शेख़ज़ादी का वाक़िया
Author: Admin Labels:: फ़िरदौस ख़ान की क़लम से, शेख़ज़ादी का वाक़ियाये अल्लाह का एक बहुत बड़ा मौजिज़ा था. ऐसे थीं हमारी अम्मी. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे, आमीन
(शेख़ज़ादी का वाक़िया)
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
اهدِنَــــا الصِّرَاطَ المُستَقِيمَ Show us the straight path हमें सही राह चला (Al Quran)
मैं तुम्हें एक तरीक़ा बताता हूं, जो मेरे लिए बहुत कारगर साबित हुआ और जिससे मैं अपने अल्लाह से रिश्ते पर ज़्यादा ध्यान देने लगा हूं।
क़ब्र डरावनी है, ज़ाहिर है कि नेक लोगों के अलावा।
मैंने इसके बारे में सोचा, और अब मेरी उम्र 54 साल है। और मैं दुनिया से और उसकी चीज़ों से तंग आ चुका हूं। अच्छा, तो जब मैं क़ब्र में जाकर अकेला रहूंगा, सैकड़ों-हज़ारों साल तक, तो मैं क्या करूंगा?
क्या तुमने कभी इसका तसव्वुर किया है?
इसलिए मैंने इन तरीक़ों पर अमल करना शुरू किया-
देखो, मैं मर जाऊंगा, और मेरे पास एक ख़ाली, बिल्कुल अंधेरी क़ब्र होगी।
इस क़ब्र को सामान की ज़रूरत होगी, इसलिए मैं हर इस्तग़फ़ार को ऐसे तसव्वुर करने लगा, जैसे मैं उसे अपनी क़ब्र की तरफ़ भेज रहा हूं, ताकि वो वहां मेरा इंतज़ार करे और मेरी तन्हाई का साथी बने।
अल्लाह की क़सम, मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा।
मैंने अपनी क़ब्र को पूरी तरह सजाने का अमल शुरू कर दिया है।
क़ब्र के एक कोने को मैं हज़ारों तस्बीहात से भर रहा हूं।
यहां मेरे सिर के क़रीब कम से कम तीन सौ ख़त्म-ए-क़ुरआन होंगे, जो मेरे लिए आरामदेह बिस्तर की वजह बनेंगे।
हर रुकू को मैं यह सोचकर अदा करता हूं कि मैं उसे क़ब्र में अपना ज़ख़ीरा बना रहा हूं।
हर कोई मुझे छोड़कर अपने घर चला जाएगा, और मैं अकेला रह जाऊंगा, शायद हज़ारों सालों तक। मेरे बच्चे कुछ सालों में मुझे भूल चुके होंगे।
इसलिए मुझे क़ब्र में साथियों, रौशनी और जन्नत जैसे मंज़रों की ज़रूरत होगी।
मैं तस्बीहात, ज़िक्र, क़ुरआन, नमाज़ और सदक़ा—सबको अपने साथ तसव्वुर करता हूं कि वो मेरे दोस्त होंगे, मेरे साथ वहां मुस्कुरा रहे होंगे और बातें कर रहे होंगे।
नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद पढ़ना मैंने अपने मामूलात का अहम हिस्सा बना लिया है। यह वहां हमारी महफ़िलों में भी शामिल होगा—ठंडे पानी की तरह, ख़ूबसूरत लिबास की तरह।
मैं यह चाहता हूं कि मेरी क़ब्र की ज़िन्दगी इस दुनिया की ज़िन्दगी से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हो, इंशाअल्लाह।
क्या यह बेहतर नहीं है कि मैं वहां जाकर ग़ीबत, चुग़ली, हसद और दूसरे दुनियावी गुनाहों के नतीजे में बदबूदार लिबास, दीमक लगे फ़र्नीचर और सख़्त पथरीले बिस्तर के बजाय अपनी क़ब्र को बेहतरीन चीज़ों से सजाकर रखूं?
मैंने दुनिया में अपना घर बनाने के लिए सारी ज़िन्दगी कड़ी मेहनत की, लेकिन यह घर तो मेरे वारिसों का हो जाएगा। असल में तो मेरी सारी मेहनत अपने लिए है ही नहीं, सारे फ़ायदे तो और लोग उठाएंगे। फिर मैंने सोचा कि बस बहुत हो गया, मुझे अपना घर बनाना है, जहां सिर्फ़ मैं ही रहूंगा और लम्बा वक़्त गुज़ारना है।
अगर मेरे सारे आमाल दुनिया की ज़रूरतों के लिए थे और अपनी क़ब्र के लिए कुछ भी नहीं था, तो फिर मेरी क़ब्र के घर के लिए सिवाय अज़ाब के फ़र्नीचर, हमेशा का अंधेरा और सख़्त हिसाब के अलावा कुछ भी नहीं होगा। और मैं ऐसे घर में अकेला कैसे रहूंगा?
मेरी आपको भी नसीहत है कि आज से अपनी क़ब्र को अपना बैंक अकाउंट बनाओ। इसमें ज़्यादा से ज़्यादा नेकियां जमा करो और लम्बे वक़्त वाली पॉलिसी लो।
अपनी इबादतों का ख़ूब ख़्याल रखो। अल्लाह की क़सम, जब तुम क़ब्र में होगे, तो तुम मुझे वहां से भी शुक्रिया अदा करोगे।
अपनी क़ब्र के घर का इस दुनिया के घर से ज़्यादा ख़्याल रखो।
अभी तुम अपने घरवालों के बीच हो, पहन रहे हो, खा-पी रहे हो, आराम से सो रहे हो, और तुम्हारी सारी ज़रूरतें पूरी हो रही हैं, फिर भी तुम अपनी हालत से ख़फ़ा रहते हो, हर वक़्त शिकायत करते रहते हो।
तो सोचो, जब तुम ज़मीन के नीचे होगे और सैकड़ों-हज़ारों सालों तक होगे, तो वहां तुम्हारे साथ कौन होगा?
तुम्हारे पसंदीदा सियासदां, खिलाड़ी, अदाकार, ताजिर— ये तो तुम्हें यहां भी नहीं जानते, और न ही इन्हें तुम्हारी इतनी फ़िक्र है। तुम ही इनके पीछे बेवक़ूफ़ों की तरह अपना वक़्त बर्बाद करते हो।
तुम्हारे वो बच्चे जिनकी शादियों पर तुम लाखों रुपये फ़िज़ूल ख़र्च कर देते हो— यक़ीन करो, यह ख़र्च तुम्हारे लिए बोझ बन चुका होगा, और बच्चे मुकर जाएंगे कि हमारे बाप और माँ ने ख़ुद अपने लिए और हमारे लिए मुसीबत खड़ी की।
इसलिए आज से अपनी जान की फ़िक्र करो, अपना ख़्याल ख़ुद रखो।
ऐ अल्लाह, हमें हुस्न-ए-ख़ातिमा अता फरमा।
आमीन, आमीन, आमीन
ऐ अल्लाह, हमारी आख़िरत को बेहतर बना दे और हमें क़ब्र के अज़ाब से बचा।
आमीन, आमीन, आमीन या अल्लाह
ऐ अल्लाह, हमें अपना ज़िक्र, शुक्र और हुस्न-ए-इबादत की तौफ़ीक़ अता फ़रमा, ताकि तू हम पर अपनी रज़ा और जन्नतुल फ़िरदौस में नेमतें नाज़िल करे, जहां हम तेरे नबी मुहम्मद मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत में हों।
आमीन, सुम्मा आमीन, अल्लाहुम्मा आमीन
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चादर ओढ़ा करते थे. उनका ये पहनावा अल्लाह को बहुत पसंद था. इसलिए क़ुरआन पाक में अल्लाह ने अपने महबूब को ‘या अय्योहल मुदस्सिर’ यानी चादर ओढ़ने वाले कहकर पुकारा है.
رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:
“اگر تم میں سے کوئی اچھا خواب دیکھے تو خوش ہو اور صرف اس کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہے۔”
حوالہ: صحیح مسلم ، حدیث نمبر: 5902
اس حدیث میں رسول اللہ ﷺ نے اچھے خواب کے بارے میں رہنمائی فرمائی ہے، یعنی اگر کسی شخص کو کوئی اچھا اور خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو اسے چاہیے کہ وہ اللہ کا شکر ادا کرے اور خوش ہو، لیکن اس خواب کو ہر کسی کے سامنے بیان کرنے کے بجائے صرف ایسے شخص کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہو اور اس کے لیے خیر خواہ ہو، کیونکہ حسد یا غلط تعبیر کا اندیشہ بھی ہو سکتا ہے، اس سے یہ سبق ملتا ہے کہ مسلمان کو چاہیے کہ وہ اچھے خواب کو اللہ کی نعمت سمجھے اور اسے مناسب لوگوں کے ساتھ ہی بیان کرے، مثال کے طور پر اگر کسی کو کوئی نیک یا خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو وہ اپنے قریبی اور خیر خواہ شخص کو بتا سکتا ہے تاکہ وہ اس کے لیے دعا کرے یا اچھی تعبیر بیان کرے، یہ حدیث ہمیں یہ بھی سکھاتی ہے کہ اسلام انسان کو زندگی کے ہر معاملے میں حکمت اور احتیاط اختیار کرنے کی تعلیم دیتا ہے۔
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जब अमानत उठ जाए, तो क़यामत क़ायम होने का इंतज़ार कर.
एक देहाती ने कहा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ईमानदारी उठने का क्या मतलब है?
एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहिवसल्लम की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें, भूखे पेट, इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा.
मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.
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