आयतुल कुर्सी की फ़ज़ीलत

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* बिस्तर पर लेटते वक़्त आयतुल कुर्सी पढ़ने वाले के साथ अल्लाह पाक की तरफ़ से एक हिफ़ाज़त करने वाला होता है और सुबह होने तक शैतान उसके क़रीब नहीं आता.[बुख़ारी]
* जिस घर में आयतुल कुर्सी पढ़ी जाती है, वहां से शैतान और हर नुक़सान पहुंचाने वाली चीज़ दूर हो जाती है. [अहमद]
* सुबह के वक़्त आयतुल कुर्सी पढ़ने वाला शाम तक और शाम के वक़्त आयतुल कुर्सी पढ़ने वाला सुबह तक शैतान से महफ़ूज़ रहता है. [नसाई]
* हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद आयतुल कुर्सी पढ़ने वाला जन्नत में जाएगा. [नसाई]
* फ़र्ज़ नमाज़ के बाद आयतुल कुर्सी पढ़ने वाला दूसरी नमाज़ तक अल्लाह पाक की हिफ़ाज़त में होता है. [तबरानी]
* आयतुल कुर्सी में इस्म-ए-आज़म है. [हाकिम]
* आयतुल कुर्सी तमाम आयतों की सरदार है. [हाकिम]
* आयतुल कुर्सी क़ुरआन मजीद के एक चौथाई हिस्से के बराबर है. [अहमद]

* घर से निकलते वक़्त पढोगे, तो 70 हज़ार फ़रिश्ते हर तरफ़ से आपकी हिफ़ाज़त करेंगे.
* घर में दाख़िल होते वक़्त पढोगे, तो आपके घर से मोहताजी दूर होगी !
* वुजू के बाद पढोगे, तो आपके 70 दर्जे बुलंद होंगे.

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दरूद-ए- अकसीर-ए-आज़म

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Durood-e-Akseer-e-Azam
अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन
Courtesy yaallah

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दरूद-ए-अकबर शरीफ़

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Durood-e-Akbar Shareef
अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन
Courtesy yaallah

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दरूद लखी

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एक बार दरूद लखी पढ़ने का सवाब एक लाख दरूद शरीफ़ के बराबर होता है, इसलिए इसे दरूद लखी कहा जाता है.







Durood-e-Lakhi Shareef
अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन
Courtesy yaallah

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दरूद तनजीना

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दरूद तनजीना की फ़ज़ीलत

अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन

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दरूद ताज

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दरूद ताज की फ़ज़ीलत
Durood-e-Taj Shareef
अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन
Courtesy yaallah

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दरूद के मसायल

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दरूद का मतलब
अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते हैं. ऐ ईमानवालो ! तुम भी उन पर दरूद व सलाम भेजो.(सूरह अहज़ाब 33/56)

अल्लाह के नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम पर दरूद भेजने का मतलब रहमत नाज़िल करना है और फ़रिश्ते या मुसल्मानों का आप पर दरूद भेजने का मतलब रहमत की दुआ करना हैं.

* हज़रत अबू हुरैरा रज़ि. से रिवायत है कि नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- तुममे से कोई शख़्स जब तक अपनी नमाज़ की जगह पर जहां उसने नमाज़ पढ़ी है, बैठा रहे और उसका वुज़ु न टूटे तब तक फ़रिश्ते उस पर दरूद भेजते रहते हैं और यूं कहते हैं – ऐ अल्लाह ! इसे बख़्श दे, इस पर रहम फ़रमा. (अबू दाऊद)

हज़रत आयशा रज़ि. से रिवायत है कि नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया – सफ़ के दाईं तरफ़ के लोगों पर अल्लाह रहमत नाज़िल करता है और फ़रिश्ते उसके लिए रहमत की दुआ करते हैं. (अबू दाऊद)

तमाम नबियों पर दरूद भेजने का हुक्म 
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. कहते हैं के नबी के अलावा किसी पर दरूद न भेजो. अलबत्ता मुसलमान मर्दों और औरतों के लिए इस्तिग़फ़ार करो. (इसे काज़ी इस्माईल ने फ़ज़लुस्सलात अलन्नबिय्यि में रिवायत किया है.)
दरूद की फ़ज़ीलत
* हज़रत अनस रज़ि से रिवायत हैं के नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया – जिसने मुझ पर एक बार दरूद भेजा अल्लाह उस पर 10 बार रहमतें नाज़िल करेगा, उसके 10 गुनाह माफ़ करेगा और 10 दर्जे बुलन्द करेगा. (निसाई)

* हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ि. से रिवायत है कि नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया – जो मुझ पर कसरत से दरूद भेजता है, क़यामत के दिन वो मेरे सबसे क़रीब होगा. (तिर्मिज़ी)

* हज़रत अबी बिन काअब रज़ि. से रिवायत है कि मैंने नबी सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम से कहा – ऐ अल्लाह के रसूल ! मैं आप पर कसरत से दरूद भेजता हूं, मै अपनी दुआ में से कितना वक़्त दरूद के लिए छोड़ूं? आपने फ़रमाय – जितना तू चाहे. मैंने कहा- एक चौथाई सही है. आपने फ़रमाया – जितना तू चाहे, लेकिन अगर इससे ज़्यादा करे, तो तेरे लिए अच्छा है. मैंने कहा कि आधा वक़्त अगर छोड़ूं. आपने फ़रमाया – जितना तू चाहे, लेकिन अगर इससे ज़्यादा करे, तो तेरे लिए अच्छा है. मैंने कहा कि तो तिहाई वक़्त अगर छोडू़ं. आपने फ़रमाया – जितना तू चाहे, लेकिन अगर इससे ज़्यादा करे, तो तेरे लिए अच्छा है. मैंने कहा- मैं अपना सारा दुआ का वक़्त दरूद के लिए रख छोड़ता हूं. इस पर आप सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया– ये तेरे सारे दुखों और मुसीबतों के लिए काफ़ी होगा और तेरे गुनाह की माफ़ी का सबब होगा. (तिर्मिज़ी)

अल्लाह हम सबको कसरत से दरूद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन
Courtesy islam-the-truth

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शिजरा

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फ़िरदौस ख़ान
लोग अकसर शिजरे की बात करते हैं... हमारा ताल्लुक़ फ़लां ख़ानदान से है, उसका फ़लां से है... हम आला ज़ात के हैं और फ़लां कमतर ज़ात का है...
हमारा एक ही जवाब है- हमारा ताल्लुक़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम है, जो जन्नत में रहा करते थे...
हम ही क्या दुनिया के हर इंसान का ताल्लुक़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम है... इसलिए ख़ुद को आला और दूसरे को कमतर समझना अच्छी बात नहीं है...

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कलमा

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मेरे मौला !
पहले ज़ुबां पर
कलमे की  तरह
उसका नाम रहता था...
लेकिन
अब शामो-सहर ज़ुबां पर
सिर्फ़ और सिर्फ़
कलमा ही रहता है.…
वो इश्क़े-मजाज़ी था
और
ये इश्क़े-हक़ीक़ी है…
-फ़िरदौस ख़ान 

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मेरे मौला

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मेरे मौला
मुझे तेरी दोज़ख़ का ख़ौफ़ नहीं
और ना ही
तेरी जन्नत की कोई ख़्वाहिश है
मैं सिर्फ़ तेरी इबादत ही नहीं करती
तुझसे मुहब्बत भी करती हूं
मुझे फ़िरदौस नहीं, मालिके-फ़िरदौस चाहिए
क्यूंकि
मेरे लिए तू ही काफ़ी है
अल्लाह तू ही तू...
-फ़िरदौस ख़ान

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खाने में नख़रे

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फ़िरदौस ख़ान
हम खाना खाते वक़्त हज़ार नख़रे करते हैं... हमें ये सब्ज़ी पसंद नहीं, हमें वो सब्ज़ी पसंद नहीं... दूध पीने के मामले में भी सौ नख़रे... मां से कितनी ही मिन्नतें करवाने के बाद दूध पीते हैं... अमूमन हर आम घर की ये कहानी है...
लेकिन हम ये नहीं जानते कि इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें न तो पेट भरने के लिए रोटी मिलती है और न ही पीने के लिए साफ़ पानी... करोड़ों लोग हर रोज़ भूखे पेट सोते हैं... दुनिया भर में लोग भूख से मर रहे हैं...
लाखों बच्चों को दूध तो क्या, पीने के लिए पेटभर उबले चावल का पानी तक नसीब नहीं होता... और भूख से बेहाल बच्चे दम तोड़ देते हैं...
अल्लाह ने जो दिया है, उसका शुक्र अदा करके उसे ख़ुशी-ख़ुशी खा लेना चाहिए... क्या हुआ अगर एक दिन घर में हमारी पसंद की सब्ज़ी नहीं बनी है तो...

तस्वीर गूगल से साभार

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ग़ुरूर

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फ़िरदौस ख़ान
कोई बड़े बंगले में रहता है, कोई छोटे से मकान में... कोई मिट्टी के कच्चे घर में, कोई छप्पर तले, कोई झुग्गी-झोपड़ी में, किसी को अपनी एक अदद छत तक नसीब नहीं है...
तो क्या बड़े बंगले में रहने वाले को ख़ुद पर ग़ुरूर होना चाहिए... ? क्या उसे नाज़ करने का कोई हक़ नहीं, जिसके पास रहने के लिए बड़ा बंगला नहीं है...
आख़िर में सभी को ख़ाक में ही मिल जाना है... फिर ग़ुरूर किस बात का... और क्यों...? 

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फ़िज़ूलख़र्ची

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खाओ और पियो और फ़िज़ूलख़र्ची न करो, क्योंकि अल्लाह फ़िज़ूलख़र्ची करने वालों को दोस्त नहीं रखता (सूरह आराफ़ 31)

जहां एक तरफ़ करोड़ों लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं, वहीं इतने ही लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी का इस्तेमाल करके इसे बर्बाद करने पर आमादा हैं. जब हम पानी पैदा नहीं कर सकते, तो फिर हमें इसे बर्बाद करने का क्या हक़ है? हमें यह समझना होगा कि पानी पर सबका हक़ है. अगर हम किफ़ायत से पानी का इस्तेमाल करें, तो उस बचे पानी से किसी और का गला तर हो सकता है. पानी ही हर बूंद क़ीमती है, इसलिए पानी फ़िज़ूल न बहाएं... उन लोगों के बारे में सोचें, जिन्हें पीने तक के लिए साफ़ पानी मयस्सर नहीं.
फ़िरदौस ख़ान
तस्वीर गूगल से साभार

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सजदा...

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मेरे मौला
मेरा एक सजदा
तो ऐसा हो
जो तुझे पसंद आ जाए...
-फ़िरदौस ख़ान 

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HOT

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एक बाअख़्लाक माशरे (सभ्य समाज) में जो चीज़ें वाहियात मानी जाती हैं... आज वही फ़ैशन बन रही हैं... एक लफ़्ज़ है HOT... आज इसका इस्तेमाल तारीफ़ के लिए ख़ूब किया जाता है... लानत है ऐसी तारीफ़ पर...
फ़ेसबुक पर HOT पेज ख़ूब पसंद किए जाते हैं... हैरत तो इस बात की होती है कि ख़ुद को मज़हबी बताने वाले लोग जहां कवर पेज पर मज़हबी तस्वीर लगाते हैं, स्टेटस में मज़हबी बातें लिखते हैं, लेकिन पसंद उनकी भी यही HOT पेज होते हैं...
भाइयो ! HOT तो जहन्नुम भी है... जाना चाहोगे... नहीं न...

दुख होता है ये देखकर कि ख़ुद को मुसलमान कहने वाले इस मामले में सबसे आगे रहते हैं... भाइयों अल्लाह के लिए, उसके प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम)के लिए अपने दीन का कुछ तो पास रखें...

Allah humma ajirni minan naar
Ameen

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह 80 हिजरी कूफ़ा में पैदा हुए. नाम नोमान रखा गया. (अलख़ैरात अलहस्सान, अज़ अल्लामा शहाबुद्दीन अहमद बिन हिज्र मक्की रहमतुल्लाह अलैह).
नाम व नस्ब
नोमान बिन साबित बिन नोमान बिन महर ज़बान बिन साबित बिन यज़्द गर्द बिन शहरयार बिन परवेज़ बिन नौशेरवां और ये सिलसिला आगे जाकर हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम के वास्ते से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिल जाता है, जो आपकी शाने-रिफ़अत व अज़मत के लिए काफ़ी है.
तालीम
इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह इब्तेदाई तालीम हासिल करने के बाद तिजारत की तरफ़ मुतवज्जा हो गए थे, मगर उसी दरमियान एक रात आपने ख़्वाब में हुज़ूर नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाल जहांआरा की ज़ियारत फ़रमाई. हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया- ऐ अबु हनीफ़ा ! अल्लाह तअला ने तुम्हें मेरी सुन्नत के इज़हार के लिए पैदा किया है, तो दुनिया की किनाराकशी इख़्तियार ना करो. (तज़किरतुल अवलिया सफ़्हा- 126)
इन्हीं दिनों आप किसी काम से जा रहे थे कि इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि से मुलाक़ात हो गई. उन्होंने आपसे दरियाफ़्त फ़रमाया कि तुम किस दर्सगाह में पढ़ते हो? आपने फ़रमाया- मैं कपड़े की तिजारत करता हूं. इस पर इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया- मैं तुम में क़ाबिलियत के जौहर देख रहा हूं. तुम उल्मा की सोहबत में बैठो और इल्म हासिल करो. ( सीरतुल नोमान)
हज़रत हम्माद जिनका सिलसिला तलम्मुज़ हज़रत अबदुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हा से मिलता है, उस वक़्त बिलइत्तेफ़ाक़ कूफ़ा की सबसे बड़ी दर्सगाह उन्हीं की थी. वहीं आपने पढ़ना शुरू कर दिया. (अनवारे इमामे-आज़म, मर्तबा अल्लामा मंशा ताबिश क़ुसूरी, लाहौर)
इमामे आज़म का हुस्ने सुलूक
हज़रत सैय्यदना इमामे आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह निहायत रहम दिल थे. हर किसी के साथ निहायत ही फ़ैय्याज़ाना सुलूक फ़रमाते. चुनांचे मनक़ूल है कि आपके पड़ौस में एक मोची रहता था, जो निहायत ही आवारा क़िस्म का आदमी था. दिन भर तो मेहनत व मज़दूरी करता. शाम को जब काम से लौटता तो शराब और गोश्त ख़रीद लाता. रात जब कुछ ढल जाती, तो उसी की तरह कुछ और आवारा लोग उसके घर जमा हो जाते और ये अपने हाथों से कबाब बनाता और शराब का दौर चलता. फिर रक़्स व सरोद की महफ़िल गर्म होती, शोर शराबा होता, जिससे हज़रत इमामे -आज़म की इबादत में ख़लल वाक़े होता था. लेकिन यही उस शख़्स के रोज़ाना का मामूल था. हज़रत इमाम कमाल दर्जा का सब्र फ़रमाते और कुछ ना कहते. एक रात मोची और उसके दोस्तों की आवाज़ ना सुनाई दी. फ़ज्र के बाद आपने लोगों से दरयाफ़्त किया कि हमारे पड़ौस में जो मोची रहता है, क्या बात है कि रात उसकी आवाज़ सुनने को नहीं मिली? लोगों ने बताया कि कल रात कोतवाल और उसके कारिंदे जब मोची के घर के पास से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने मोची के घर से काफ़ी शोर व शराबा सुना. इस वजह से उसे गिरफ़्तार कर लिया गया है. ये सुनकर आप बहुत ग़मगीन हुए और सीधे दारुल एमारः गवर्नर कूफ़ा के पास पहुंचे. गवर्नर ईसा बिन मूसा ने तशरीफ़ आवरी का सबब दरयाफ़्त किया. आपने फ़रमाया- मेरे पड़ौस में एक मोची रहा करता है, जिसे कल रात कोतवाल गिरफ़्तार कर लाया है. मैं उसकी सिफ़ारिश के लिए आया हूं, उसे रिहा कर दिया जाए. उसी वक़्त गवर्नर ने हुक्म दिया और मोची को छोड़ दिया गया. जब आप लौटने लगे, तो मोची भी आप के साथ हो लिया. उसके दिल पर आपके सुलूक का ऐसा असर हुआ कि वो सच्चे दिल से ताएब हो गया और हज़रत की सोहबत में रहने लगा. यहां तक कि लोग उसे फ़कीह के मुअज़्ज़िज़ लक़ब से पुकारने लगे. (अलख़ैरात अलहस्सान)
इमामे-आज़म और तिजारत
हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह कूफ़ा में कपड़े के बड़े ताजिर थे और आप का कारोबार निहायत ही वसी पैमाने पर था. आपका माले तिजारत दूर दराज़ इलाक़ों में भी भेजा करते थे. ज़रूरी अशिया बाहर से मंगवाते भी थे. तिजारत व कारोबार में सच्चाई और दियानतदारी का ऐसा ख़्याल रखते थे कि इसकी मिसाल कम ही इस ज़मीन पर मिल सकती है. एक मर्तबा का वाक़िया है कि आपने दुकान से कहीं जाते वक़्त कपड़ों का थान नौकर के सुपुर्द किया और फ़रमाया- अगर कोई उसे ले, तो उसे कपड़ों का ऐबदार होना बता देना. फिर जब आप दुकान पर वापस आए, तो देखा कि कपड़े बिक चुके हैं. आपने मुलाज़िम से दरयाफ़्त फ़रमाया कि तुमने इन कपड़ों का ऐबदार होना ख़रीदने वाले को बता दिया था. इस पर ख़ादिम ने नेदामत का इज़हार करते हुए कहा कि मैं भूल गया था, मुझे याद ही ना था. इस पर इमाम साहब ने कपड़ों की पूरी क़ीमत जिसकी मालियत तीस हज़ार दिरहम थी, सदक़ा फ़रमा दी. अल्लाहो अकबर क्या इससे बढ़कर भी कोई दियानतदारी का सबूत पेश कर सकता है.
इमामे-आज़म और इबादत
हज़रत इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म रहमतुल्लाह अलैह ने चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी. रात भर आप क़ुरान शरीफ़ पढ़ा करते थे और ख़ौफ़े-ख़ुदा से इस क़द्रर रोते थे कि आप के हमसायों को आप पर रहम आता था.
हज़रत इमाम के शागिर्द हज़रत क़ाज़ी इमाम अबु यूसुफ़ फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म हर रात और दिन में एक ख़त्म क़ुरान पढ़ा करते थे और रमज़ान शरीफ़ में (दिन और रात मिला कर) बासठ क़ुरान ख़त्म फ़रमाया करते थे. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
हज़रत मिसअर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म फ़ज्र से इशा तक तदरीसी कामों और इफ़्ता वग़ैरह में मसरूफ़ रहते थे. एक मर्तबा मैंने सोचा कि आख़िर आप इबादत कब करते हैं, उसे मालूम किया जाए. इस नीयत से मैं इस खोज में लग गया. जब रात हुई और लोग इशा की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर सो गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमामे-आज़म मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और पूरी रात फ़ज्र तक इबादत में गुज़ार दी. फिर फ़ज्र की नमाज़ के बाद हसबे-मामूल आप तदरीसी कामों में मसरूफ़ हो गए. यहां तक कि फिर रात आ गई, तो मैंने देखा कि आप मस्जिद आकर इबादत में मसरूफ़ हो गए. फिर सुबह हुई, तो अपने मुआमलात की तरफ़ मुतवज्जा हुए.
मैंने दिल में ख़्याल किया कि दो रातें तो हज़रत इमाम ने निशात के साथ इबादत में गुज़ार दी हैं. अब देखा जाए कि क्या करते हैं. चुनांचे मैंने देखा कि हसबे-मामूल आपने फिर पूरी रात इबादत में गुज़ार दी. इस पर मैंने ये अज़्म किया कि ज़िंदगी भर मैं ऐसे इबादतगुज़ार की सोहबत ना छोड़ूंगा, जो दिनों को रोज़े रखता है और रात को बेदार रहकर अल्लाह की इबादत में गुज़ारता है. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
इमामे-आज़म और ख़ुदातरसी
इमामे-आज़म के अंदर ख़शीयते-इलाही का वाफ़र हिस्सा मौजूद था. अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का नाम सुनते ही आप पर लर्ज़ा तारी हो जाता था. चुनांचे हज़रत यज़ीद बिन लैस बयान करते हैं कि एक मर्तबा इशा की जमात में इमाम ने इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पढ़ी. हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा जमात में शरीक थे. जब सारे लोग नमाज़ से फ़ारिग़ होकर चले गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा फ़िक्र में डूबे हुए हैं और ठंडी सांस ले रहे हैं. मैंने ख़्याल किया कि मेरी वजह से हज़रत के ज़िक्र व फ़िक्र में कोई ख़लल वाक़े ना हो. चिराग़ जलता हुआ छोड़कर आहिस्तगी के साथ मस्जिद से निकल गया. फ़ज्र के वक़्त जब मैं मस्जिद पहुंचा, तो देखा कि आप अपनी दाढ़ी पकड़े हुए हैं और इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पूरी सूरत की तिलावत फ़रमा रहे हैं और निहायत ही रक्तअंगेज़ और दर्द भरी आवाज़ में कह रहे हैं, ऐ मेरे मालिक व ख़ालिक़ ! जो ज़र्रा भर नेकी का अच्छा बदला देने वाला है और ज़र्रा भर बुराई की सज़ा देने वाला है अपने बंदे-नोमान को आग और उसके अज़ाब से बचाना और अपने जवाज़े-रहमत में दाख़िल फ़रमाना. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 86)
इसी तरह एक दिन मस्जिद के इमाम ने फ़ज्र की नमाज़ में ये आयते-करीमा पढ़ी ( तर्जुमा), तुम हरगिज़ अल्लाह ताला को इससे बेख़बर ना समझना, जो कुछ ज़ालिम करते हैं. ये सुनना था कि हज़रत हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के जिस्म पर ख़ौफ़े-ख़ुदा की वजह से लर्ज़ा तारी हो गया, जिसे नमाज़ में शरीक लोगों ने भी महसूस किया. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 89)
तारीख़ विसाल
हज़रत इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह का विसाल सत्तर बरस की उम्र में 2 शाबानुल मोअज़्ज़म 150 हिजरी में हुआ. जामा मस्जिद बग़दाद में आपका आस्ताना मुबारका मरज्जा ख़लाइक़ है.
Hazrat imam abu hanifa (R.A.)
साभार

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खाना

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हम खाना खाते वक़्त हज़ार नख़रे करते हैं... हमें ये सब्ज़ी पसंद नहीं, हमें वो सब्ज़ी पसंद नहीं... दूध पीने के मामले में भी सौ नख़रे... मां से कितनी ही मिन्नतें करवाने के बाद दूध पीते हैं... अमूमन हर आम घर की ये कहानी है...
लेकिन हम ये नहीं जानते कि इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें न तो पेट भरने के लिए रोटी मिलती है और न ही पीने के लिए साफ़ पानी... करोड़ों लोग हर रोज़ भूखे पेट सोते हैं... दुनिया भर में लोग भूख से मर रहे हैं...
लाखों बच्चों को दूध तो क्या, पीने के लिए पेटभर उबले चावल का पानी तक नसीब नहीं होता... और भूख से बेहाल बच्चे दम तोड़ देते हैं...
अल्लाह ने जो दिया है, उसका शुक्र अदा करके उसे ख़ुशी-ख़ुशी खा लेना चाहिए... क्या हुआ अगर एक दिन घर में हमारी पसंद की सब्ज़ी नहीं बनी है तो...
(Firdaus Diary)

तस्वीर गूगल से साभार

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मरने के बाद भी सवाब का सिलसिला जारी रखें

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प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया ” कि जो शख्स अल्लाह की रज़ा के लिए मस्जिद की तामीर करता है, अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त उसके बदले में उस शख़्स को जन्नत में उसकी पसंद का घर अता फ़रमाएंगे

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86 सूर: अत-तारीक़

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 17 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1.  आसमान और रात को आने वाले की क़सम
2. क्या तुमको मालूम है रात को आने वाला क्या है
3. वह चमकता हुआ तारा है
4. ऐसा कोई शख़्स नहीं, जिस पर निगरानी करने वाला मुक़र्रर नहीं
5. इंसान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा हुआ
6. वह उछलते हुए पानी से पैदा हुआ
7. जो कमर और पसलियों के बीच से निकलता है
8. बेशक ख़ुदा उसे दोबारा पैदा करने की ताक़त रखता है
9. जिस दिन दिलों के भेद परखे जाएंगे
10. तब उसका न ज़ोर चलेगा और न कोई मददगार होगा
11. चक्कर खाने वाले आसमान की क़सम
12. और फटने वाली (ज़मीन की क़सम)
13. बेशक ये क़ुरआन क़ौले-फ़ैसल है
14. यह कोई हंसी-मज़ाक़ नहीं
15. बेशक ये काफ़िर चालें चल रहे हैं
16. और मैं अपनी तदबीर कर रहा हूं
17. तो काफ़िरों को मोहलत दो, बस उन्हें थोड़ी-सी मोहलत दो
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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87 सूर: अल-आला

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 19 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. अपने आलीशान परवरदिगार की तस्बीह करो
2. जिसने हर चीज़ को पैदा किया
3. जिसने दुरुस्त किया और सही राह दिखाई
4. जिसने चारा उगाया
5. फिर उसे सुखा कर काले रंग का कूड़ा कर दिया
6. हम तुम्हें पढ़ा देंगे, फिर तुम भूलोगे नहीं
7. मगर वही होता है, जो ख़ुदा चाहता है. बेशक वह हर ज़ाहिरी और छुपी बात को जानता है
8. और हम तुमको आसान तरीक़े की तौफ़ीक़ देंगे
9. जहां तक समझना मुफ़ीद हो, समझते रहो
10. जो डरता है, वो जल्द समझ जाएगा
11. और बदबख़्त उससे कतराएगा
12. जो भड़कती आग में दाख़िल होगा
13. फिर वह न मरेगा, न जियेगा
14. वह कामयाब हो गया, जिसने ख़ुद को पाक रखा
15. और अपने परवरदिगार का ज़िक्र करता रहा और नमाज़ पढ़ता रहा
16. मगर तुम दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह देते हो
17. हालांकि आख़िरत कहीं बेहतर और बाक़ी रहने वाली है
18. बेशक यही बात पहले की किताबों में भी है
19. इब्राहीम और मूसा की किताबों में भी
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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88 सूर: अल-गाशीयह

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 26 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. क्या तुम्हें उस छा जाने वाली मुसीबत (क़यामत) के बारे में मालूम है
2. उस दिन बहुत से चेहरे ज़लील और रुसवा होंगे
3. कड़ी मशक़्क़त करने वाले
4. थके मांदे दहकती हुई आग में दाख़िल होंगे
5. उन्हें एक ख़ौलते हुए चश्मे का पानी पिलाया जाएगा
6. कंटीली झाड़ी के सिवा उनके लिए कोई खाना नहीं
7. जो न जिस्म को लगेगा, न भूख मिटाएगा
8. बहुत से चेहरे उस दिन तरो-ताज़ा होंगे
9. अपनी कोशिश पर ख़ुश
10. एक आलीशान बाग़ में
11. वहां कोई फ़िज़ूल बात नहीं सुनेंगे
12. उसमें चश्मे जारी होंगे
13. उसमें ऊंचे-ऊंचे तख़्त बिछे होंगे
14. और गिलास रखे होंगे
15. और गाव तकिये क़तार की क़तार लगे होंगे
16. और हर तरफ़ क़ालीन बिछी होगी
17. फिर क्या वे ऊंट की तरफ़ नहीं देखते कि कैसा बनाया गया है
18. और आसमान की तरफ़ कि कैसा बुलंद बनाया गया है
19. और पहाड़ों की तरफ़ कि कैसे खड़े किए गए हैं
20. और ज़मीन की तरफ़ कि किस तरह बिछाई गई है
21. अच्छा तो तुम नसीहत करते रहो, तुम तो नसीहत करने वाले हो
22. तुम उन पर कोई दरोग़ा नहीं हो
23. हां जिसने मुंह फेर लिया
24. तो अल्लाह उसे बड़ा अज़ाब देगा
25. बेशक उनको हमारी तरफ़ लौट कर आना है
26. फिर उनका हिसाब हमारे ज़िम्मे है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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89 सूर: अल-फ़ज्र

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 30 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. सुबह की क़सम
2. और दसों रातों की
3. और ज़ुफ़्त और ताक़ की
4. और रात की जब आने लगे
5. अक़्लमंद के लिए तो ज़रूर बड़ी क़सम (काफ़िरों पर ज़रूर अज़ाब होगा)
6. क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे आद के साथ क्या किया
7. यानी इरम वाले दराज़ के साथ
8. उन जैसे लोग (दुनिया के) तमाम शहरों में पैदा ही नहीं हुए
9. और समूद के साथ (क्या किया), जो वादी (क़रा) में पत्थर तराश के घर बनाते थे
10. और फ़िर फ़िरऔन के साथ (क्या किया), जो (सज़ा के लिए) मेख़े रखता था
11. ये लोग मुख़तलिफ़ शहरों में सरकश हो रहे थे
12. और उनमें बहुत से फ़साद फैला रहे थे
13. तो तुम्हारे परवरदिगार ने उन पर अज़ाब का कोड़ा लगाया
14. बेशक तुम्हारा परवरदिगार ताक में है
15. लेकिन जब इंसान को उसका परवरदिगार इज़्ज़त और नेअमत देकर आज़माता है, तो वह कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज़्ज़त दी
16. लेकिन जब उसकी रोज़ी को तंग करके आज़माता है, तो वह कहता है कि मुझे ज़लील किया
17. हरगिज़ नहीं, बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो
18. और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते हो
19. और मीरारा के माल को समेट कर चख जाते हो
20. और माल को बहुत ही अज़ीज़ रखते हो
21. सुनो, जब ज़मीन कूट-कूट कर रेज़ा-रेज़ा कर दी जाएगी
22. और तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म और फ़रिश्ते क़तार के क़तार आ जाएंगे
23. और उस दिन जहन्नुम सामने कर दी जाएगी, उस दिन इंसान चौंकेगा, मगर अब चौंकना कहां (फ़ायदा देगा)
24. (उस वक़्त) कहेगा कि काश मैंने अपनी (इस) ज़िन्दगी के लिए कुछ पहले भेजा होता
25. उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा
26. और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा
27. (और कुछ लोगों से कहेगा) ऐ इत्मीनान पाने वाली जान
28. अपने परवरदिगार की तरफ़ चल, तू उससे ख़ुश, वह तुझसे राज़ी
29. तो मेरे (ख़ास) बन्दों में शामिल हो जा
30. और मेरे बहिश्त में दाख़िल हो जा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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90 सूर: अल-बलद

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 20 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. मुझे इस शहर (मक्का) की क़सम
2. और तुम इसी शहर में रहते हो
3. और (तुम्हारे) बाप (आदम) और उसकी औलाद की क़सम
4. हमने इंसान को मशक़्क़त में (रहने वाला) पैदा किया है
5. क्या वह ये समझता है कि उस पर क़ाबू न पा सकेगा
6. वह कहता है कि मैंने ढेरों माल उड़ा दिया
7. क्या वह ये ख़्याल रखता है कि उसको किसी ने देखा ही नहीं
8. क्या हमने उसे दोनों आंखें और ज़बान
9.और दो लब नहीं दिए (ज़रूर दिए)
10. और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं
11. फिर वह घाटी पर से होकर (क्यों) नहीं गुज़रा
12. और तुमको क्या मालूम की घाटी क्या है
13. किसी (की) गर्दन का (ग़ुलामी या क़र्ज़ से) छुड़ाना
14. या भूख के दिन रिश्तेदार, यतीम या ख़ाकसार
15. मोहताज को
16. खाना खिलाना
17. फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता, जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे
18. यही लोग ख़ुशनसीब हैं
19. और जिन लोगों ने हमारी आयतों से इंकार किया है, यही लोग बदबख़्त हैं
20. कि उनको आग में डालकर हर तरफ़ से बंद कर दिया जाएगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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91 सूर: अश-शम्स

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 15 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. सूरज की क़सम और उसकी रौशनी की
2. और चांद की, जब उसके पीछे निकले
3. और दिन की, जब उसे चमका दे
4. और रात की, जब उसे ढंक ले
5. और आसमान की और जिसने उसे बनाया
6. और ज़मीन की, जिसने उसे बिछाया
7. और जान की जिसने उसे दुरुस्त किया
8. फिर उसकी बदकारी और परहेज़गारी को उसे समझा दिया
9. (क़सम है) जिसने उसको (गुनाह से) पाक रखा, वह तो कामयाब हुआ
10. और जिसने उसे (गुनाह करके) दबा दिया, वह नामुराद रहा
11. क़ौम मसूद ने अपनी सरकशी से (सालेह पैग़म्बर को) झुठ्लाया
12. जब उनमें का एक बड़ा बदबख़्त उठ खड़ा हुआ
13. तो ख़ुदा के पैग़म्बर (सालेह) ने उनसे कहा कि ख़ुदा की ऊंटनी और उसे पानी पिलाने में कोताही न करना
14. मगर उन लोगों ने पैग़म्बर को झुठलाया और उसकी कूंचें काट डालीं, तो ख़ुदा ने उन पर अज़ाब नाज़िल करके हिसाब बराबर कर दिया
15. और उसको उनके बदले का ख़ौफ़ तो है नहीं
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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92 सूर: अल-लैल

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 21 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. रात की क़सम जब (सूरज को) छुपा ले
2. और ख़ूब चमकते दिन की क़सम
3. और उस (ज़ात) की क़सम जिसने नर और मादा को पैदा किया
4. बेशक तुम्हारी कोशिश तरह तरह की है
5. तो जिसने सख़ावत की और अच्छी बात की तस्दीक की
6. तो हम उसके लिए राहत और आसानी
7.  (जन्नत) के असबाब मुहैया कर देंगे
8. और जिसने कंजूसी की और बेपरवाई की
9. और अच्छी बात को झुठलाया
10. तो हम उसे सख़्ती (जहन्नुम) में पहुंचा देंगे
11. और जब वह हलाक होगा, तो उसका माल उसके कुछ भी काम न आएगा
12. बेशक हम राह दिखाते हैं
13. और आख़िरत और दुनिया ख़ास हमारी चीज़ें हैं
14. तो तुम्हें हमने भड़कती हुई आग से डरा दिया
15. उसमें बस वही दाख़िल होगा, जो बदबख़्त है
16. जिसने झुठलाया और मुंह फेर लिया और जो बड़ा परहेज़गार है
17. वह उससे बचा लिया जाएगा
18. जो अपना माल (ख़ुदा की राह में) देता है, ताकि पाक हो जाए
19. और हाल ये है कि किसी का उस पर कोई अहसान नहीं, जिसका बदला दिया जाता है
20. बल्कि (वह) सिर्फ़ अपने आलीशान परवरदिगार की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए देता है
21. और वह अनक़रीब ख़ुश भी हो जाएगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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93 सूर: अज़-ज़ुहा

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. चढ़ते दिन की क़सम
2. और अंधेरी रात की क़सम
3. तुम्हारे परवरदिगार न तुम्हें छोड़ा और न तुमसे नाराज़ हुआ
4. और तुम्हारे लिए आख़िरत दुनिया से यक़ीनन कहीं बेहतर है
5. और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़द्र अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ
6. क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबु तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)
7. और तुम्हें राह से अनजान देखा, तो मंज़िले-मक़सूद तक पहुंचा दिया
8. और तुम्हें ज़रूरतमंद पाया, तो ग़नी कर दिया
9. तो तुम भी यतीम पर सितम न करना
10. मांगने वाले को झिड़की न देना
11. और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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94 सूर: अल- इंशिराह

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 8 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. क्या हमने तुम्हारा सीना इल्म से कुशादा नहीं कर दिया (ज़रूर किया)
2. और तुम पर से वह बोझ उतार दिया
3. जिसने तुम्हारी कमर तोड़ रखी थी
4. और तुम्हारा ज़िक्र भी बुलंद कर दिया
5. बेशक दुश्वारी के साथ ही आसानी है
6. यक़ीनन दुश्वारी के साथ आसानी है
7. जब तुम फ़ारिग़ हो जाओ, तो मुक़र्रर कर दो
8. और फिर अपने परवरदिगार से लौ लगाओ
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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95 सूर: अत-तीन

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 8 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. इंजीर और जैतून की क़सम
2. और तूर सीनीन की
3. और उस अमन वाले शहर (मक्का) की
4. हमने इंसान को बेहतरीन रूप में पैदा किया
5. फिर हमने उसे (बूढ़ा करके) पस्त से पस्त हालत की तरफ़ फेर दिया
6. मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे, उनके लिए तो बेइंतेहा अज्र और सवाब हैं
7. तो इन दलीलों के बाद (रोज़े) जज़ा के बारे में कौन झुठला सकता है
8. क्या ख़ुदा सबसे बड़ा हाकिम नहीं है (हां, ज़रूर है)
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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96 सूर: अल- अलक़

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 19 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. अपने परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो, जिसने पैदा किया है
2. उसने इंसान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया, पढ़ो
3. और तुम्हारा परवरदिगार बड़ा करीम है
4. जिसने क़लम के ज़रिये तालीम दी
5. उसने इंसान को वो बातें बताईं, जिन्हें वे जानता ही नहीं था
6. सुनो, इंसान ख़ुद को ग़नी देखता है
7. इसलिए वह सरकश हो जाता है
8. बेशक तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ (सबको) लौटना है
9. भला तुमने उस शख़्स को देखा है
10. जो नमाज़ पढ़ने वाले बन्दे को रोकता है
11. भला देखो, अगर ये राहे-हक़ पर हो या परहेज़गारी का हुक्म करे
12. तो रोकना कैसा
13. भला देखो तो, अगर उसने (सच्चे को) झुठला दिया और (उसने) मुंह फेरा
14. (तो नतीजा क्या होगा) क्या उसको ये मालूम नहीं है कि ख़ुदा यक़ीनन देख रहा है
15. देखो, अगर वह बाज़ न आएगा, तो हम चोटी पकड़ के घसीटेंगे
16. झूठे क़ुसूरवार की चोटी
17. वह भी अपने हिमायतियों को बुलाए, हम भी जल्लाद फ़रिश्ते को बुलाएंगे
18. देखो, हरगिज़ उनका कहना न मानना
19. और सजदे करते रहो और क़ुर्ब हासिल करो (सजदा)
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान



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97 सूर: अल- कद्र

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 5 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. हमने क़ुरआन को शबे-क़द्र में नाज़िल करना शुरू किया
2. और तुमको क्या मालूम शबे-क़द्र क्या है
3. शबे-क़द्र मरतबा और अमल में हज़ार महीनों से बेहतर है
4. इसमें फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की हर बात) का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाज़िल होते हैं
5. ये रात सुबह होने तक सलामती है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान


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98 सूर: अल-बैयिनह

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 8 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. अहले-किताब और मुशरिकों से जो लोग काफ़िर थे, जब तक कि उनके पास खुली हुई दलीलें न पहुंचे, वे (अपने कुफ़्र से) बाज़ आने वाले नहीं थे
2. ख़ुदा के रसूल जो पाक औराक़ पढ़ते हैं
3. उनमें पुरज़ोर और ज़बरदस्त आयतें लिखी हुई हैं
4. अहले-किताब मुताफ़र्रिक़ हुए भी, तो जब उनके पास खुली हुई दलील आ चुकी
5. तब उन्हें ये हुक्म दिया गया था कि सिर्फ़ उसी का एतक़ाद रखके बातिल से परहेज़ कर ख़ुदा की इबादत करे और पाबंदी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्ची दीन है
6. बेशक अहले-कितान और मुशरेकीन सेजो लोग (अब तक) काफ़िर हैं, वे दोज़ख़ की आग में होंगे, हमेशा उसी में रहेंगे, यही लोग सबसे बुरे हैं
7. बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे, यही लोग सबसे अच्छे लोग हैं
8. उनकी जज़ा उनके परवरदिगार के पास सदाबहार बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी. उनमें वे हमेशा रहेंगे. ख़ुदा उनसे राज़ी और वे ख़ुदा से ख़ुश. ये ख़ास उनके लिए है, जो अपने परवरदिगार से डरें
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान


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99 सूर: अज़-ज़िल्ज़ाल

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 8 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगी
2. और अपने के बोझे निकाल डालेगी
3. और एक इंसान कहेगा कि इसे क्या हो रहा है
4. और उस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगी
5. क्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसे हुक्म दिया होगा
6. उस दिन लोग अपनी अपनी क़ब्रों से निकलेंगे, ताकि अपने आमाल को देखें
7. तो जिस इंसान ने ज़र्रा बराबर नेकी की, वह उसे देख लेगा
8. और जिस इंसान ने ज़र्रा बराबर बदी की, तो उसे देखेगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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100 सूर: अल-आदियात

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. सरपट दौड़ने वाले घोड़ों की क़सम
2. जो नथनों से फ़र्राटे लेते हैं
3. फिर पत्थर पर टाप मारकर चिंगारियां निकालते हैं, फिर सुबह को छापा मारते हैं
4. (तो दौड़धूप से) बुलंद कर देते हैं
5. फिर उस वक़्त (दुश्मन के) दिल में घुस जाते हैं
6. बेशक इंसान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है
7. और यक़ीनी ख़ुदा भी उससे वाक़िफ़ है
8. और बेशक वह माल का सख़्त हरीस है
9. तो क्या वह ये नहीं जानता कि जब मुर्दे क़ब्रों से निकाले जाएंगे
10. और दिलों के राज़ ज़ाहिर कर देंगे
11. बेशक उस दिन उनका परवरदिगार उनसे ख़ूब वाक़िफ़ होगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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101 सूर: अल-क़ारीअह

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 11 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. खड़खड़ाने वाली
2. वह खड़खड़ाने वाली क्या है
3. और तुमको क्या मालूम कि वह खड़खड़ाने वाली क्या है
4. जिस दिन लोग (मैदाने-हश्र में) टिड्डियों की तरह फैले होंगे
5. और पहाड़ धुनी हुई रुई की तरह हो जाएंगे
6. तो जिनके (नेक आमाल) के पल्ले भारी होंगे
7. वे मनचाहे ऐश में रहेंगे
8. और जिनके आमाल के पल्ले हल्के होंगे
9. और उनका ठिकाना न रहा
10. और तुमको क्या मालूम हाविया क्या है
11. वह दहकती हुई आग है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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102 सूर: अत-तकासूर

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 8 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. कुल और ज़्यादा माल ने तुम लोगों को ग़ाफ़िल कर रखा है
2. यहां तक कि तुम लोगों ने क़ब्रें देखीं
3. देखो तुमको जल्द ही मालूम हो जाएगा
4. फिर देखो तुमको जल्द ही मालूम हो जाएगा
5. देखो अगर तुमको यक़ीनी तौर पर मालूम होता (तो हरगिज़ ग़ाफ़िल न होते)
6. तुम लोग ज़रूर दोज़ख़ को देखोगे
7. फिर तुम यक़ीनी तौर पर देखोगे
8. फिर तुमसे नेअमतों के बारे में पूछा जाएगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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103 सूर: अल-अस्र

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 3 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. अस्र की नमाज़ की क़सम
2. बेशक इंसान घाटे में है
3. सिवाय उन लोगों के जो लोग ईमान लाए, और नेक काम करते रहे और एक दूसरे को हक़ की ताक़ीद और सब्र की वसीयत करते रहे
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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104 सूर: अल-हुमज़ह

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 9 आयतें हैं.
 अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. हर ताना देने वाले चुग़लख़ोर की ख़राबी है
2. जो माल जमा करता है और गिन-गिन कर रखता है
3. वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा रखेगा
4. हरगिज़ नहीं, वह तो ज़रूर हुतमा में डाला जाएगा
5. क्या तुमको मालूम है हुतमा क्या है
6. वह अल्लाह की दहकाई हुई आग है, जो (तलवों से) दिलों तक चढ़ जाएगी
7. ये लोग आग के लंबे-लंबे सुतूनों में
8. डाल कर बंद कर दिए
9. जाएंगे
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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105 सूर: अल-फ़ील

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 5 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे परवरदिगार ने हाथी वालों के साथ क्या किया
2. क्या उसने उनकी तमाम तदबीरें नाकाम नहीं कर दीं
3. और उन पर चिड़ियों के झुंड के झुंड भेज दिए
4. जो उन पर कंकरीले पत्थर फेंकती थीं
5. और उन्हें चबाये हुए भूस की तरह कर दिया
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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106 सूर: अल-क़ुरैश

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 4 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. क़ुरैश को सर्दी और जर्मी के सफ़र ने मानूस कर दिया है
2. उन्हें मानूसी कर देने की वजह से
3.  उन्हें काबा के मालिक की इबादत करनी चाहिए
4. जिसने भूख में उन्हें खाना दिया और ख़ौफ़ से निजात दी
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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107 सूर: अल-माऊन

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 7 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. क्या तुमने उस शख़्स को देखा है, जो रोज़े-जज़ा को झुठलाता है
2. यह तो वही है, जो यतीम को धक्के देता है
3. और मोहताजों को खिलाने के लिए लोगों को आमादा नहीं करता
4. उन नमाज़ियों की तबाही है
5. जो अपनी नमाज़ से ग़ाफ़िल रहते हैं
6. जो दिखावे के लिए काम करते हैं
7. रोज़मर्रा की मामूली चीज़ें भी औरों को बरतने के लिए नहीं देते
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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108 सूर: अल-कौसर

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 3 आयतें हैं.
 अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. ऐ रसूल, हमने तुमको कौसर अता किया
2. तुम अपने परवरदिगार की नमाज़ पढ़ा करो
3. और क़ुर्बानी दिया करो, बेशक तुम्हारा दुश्मन बेऔलाद रहेगा
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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109 सूर: अल-काफ़िरून

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 6 आयतें हैं.
 अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. ऐ रसूल, तुम कह दो कि ऐ काफ़िरों
2. तुम जिन चीज़ों की पूजा करते हो, मैं उनकी पूजा नहीं करता
3. और मैं जिस ख़ुदा की इबादत करता हूं, तुम उसकी इबादत नहीं करते
4. और जिनकी तुम पूजा करते हो, मैं उनकी पूजा नहीं करूंगा
5. और जिसकी मैं इबादत करता हूं, तुम उसकी इबादत नहीं करोगे
6. तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन, मेरे लिए मेरा दीन
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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110 सूर: अल-नस्र

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मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 3 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. ऐ रसूल, जब ख़ुदा की मदद आ पहुंचेगी
2. और मक्का फ़तेह हो जाएगा, तो तुम देखोगे कि लोगों के गिरोह के गिरोह ख़ुदा के दीन में शामिल हो रहे हैं
3. तुम अपने परवरदिगार की तारीफ़ करो और मग़फ़िरत की दुआ मांगो. बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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111 सूर: अल-लहब

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 5 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. अबु लहब के दोनों हाथ टूट गए और वह ख़ुद तबाह हो गया
2. न उसका माल काम आया और वह, जो उसने कमाया
3. वह बहुत भड़कती आग में दाख़िल होगा
4. और उसकी बीवी भी, जो सिर पर ईंधन उठाये फिरती है
5. और उसके गले में बटी हुई रस्सी होगी

.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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112 सूर: अल-इख़लास

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मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 4 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. कहो, ख़ुदा एक है
2. ख़ुदा बरहक़ बेनियाज़ है
3. न उसने किसी को पैदा किया और न उसे किसी ने पैदा किया
4. और उसका कोई साथी नहीं है
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान

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113 सूर: अल-फ़लक़

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 5 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1.  कहो, मैं सुबह के मालिक की पनाह मंगता हूं
2. हर चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की
3. और अंधेरी रात की बुराई से, जब अंधेरा छा जाए
4. और झाड़-फूंक करने वालों की बुराई से
5. और हसद करने वालों की बुराई से
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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114 सूर: अल-नास

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मक्का या मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 6 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1.  कहो, मैं पनाह मांगता हूं परवरदिगार की
2. इंसानों के बादशाह की
3. इंसानों के माबूद की
4. उस वसवसे डालने वाले शैतान की बुराई से, जो ख़ुदा का नाम सुन कर पीछे हट जाता है
5. जो लोगों के दिलों में वसवसे डालता है
6. जो जिन्नात में से भी होता है और इंसानों में से भी
.......
हमने क़ुरआन करीम को आम ज़ुबान में पेश करने की कोशिश की है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग क़ुरआन को पढ़ सकें, समझ सकें और उन तक क़ुरआन का पैग़ाम पहुंच सके. तर्जुमा आलिमों का ही है.
-फ़िरदौस ख़ान 

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सदक़ा...

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels:: , , ,


सिर्फ़ रुपये-पैसे देना ही सदक़ा नहीं हुआ करता. अल्लाह को ख़ुश करने का हर अमल सदक़ा है. हर वो काम सदक़ा है, जिससे दूसरों का भला हो. सदक़े में बहुत-सी चीज़ें शामिल हैं.
प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया-
मोमिन का हर अच्छा अमल सदक़ा है. (बुख़ारी)
आपने फ़रमाया-
* लोगों के दरमियान इंसाफ़ करना सदक़ा है, किसी को जानवर पर चढ़ने में मदद करना सदक़ा है. किसी का सामान उठा * देना सदक़ा है, अच्छी बात कहना सदक़ा है, नमाज़ की ओर क़दम बढ़ाना सदक़ा है, रास्ते में से नुक़सादेह चीज़ों को हटाना सदक़ा (बुख़ारी)
* शौहर का अपनी बीवी को घर के कामकाज में मदद करना भी सदक़े में शुमार होगा.
* अपने मोमिन भाई कि ओर देखकर मुस्कराना भी सदक़ा है ( तिरमिजि)

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया-  क़यामत के दिन मोमिन के सदक़ात उसके लिए छांव बनेंगे (तिरमिजी)
सलफ़ सालेहीन ने कहा-
* सदक़ा अल्लाह के गु़स्से को ठंडा करता है
* सदक़ा गुनाहों का कफ़्फ़ारा है
* सदक़ा तकलीफ़-मुसीबत दुर करता है
* सदक़ा हिदायत मिलने या हिदायत में इज़ाफ़ा होने का सबब है

यानी हर नेक काम सदक़ा है... किसी को दुआ देना सदक़ा है. इसी तरह इल्म सिखाना भी सदक़ा है.
किसी ज़रूरतमंद की मदद करना भी सदक़ा ही है.
किसी को अच्छा मशविरा देना भी सदक़ा है
किसी को अपना वक़्त देना भी सदक़ा है.
किसी को तरबियत देना भी सदक़ा है.
मुश्किल वक़्त में हौसला या तसल्ली देना भी सदक़ा है.
नेकी की राह दिखाना भी सदक़ा है.
बुराई से रोकना भी सदक़ा है.
किसी भटके हुए को रास्ता बताना भी सदक़ा है.
किसी प्यासे को पानी पिलाना भी सदक़ा है.
किसी भूखे को खाना खिलाना भी सदक़ा है.
परिन्दों के लिए दाना-पानी रखना भी सदक़ा है.
नरमी से बात करना भी सदक़ा है.
माफ़ करना भी सदक़ा है.
किसी की ख़ुशी में शामिल होना भी सदक़ा है.
बीमार की तीमारदारी करना भी सदक़ा है.
बीमार की ख़ैरियत पूछना भी सदक़ा है.
मुस्कराहट से मिलना भी सदक़ा है.

आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए.
-फ़िरदौस ख़ान


तस्वीर गूगल से साभार

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अल्लाह और रोज़ेदार

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एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहिवसल्लम) की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें , भूखे पेट,  इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा.
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों  का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.
एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहिवसल्लम) की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें , भूखे पेट, इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा.
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.

नोट : ये तहरीर राहे-हक़ के लिए भाई  Sahil Khan​  ने भेजी है. जज़ाक अल्लाह.
तस्वीर गूगल से साभार

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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