वह तो तुम पढ़ चुके

Author: Admin Labels:: ,


एक आदमी मस्जिद में नमाज़ पढ़ने गया. उसने वुज़ू करने के लिए कुएं से एक बाल्टी पानी खींचा. उसी वक़्त गांव की एक औरत अपना घड़ा लेकर आ गई और उस आदमी से कहा कि पानी मेरे घड़े में डाल दो. आदमी ने औरत का घड़ा भर दिया. जब आदमी ने दूसरी बाल्टी पानी खींचा तो एक दूसरी औरत ने यही कहा. उस आदमी ने दूसरी औरत का घड़ा भी भर दिया. यही होता रहा. आदमी को ध्यान आया, अरे नमाज़ पढ़ने का वक़्त तो निकला जा रहा है. उसने जल्दी जल्दी वुज़ू किया. जब वह नमाज़ पढ़ने खड़ा हुआ, तो पीछे से एक हाथ उसके कंधे पर आया. उसने मुड़ कर देखा, तो पीछे एक सूफ़ी खड़े हैं. उन्होंने पूछा- तुम क्या करने जा रहे हो? उस आदमी ने कहा- मैं नमाज़ पढ़ने जा रहा हूं. 
सूफ़ी ने कहा- वह तो तुम पढ़ चुके.
-असग़र वज़ाहत


0 comments |

मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह

Author: Admin Labels:: ,


-फ़िरदौस ख़ान
बुल्ले शाह पंजाबी के प्रसिध्द सूफ़ी कवि हैं. उनके जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़ बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वे बुल्ले शाह कहलाए. वे जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए।. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वे अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिध्द 'क़िस्सा हीर-रांझा' के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की.

बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के शिष्य थे. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में भारत के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है. उनकी एक रचना में नाथ संप्रदाय की झलक मिलती है, जिसमें उन्होंने कहा है-
तैं कारन हब्सी होए हां
नौ दरवाजे बंद कर सोए हां
दर दसवें आन खलोए हां
कदे मन मेरी असनाई
यानी, तुम्हारे कारण मैं योगी बन गया हूं. मैं नौ द्वार बंद करके सो गया हूं और अब दसवें द्वार पर खड़ा हूं. मेरा प्रेम स्वीकार कर मुझ पर कृपा करो.

भगवान श्रीकृष्ण के प्रति बुल्ले शाह के मन में अपार श्रध्दा और प्रेम था. वे कहते हैं-
मुरली बाज उठी अघातां
मैंनु भुल गईयां सभ बातां
लग गए अन्हद बाण नियारे
चुक गए दुनीयादे कूड पसारे
असी मुख देखण दे वणजारे
दूयां भुल गईयां सभ बातां

असां हुण चंचल मिर्ग फहाया
ओसे मैंनूं बन्ह बहाया
हर्ष दुगाना उसे पढ़ाया
रह गईयां दो चार रुकावटां

बुल्ले शाह मैं ते बिरलाई
जद दी मुरली कान्ह बजाई
बौरी होई ते तैं वल धाई
कहो जी कित वल दस्त बरांता

बुल्ले शाह हिन्दू-मुसलमान और ईश्वर-अल्लाह में कोई भेद नहीं मानते थे. इसलिए वे कहते हैं-
की करदा हुण की करदा
तुसी कहो खां दिलबर की करदा।
इकसे घर विच वसदियां रसदियां नहीं बणदा हुण पर्दा
विच मसीत नमाज़ गुज़ारे बुतख़ाने जा सजदा
आप इक्को कई लख घरां दे मालक है घर-घर दा
जित वल वेखां तित वल तूं ही हर इक दा संग कर दा
मूसा ते फिरौन बणा के दो हो कियों कर लडदा
हाज़र नाज़र ख़ुद नवीस है दोज़ख किस नूं खडदा
नाज़क बात है कियों कहंदा ना कह सकदा ना जर्दा
वाह-वाह वतन कहींदा एहो इक दबींदा इस सडदा
वाहदत दा दरीयायो सचव, उथे दिस्से सभ को तरदा
इत वल आये उत वल आये, आपे साहिब आपे बरदा
बुल्ले शाह दा इश्क़ बघेला, रत पींदा गोशत चरदा

बुल्ले शाह समाज के सख़्त नियमों को ग़ैर ज़रूरी मानते थे. उनका मानना था कि इस तरह के नियम व्यक्ति को सांसारिक बनाने का काम करते हैं. वे तो ईश्वर को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता। वे कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
जात मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी

बुल्लेशाह का मानना था कि ईश्वर धार्मिक आडंबरों से नहीं मिलता, बल्कि उसे पाने का सबसे सरल और सहज मार्ग प्रेम है. वे कहते हैं-
इश्क़ दी नवियों नवी बहार
फूक मुसल्ला भन सिट लोटा
न फड तस्बी कासा सोटा
आलिम कहन्दा दे दो होका
तर्क हलालों खह मुर्दार
उमर गवाई विच मसीती
अंदर भरिया नाल पलीती
कदे वाहज़ नमाज़ न कीती
हुण कीयों करना ऐं धाडो धाड।
जद मैं सबक इश्क़ दा पढिया
मस्जिद कोलों जियोडा डरिया
भज-भज ठाकर द्वारे वडिया
घर विच पाया माहरम यार
जां मैं रमज इश्क़ दा पाई
मैं ना तूती मार गवाई
अंदर-बाहर हुई सफ़ाई
जित वल वेखां यारो यार
हीर-रांझा दे हो गए मेले
भुल्लि हीर ढूंडेंदी बेले
रांझा यार बगल विच खेले
मैंनूं सुध-बुध रही ना सार
वेद-क़ुरान पढ़-पढ़ थक्के
सिज्दे कर दियां घर गए मथ्थे
ना रब्ब तीरथ, ना रब्ब मक्के
जिन पाया तिन नूर अंवार।
इश्क़ भुलाया सिज्दे तेरा
हुण कियों आईवें ऐवैं पावैं झेडा
बुल्ला हो रहे चुप चुपेरा
चुक्की सगली कूक पुकार
बुल्लेशाह अपने मज़हब का पालन करते हुए भी साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से परे थे. वे कहते हैं-
मैं बेक़ैद, मैं बेक़ैद
ना रोगी, न वैद
ना मैं मोमन, ना मैं काफ़र
ना सैयद, ना सैद

बुल्ले शाह का कहना था कि ईश्वर मंदिर और मस्जिद जैसे धार्मिक स्थलों का मोहताज नहीं है. वह तो कण-कण में बसा हुआ है। वे कहते हैं-
तुसी सभनी भेखी थीदे हो
हर जा तुसी दिसीदे हो
पाया है किछ पाया है
मेरे सतगुर अलख लखाया है
कहूं बैर पडा कहूं बेली है
कहूं मजनु है कहूं लेली है
कहूं आप गुरु कहूं चेली है
आप आप का पंथ बताया है
कहूं महजत का वर्तारा है
कहूं बणिया ठाकुर द्वारा है
कहूं बैरागी जटधारा है
कहूं शेख़न बन-बन आया है
कहूं तुर्क किताबां पढते हो
कहूं भगत हिन्दू जप करते हो
कहूं घोर घूंघट में पडते हो
हर घर-घर लाड लडाया है
बुल्लिआ मैं थी बेमोहताज होया
महाराज मिलिया मेरा काज होया
दरसन पीया का मुझै इलाज होया
आप आप मैं आप समाया है
कृष्ण और राम का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं-
ब्रिन्दाबन में गऊआं चराएं
लंका चढ़ के नाद बजाएं
मक्के दा हाजी बण आएं
वाहवा रंग वताई दा
हुण किसतों आप छपाई दा

उनका अद्वैत मत ब्रह्म सर्वव्यापी है. वे कहते हैं-
हुण किस थी आप छपाई दा
किते मुल्ला हो बुलेन्दे हो
किते सुन्नत फ़र्ज़ दसेन्दे हो
किते राम दुहाई देन्दे हो
किते मथ्थे तिलक लगाई दा
बेली अल्लाह वाली मालिक हो
तुसी आपे अपने सालिक हो
आपे ख़ल्कत आपे ख़ालिक हो
आपे अमर मारूफ़ कराई दा
किधरे चोर हो किधरे क़ाज़ी हो
किते मिम्बर ते बेह वाजी हो
किते तेग बहादुर गाजी हो
आपे अपना कतक चढाई दा
बुल्ले शाह हुण सही सिंझाते हो
हर सूरत नाल पछाते हो
हुण मैथों भूल ना जाई दा
हुण किस तों आप छपाई दा

बुल्ले शाह का मानना था कि जिसे गुरु की शरण मिल जाए, उसकी ज़िन्दगी को सच्चाई की एक राह मिल जाती है. वे कहते हैं-
बुल्ले शाह दी सुनो हकैत
हादी पकड़िया होग हदैत
मेरा मुर्शिद शाह इनायत
उह लंघाए पार
इनायत सभ हूया तन है
फिर बुल्ला नाम धराइया है

भले ही बुल्ले शाह की धरती अब पाकिस्तान हो, लेकिन भारत में भी उन्हें उतना ही माना जाता है, जितना पाकिस्तान में. अगर यह कहा जाए कि बुल्ले शाह भारत और पाकिस्तान के महान सूफ़ी शायर होने के साथ इन दोनों मुल्कों की सांझी विरासत के भी प्रतीक हैं तो ग़लत न होगा. आज भी पाकिस्तान में बुल्ले शाह के बारे में कहा जाता है कि 'मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह'.

0 comments |

दूसरों की क़द्र करनी चाहिए

Author: Admin Labels:: ,


एक सूफ़ी अपने मक़तब में लड़कों को पढ़ा रहे थे. उसी समय उनके एक पंडित मित्र आए, जिनके नंगे शरीर पर केवल जनेऊ पड़ी हुई थी. मस्तक पर तिलक आदि लगाए हुए थे. धोती पहन रखी थी. उनके पैरों में खडाऊं थी. सिर पर मोटी सी चोटी थी.
उन्हें देखकर सूफ़ी जी का एक शिष्य मुस्कराने लगा.
सूफ़ी जी ने पंडित जी से बातचीत की और जब पंडित जी चले गए, तब सूफ़ी ने अपने उस शिष्य से जो मुस्करा रहा था कहा, तुम यहां से निकल जाओ, मैं तुम्हें नहीं पढ़ाऊंगा.
शिष्य ने कहा कि मुझसे क्या ग़लती हुई है?
सूफ़ी ने कहा तुम जानते हो, तुमने क्या ग़लती की है.
शिष्य ने बहुत विनती की और कहा मुझे आप न निकालें, जो सज़ा चाहें दे दें.
तब सूफ़ी ने कहा कि एक ही रास्ता है. तुम कल उसी वेश से आओ जैसे आज पंडित जी आए थे और चार धाम की यात्रा करो, तब मेरे पास आओ. फिर मैं तुम्हें शिष्य के रूप में स्वीकार करूंगा.
शिष्य ने ऐसा ही किया और तब सूफ़ी ने उसे अपना शिष्य स्वीकार किया.
दूसरों के विश्वासों और धार्मिक मान्यताओं को सम्मान देना हम सब का कर्तव्य है.
-असग़र वज़ाहत

0 comments |

खाना...

Author: Admin Labels:: , , , ,


एक बुज़ुर्ग फ़रमाते हैं कि मैं एक मस्जिद में नमाज़ अदा करने गया. वहां मैंने देखा कि एक मालदार ताजिर (व्यापारी) बैठा हैं और क़रीब ही एक फ़क़ीर दुआ मांग रहा हैं-
"या अल्लाह तआला, आज मैं इस तरह का खाना और इस क़िस्म का हलवा खाना चाहता हूं".
ताजिर ने ये दुआ सुनकर बदगुमानी करते हुए कहा- "अगर ये मुझसे कहता तो मैं इसे ज़रूर खिलाता, मगर ये बहाना साज़ी कर रहा है और मुझे सुनाकर अल्लाह तआला से दुआ कर रहा है, ताकि मैं सुनकर इसे खिला दूं, वल्लाह मैं तो इसे नहीं खिलाऊंगा".
वो फ़क़ीर दुआ से फ़ारिग़ होकर एक कोने में सो गया. कुछ देर बाद एक शख़्स ढका हुआ तबाक़ लेकर आया और दायें बायें देखता हुआ फ़क़ीर के पास गया और उसे जगाने के बाद वो तबाक़ ब सद आजिज़ी उसके सामने रख दिया. ताजिर ने ग़ौर से देखा, तो ये वही खाने थे जिनके लिए फ़क़ीर ने दुआ की थी. फ़क़ीर ने ख़्वाहिश के मुत़ाबिक़ इसमें से खाया और बाक़ी खाना वापस कर दिया.
ताजिर ने खाना लाने वाले शख़्स को अल्लाह तआला का वास्ता देकर पूछा- "क्या तुम इन्हें पहले से जानते हो"?
खाना लाने वाले शख़्स ने जवाब दिया- "ब खुदा, हरगिज़ नहीं, मैं एक मज़दूर हूं, मेरा जमाई और बेटी साल भर से इन खानों की ख़्वाहिश रखते थे, मगर मुहैया नहीं हो पाते थे. आज मुझे मज़दूरी में एक मिस्क़ाल (यानी साढ़े चार माशा) सोना मिला, तो मैंने उससे गोश्त वग़ैरह ख़रीदा और घर ले आया. मेरी बीवी खाना पकाने में मसरूफ़ थी कि इस दौरान मेरी आंख लग गई. आंखें तो क्या सोईं, सोई हुई क़िस्मत अंगड़ाई लेकर जाग उठी. मुझे ख़्वाब में सरवरे-दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का जलवा-ए-ज़ैबा नज़र आ गया और हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने अपने मुबारक लबों को जुम्बिश दी और फ़रमाया-
"आज तुम्हारे इलाक़े में अल्लाह तआला का एक वली आया हुआ है. उसका क़याम मस्जिद में है, जो खाने तुमने अपने बीवी बच्चों के लिए तैयार करवाए हैं, उन खानों की उसे भी ख़्वाहिश है. उसके पास ले जाओ वो अपनी ख़्वाहिश के मुत़ाबिक़ खाकर वापस कर देगा, बक़िया में अल्लाह तआला तेरे लिए बरकत अता फ़रमाएगा और मैं तुम्हारे लिए जन्नत की ज़मानत देता हूं".
नींद से उठकर मैंने हुक्म की तामील की, जिसे तुमने भी देखा.
वो ताजिर कहने लगा- "मैंने इन्हें इन्हीं खानों के लिए दुआ मांगते सुना था. तुमने इन खानों पर कितनी रक़म ख़र्च की"?
उस शख़्स ने जवाब दिया- "मिस्क़ाल भर सोना".
उस ताजिर ने पेशकश की- क्या ऐसा हो सकता हैं कि मुझसे दस मिस्क़ाल सोना ले लो और उस नेकी में मुझेभी हिस्सेदार बना लो"?
उस शख़्स ने कहा- "ये नामुमकिन है".
ताजिर ने इज़ाफ़ा करते हुए कहा- "अच्छा मैं तुझे बीस मिस्क़ाल सोना दे देता हूं".
उस शख़्स ने अपने इंकार को दोहराया. फिर उस ताजिर ने सोने की मिक़दार बढ़ाकर पचास फिर सौ मिस्क़ाल कर दी, मगर वो शख़्स अपने इंकार पर डटा रहा और कहने लगा- "वल्लाह, जिस शै की ज़मानत रसूले-अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दी है, अगर तू उसके बदले सारी दुनिया की दौलत भी दे दे फिर भी मैं उसे फ़रोख़्त नहीं करूंगा, तुम्हारी क़िस्मत में ये चीज़ होती, तो तुम मुझसे पहले कर सकते थे".
ताजिर निहायत नादिम और परेशान होकर मस्जिद से चला गया, गोया उसने अपनी क़ीमती चीज़ खो दी हो.

0 comments |

सूफ़ी की दावत

Author: Admin Labels:: ,



एक बहुत बड़े सूफ़ी को उनके एक शागिर्द ने खाने पर बुलाया. सूफ़ी साहब ने शागिर्द से पूछा, तुमने मेरे खाने के लिए क्या इंतज़ाम किया है. शागिर्द ने सब बताया. सूफी साहब ने कहा, क्या तुमने शराब का बंदोबस्त किया है? शागिर्द हैरान हो गया. सूफ़ी साहब ने कहा, क्या तुमको नहीं मालूम कि मै शराब पीता हूं. ख़ैर, शराब मंगाई गई और खाने के साथ रखी गई. सूफ़ी साहिब ने शराब को हाथ नहीं लगाया.
शागिर्द ने पूछा, हुज़ूर शराब क्यों नही पी रहे? सूफ़ी साहब ने कहा, मै शराब नहीं पीता. शागिर्द को और हैरानी हुई. उसने कहा तब आपने शराब क्यों मंगवाई? सूफ़ी साहिब ने कहा, अगर तुमने शराब न मंगवाई होती, तो मै खाना न खाता. शागिर्द ने पूछा , क्यों? इस पर सूफ़ी साहिब ने कहा कि इससे ये साबित होता कि तुम्हारे दिल में उन लोगों के लिए कोइ जगह नहीं है जिनके यक़ीन (विश्वास/आस्था) तुम्हारे यक़ीन के उलटे ( विपरीत) हैं, बरअक्स है.
-असग़र वज़ाहत

0 comments |

इबादत करने का बेहतरीन दिन

Author: Admin Labels:: ,


किसी शख़्स ने एक सूफ़ी से पूछा कि इबादत करने का बेहतरीन दिन कौन-सा है?
इस पर सूफ़ी ने जवाब दिया कि मौत से एक दिन पहले.
उस शख़्स ने कहा कि मौत का तो कोई वक़्त नहीं है.
फिर सूफ़ी ने कहा कि ज़िंदगी का हर दिन आख़िरी समझो और इबादत करो.


0 comments |

अल्फ्रेड नोबेल ने ग़लती सुधार ली

Author: Admin Labels:: ,


डायनामाईट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु की जब अफ़वाह उडी, और अगले दिन सारे अख़बारों में यही हेडलाइन छपी तो हस्बे मामूल अल्फ्रेड नोबेल ने भी यह ख़बरें पढ़ीं. ख़बरों की हेडिंग कुछ इस तरह से थी-   "बारूद का शहंशाह दुनिया से रुखसत" "मौत का सौदागर ख़ुद मौत की आगोश में" इत्यादि.....
नोबेल को अचानक एहसास हुआ कि उनकी मौत के बाद उन्हें लोग ऐसे याद रखेंगे? और अगले दिन नोबेल ने इस " नोबेल अवार्ड" का मन बनाया जिसमे अल्फ्रेड नोबेल की संपत्ति (उस समय लगभग 500 मिलियन डॉलर और मृत्यु के समय 900 मिलियन डॉलर) पूरी बैंक में रखी जानी थी और उसका इंटरेस्ट हर साल भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और मेडिकल फील्ड में 'मानव जाti का उद्धार' करने वाले आविष्कारों और आविष्कारकों को दिया जाएगा.
अल्फ्रेड नोबेल को वक़्त मिल गया था अपनी ग़लती सुधारने का... सबको नहीं मिलता.
-हैदर रिज़वी

0 comments |

ज़िन्दगी कैसे जियें

Author: Admin Labels:: ,


हम चाहते हैं कि हम ऐसी ज़िन्दगी जियें कि हमारी मौत के बाद कोई ये न कह सके कि हमने जानबूझ कर उसे तकलीफ़ पहुंचाई थी या उसका दिल दुखाया था... हालांकि अनजाने में इंसान से ऐसी न जाने कितनी ग़लतियां हो जाती होंगी, जिससे दूसरों को दुख पहुंचता होगा...
दरअसल, हमारी मौत के बाद लोग हमें किस तरह याद रखेंगे... अगर हम ये सोच कर अपनी ज़िन्दगी गुज़ारें, तो शायद बेहतर ज़िन्दगी जी सकते हैं..
-फ़िरदौस ख़ान

0 comments |

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

List

Popular Posts

Followers

Follow by Email

Translate

Powered by Blogger.

Search This Blog

इस बलॊग में इस्तेमाल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं
banner 1 banner 2