ग़ुज़ारिश : ज़रूरतमंदों को गोश्त पहुंचाएं

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ईद-उल-अज़हा का महीना शुरू हो चुका है... जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं... तीन दिन तक एक ही घर में कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं... इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है... एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है... जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं...
ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती... ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... राहे-हक़ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक गोश्त पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं...
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक पहुंचाएं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं... आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है...

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सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन


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62 सूर: अल-जुमा

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है, सब ख़ुदा की तस्बीह करती हैं, जो बादशाह पाक ज़ात ग़ालिब हिकमत वाला है
2. वही तो है, जिसने जाहिलों में उन्हीं में का एक रसूल भेजा, जो उनके सामने उसकी आयतें पढ़ते और उन्हें पाक करते, और उन्हें किताब और अक़्ल की बातें सिखाते हैं, अगरचे इसके पहले तो ये लोग खुली गुमराही में थे
 3. और उनमें से उन लोगों की तरफ़ भेजा, जो अभी तक उनसे मुलहिक़ नहीं हुए और वह तो ग़ालिब हिकमत वाला है
4. ख़ुदा का फ़ज़ल है, जिसको चाहता है अता फ़रमाता है और ख़ुदा तो बड़े फ़ज़ल का मालिक है
5. जिन लोगों पर तौरेत लादी गई है, उन्होंने उसके बोझ को न उठाया, उनकी मिसाल गधे जैसी है, जिस पर बड़ी-बड़ी किताबें लदी हों, जिन लोगों ने ख़ुदा की आयतों को झुठलाया, उनकी भी क्या बुरी मिसाल है और ख़ुदा ज़ालिमों को उनकी मंज़िल तक नहीं पहुंचाता
6. तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख़्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं,  तो अगर तुम सच्चे हो, तो मौत की तमन्ना करो
7. और ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं, कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है
8. तुम कह दो कि मौत जिससे तुम लोग भागते हो, वह तो ज़रूर तुम्हारे सामने आएगी, फिर तुम पोशीदा और ज़ाहिर के जानने वाले ख़ुदा की तरफ़ लौटा दिए जाओगे, फिर जो कुछ भी तुम करते थे, तुम्हें बता देगा
9. ऐ ईमान वालों, जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाएगी, तो ख़ुदा की याद की तरफ़ दौड़ पड़ो और ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़ दो, अगर तुम समझते हो, तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
10. फिर जब नमाज़ हो चुके, तो ज़मीन में जहां चाहे जाओ और ख़ुदा के फ़ज़ल की तलाश करो और ख़ुदा को बहुत याद करते रहो, ताकि तुम दिली मुरादें पाओ
11. और जब ये लोग सौदा बिकता या तमाशा होता देखें, तो उसकी तरफ़ टूट पडए और तुम्हें खड़ा हुआ छोड़ दें, तुम कह दो कि जो चीज़ ख़ुदा के यहां है, वह तमाशे और सौदे से कहीं बेहतर है और ख़ुदा सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाला है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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63 सूर: अल-मुनाफ़िक़ून

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 मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जब तुम्हारे पास मुनाफ़ि़क़ीन आते हैं, तो कहते हैं कि हम तो इक़रार करते हैं कि आप यक़ीनन ख़ुदा के रसूल हैं, और ख़ुदा भी जानता है कि तुम यक़ीनी उसके रसूल हो, लेकिन ख़ुदा ज़ाहिर किए देता है कि ये लोग बिल्कुल झूठे हैं
2. इन लोगों ने अपनी क़समों को सिपर बना रखा है, तो इसी के ज़रिये लोगों को ख़ुदा की राह से रोकते हैं, बेशक ये लोग बुरे काम करते हैं
3. इस तरह ज़ाहिर से ईमान लाए, फिर काफ़िर हो गए, उनके दिलों पर मोहर लगा दी गई है, तो अब ये समझते ही नहीं
4. और जब तुम उन्हें देखोगे, तो तनासुबे-आज़ा की वजह से उनका डील-डौल तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा, और गुफ़्तगू करेंगे तो ऐसी कि तुम तवज्जो से सुनो, मगर अक़्ल से ख़ाली, गोया दीवार से लगाई हुई बेकार लकड़ियां हैं, हर चीख़ की आवाज़ को समझते हैं कि उन्हीं पर आ पड़ी, ये लोग तुम्हारे दुश्मन हैं, तुम इनसे बचो, ख़ुदा इन्हें मार डाले, ये कहां बहके फिरते हैं
5. और जब उनसे कहा जाता है कि आओ रसूलअल्लाह तुम्हारे लिए मग़फ़िरत की दुआ करें, तो वे लोग अपने सर फेर लेते हैं, और तुम उन्हें देखोगे कि तकब्बुर करते हुए मुंह फेर लेते हैं
6. तुम उनकी मग़फ़िरत की दुआ मांगो या न मांगो, उनके हक़ में बराबर है, क्योंकि ख़ुदा तो उन्हें हरगिज़ बख़्शेगा नहीं, ख़ुदा बदकारों को उनकी मंज़िल तक नहीं पहंचाता
7. ये वही लोग हैं, जो कहते हैं कि जो रसूले-ख़ुदा के पास रहते हैं, उन पर ख़र्च न करो, यहां तक कि ये लोग ख़ुद तितर-बितर हो जाएं, हालांकि सारे आसमान और ज़मीन के ख़ज़ाने ख़ुदा ही के पास हैं, मगर मुनाफ़िक़ीन नहीं समझते
8. ये लोग तो कहते हैं कि अगर हम लौट कर मदीने पहुंचे, तो इज़्ज़तदार लोग ज़लील को ख़ुद निकाल बाहर कर देंगे, हालांकि इज़्ज़त तो ख़ास ख़ुदा और रसूल और मोमिनीन के लिए है, लेकिन मुनाफ़िक़ीन नहीं जानते
9. ऐ ईमान वालों, तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद तुम्हें ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल न करे, और जो ऐसा करेंगे, तो वे लोग घाटे में रहेंगे
10. और हमने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसमें से इससे पहले ख़ुदा की राह में ख़र्च कर डालो कि तुम में से किसी की मौत आ जाए, इसकी नौबत न आए कि कहने लगे कि परवरदिगार तूने मुझे थोड़ी सी मोहलत और क्यों न दी, ताकि ख़ैरात करता और नेक लोगों में से हो जाता
11. और जब किसी की मौत आती है, तो ख़ुदा उसे हरगिज़ मोहलत नहीं देता, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उससे ख़बरदार है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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64 सूर: अत-ताग़ाबून

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 18 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है, सब ख़ुदा ही की तस्बीह करती हैं, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए सज़ावार है, और वही हर चीज़ पर क़ादिर है
2.  वही तो है, जिसने तुम लोगों को पैदा किया, कोई तुम में काफ़िर है और कोई मोमिन, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उसे देख रहा है
3.  उसी ने सारे आसमान और ज़मीन को हिकमत और मसलेहत से पैदा किया, और उसी ने तुम्हारी सूरतें बनाईं, तो सबसे अच्छी सूरतें बनाईं, और तुम्हें उसी की तरफ़ लौट कर जाना है
4. जो कुछ सारे आसमान और ज़मीन में है, वह सब जानता है, और जो कुछ तुम छुपाकर कर या सरेआम करते हो, उससे भी वाक़िफ़ है और ख़ुदा तो दिल के राज़ तक से आगाह है
5. क्या तुम्हें उनकी ख़बर नहीं पहुंची, जिन्होंने तुमसे पहले कुफ़्र किया, उन्होंने दुनिया में अपने कामों की सज़ा भुगती और आख़िरत में तो उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
6. ये इस वजह से है, क्योंकि उनके पास रौशन मौजिज़े और पैग़ाम लेकर पैग़म्बर आए थे, तब वे लोग कहने लगे कि क्या आदमी हमारे रहनुमा बनेंगे, ग़र्ज़ ये कि लोग काफ़िर बन बैठे और ख़ुदा ने भी उनकी परवाह न की, और ख़ुदा तो बेपरवाह सज़ावारे हम्द है
7. काफ़िरों का ख़्याल ये है कि ये लोग दोबारा न उठाए जाएंगे, तुम कह दो वहां अपने परवरदिगार की क़सम, तुम ज़रूर उठाए जाओगे, फिर तुम जो काम करते रहे, वह तुम्हें बता देगा, और ये तो ख़ुदा पर आसान है
8. तुम ख़ुदा और उसके रसूल पर उसी नूर पर ईमाल लाओ, जिसे हमने नाज़िल किया है, और जो कुछ तुम करते हो, ख़ुदा उससे ख़बरदार है
9. जब वह क़यामत के दिन तुम सबको जमा करेगा, फिर यही हार जीत का दिन होगा और जो शख़्स ख़ुदा पर ईमान लाए और नेक काम करे, वह उससे उसकी बुराइयां दूर कर देगा और उसको जन्नत के उन बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, वह उनमें हमेशा आबाद रहेगा, यही तो बड़ी कामयाबी है
10. और जो लोग काफ़िर हैं, और हमारी आयतों को झुठलाते रहे, ये लोग जहन्नुमी हैं और हमेशा उसी में रहेंगे, यह बुरी जगह है
11. और जब कोई मुसीबत आती है, तो ख़ुदा के हुक्म से, और जो शख़्स ख़ुदा पर ईमान लाता है, तो ख़ुदा उसके क़ल्ब की हिदायत करता है, और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
12. और ख़ुदा का हुक्म मानो और रसूल का हुक्म मानो, फिर अगर तुमने मुंह फेरा, तो हमारे रसूल पर सिर्फ़ पैग़ाम को बयान करके पहुंचा देना फ़र्ज़ है
13.  ख़ुदा के सिवा कोई माबूद नहीं और मोमिनों को ख़ुदा ही पर यक़ीन करना चाहिए
14. ऐ ईमान वालों, तुम्हारी बीवियों और तुम्हारी औलादों में से कुछ तुम्हारे दुश्मन हैं, तो तुम उनसे बचकर रहो, और अगर तुम माफ़ कर दो, दरगुज़र करो और बख़्श दो, तो ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
15. तुम्हारे माल और तुम्हारी औलादें बस आज़माश हैं और ख़ुदा के यहां तो बड़ा अज्र है
16. जहां तक तुमसे हो सके, ख़ुदा से डरते रहो और उसकी सुनो और मानो, और अपनी बेहतरी के लिए उसकी राह में ख़र्च करो, और जो शख़्स अपनी नफ़्स की हिरस से बचा लिया गया, तो ऐसे ही लोग मुरादें पाने वाले हैं
17. अगर तुम ख़ुदा को भला क़र्ज़ दोगे, तो वह उसे तुम्हारे लिए दोगुना कर देगा, और तुमको बख़्श देगा, और ख़ुदा तो बड़ा क़द्रदान और बुर्दबार है
18. पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला ग़ालिब हिकमत वाला है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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66 सूरः अत-तहरीम

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 12 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जो चीज़ ख़ुदा ने तुम्हारे लिए हलाल की है, तुम उससे अपनी बीवियों की ख़ुशी के लिए क्यों गुरेज़ करते हो, ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला है
2. ख़ुदा ने तुम लोगों के लिए क़समों को तोड़ देने का कफ़्फ़ार मुक़र्रर किया है और ख़ुदा ही तुम्हारा कारसाज़ है और वही हिकमत वाला है
3. और जब पैग़म्बर ने अपनी बीवी (हफ़्सा) से चुपके से कोई बात कही. फिर जब उसने वह बात हफ़्सा को बता दी, तो ख़ुदा ने इस बात को पैग़म्बर पर ज़ाहिर कर दिया, फिर पैग़म्बर ने आयशा को कुछ बात (क़िस्सा मारिया) बता दी और कुछ बात (क़िस्सा यहद) टाल दी, जब पैग़म्बर ने ये वाक़िया आयशा को बताया, तो वह हैरत से कहने लगी, आपको किसने इसकी ख़बर दी, पैग़म्बर ने कहा कि मुझे बड़े वाक़िफ़कार ख़बरदार ख़ुदा ने बताया है.
4. अगर तुम दोनों तौबा करो, तो ख़ैर है, क्योंकि तुम दोनों के दिल साफ़ नहीं हैं और अगर तुम दोनों पैग़म्बर की मुख़ालिफ़त में एक दूसरे की अनायत करती रहोगी, तो कोई परवाह नहीं, क्योंकि ख़ुदा और जिबरील और तमाम ईमानदारों में नेक शख़्स उनके मददगार हैं और उनके अलावा कुल फ़रिश्ते मददगार हैं
5. अगर पैग़म्बर तुम लोगों को तलाक़ दे दे, तो अनक़रीब उनका परवरदिगार तुम्हारे बदले उन्हें तुमसे अच्छी बीवियां अता करे, जो ख़ुदा रसूल की फ़रमाबरदार ईमानदार तौबा करने वाली, इबादत गुज़ार रोज़ा रखने वाली ब्याही हुई
6. और बिन ब्याही कुंवारियां हों, ऐ ईमानदारों अपने लड़कों को आग से बचाओ, जिसके ईंधन आदमी और पत्थर होंगे, उन पर वह तन्दख़ू सख़्त मिज़ाज फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं कि ख़ुदा जिस बात का हुक्म देता है, उसकी नाफ़रमानी नहीं करते और जो हुक्म मिलता है, उसे पूरा करते हैं
7. (जब काफ़िर दोज़ख़ के सामने लाए जाएंगे, तो उनसे कहा जाएगा) काफ़िरों आज बहाने न तलाशो, जो कुछ तुम करते थे, तुम्हें उसकी सज़ा दी जाएगी
8. ऐ ईमानदारों ख़ुदा की बारगाह में साफ़ दिल से तौबा करो, तो उम्मीद है कि तुम्हारा परवरदिगार  तुम्हारे गुनाह मुआफ़ कर दे और तुमको बहिश्त के उन बाग़ों में दाख़िल करे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, उस दिन जब ख़ुदा पैग़म्बर को और उन लोगों को, जो उनके साथ ईमान लाए, रुस्वा नहीं करेगा, उनका नूर उनके आगे आगे और उनके दाहिनी तरफ़ रौशनी करता चल रहा होगा और ये लोग दुआ करते होंगे कि परवरदिगार हमारे लिए हमारा नूर पूरा कर और हमें बख़्श दे, तू हर् चीज़ पर क़ादिर है
9. काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों से जेहाद करो और उन पर सख़्ती करो और उनका ठिकाना जहन्नुम है और वह क्या बुरा ठिकाना है
10. ख़ुदा ने काफ़िरों के लिए नूह की बावी (वाएला) और लूत की बीवी (वाहेला) की मिसाल बयान की है कि ये दोनों हमारे बन्दों के ख़िलाफ़ थीं, तो दोनों ने अपने शौहरों को धोका दिया, तो उनके शौहर ख़ुदा के मुक़ाबले में उनके कोई काम न आए और उन्हें हुक्म दिया गया कि और जाने वालों के साथ तुम दोनों भी जहन्नुम में दाख़िल हो जाओ
11. और ख़ुदा ने मोमिनीन की तसल्ली के लिए फ़िरऔन की बीवी (आसिया) की मिसाल बयान की है कि जब उसने दुआ की, परवरदिगार मेरे लिए अपने यहां बहिश्त में एक घर बना और मुझे फ़िरऔन और उसकी कारस्तानी ने निजात दे और मुझे ज़ालिम लोगों से छुटकारा अता फ़रमा
12. और दूसरी इमरान की बेटी मरियम, जिसने अपनी शर्मगाह को महफ़ूज़ रखा, तो उसमें रूह फूंक दी और उसने अपने परवरदिगार की बातों की तस्दीक की और फ़रमाबरदारों में थी
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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माहे-ज़िलहज की पहली तारीख का अमल

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हदीस शरीफ़ में आया है कि जो शख़्स माहे-ज़िलहज की पहली तारीख़ की रात को चार रकअत नमाज़ पढ़े और हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह इख़लास 25 मर्तबा पढ़े, अल्लाह तअला उसके आमालनामे में 25 बरस की इबादत का सवाब दर्ज फ़रमाएगा और मरने से पहले बहिश्त में अपना मुक़ाम देख लेगा.

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें हैं.
पहली शर्त
वे बहीमतुल अनआम (चौपायों) में से हों,  और वे ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है- "और हर उम्मत के लिए हमने क़ुर्बानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर किया है, ताकि वे उन बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों) पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है." (सूरतुल हज्ज : 34)
बहीमतुल अनआम (पशु) से मुराद ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं. अरब के बीच यही जाना जाता है, इसे हसन, क़तादा, और कई लोगों ने कहा है.

दूसरी शर्त
वे जानवर शरीअत में निर्धारित आयु को पहुंच गए हों. इस प्रकार कि भेड़ जज़आ हो, या दूसरे जानवर सनिय्या हों, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है- "तुम मुसिन्ना जानवर ही क़ुर्बानी करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे लिए कठिनाई हो, तो भेड़ का जज़आ़ क़ुर्बानी करो." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है.)

मुसिन्ना : सनिय्या या उस से बड़ी आयु के जानवर को कहते हैं, और जज़आ उससे कम आयु के जानवर को कहते हैं.
ऊंट में से सनिय्या : वह जानवर है जिस के पांच साल पूरे हो गए हों.
गाय में से सनिय्या : वह जानवर है जिसके दो साल पूरे हो गए हों.
बकरी में से सनिय्या : वह जानवर है जिसका एक साल पूरा हो गया हो.
और जज़आ : उस जानवर को कहत हैं, जो छह महीने का हो.

अत: ऊंट, गाय और बकरी में से सनिय्या से कम आयु के जानवर की क़ुर्बानी करना शुद्ध नहीं है, भेड़ में से जज़आ से कम आयु की कु़र्बानी नहीं है.

तीसरी शर्त
वे जानवर उन दोषों (ऐबों और कमियों) से मुक्त (ख़ाली) होने चाहिए, जिनके होते हुए वे जानवर क़ुर्बानी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, औ वे चार दोष हैं-
1. स्पष्ट कानापन : और वह ऐसा जानवर है जिसकी आंख धंस गई (अंधी हो गई) हो, या इस तरह बाहर निकली हुई हो कि वह बटन की तरह लगती हो, या इस प्रकार सफ़ेद हो गई हो कि साफ़ तौर पर उसके कानेपन का पता देती हो.
2. स्पष्ट बीमारी : ऐसी बीमारी जिसकी निशानियांपशु पर स्पष्ट हों जैसे कि ऐसा बुख़ार जो उसे चरने से रोक दे और उसकी भूख को मार दे, और प्रत्यक्ष खुजली जो उसके गोश्त को ख़राब कर दे या उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर दे,  और गहरा घाव जिस से उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए, इत्यादि.
3. स्पष्ट लंगड़ापन : जो पशु को दूसरे दोषरहित पशुओं के साथ चलने से रोक दे.
4. ऐसा लंगड़ापन जो गूदा को समाप्त करन वाला हो, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि क़ुर्बानी के जानवरों में किस चीज़ से बचा जाए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से संकेत करते हुए फ़रमाया : "चार : लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन स्पष्ट हो, काना जानवर जिसका कानापन स्पष्ट हो, रोगी जानवर जिसका रोग स्पष्ट हो, तथा लागर जानवर जिस की हड्डी में गूदा न हो. इसे इमाम मालिक ने मुवत्ता में बरा बिन आज़िब की हदीस से रिवायत किया है, और सुनन की एक रिवायत में बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि उन्होंने कहा- अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीच खड़े हुए और फ़रमाया- "चार चीज़ें (दोष और ख़ामियां) क़ुर्बानी के जानवर में जाइज़ नहीं हैं." और आप ने पहली हदीस के समान ही उल्लेख किया. इसे अल्बानी ने इर्रवाउल गलील (1148) में सही कहा है.

ये चार दोष और ख़ामियां क़ुर्बानी के जानवर के पर्याप्त होने में रुकावट हैं (अर्थात् इनमें से किसी भी दोष से पीड़ित जानवर की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है), इसी तरह जिन जानवरों में इन्हीं के समान या इन से गंभीर दोष और ख़ामियां होंगी उन पर भी यही हुक्म लागू होगा, इस आधार पर निम्नलिखित जानवरों की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है-
1. वह जानवर जो दोनों आंख का अंधा हो.
2. वह जानवर जिसका पेट अपनी क्षमता से अधिक खाने के कारण फूल गया हो, यहां तक कि वह पाखाना कर दे, और ख़तरे से बाहर हो जाए.
3. वह जानवर जो जने जाने के समय कठिनाई से पीड़ित हो जाए, यहां तक कि उस से ख़तरा टल जाए.
4. ऊंचे स्थान से गिरने या गला घुटने आदि के कारण मौत के ख़तरे का शिकार जानवर यहां तक कि वह ख़तरे से बाहर हो जाए.
5. किसी बीमारी या दोष के कारण चलने में असमर्थ जानवर.
6. जिस जानवर का एक हाथ या एक पैर कटा हुआ हो.

जब इन दोषों और ख़ामियों को उपर्युक्त चार नामज़द (मनसूस) ख़ामियों के साथ मिलाया जाए, तो उन ख़ामियों (ऐबों) की संख्या जिनके कारण क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है, दस हो जाती है. ये छह ख़ामियां और जो पिछली चार ख़ामियों से पीड़ित हो.

चौथी शर्त
वह जानवर क़ुर्बानी करने वाले की मिल्कियत (संपत्ति) हो, या शरीअत की तरफ़ से या मालिक की तरफ़ से उसे उस जानवर के बारे में अनुमति प्राप्त हो. अत: ऐसे जानवर की क़ुर्बानी शुद्ध नहीं है जिसका आदमी मालिक न हो जैसे कि हड़प किया हुआ, या चोरी किया हुआ, या झूठे दावा द्वारा प्राप्त किया गया जानवर इत्यादि, क्योंकि अल्लाह तआला की अवज्ञा के द्वारा उस का सामीप्य और नज़दीकी प्राप्त करना उचित नहीं है.
तथा अनाथ के संरक्षक (सरपरस्त) के लिए उसके धन से उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी करना वैध है. अगर उसकी परम्परा है और क़ुर्बानी न होने के कारण उसके दिल के टूटने का भय है.
तथा वकील (प्रतिनिधि) का अपने मुविक्कल के माल से उसकी अनुमति से क़ुर्बानी करना उचित है.

पांचवीं शर्त
उस जानवर के साथ किसी दूसरे का हक़ (अधिकार) संबंधित न हो, चुनांचे उस जानवर की क़ुर्बानी मान्य नहीं है, जो किसी दूसरे की गिरवी हो.

छठी शर्त
शरीअत में क़ुर्बानी का जो सीमित समय निर्धारित है उसी में उसकी क़ुर्बानी करे, और वह समय क़ुर्बानी (10 ज़ुलहिज्जा) के दिन ईद की नामज़ के बाद से अय्यामे तश्रीक़ अर्थात् 13वीं ज़ुलहिज्जा के दिन सूर्यास्त तक है. इस तरह बलिदान के दिन चार हैं- नमाज़ के बाद से ईद का दिन, और उस के बीद अतिरिक्त तीन दिन. जिसने ईद की नमाज़ से फ़ारिग़ होने से पहले, या तेरहवीं ज़ुलहिज्जा को सूरज डूबने के बाद क़ुर्बानी की, तो उसकी क़ुर्बानी शुद्ध और मान्य नहीं है , क्योंकि इमाम बुख़ारी ने बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "जिसने ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी की, तो उसने अपने घर वालों के लिए गोश्त तैयार किया है, और उस का धार्मिक परंपरा से (क़ुर्बानी की इबादत) से कोई संबंध नहीं है." तथा जुनदुब बिन सुफ़यान अल-बजली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा- "मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास उपस्थित था, जब आप ने फ़रमाया- "जिसने -ईद की- नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुर्बानी कर दी, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुर्बानी करे." तथा नुबैशा अल-हुज़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "तश्रीक़ के दिन खाने, पीने और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को याद करने के दिन हैं." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है)

किन्तु यदि किसी कारणवश तश्रीक़ के दिन (13 ज़ुलहिज्जा) से विलंब हो जाए, उदाहरण के तौर पर बिना उसकी कोताही के क़ुर्बानी का जानवर भाग जाए और समय बीत जाने के बाद ही मिले, या किसी को क़ुर्बानी करने के लिए वकील (प्रतिनिधि) बना दे और वकील भूल जाए यहां तक कि क़ुर्बानी का समय निकल जाए, तो उज़्र के कारण समय निकलने के बाद क़ुर्बानी करने में कोई बात नहीं है, तथा उस आदमी पर क़ियास करते हुए जो नमाज़ से सो जाए या उसे भूल जाए, तो वह सोकर उठने या उसके याद आने पर नमाज़ पढ़ेगा.

निर्धारित समय के अंदर दिन और रात में किसी भी समय क़ुर्बानी करना जाइज़ है, जबकि दिन में क़ुर्बानी करना श्रेष्ठ है, तथा ईद के दिन दोनों ख़ुत्बों के बाद क़ुर्बानी करना अफज़ल हैं, तथा हर दिन उसके बाद वाले दिन से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भलाई की तरफ़ पहल और जल्दी करना पाया जाता है.

साभार islamqa



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हज का तरीक़ा

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हज सर्वश्रेष्ठ उपासनाओं और महान आज्ञाकारिताओं में से है, और वह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, जिसके साथ अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा है और जिसके बिना बंदे का धर्म संपूर्ण नहीं हो सकता.
तथा दो चीज़ों के बिना किसी इबादत द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त नहीं होती और न ही वह इबादत स्वीकार होती है-
एक : अल्लाह सर्वशक्तिमान के लिए निःस्वार्थता (इख़्लास) है इस प्रकार कि उसके द्वारा उसका उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना और आख़िरत का दिन हो, वह उसके द्वारा दिखावा, पाखंड और सांसारिक लाभ का इच्छुक न हो.
दूसरा : करनी और कथन में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की जानकारी के बिना संपूर्ण नहीं हो सकती.

इसीलिए उस व्यक्ति पर, जो किसी इबादत हज या उसके अलावा के द्वारा अल्लाह की उपासना करना चाहता है, यह अनिवार्य है कि वह उसके अंदर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े को सीखे ताकि उसका कार्य सुन्नत के अनुसार हो.

हज के प्रकार
हज के तीन प्रकार हैं : तमत्तुअ, इफ्राद, क़िरान
तमत्तुअ : यह है कि हज करने वाला हज के महीनों में (और हज के महीने शव्वाल, ज़ुल-क़ादा, और ज़ुल-हिज्जा हैं. केवल उम्रा का एहराम बांधे. जब मक्का पहुंच जाए तो उम्रा के लिए तवाफ़ और सई करे, अपने सिर के बाल मुंडा ले या उन्हें छोटे करवा ले और अपने एहराम से हलाल हो जाए (अर्थात एहराम के कपड़े उतार दे और एहराम की पाबंदी ख़त्म कर दे). जब तर्विया अर्थात आठ ज़ुल-हिज्जा का दिन आए, तो केवल हज का एहराम बांधे और उसके सभी कार्यों को करे. तमत्तुअ करने वाला संपूर्ण उम्रा करता है और संपूर्ण हज करता है.
इफ्राद : हज करने वाला केवल हज का एहराम बांधे (अर्थात केवल हज की नीयत करे). जब मक्का पहुंच जाए, तो तवाफ़े-क़ुदूम (आगमन का तवाफ़) करे और हज के लिए सई करे, तथा सिर के बाल न मुंडाए और न उसे छोटा करवाए, और अपने एहराम से हलाल न हो, बल्कि वह मोहरमि बाक़ी रहे यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बा को कंकरी मारने के बाद हलाल हो, और यदि हज की सई को हज का तवाफ़ करने के बाद तक विलंब कर दे तो कोई आपत्ति की बात नहीं है.
क़िरान: हज करने वाला उम्रा और हज का एक साथ एहराम बांधे (अर्थात नीयत करे) या पहले उम्रा का एहराम बांधे फिर उसका तवाफ़ आरंभ करने से पहले उस के साथ हज को भी सम्मिलित कर ले, (इस प्रकार कि वह इस बात की नीयत करे कि उसका तवाफ़ और उसकी सई उसके हज और उम्रा की है).

क़िरान हज करने वाले का काम इफ्राद हज करने वाले के काम के समान है, केवल इतना अंतर है कि क़िरान करने वाले पर हदी (जानवर की क़ुर्बानी) अनिवार्य है और इफ्राद हज करने वाले पर हदी अनिवार्य नहीं है.

हज के इन तीनों प्रकार में सबसे श्रेष्ठ तमत्तुअ हज है, इसी का नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को आदेश दिया था और इसी पर बल दिया था, यहां तक कि यदि मनुष्य क़िरान हज या इफ्राद हज की नीयत करे तब भी उसके लिए महत्वाकांक्षिक बात यह है कि वह अपने एहराम को उम्रा में परिवर्तित कर दे फिर वह हलाल हो जाए ताकि वह तमत्तुअ हज्ज करने वाला हो जाए, चाहे यह तवाफ़े- क़ुदूम और सई करने के बाद ही क्यों न हो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब हज्जतुल वदाअ के साल तवाफ़ और सई कर लिया और आपके साथ आपके सहाबा भी थे, तो आपने हर उस व्यक्ति को जिसके पास हदी नहीं थी, अपने एहराम (हज की नीयत) को उम्रा में बदलने और बाल कटवाकर हलाल हो जाने का आदेश दिया और फरमाया : “यदि मैं अपने साथ हदी को न लाया होता, तो उसी तरह करता जिसका मैं ने तुम्हें आदेश दिया है.”
एहराम
यहां एहराम की उन सुन्नतों को किया जाएगा जैसे स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना.

फिर अपनी नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद या अपनी सवारी पर बैठने के बाद एहराम बांधे (अर्थात हज की इबादत में प्रवेश करने की नीयत करे)
फिर यदि वह तमत्तुअ करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि- उम्रह” कहे.
यदि वह हज क़िरान करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि-हज्जतिन व उम्रह” कहे.
और यदि वह इफ्राद हज करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” कहे.

फिर कहे : अल्लाहुम्मा हाज़िही हज्जतुन ला रियाआ फ़ीहा वला सुमअह (ऐ अल्लाह यह ऐसा हज है जिसमें कोई दिखावा और पाखंड नहीं है).

फिर वही तल्बिया पढ़े जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पढ़ी थी और वह यह है :
“लब्बैका, अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन्नेमता लका वल मुल्क, ला शरीका लक”
(मैं उपस्थित हूं, ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूं, मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं, हर प्रकार की स्तुति और सभी नेमतें तथा राज्य तेरा ही है, तेरा कोई साझी नहीं.)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तल्बिया में से ये शब्द भी हैं- “लब्बैका इलाहल हक़्क़” (ऐ सत्य पूज्य मैं उपस्थित हूं). तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु तल्बियह में इन शब्दों की वृद्धि करते थे- “लब्बैका व सा'दैक, वल-ख़ैरो बि-यदैक, वर्रग़्बाओ इलैका वल अमल”. पुरूष इसे ऊंचे स्वर में कहेगा, परंतु महिला इतनी आवाज़ में कहेगी कि अपनी बग़ल वाली को सुना सके, लेकिन यदि उसके बग़ल में कोई पुरूष है जो उसका महरम नहीं है, तो वह धीमी स्वर में तल्बिया पढ़ेगी.

यदि एहराम बांधने का इरादा रखने वाला आदमी किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है (जैसे- बीमारी, दुश्मन, या क़ैद इत्यादि) तो उसके लिए उचित यह है कि वह एहराम बांधते समय शर्त लगा ले और कहे-:
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)

अर्थात् यदि कोई रुकावट जैसे बीमारी या विलंब या कोई रुकावट ने मुझे अपने हज के कामों को पूरा करने से रोक दिया, तो मैं अपने एहराम से हलाल हो जाऊंगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बाअह बिंत ज़ुबैर को जबकि उन्हों ने एहराम बांधने का इरादा किया और वह बीमार थीं तो आपने उन्हें आदेश दिया कि वह शर्त लगा लें और फरमाया- तुम्हारे लिअ अपने पालनहार पर वह चीज़ है जिसे तुम मुस्तसना (अपवाद) कर दो.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5089) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1207) ने रिवायत किया है. अतः जब भी वह शर्त लगा ले और उसे वह रुकावट पेश आ जाए जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक दे तो वह अपने एहराम से हलाल हो जाएगा और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है.

किंतु जो व्यक्ति किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर महसूस नहीं कर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है, तो उसके लिए शर्त लगाना उचित नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शर्त नहीं लगाई और न तो हर एक को शर्त लगाने का आदेश ही दिया है, आपने ज़बाआ बिंत ज़ुबैर को उनके बीमारी से ग्रस्त होने के कारण इसका आदेश दिया था.

मेहरिम को चाहिए कि अधिक से अधिक तल्बियह पढ़े, विशेष रूप से स्थितियों और ज़माने के बदलने के समय उद्हारण के तौर पर जब किसी ऊंचाई पर चढ़े, यी नीची जगह उतरे, या रात या दिन आए. तथा उसके बाद अल्लाह तअला से उसकी प्रसन्नता और स्वर्ग का प्रश्न करे और उसकी दया व कृपा के द्वारा नरक से पनाह मांगे.

उम्रा के अंदर तल्बिया कहना एहराम से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक धर्म संगत है.
और हज में एहराम बांधने से लेकर ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने तक धर्म संगत है.

मक्का में प्रवेश करने के लिए स्नान करना
मोहरिम के लिए उचित है कि जब वह मक्का के निकट पहुंच जाए तो उसमें प्रवेश करने के लिए यदि उसके लिए आसान है तो स्नान कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का में प्रवेश करने के समय स्नान किया. इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1259) ने रिवायत किया है.

फिर जब मस्जिदुल हराम में प्रवेश करे तो अपने दाहिने पैर को पहले रखे और कहे- “बिस्मिल्लाह वस्सलातो वस्सलामो अला रसूलिल्लाह, अल्लाहुम्मग़ फिर्ली ज़ुनूबी वफ़-तह् ली अब्वाबा रहमतिक, अऊज़ो बिल्लाहिल अज़ीम वबि-वज्हेहिल करीम वबि-सुल्तानिहिल क़दीम मिनश्शैतानिर्रजीम” (मैं अल्लाह के नाम से - प्रवेश करता हूं - तथा दुरूद व सलाम हो अल्लाह के पैगंबर पर, ऐ अल्लाह ! तू मेरे लिए मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वारों को खोल दे, मैं महान अल्लाह, उसके दानशील चेहरे और उसके प्राचीन राज्य की शरण में आता हूं शापित शैतान से), फिर हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) की ओर जाए ताकि तवाफ़ शुरू करे.

फिर तवाफ़ करने और दो रक्अत नमाज़ पढ़ने के बाद सई करने के स्थल पर आए और सफ़ा व मर्वा के बीच सई करे.
जहां तक तमत्तुअ करने वाले का संबंध है तो वह उम्रा के लिए सई करेगा, लेकिन इफ्राद और क़िरान करने वाले हज के लिए सई करेंगे, तथा वे दोनों तवाफ़े-इफ़ाज़ा के बाद तक सई को विलंब भी कर सकते हैं.

सिर के बाल मुंडाना या छोटे करवाना
जब वह सात चक्कर अपनी सई पूरी कर ले तो यदि वह पुरुष है तो अपने सिर को मुंडाए, या उसके बालों को छोटा करवाए, तथा ज़रूरी है कि उसका सिर मुंडाना सिर के सभी बालों के लिए हो, इसी तरह बालों को सिर के सभी ओर से छोटा करवाया जाएगा. जबकि सिर के बालों को मुंडाना उन्हें छोटा करवाने से सर्वश्रेष्ठ है. क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने “सिर के बालों को मुंडाने वालों के लिए तीन बार दुआ की और बालों को छोटा करवाने वालों के लिए एक बार दुआ फ़रमाई.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1303) ने रिवायत किया है।

हां, यदि हज का समय इतना निकट हो कि सिर के बालों के उगने भर के लिए समय न हो तो सर्वश्रेष्ठ बालों को छोटा करवाना ही है, ताकि हज में मुंडाने के लिए उसके सिर में बाल बाक़ी रहें, इस प्रमाण के आधार पर कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्जतुल वदाअ़ के अवसर पर अपने साथियों (सहाबा) को उम्रा के लिए बाल छोटे करवाने का आदेश दिया था, इसलिए कि उन लोगों का आगमन ज़ुल-हिज्जा के चौथे दिन की सुबह को हुआ था. जहां तक महिला की बात है तो वह अपने बालो से उंगली के एक पोर के बराबर काट लेगी.

इन कामों के कर लेने से उम्रा संपूर्ण हो जाएगा और इसके बाद वह पूरी तरह हलाल हो जागा, और वह उसी तरह करेगा जिस तरह कि बिना एहराम वाले लोग कपड़े पहनते हैं, सुगंध लगाते हैं.

जहां तक क़िरान और इफ्राद हज करने वालों का संबंध है तो वे दोनों न सिर के बाल मुंडाएंगे न छोटे करवाएंगे और न ही वे दोनों अपने एहराम से हलाल होंगे (एहराम नहीं खोलेंगे), बल्कि वे दोनों अपने एहराम पर बाक़ी रहेंगे यहां तक कि ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने और सिर मुंडाने या सिर के बाल छोटे करवाने के बाद हलाल होंगे.

फिर जब तर्वियह अर्थात ज़ुल-हिज्जा का आठवां दिन होगा तो तमत्तुअ हज करने वाला चाश्त के समय मक्का में अपने स्थान से ही हज का एहराम बांधेगा, और उसके लिए अपने हज का एहराम बांधते समय वही चीज़ें करना मुस्तहब (ऐच्छिक) है जो उसने अपने उम्रा का एहराम बांधते समय किया था जैसे- स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना, चुनांचे वह हज का एहराम बांधने की नीयत करेगा और तल्बियह कहेगा, वह कहेगा- “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” (ऐ अल्लाह मैं हज्ज की नीयत से उपस्थित हूं).

और यदि वह किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज को पूरा करने से रोक सकती है तो वह शर्त लगा ले और कहे-
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)
और यदि उसे किसी ररुकावट के पेश आने का भय न हो तो शर्त न लगाए. तथा उसके लिए ऊंचे स्वर में तल्बियह कहना मुस्तहब है यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारना शुरू कर दे.

मिना जाना
फिर वह मिना जाए और वहां ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ें क़स्र करके पढ़े, दो नमाज़ों को एक साथ न पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिना में क़स्र करते थे, दो नमाज़ों को एकत्र करके नहीं पढ़ते थे.” क़स्र कहते हैं : चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत करके पढ़ना, तथा मक्का वाले और उनके अलावा अन्य लोग मिना, अरफ़ह और मुज़दलिफ़ा में नमाज़ को क़स्र करके पढ़ेंगे, क्योंकि हज्जतुल वदाअ़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को नमाज़ पढ़ाते थे और आपके साथ मक्का वाले भी थे और आपने उन्हें नमाज़ पूरी करने का आदेश नहीं दिया, यदि नमाज़ पूरी पढ़ना उनके ऊपर अनिवार्य होता तो आप उन्हें इसका आदेश देते जिस तरह कि आपने उन्हें मक्का पर विजय के साल इसका आदेश दिया था. लेकिन क्योंकि मक्का की आबादी बढ़ गई और वह मिना को भी सम्मिलित हो गई और वह ऐसे हो गई कि मानो वह उसका एह मुहल्ला है इसलिए मक्का वाले उसमें नमाज़ क़स्र नहीं करते हैं.

अरफ़ह जाना
जब अरफह (नौ ज़ुल-हिज्जा) के दिन सूरज उग आए तो वह मिना से अरफ़ह की ओर प्रस्थान करेगा और ज़ुहर के समय तक यदि उसके लिए आसान है तो नमिरह में पड़ाव करेगा (नमिरह: अरफा से तुरंत पूर्व एक जगह है), नहीं तो कोई बात नहीं है, क्योंकि नमिरह में पड़ाव करना सुन्नत है अनिवार्य नहीं है. जब सूरज ढल जाए (अर्थात ज़ुहर की नमाज़ का समय शुरू हो जाए) तो ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें दो-दो रक्अत पढ़ेगा और उन दोनों के बीच जमा तक़दीम करेगा (अर्थात दोनों को ज़ुहर के समय में पढ़ेगा जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया ताकि अरफ़ह में ठहरने और दुआ करने का समय लंबा हो जाए.

फिर नमाज़ के बाद ज़िक्र (जप), दुआ और अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने गिड़गिड़ाने (विनती करने) के लिए फ़ारिग़ हो जाए और उसे जो पसंद हो अपने दोनों हाथों को उठाकर क़िब्ला की ओर मुंह करके दुआ करे यद्यपि अरफ़ात की पहाड़ी उसके पीछे हो, क्योंकि सुन्नत क़िब्ला की ओर मुंह करना है पहाड़ी की ओर नहीं, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहाड़ी के पास ठहरे थे और फ़रमाया था- “मैं यहां ठहरा हूं और पूरा अरफ़ह ठहरने की जगह है.”

तथा उस महान ठहरने के स्थान पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अक्सर यह दुआ पढ़ते थे- “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्को व लहुल हम्द, वहुवा अला कुल्ले शैइन क़दीर” (अल्लाह के अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत (राज्य) है और उसी के लिए सभी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर शक्तिवान है.)

यदि उसे उकताहट और आलस्य लगे और वह अपने साथियों के साथ लाभदायक बातचीत के द्वारा या लाभदायक किताबों को पढ़कर विशेषकर जिनका संबंध अल्लाह सर्वशक्तिमान की दानशीलता और उसके व्यापक उपहारों से है, ताकि उस दिन में आशा का पहलू मज़बूत हो तो ऐसा करना अच्छा है. इसके बाद वह फिर से अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने, गिड़गिड़ाने और दुआ करने में व्यस्त हो जाए और दिन के अंतिम समय को दुआ में बिताने का इच्छुक और लालायित बने, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ दुआ अरफ़ह के दिन की दुआ है.

मुज़दलिफ़ा जाना
जब सूरज डूब जाए तो अरफ़ह की ओर रवाना हो. जब अरफ़ह पहुंच जाए तो एक अज़ान और दो इक़ामत से मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े.
और यदि उसे इस बात का भय हो कि वह मुज़दलिफ़ा आधी रात के बाद पहुंचेगा तो वह रास्ते में ही नमाज़ पढ़ लेगा, उसके लिए इशा की नमाज़ को आधी रात के बाद तक विलंब करना जाइज़ नहीं है.

और वह मुज़दलिफ़ा में रात बिताएगा, जब फ़ज्र स्पष्ट हो जाए तो अज़ान और इक़ामत के साथ फ़ज्र की नमाज़ सवेरे पढ़ेगा फिर मश्अरूल हराम का क़सद करेगा (और वह मुज़दलिफ़ा में मौजूद मस्जिद का स्थान है) तो अल्लाह की एकता का वर्णन करेगा और तक्बीर कहेगा और अपनी पसंदीदा दुआ करेगा यहां तक भली भांति रोशनी हो जाए (इस से अभिप्राय यह है कि सूरज उगने से पूर्व दिन की रोशनी स्पष्ट हो जाए)। यदि उसके लिए मश्अरूल हराम तक जाना आसान न हो तो वह अपने स्थान पर ही दुआ करेगा क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- मैं यहां ठहरा हूं और पूरा मुज़दलिफ़ा ठहरने की जगह है. ज़िक्र करने और दुआ करने की हालत में वह अपने दोनों हाथों को उठाए हुए क़िब्ला की ओर मुंह किए होगा.

मिना की तरफ़ प्रस्थान
जब अच्छी तरह रोशनी फैल जाए तो सूरज उगने से पहले वह मिना की ओर प्रस्थान करेगा, और वादी मुहस्सर (मुज़दलिफ़ा और मिना के बीच एक वादी है) में तेज़ी से चलेगा मिना पहुंचकर जमरतुल अक़बह को कंकरी मारेगा और वह मक्का के निकट सबसे अंतिम जमरह है (वह मक्का से सबसे निकट जमरह है) वह एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारेगा, हर कंकरी लगभग लूबिया के दाने के बराबर होगी, हर कंकरी के साथ तक्बीर कहेगा (जमरतुल अक़बह को कंकरी मारते समय सुन्नत यह है कि आदमी जमरह की ओर मुंह करे और मक्का को अपने बायें ओर और मिना को अपने दाहिने ओर कर ले). कंकरी मारने से फ़ारिग़ होने के बाद अपने हदी (क़ुर्बानी के जानवर) को ज़बह करे, फिर अपने सिर को मुंडाए या उसके बालों को छोटा करवाए यदि वह पुरुष है, रही बात महिला की तो वह अपने बालों से एक उंगल (पोर) के बराबर बाल काट लेगी. (इसके द्वारा मोहरिम को पहला तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा, अतः उसके लिए अपनी पत्नी से संभोग करने के अलावा एहराम की हालत में निषिद्ध हर चीज़ हलाल हो जाएगी) फिर वह मक्का जाए और हज का तवा और सई करे. (फिर उसे दूसरा तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा तो उसके लिए हर वह चीज़ हलाल हो जाएगी जो एहराम के कारण उसके लिए हराम थी).

सुन्नत यह है कि जब वह कंकरी मारने और सिर मुंडाने के बाद तवाफ़ के लिए मक्का जाने का इरादा करे तो ख़ुशबू लगाए, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का फ़रमान है कि “मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपके एहराम बांधने के समय तथा आपके हलाल होने के समय काबा का तवाफ़ करने से पूर्व ख़ुशबू लगाती थी.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1539) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1189) ने रिवायत किया है.

फिर तवाफ़ और सई करने के बाद मिना लौट आए और वहां ज़ुल-हिज्जा की ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ की रात गुज़ारे और दोनों दिनों में सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे, सर्वश्रेष्ठ यह है कि वह कंकरी मारने के लिए पैदल चलकर जाए और यदि वह सवारी कर लेता है तो कोई पाप की बात नहीं है. वह सर्व प्रथम पहले जमरह को कंकरी मारेगा और वह मक्का से सबसे दूर का जमरह है और वही मस्जिदे ख़ैफ़ के निकट है, एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के बाद अल्लाहु अकबर कहे, फिर थोड़ा आगे बढ़कर अपनी पसंद के अनुसार लंबी दुआ करे, यदि उसके लिए देर तक ठहरना कष्टदायक हो तो जितना भी उसके लिए आसान हो दुआ करे चाहे थोड़ा ही सही, ताकि सुन्नत पर अमल हो जाए.

फिर मध्य जमरह (अल-जमरतुल वुस्ता) को एक के पीछे एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर बायें ओर हो जाए और क़िब्ला की ओर मुंह करके अपने दोनों हाथों को उठाकर खड़ा हो और यदि उसके लिए आसान हो तो लंबी दुआ करे, नहीं तो जितना उसके लिए आसान हो उतना ही ठहरे, और उसके लिए दुआ के लिए ठहरने को त्याग करना उचित नहीं है क्योंकि यह सुन्नत है, जबकि बहुत से लोग अज्ञानता के कारण या लापरवाही में उसे छोड़ देते हैं, और जब भी किसी सुन्नत को नष्ट कर दिया जाए तो उसको करना और लोगों के बीच उसको प्रकाशित करना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि उसे छोड़ा न जाए और वह मिटने न पाए.

फिर जमरतुल अक़बह को एक के बाद एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर वहां से चला जाए और उसके बाद दुआ न करे.

जब बारहवें दिन सभी जमरात को कंकरी मार ले तो यदि चाहे तो जल्दी करे और मिना से बाहर निकल जाए, और यदि चाहे तो विलंब करे और वहां तेरह ज़ुलहिज्जा की रात बिताए और सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे जैसा कि पीछे गुज़र चुका. जबकि विलंब करना सर्वश्रेष्ठ है, और ऐसा करना अनिवार्य नहीं है सिवाय इसके कि बारह ज़ुलहिज्जा को सूरज डूब जाए और वह मिना ही में हो, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य है यहां तक कि वह अगले दिन सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मार ले, किंतु यदि बारह ज़ुल-हिज्जा को उसके ऊपर मिना में सूरज उसकी इच्छा के बिना डूब जाए, उदाहरण के तौर पर उसने प्रस्थान कर दिया हो और सवारी पर बैठ गया हो, किंतु गाड़ियों की भीड़ इत्यादि के कारण विलंब हो जाए तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि सूरज डूबने तक उसका विलंब होना उसकी इच्छा के बिना हुआ है.

फिर जब वह मक्का से निकल कर अपने देश जाने का इरादा करे तो वह बाहर न निकले यहां तक कि विदाई तवाफ़ कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- “कोई व्यक्ति कूच न करे यहां तक कि उसका अंतिम काम अल्लाह के घर (काबा) का तवाफ़ हो.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1327) ने रिवायत किया है, तथा एक रिवायत के शब्द यह हैं कि “लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम काम अल्लाह के घर का तवाफ़ करना हो सिवाय इसके कि मासिक धर्म वाली औरत के लिए रुख़्सत दी गई है.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1755) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1328) ने रिवायत किया है.

चुनांचे मासिक धर्म और प्रसव वाली औरत पर विदाई तवाफ़ अनिवार्य नहीं है, तथा उन दोनों के लिए विदाई के लिए मस्जिदुल हराम के द्वार के पास खड़ा होना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है.

तथा वह विदाई तवा को अल्लाह के घर का अंतिम काम बनाए, जब वह यात्रा के लिए कूच करने का इरादा करे, तो यदि वह विदाई तवाफ़ के बाद साथियों की प्रतीक्षा के लिए या अपनी सवारी को लादने के लिए ठहर जाए या रास्ते में कोई आवश्यकता की चीज़ ख़रीद ले तो उस पर कोई पाप नहीं है, और वह तवा को नहीं लौटाएगा सिवाय इसके  कि वह अपने सफ़र को स्थगित करने की नीयत कर ले, उदाहरण के तौर पर वह दिन के आरंभ में सफ़र करना चाहता है तो वह विदाई तवाफ़ कर ले फिर वह सफ़र को उदाहरण के तौर पर दिन के अंत तक निलंबित कर दे, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए तवाफ को लौटाना अनिवार्य है ताकि वह उसका अल्लाह के घर का अंतिम काम हो जाए.

लाभदायक जानकारी
हज या उम्रा का एहराम बांधने वाले पर निम्नलिखित बातें अनिवार्य हैं-
1. अल्लाह तअला ने अपने धर्म के जो प्रावधान उसके ऊपर अनिवार्य किए हैं जैसे कि जमाअत के साथ नमाज़ को उसके समय पर पढ़ना, उसका पालन करना.
2. अल्लाह तअला ने उसे जिन कामुक बातों, गुनाहों और उल्लंघनों से रोका है उनसे दूर रहे क्योंकि अल्लाह तअला का फ़रमान है-

﴿فمن فرض فيهن الحج فلا رفث ولا فسوق ولا جدال في الحج ﴾ [ البقرة: 197]
“अतः जिसने इन महीनों में हज को फ़र्ज़ कर लिया, तो हज में संभोग और कामुक बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवज्ञा और पाप) तथा लड़ाई-झगड़ा (वैध) नहीं है.” (सूरतुल बक़रा : 197)

3. मुसलमानों को अपने कथन या कर्म से, चाहे वह मशाइर के पास हो या उसके अलावा में, कष्ट पहुंचाने से बाज़ रहे.
4. एहराम की हालत में निषिद्ध सभी चीज़ों से बचना.
(क) - अपने बाल या नाख़ून से कोई चीज़ न काटे, जहां तक कांटे को निकालने की बात है तो उसमें कोई पाप की बात नही है, भले ही ख़ून निकल आए.
(ख) - अपना एहराम बांधने के बाद अपने शरीर, या कपड़े, या खाने या पीने की चीज़ में ख़ुशबू न लगाए और न ही ख़ुशबूदार साबून से सफ़ाई सुथराई करे, रही बात उस बाक़ी बचे सुगंध के प्रभाव की जो उसने अपने एहराम से पहले इस्तेमाल की थी तो उसमें कोई हानि नहीं है.
(ग) - शिकार को न मारे।
(घ) - अपनी पत्नी से संभोग न करे.
(ङ) - तथा कामुकता के साथ स्पर्श या चुंबन या आलिंग्न वग़ैरह न करे.
(च) - स्वयं अपना या किसी दूसरे का विवाह न करे, तथा किसी औरत से अपनी या किसी अन्य की मंगनी न करे.
(छ) - दस्ताने न पहने. रही बात दोनों हाथों को कपड़े (चीथड़े) से लपेटने की तो इसमें कोई बात नहीं है.

ये सातों निषिद्ध चीज़ें पुरुष और स्त्री दोनों के लिए निषिद्ध हैं.

जबकि निम्नलिखित चीज़ें पुरूष के लिए विशिष्ट हैं:
- अपने सिर को किसी चिपकने वाली (सिर से मिली या चिपकी हुई) चीज़ से न ढांपे, रही बात छत्री, गाड़ी की छत और खैमा से साया करने, सिर पर सामान उठाने की, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है.
- वह क़मीज, पगड़ी, टोपी (हैट) पायजामा और मोज़ा न पहने, सिवाय इसके कि यदि वह इज़ार (तहबंद) न पाए तो पायजामा पहन ले या यदि जूते न पाए तो मोज़े पहन ले.
- तथा कोई ऐसी चीज़ न पहने जो उन चीज़ों के अर्थ में हो जिनका पीछे उल्लेख किया गया है, चुनांचे वह बुरक़ा, कंटोप, बनियान इत्यादि न पहने.
-  तथा उसके लिए जूते, अंगूठी, चश्मा, हेड-फून पहनना जाइज़ है, तथा वह अपने हाथ में घड़ी पहने, या उसे अपनी गर्दन में लटका ले, तथा बेल्ट बांधना ताकि उसमें अपने ख़र्च का पैसा रख सके.
- तथा उसके लिए ऐसी चीज़ के द्वारा सफ़ाई करना जाइज़ है जिसमें सुगंध न हो, या अपने सिर या शरीर को धोना और खुजलाना जाइज़ है और यदि ऐसा करने से बिना इच्छा के कोई बाल गिर जाए तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है.

तथा महिला नक़ाब नहीं पहनेगी, नक़ाब उस कपड़े को कहते हैं जिस से वह अपना चेहरा छिपाती है जिसमें उसकी दोनों आंखों के लिए सूराख बना होता है, तथा वह बुरक़ा भी नहीं पहनेगी.
सुन्नत यह है कि वह अपने चेहरे को खोले रखे सिवाय इसके कि उसे उसके गैर मह्रम मर्द देख रहे हों तो ऐसी स्थिति में उसके ऊपर एहराम की हालत और उसके अलावा में भी चेहरा छिपाना अनिवार्य है.
साभार islamqa

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एक दुआ जिसका सवाब अल्लाह ने छुपा रखा है

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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