फ़रिश्ते कौन हैं

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ख़ुदाय वाहदहु ला शरीक जो सब मख़लूक का ख़ालिक़ और मालिक है.
उसने इंसान को मिट्टी से अपनी इबादत और इताअत के लिए पैदा किया है. और फ़रिश्तों को उसने नूर से पैदा करके उन को हमारी नज़रों से छुपा दिया है. उनका मर्द या औरत होना कुछ नहीं बतलाता, उनको फ़रिश्ते कहते हैं. अल्लाह तआला ने उनको हर तरह की सूरत में बन जाने की क़ुदरत दी हैं. फ़रिश्ते चाहें, तो हवा बन जाएं, इंसान बन जाएं या किसी जानवर बन जाएं. वे किसी भी शक्ल में ख़ुद को ढाल सकते हैं.
इनके पर भी होते हैं, किसी के दो पर, किसी के तीन पर, किसी के चार पर.इनकी ख़ुराक अल्लाह तआला की याद और ताबेदारी करना है. तमाम ज़मीन-ओ-आसमान का इंतज़ाम इनके सपुर्द है.
वो कोई काम अल्लाह तआला के हुक्म के खिलाफ़ नही करते. इनमें यह चार फ़रिश्ते बड़ा रूतबा रखते हैं.
हज़रत जिबराईल (अलैहिस्सलाम)
हज़रत मीकाईल (अलैहिस्सलाम)
हज़रत इस्राफ़िल (अलैहिस्सलाम)
हज़रत इज़राईल (अलैहिस्सलाम)
हज़रत जिबराईल अल्लाह तआला के अहकाम और किताबें रसूलों और नबियों के पास लाते थे. बाज़ मौक़े पर अल्लाह तआला उन्हें रिज़्क़ पहुंचाने और बारिश वग़ैरह के कामों पर मुक़र्रर किया हैं. बहुत से फ़रिश्ते उनकी मातहती में काम करते हैं. कुछ बादलों और हवाओं, दरियाओं, तालाबों और नहरों के कारोबार में लगे हुए हैं.
हज़रत इस्राफ़िल सूर लिए खड़े हैं. जब क़यामत होगी वो सूर बजाएंगे.
हज़रत इज़राईल मलक-उल-मौत मख़लूक़ की जान निकलने के लिए मुक़र्रर हैं और बहुत से फ़रिश्ते उनकी मातहती में काम करते हैं. नेक और बद लोगों की जान निकलने वाले फ़रिश्ते अलग-अलग हैं. दो फ़रिश्ते इंसान के अच्छे और बुरे अमल लिखने वाले हैं. इन्हें किरमान कातेबीन कहते हैं.
बाज़ फ़रिश्ते इंसान को मुसीबत से बचाने के लिए मुक़र्रर हैं. ये अल्लाह तआला के हुक्म से हिफ़ाज़त करते हैं.
बाज़ फ़रिश्ते जन्नत और दोज़ख़ के इंतज़ामात के लिए मुक़र्रर हैं. बाज़ फ़रिश्ते हर वक़्त अल्लाह तआला की इबादत और याद में मशग़ूल रहते हैं.
बाज़ फ़रिश्ते दुनिया में काम करने आते हैं, उनकी सुबह व शाम बदली भी होती है. सुबह की नमाज़ के बाद रात में काम करने वाले फ़रिश्ते आसमान पर चले जाते हैं. उनकी जगह दिन में काम करने वाले फ़रिश्ते आ जाते हैं. ये फ़रिश्ते अस्र की नमाज़ के बाद चले जाते हैं.
बाज़ फ़रिश्ते दुनिया में फिरते हैं और जहां अल्लाह तआला का ज़िक्र होता हो, जैसे क़ुरआन मजीद पढ़ा जाता हो, या बुज़ुर्गों और आलिमों की सोहबत में दीन का ज़िक्र होता हो, ये वहां जमा होते हो जाते हैं.
फिर उनके शरीक होने की गवाही अल्लाह तआला के सामने देते हैं और यह सब बातें क़ुरआन व हदीस में मौजूद हैं.
पेशकश : वाजिद शेख़

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क्या आप जानते हैं

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सवाल : पहले जुम्मा किसने क़ायम किया ?
जवाब : हज़रत असद बिन जुरारह ने
सवाल : क़यामत के दिन सबसे पहले लोगों के दरमियान किस चीज़ का फ़ैसला होगा ?
जवाब : ख़ून का
सवाल : सबसे पहले दुनिया की कौन सी नेमत उठाई जाएगी ?
जवाब : शहद
सवाल : इस्लाम में सबसे पहले मुफ़्ती कौन हुए ?
जवाब : हज़रत अबु बक़्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हा
सवाल :- सबसे पहले बीस रकात तरावीह बा जमात किसने राइज़ की ?
जवाब : हज़रत उमर फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हा ने
सवाल : इस्लाम में सबसे पहले राहे-ख़दा में अपनी तलवार किसने निकाली ?
जवाब :हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम ने
सवाल : मक्का की सरज़मीं पर सबसे पहले बुलंद आवाज़ से कु़रान पाक किसने पढ़ा?
जवाब : हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने
सवाल : इस्लाम में सबसे पहले शायर कौन हुए?
जवाब : हज़रत हस्सान बिन साबित
सवाल :. इस्लाम में सबसे पहले शहादत किसकी हुई ?
जवाब : अम्मार बिन यासर की मां समिय्या की
सवाल : सबसे पहले गेहूं की खेती किसने की?
जवाब : हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने
सवाल : सबसे पहले सर के बाल किसने मुंडवाये?
जवाब : हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने मुंडवाये और मुंडने वाले हज़रत जिब्राईल अमीन थे.
सवाल : सबसे पहले क़लम से किसने लिखा?
जवाब : हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम ने
सवाल : सबसे पहले चमड़े का जुता किसने बनाया ?
जवाब : हज़रत नुह अलैहिस्सलाम ने
सवाल : अरब में सबसे पहले कौन से नबी तशरीफ़ लाए ?
जवाब : हज़रत हुद अलैहिस्सलाम
सवाल : सबसे पहले आशुरा का रोज़ा किसने रखा ?
जवाब : हज़रत नुह अलैहिस्सलाम ने
सवाल : सबसे पहले ख़ुदा की राह में किसने जिहाद किया ?
जवाब : हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने
सवाल : सबसे पहले साबुन किसने ईजाद किया ?
जवाब : हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने
सवाल : सबसे पहले काग़ज़ किसने तैयार किया ?
जवाब : हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने
सवाल : कयामत के दिन सबसे पहले शफ़ाअत कौन करेंगे ?
जवाब : मेरे आका सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम..
सवाल : सबसे पहले किस नबी की उम्मत जन्नत में दाख़िल होगी ?
जवाब : मेरे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत
पेशकश : वाजिद शेख़

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सोलह सैयदों की कहानी

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शाने-ग़ौसे आज़म

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ऐ बग़दाद के मुसाफ़िर !  मेरा सलाम कहना...
हमारे पीर हैं हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रज़ियल्लाहूतआला यानी ग़ौस-ए-आज़म रज़ियल्लाहू तआला.
ये हज़रत सैयद मोईनुद्दीन अब्दुल क़ादिर अल-जिलानी अल-हसनी अल-हुसैनी का महीना रबीउल आख़िर है. इस माह की ग्यारह तारीख़ को ग़ौस-ए-आज़म की नियाज़ दिलाई जाती है.
कौन हैं ग़ौसे-आज़म
* जिन्होंने मां के पेट में ही 11 पारे हिफ़्ज़ किए
* जिन्होंने फ़रमाया- मैं इंसानों का ही नहीं, बल्कि जिन्नात का भी पीर हूं
* जिन्होंने फ़रमाया- जो मुझे अपना पीर मानेगा, वो मेरा मुरीद है
* जिन्होंने फ़रमाया- मैं मशरिक़ में रहूं और मेरा मुरीद मगरिब में मुझे पुकारेगा, तो मैं फ़ौरन उसकी मदद को आऊंगा
* जिन्होंने एक पल में बारह साल पहले डूबी हुई कश्ती को ज़िन्दा बारातियों के साथ निकाला
* जिनके हुज़ूर-ए-पाक में एक चोर चोरी की नीयत से आया और वक़्त का क़ुतुब बन गया
* जिन्होंने एक हज़ार साल पुरानी क़ब्र में दफ़न मुर्दे को ज़िन्दा कर दिया
* जिन्होंने फ़रमाया- वक़्त मुझे सलाम करता है, तब आगे बढ़ता है
* जिन्होंने अपने धोबी को हुक़्म दिया कि क़ब्र में मुन्कर नक़ीर सवाल पूछे, तो कह देना मैं ग़ौसे-आज़म का धोबी हूं, तो बख़्शा जाएगा
* जो अपने मुरीदों के लिए इरशाद फ़रमाते हैं कि जब तक मेरा एक-एक मुरीद जन्नत में नहीं चला जाए, तब तक अब्दुल क़ादिर जन्नत में नहीं जाएगा.
* जिनका नाम अगर किसी सामान पर लिख दिया जाए, तो वो सामान कभी चोरी नहीं होता

होता है, होता ही रहेगा चर्चा ग़ौसे-आज़म का
बजता है, बजता ही रहेगा डंका ग़ौसे-आज़म का
देखने वालो, चल कर देखो आस्तान-ए-अब्दुल क़ादिर
चांद के जैसा चमक रहा है रौज़ा ग़ौसे-आज़म का

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एक विश मुहब्बत की

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फ़िरदौस ख़ान
क्रिसमस है... साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते हैं इस बड़े दिन का... बहुत ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं क्रिसमस से... बचपन से ही यह त्यौहार बहुत अच्छा लगता है... गुज़रते वक़्त के साथ इस त्यौहार से एक गहरा रिश्ता जुड़ गया... वो कहीं भी हों, इस दिन चर्च ज़रूर जाते हैं...
बचपन से सुनते आए हैं कि क्रिसमस के दिन सांता क्लाज आते हैं. अपने साथ बहुत सारे तोहफ़े और खुशियां लाते हैं. बचपन में बस संता क्लॊज़ को देखने की ख़्वाहिश थी. उनसे कुछ पाने का ख़्याल कभी ज़हन में आया तक नहीं, क्योंकि हर चीज़ मुहैया थी. जिस चीज़ की तरफ़ इशारा कर दिया कुछ ही पलों में मिल जाती थी. किसी चीज़ का अभाव किया होता है. कभी जाना ही नहीं. मगर अब सांता क्लाज़ से पाना चाहते हैं- मुहब्बत, पूरी कायनात के लिए, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए... हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो, आमीन.. संता क्लॊज़ वही हैं, मगर उम्र बढ़ने के साथ ख़्वाहिशें भी बढ़ जाती हैं...


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क्रिसमस की दिलचस्प दास्तां

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फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है. क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है.
भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है. यहां 'द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी' नाम से इसे मनाया जाता है. माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे.

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था. 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था.

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा. वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्म  हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे. उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं.

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.
पुरानी कैथोलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ. हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई. उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री. अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट  चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है. यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह.

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अक़ीदत के फूल...

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अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...
अक़ीदत के फूल...
मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम
प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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और क़ब्र तंग होती गई

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फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

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शुगर का देसी इलाज...

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गिलोय की बेल के पत्ते खाने से शुगर का स्तर कम हो जाता है... हमारी एक हमसाई की शुगर का स्तर हमेशा 250 से ज़्यादा रहता था... वो हमारे घर से हर रोज़ गिलोय के पत्ते ले जाया करती थीं... उन्होंने लगातार तीन माह निहार मुंह गिलोय का पत्ता चबाकर पानी पी लिया... अब उनकी शुगर नियंत्रित हो गई... शुगर के अलावा बुख़ार, हड्डियों के दर्द, कैंसर, पेट और आंखों आदि की बीमारी में गिलोय बेहद फ़ायदेमंद है...

हमारे घर गिलोय की बहुत-सी बेलें हैं... बहुत लोग इसके पत्ते ले जाते हैं... गिलोय की बेल तक़रीबन हर जगह पाई जाती है... एक बार लगाने पर ये कई साल तक पत्तों से भरी रहती है... गिलोय की बेल किसी भी नर्सरी में मिल सकती है... पार्क में भी मिल सकती है... सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर भी ये बेल ख़ूब देखी जा सकती है... हो सके, तो इसे अपने घर में ज़रूर लगाएं... इसे गमले में भी उगाया जा सकता है...

गिलोय का वैज्ञानिक नाम तिनोस्पोरा कार्डीफ़ोलिया है... इसे मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुंडलिनी गुडूची भी कहा जाता है... फ़ारसी में इसे गिलाई कहते हैं... अंग्रेज़ी में गुलंच, मराठी में गुलबेल, कन्नड़ में अमरदवल्ली, तेलगू में गोधुची, तमिल में शिन्दिल्कोदी और गुजराती में गालो में आदि नामों से जाना जाता है... गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल और बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाए जाते है... मान्यता है कि देव और दानवों के युद्ध के दौरान जहां-जहां अमृत कलश की बूंदे गिरीं, वहां-वहां गिलोय की बेल उग आई...
-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत सरमद रहमतुल्लाह अलैहि

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फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों के क़रीब हज़रत साहब का मज़ार है... हम अकसर वहां जाते हैं... बहुत सुकून मिलता है... वहां से उठने को दिल नहीं करता...
फ़िलिस्तीन में जन्मे हज़रत सरमद, हज़रत अबुल क़ासिम उर्फ़ हरे-भरे सब्ज़वारी के मुरीद हैं... हज़रत सरमद से वाबस्ता एक वाक़िया पेश कर रहे हैं...
एक रात बादशाह औरंगज़ेब ने ख़्वाब में देखा कि जन्नत में एक बहुत ही ख़ूबसूरत और आलीशान महल है, जिस पर लिखा है- "शहज़ादी ज़ैबुन्निसा का ख़रीदा हुआ महल."
औरंगज़ेब उसमें जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन महल के पहरेदार उन्हें महल के अंदर नहीं जाने देते. अगली सुबह बादशाह ने अपनी 12 साल की बेटी ज़ैबुन्निसा से पूछा कि जन्नत का महल क्या है? इस पर बेटी ने जवाब दिया कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों के पास हज़रत सरमद एक मिट्टी का घरौंदा बनाकर बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा, "मैं जन्नत का महल बनाता हूं."   मैंने एक हुक़्क़ा तम्बाक़ू के बदले उस महल को ख़रीद लिया. ये बात सुनकर बादशाह बेचैन हो गए. अगले जुमे को वे जामा मस्जिद गए और हज़रत सरमद से पूछा, "जन्नत का एक महल हमें भी ख़रीदना है." हज़रत सरमद ने जवाब दिया, ख़रीद-फ़रोख़्त हर रोज़ नहीं होती."

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بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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