ों को धारण कर वे आगे की यात्रा पर निकल पड़े. घूमते-घूमते वे नेशापुर पहुंच गए और वहां की एक गुफ़ा में अपना डेरा जमाया. इस गुफ़ा में उन्होंने नौ साल तक अल्लाह की इबादत की. इसी दौरान हफ़्ते में एक दिन वे जंगल से लकड़ियां काटते और उन्हें बाज़ार में बेचकर जो कुछ मिलता उसके कुछ हिस्से से रोटी ख़रीदते और बाक़ी हिस्सा ज़रूरतमंदों में बांट देते.

वे मुरीदों को हमेशा यह हिदायत करते थे कि कभी किसी औरत या कमसिन लड़के को नज़र भरकर नहीं देखना और हज के दौरान तो बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि तवाफ़ में बहुत-सी औरतें और कमसिन लड़के भी शरीक होते हैं. एक बार तवाफ़ की हालत में एक लड़का सामने आ गया और न चाहते हुए भी उनकी निगाहें उस पर जम गईं. तवाफ़ के बाद मुरीदों ने कहा कि अल्लाह आप पर रहम करे, क्योंकि आपने हमें जिस चीज़ से रोकने की हिदायत की थी, आप ख़ुद उसमें शामिल हो गए. क्या आप इसकी वजह बयान कर सकते हैं?

उन्होंने फ़रमाया कि जब मैंने बल्ख़ छोड़ा था उस वक़्त मेरा बेटा छोटा बच्चा था और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह वही बच्चा है. इसके बाद उनके एक मुरीद ने बच्चे को तलाश किया और उससे उसके वालिद के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह बलख़ के बादशाह इब्राहिम-बिन-अदहम का बेटा है, जो बरसों पहले सल्तनत छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए कहीं चले गए हैं. मुरीद ने उनके बेटे और बीवी को इब्राहिम-बिन-अदहम से मिलवाया. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को गले से लगाया, तो उसकी मौत हो गई. जब मुरीद ने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ग़ैब से आवाज़ आई थी कि तू हमसे दोस्ती का दावा करता है और फिर अपने बेटे से भी मुहब्बत जताता है. यह सुनकर उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह ! या तो बेटे की जान ले ले या फिर मुझे मौत दे दे. अल्लाह ने बेटे के हक़ में दुआ क़ुबूल की.

एक बार की बात है कि इब्राहिम-बिन-अदहम दजला नदी के किनारे बैठे अपनी गुदड़ी सील रहे थे. तभी किसी आदमी ने आकर उनसे पूछा की बलख़ की सल्तनत छोडक़र आपको क्या मिला? उन्होंने एक सुई दरिया में डाल दी और इशारा किया. तभी हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक सोने की सुई लेकर सामने आ गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें तो केवल अपनी ही सुई चाहिए. फिर एक छोटी मछली मुंह में सुई लेकर सामने आ गई. उन्होंने उस आदमी को बताया कि सल्तनत छोड़ने के बाद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि इंसान को हक़ीक़त में किस चीज़ की ज़रूरत होती है.

एक बार उन्होंने पानी के लिए कुएं में डोल डाला, तो उसमें सोना भरकर आ गया. दोबारा डालने पर डोल चांदी से भरा हुआ मिला और तीसरी बार डाला, तो उसमें हीरे और जवाहारात भरे हुए थे. चौथी बार डोल कुएं में डालते वक़्त उन्होंने कहा कि उन्हें तो सिर्फ़ पानी ही चाहिए. इसके बाद डोल पानी से भरा हुआ मिला. उन्होंने उस आदमी को समझाया कि धन-दौलत और एश्वर्य नश्वर हैं. मनुष्य का जीवन इनके बिना भी गुज़र सकता है, लेकिन अल्लाह की इबादत और जन सेवा ही मनुष्य के हमेशा काम आती है. अल्लाह भी दूसरों के लिए जीने वाले लोगों को ही पसंद करता है. वे कहते थे कि अल्लाह पर हमेशा यक़ीन रखना चाहिए, क्योंकि वे कभी किसी को मायूस नहीं करता.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

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रमज़ान और शबे-क़द्र

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रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है जिसे शबे क़द्र कहा जाता है. शबे क़द्र का अर्थ होता है " सर्वश्रेष्ट रात " ऊंचे स्थान वाली रात " लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात, शबे-क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत कुरआन मजीद और प्रिय रसूल मोहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीसों से प्रमाणित है।
निम्नलिखित महत्वपूर्ण वाक्यों से क़द्र वाली रात की अहमियत मालूम होती है।
(1) इस पवित्र रात में अल्लाह तआला ने कुरआन करीम को लोह़ महफूज़ से आकाश दुनिया पर उतारा फिर 23 वर्ष की अविधि में अवयशक्ता के अनुसार मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर उतारा गया। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है।.. " (सुराः कद्र)
(2) यह रात अल्लाह तआला के पास बहुत उच्च स्थान रखता है।
इसी लिए अल्लाह तआला ने प्रश्न के तरीके से इस रात की महत्वपूर्णता बयान फरमाया है और फिर अल्लाह तआला स्वयं ही इस रात की फज़ीलत को बयान फरमाया कि यह एक रात हज़ार महीनों की रात से उत्तम है। " और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? क़द्र की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है।" (सुराः कद्र)
(3) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से अन्गीनित फरिश्ते और जिबरील आकाश से उतरते है। अल्लाह तआला की रहमतें, अल्लाह की क्षमा ले कर उतरते हैं, इस से भी इस रात की महत्वपूर्णता मालूम होती है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " फ़रिश्ते और रूह उस में अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। " (सुराः कद्र)
(4) यह रात बहुत सलामती वाली है। इस रात में अल्लाह की इबादत में ग्रस्त व्यक्ति परेशानियों, ईश्वरीय संकट से सुरक्षित रहते हैं। इस रात की महत्वपूर्ण, विशेष्ता के बारे में अल्लह तआला ने कुरआन करीम में बयान फरमाया है। " यह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। " (सुराः कद्र)
(5) यह रात बहुत ही पवित्र तथा बरकत वाली है, इस लिए इस रात में अल्लाह की इबादत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह से दुआ की जाए, अल्लाह का फरमान है। " हम्ने इस (कुरआन) को बरकत वाली रात में अवतरित किया है।...... " (सुराः अद् दुखान)
(6) इस रात में अल्लाह तआला के आदेश से लोगों के नसीबों (भाग्य) को एक वर्ष के लिए दोबारा लिखा जाता है। इस वर्ष किन लोगों को अल्लाह तआला की रहमतें मिलेंगी? यह वर्ष अल्लाह की क्षमा का लाभ कौन लोग उठाएंगे? इस वर्ष कौन लोग अभागी होंगे? किस को इस वर्ष संतान जन्म लेगा और किस की मृत्यु होगी? तो जो व्यक्ति इस रात को इबादतों में बिताएगा, अल्लाह से दुआ और प्राथनाओं में गुज़ारेगा, बेशक उस के लिए यह रात बहुत महत्वपूर्ण होगी। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। " यह वह रात है जिस में हर मामले का तत्तवदर्शितायुक्त निर्णय हमारे आदेश से प्रचलित किया जाता है। " (सुराः अद् दुखानः5 )
(7) यह रात पापों , गुनाहों, गलतियों से मुक्ति और छुटकारे की रात है।
मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। खास कर इस रात में लम्बी लम्बी नमाज़े पढ़ा जाए, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों, गलतियों पर माफी मांगा जाए, अल्लाह तआला बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला है। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है। " जो व्यक्ति शबे क़द्र में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे" ( बुखारी तथा मुस्लिम)
यह महान क़द्र की रात कौन सी है ?
यह एक ईश्वरीय प्रदान रात है जिस की महानता के बारे में कुछ बातें बयान की जा चुकी हैं। इसी शबे क़द्र को तलाशने का आदेश प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने कथन से दिया है। " जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि " रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक रातों में तलाशों " ( बुखारी तथा मुस्लिम)
एक हदीस में रमज़ान करीम की चौबीसवीं रात में शबे क़द्र को तलाशने का आज्ञा दिया गया है। और प्रिय रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस मुबारक रात की कुछ निशानियाँ बताया है। जिस के अनुसार वह रात एकीस रमज़ान की रात थीं जैसा कि प्रिय रसूल के साथी अबू सईद अल खुद्री (रज़ी अल्लाहु अन्हु) वर्णन करते हैं। प्रिय रसूल के दुसरे साथी अब्दुल्लाह बिन अनीस (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात तेईस रमज़ान की रात थीं और अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ी अल्लाहु अन्हुमा) तथा उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रिवायत से पता चलता कि वह रात सत्ताईस रमज़ान की रात थीं और उबइ बिन कअब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) तो कसम खाया करते थे कि शबे क़द्र सत्ताईस रमज़ान की रात है, तो उन के शागिर्द ने प्रश्न किया कि किस कारण इसी रात को कहते हैं? तो उन्हों ने उत्तर दिया, निशानियों के कारण, प्रिय रसूल मोहम्मद (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने भी शबे क़द्र को अन्तिम दस ताक वाली(21,23,25,27,29) रातों में तलाश ने का आदेश दिया है। शबे क़द्र के बारे में जितनी भी हदीस की रिवायतें आइ हैं। सब सही बुखारी, सही मुस्लिम और सही सनद से वारिद हैं। इस लिए हदीस के विद्ववानों ने कहा है कि सब हदीसों को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि शबे क़द्र हर वर्ष विभिन्न रातों में आती हैं। कभी 21 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 23 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 25 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 27 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती, तो कभी 29 रमज़ान की रात क़द्र वाली रात होती और यही बात सही मालूम होता है। इस लिए हम इन पाँच बेजोड़ वाली रातों में शबे क़द्र को तलाशें और बेशुमार अज्रो सवाब के ह़क़्दार बन जाए।
शबे क़द्र की निशानीः
प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात की कुछ निशानी बयान फरमाया है जिस के माध्यम से इस महत्वपूर्ण रात को पहचाना जा सकता है।
(1) यह रात बहूत रोशनी वाली होगी, आकाश प्रकाशित होगा , इस रात में न तो बहुत गरमी होगी और न ही सर्दी होगी बल्कि वातावरण अच्छा होगा, उचित होगा। जैसा कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने निशानी बताया है जिसे सहाबी वासिला बिन अस्क़अ वर्णन करते है कि रसूल ने फरमाया " शबे क़द्र रोशनी वाली रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और वातावरण संतुलित होता है और सितारे को शैतान के पीछे नही भेजा जाता।" ( तब्रानी )
(2) यह रात बहुत संतुलित वाली रात होगी। वातावरण बहुत अच्छा होगा, न ही गर्मी और न ही ठंडी होगी। हदीस रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इसी बात को स्पष्ट करती है " शबे क़द्र वातावरण संतुलित रात होती है, न ज़्यादा गर्मी और न ज़्यादा ठंढ़ी और उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो लालपन धिमा होता है।" ( सही- इब्नि खुज़ेमा तथा मुस्नद त़यालसी )
(3) शबे क़द्र के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी धिमी होती है, सुर्य के रोशनी में किरण न होता है । जैसा कि उबइ बिन कअब वर्णन करते हैं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " उस रात के सुबह का सुर्य जब निकलता है तो रोशनी में किरण न होता है।" ( सही मुस्लिम )
हक़ीक़त तो यह है कि इन्सान इन रातों की निशानियों का परिचय कर पाए या न कर पाए बस वह अल्लाह की इबादतों, ज़िक्रो- अज़्कार, दुआ और कुरआन की तिलावत,कुरआन पर गम्भीरता से विचार किरे । इख्लास के साथ, केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत करे, प्रिय रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इताअत करे, और अपनी क्षमता के अनुसार अल्लाह की खूब इबादत करे और शबे क़द्र में यह दुआ अधिक से अधिक करे, अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगे जैसा कि आइशा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि, मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया " अल्लाहुम्मा इन्नक अफुव्वुन करीमुन, तू हिब्बुल-अफ्व,फअफु अन्नी" अर्थात: ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।"
अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे। आमीन...

Courtesy jiwankatha

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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इस बलॊग में इस्तेमाल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं
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