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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "इशराक़ की नमाज़ तौबा करने वालों की नमाज़ है.
(सही मुस्लिम 748) 



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अव्वाबीन की नमाज़

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अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जिसने मग़रिब की नमाज़ के बाद छह रकअतें अव्वाबीन की पढ़ीं, उसे बारह साल की इबादत का सवाब मिलेगा."   
(सुनन तिर्मिज़ी 435) 

नमाज़ अव्वाबीन के बारे में अमार बिन यासिर सहाबी रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है कि मैंने रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मग़रिब के बाद रकअतें पढ़ते हैं. हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो ये नमाज़ पढ़ता है, उसकी मग़फ़िरत हो जाती है, चाहे उसके गुनाह समन्दर के झाग के बराबर हों."

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स मग़रिब के बाद 20 रकअत पढ़ेगा, अल्लाह तअला उसके लिए जन्नत में एक महल तामीर करवाएगा. जन्नत के एक दरवाज़े का नाम अव्वाब है, जो क़यामत के दिन अल्लाह तअला से दरख़्वास्त करेगा कि ऐ अल्लाह ! जिसने मेरे नाम वाली नमाज़ पढ़ी, उसे मुझमें दाख़िल फ़रमा. अल्लाह उसकी दरख़्वास्त क़ुबूल करेगा. इसके कम से कम दो नफ़िल पढ़े जाते हैं. और ये नफ़िल मग़रिब की नमाज़ के बाद पढ़े जाते हैं."      


                 

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शब-ए-मेराज

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इस्लामी कलेंडर के रजब माह की 27 तारीख़ मुसलमानों के लिए अज़ीम मुक़ाम रखती है. इस तारीख़ को हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह) से मुलाक़ात के लिए गए थे.  इसी रात में आपकी उम्मत को नमाज़ का अज़ीम तोहफ़ा अता किया गया. एक हदीस में बताया गया है कि अगर नबी की मेराज अल्लाह से मुलाकात है, तो मोमिन की मेराज नमाज़ है.
इस तारीख़ को रात में इबादत और दिन में रोज़ा रखा जाता है, यानी आज की रात इबादत की रात है और कल रोज़ा रखा जाएगा. शब-ए-मेराज की फ़ज़ीलत को जितना बयां किया जाए, कम है.

मिस्बाह में शेख़ ने इमाम अबू जाफ़र जवाद (अस) से नक़ल किया है. फ़रमाया- रजब महीने में एक रात उन सब चीज़ों से बेहतर है, जिन पर सूरज चमकता है और वह 27 रजब की रात है, जिसकी सुबह रसूले आज़म (स:अ:व:व) मब'उस ब रिसालत हुए. हमारे पैरोकारों में जो इस रात अमल करेगा, तो उसको 60 साल के अमल का सवाब हासिल होगा. मैंने अर्ज़ किया, "इस रात का अमल क्या है?" आप (अस) ने फ़रमाया : नमाज़े-ईशा के बाद सो जाएं और फिर आधी रात से पहले उठकर 12 रकअत नमाज़ 2-2 रकअत करके पढ़ें और हर रकअत में सुरह अल-हम्द के बाद क़ुरान की आख़िरी मुफ़स्सिल सूरतों (सुरह मोहम्मद से सुरह नास) में से कोई एक सुरह पढ़ें. नमाज़ का सलाम देने के बाद यह सारी सुरतें पढ़े-
सुरह हम्द 7 मर्तबा
सुरह फ़लक़ 7 मर्तबा
सुरह नास 7 मर्तबा
सुरह तौहीद 7 मर्तबा
सुरह काफ़ेरून 7 मर्तबा
सुरह क़द्र 7 मर्तबा
आयतल कुर्सी 7 मर्तबा

अगले साल शब-ए-मेराज पर हम हों, न हों... इसलिए मेराज की रात और दिन इबादत में गुज़ार दें, अपनी ज़िन्दगी में से कुछ वक़्त तो अपने ख़ुदा के लिए रखें. अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन

-फ़िरदौस ख़ान

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इस्लाम के स्तंभ

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels:: , , , , , , ,


हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
इस्लाम पाँच स्तंभों पर आधारित है जिन्हें पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस फरमान के द्वारा स्पष्ट किया है :"इस्लाम की नीव पाँच चीज़ों पर आधारित है: इस बात की शहादत देना कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा पूज्य (मा’बूद) नहीं, और यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पैगंबर हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज्ज करना और रमज़ान के महीने के रोज़े रखना।" (बुखारी हदीस संख्याः 8)
इस्लाम अक़ीदा (आस्था, विश्वास) और शरीअत (नियम, क़ानून, शास्त्र) का नाम है जिस में अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल और हराम (वैध और अवैद्ध), नैतिकता, शिष्टाचार, उपासना के कार्य, मामलात, अधिकारों और कर्तव्यों और क़ियामत के दृश्यों को स्पष्ट किया है। जब अल्लाह तआला ने इस धर्म को अपने पैग़म्बर के हाथ पर परिपूर्ण कर दिया, तो इसे इस बात के लिए पसंद कर लिया कि यह क़ियामत आने तक सर्व मानव जाति के लिए जीवन का दस्तूर बन जाये : "आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दीं और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसन्द कर लिया।" (सूरतुल-माईदा:3)
यह इस्लाम के स्तंभ और उसके सिद्धांत हैं जिन पर वह आधारित है :
पहला स्तंभ : शहादतैन (दो गवाहियाँ अर्थात "ला-इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" की गवाही) :
इस का मतलब यह है कि मनुष्य यह विश्वास रखे कि अकेला अल्लाह ही परमेश्वर (पालनकर्ता) स्वामी, नियंत्रक, उत्पत्तिकर्ता और प्रदाता है, और उसके उन सभी सुंदर नामों और सर्वोच्च गुणों को साबित करे जिन्हें अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है, या उन्हें उसके लिए उसके रसूल ने साबित किया है, और यह आस्था और विश्वास रखे कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है :"वह (अल्लाह) आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला है, उसके औलाद कहाँ हो सकती है? जब कि उसकी कोई बीवी नहीं है वह हर चीज़ का बनाने वाला और जानने वाला है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है, उस के सिवाय कोई माबूद नहीं, हर चीज़ का बनाने वाला है, इसलिए उसी की इबादत करो और वह हर चीज़ का निगराँ है।" (सूरतुल अंआम : 101-102)
तथा मनुष्य यह आस्था रखे कि अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना रसूल बनाकर भेजा है, और आप पर क़ुर्आन अवतरित किया है और आप को तमाम लोगों तक इस दीन को पहुँचाने का आदेश दिया है, तथा यह आस्था रखे कि अल्लाह और उसके रसूल से महब्बत करना और उनका आज्ञापालन करना हर एक पर वाजिब है, और अल्लाह से महब्बत करना रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और ताबेदारी के बिना परिपूर्ण नहीं हो सकता: "कह दीजिए अगर तुम अल्लाह तआला से महब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी (अनुसरण) करो, स्वयं अल्लाह तआला तुम से महब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा और अल्लाह तआला बड़ा माफ करने वाला और बहुत मेहरबान (दयालू) है।" (सुरत-आल इम्रान: 31)
दूसरा स्तंभ : नमाज़
इसका मतलब यह है कि आदमी यह अक़ीदा रखे कि अल्लाह ने हर बालिग बुद्धिमान मुसलमान पर दिन और रात में पाँच वक्त की नमाज़ें अनिवार्य की हैं जिसे वह पवित्रता की हालत में अदा करेगा, चुनाँचि वह अपने रब के सामने हर दिन पाकी हासिल करके नम्रता और खुशू के साथ खड़ा होता है, अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करता है, उसके फज्ल़ (अनुकम्पा) का सवाल करता है, उस से अपने गुनाहों की माफी माँगता है, उस से जन्नत का प्रश्न करता है और जहन्नम से पनाह मांगता है।
दिन और रात में अनिवार्य नमाज़ें पाँच हैं : फज्र, ज़ुह्र, अस्र, मग्रिब और इशा। इसी तरह कुछ मस्नून (ऐच्छिक) नमाज़ें भी हैं जैसे क़ियामुल्लैल, तरावीह की नमाज़, चाश्त के वक्त की दो रक्अतें और इनके अलावा दूसरी सुन्नत नमाज़ें।
नमाज़, चाहे फज़Z हो या नफ्ल, सभी मामलों में केवल अकेले अल्लाह की ओर वास्तविक रूप से ध्यानगम्न (मुतवज्जिह) होने का प्रतिनिधित्व करता है, अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा समस्त मुसलमानों को जमाअत के साथ उसकी पाबन्दी करने का आदेश दिया है : "नमाज़ों की हिफाज़त करो विशेषकर बीच वाली नमाज़ की, और अल्लाह तआला के लिए विनम्रता के साथ (बा-अदब) खड़े रहा करो।" (सूरतुल बक़रा : 238)
पाँच समय की नमाज़ें दिन और रात में प्रत्येक पुरूष और स्त्री पर अनिवार्य हैं : "नि:सन्देह नमाज़ मुसलमानों पर निश्चित और नियत समय पर अनिवार्य की गई हैं।" (सूरतुन्निसा :103)
और जिस ने नमाज़ छोड़ दिया, उस आदमी का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं, अत: जिस ने जान बूझ कर उसे छोड़ दिया उस ने कुक्र किया जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "(लोगो !) अल्लाह की ओर ध्यान करते हुए उस से डरते रहो और नमाज़ को कायम रखो और मुश्रिकों (मूर्तिपूजकों) में से न हो जाओ।" (सूरतुर्रूम :31)
इस्लाम धर्म आपसी सहयोग, भाईचारे और प्यार पर आधारित है, इस्लाम ने इन नमाज़ों और इनके अलावा अन्य नमाज़ों के लिए एकत्र होने को इन्हीं प्रतिष्ठाओं (उद्देश्यों) को प्राप्त करने के लिए वैध किया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जमाअत की नमाज़ अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्ताईस दर्जा श्रेष्ठ है।" (मुस्लिम हदीस नं.:650)
कठिनाई और आपदा के समय नमाज़ बन्दे के लिए सहायक है, अल्लाह तआला का फरमान है : "और सब्र और नमाज़ के द्वारा मदद हासिल करो। और वास्तव में यह बहुत भारी है, लेकिन अल्लाह से डरने वालों के लिए नहीं।" (सूरतुल बक़रा :45)
पाँच दैनिक नमाज़ें गुनाहों को मिटा देती हैं, जैसा कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :"तुम्हारा क्या विचार है अगर तुम में से किसी के दरवाजे़ पर नदी हो जिस में वह प्रति दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर पर कुछ गंदगी (मैल) बाक़ी रहे गी? लोगों ने उत्तर दिया : उसकी गंदगी (मैल-कुचैल) बाकी नहीं रह जाये गी। आप ने फरमाया : तो इसी के समान पाँच दैनिक नमाज़ें भी हैं इनके द्वारा अल्लाह तआला गुनाहों को मिटा देता है।" (मुस्लिम हदीस नं.: 677)
मिस्जद में नमाज़ पढ़ना स्वर्ग में प्रवेश करने का कारण है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जो आदमी सुबह या शाम को मिस्जद में आता है तो अल्लाह तआला उसके लिए स्वर्ग में मेहमानी की व्यवस्था करता है जब भी वह सुबह या शाम के समय आता है।" (मुस्लिम हदीस नं. :669)
नमाज़ बन्दे को उसके उत्पत्तिकर्ता (खालिक़) से जोड़ती और मिलाती है, तथा वह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आँख की ठंढक थी। जब भी आप को कोई गंभीर मामला पेश आता था तो नमाज़ की तरफ भागते थे, अपने रब (प्रभु) से चुपके चुपके बातें करते, उस से विनती करते, उस से क्षमा मांगते और उसके फज्ल़ व मेहरबानी (दया और अनुकंपा) का प्रश्न करते।
विनम्रता और भय के साथ पढ़ी जाने वाली नमाज़ मुसलमान को उसके पालनहार (प्रभु) से क़रीब कर देती है, बेहयाई (अश्लीलता) और बुरे कामों से रोकती है जैसा कि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है :"आप पर जिस किताब की वह्य (प्रकाशना, ईश्वाणी) की गई है उसकी तिलावत कीजिये और नमाज़ स्थापित कीजिये, नि:सन्देह नमाज़ बेहयाई (अश्लीलता) और बुरी बातों से रोकती है।" (सूरतुल अंकबूत : 46)
तीसरा स्तंभ : ज़कात :
अल्लाह तआला ने लोगों को रंग, नैतिकता, व्यवहार, ज्ञान, कर्मों और जीविकाओं में भिन्न-भिन्न पैदा किया है, चुनाँचि उन्हीं में से कुछ को धन्वान और कुछ को निर्धन बनाया है, ताकि धन्वान की कृतज्ञता के द्वारा और निर्धन की धैर्य के द्वारा परीक्षा करे।
जब मोमिन लोग आपस में भाई-भाई हैं और यह भाईचारा, करूणा, हमदर्दी, स्नेह, दया, प्यार और मेहरबानी पर आधारित है, इसीलिए अल्लाह तआला ने मुसलमानों पर ज़कात को अनिवार्य किया है जो उनके मालदार लोगों से लेकर उनके निर्धन और दरिद्र लोगों में बांट दिया जायेगा, अल्लाह तआला का फरमान है : "आप उनके मालों में से सद्क़ा ले लीजिए जिस के द्वारा आप उन्हें पाक व साफ कर दीजिए, और उनके लिए दुआ कीजिए, बेशक आप की दुआ उनके लिए इत्मेनान का कारण है।" (सूरतुत्तौबा : 103)
ज़कात, धन को पवित्र करता और उस में बढ़ोतरी करता है, आत्मा को कंजूसी और लोभ (लालच) से पाक करता है, गरीबों और मालदारों के बीच प्यार को मज़बूत बनाता है, जिस के कारण कीना-कपट (द्वेष) समाप्त हो जाता है, शान्ति फैलती है और उम्मत को सौभाग्य प्राप्त होता है।
जो भी आदमी सोना, चाँदी या अन्य धातुओं और व्यापार के सामान में से निसाब भर (वह न्यूनतम राशि जिस पर ज़कात अनिवार्य होती है) का मालिक हो और उस पर एक साल बीत जाये, तो उस पर अल्लाह तआला ने चालीसवाँ हिस्सा (2.5%) ज़कात निकालना अनिवार्य किया है, जहाँ तक कृषि उपज और फलों का संबंध है तो यदि उसकी सिंचाई बिना खर्च के हुई है तो उस में दसवाँ भाग और अगर खर्च के द्वारा उसकी सिंचाई हुई है तो उस में बीसवाँ भाग उसकी कटाई के समय ज़कात निकालना अनिवार्य है, और पशुओं के ज़कात की मात्रा का विवरण किक्ह की किताबों में है। अत: जो इसे निकाले गा अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मिटा देगा, उसके धन में बरकत देगा और उसके लिए बहुत बड़ा अज्र (पुण्य) संग्रहित करके रखे गा, अल्लाह तआला का फरमान है : "तुम नमाज़ की अदायगी करो और ज़कात (धर्मदान) देते रहो, और जो भलाई तुम अपने लिये आगे भेजो गे सब कुछ अल्लाह के पास पा लोगे, बेशक अल्लाह तआला तुम्हारे अमल को देख रहा है।" (सूरतुल बक़रा : 110)
ज़कात को रोक लेना और उसकी अदायगी न करना उम्मत के लिए आपदाओं, मुसीबतों और बुराईयों को न्योता देता है, ज़कात रोकने वालों को अल्लाह तआला ने क़ियामत के दिन कष्टदायक अज़ाब की धमकी दी है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का फरमान है : "और जो लोग सोने चाँदी का खज़ाना रखते हैं और उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च नहीं करते उन्हें कष्टदायक सज़ा की सूचना पहुँचा दीजिए। जिस दिन उस खज़ाना को जहन्नम की आग में तपाया जायेगा, फिर उस से उन के माथे और पहलू और पीठें दागी जायेंगी (उन से कहा जायेगा) यह है जिसे तुम ने अपने लिए खज़ाना बना कर रखा था, तो अपने खज़ानों का मज़ा चखो।" (सूरतुत्तौबा : 34)
ज़कात को गुप्त रखना उसे लोगों के सामने ज़ाहिर करने से बेहतर है जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "अगर तुम सदक़ात (दान-पुण्य) को ज़ाहिर करो, तो वह अच्छा है, और अगर तुम उसे छिपा कर गरीबों को दे दो, तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है, और अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को मिटा देगा, और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उस से अवगत है।" (सूरतुल बक़रा : 27)
जब मुसलमान ज़कात निकाले तो उसके लिए उसे केवल उन्हीं चीज़ों में खर्च करना जाईज़ है जिनका अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 60)
चौथा स्तंभ : रमज़ान का रोज़ा रखना
रोज़ा रखने की नीयत (इच्छा) से फज्र के उदय होने से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों जैसे खाना पीना और संभोग से रूका रहना रोज़ा या 'सौम' कहलाता है।
ईमान के अंदर सब्र (धैर्य) का स्थान शरीर में सिर के समान है। अल्लाह तआला ने इस उम्मत पर साल भर में एक महीना रोज़ा रखना अनिवार्य किया है ताकि वह अल्लाह से डरे, अल्लाह की हराम की हुई चीज़ से बचाव करे और सब्र करने और अपने नफ्स को नियंत्रण में करने का आदी बने, दानशीलता, उदारता, आपसी सहयोग, हमदर्दी और दया में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करे। अल्लाह तआला का फरमान है : "ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े रखना अनिवार्य किया गया है जिस प्रकार तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम संयम और भय अनुभव करो।" (सूरतुल बक़रा: 183)
रमज़ान का महीना एक महान महीना है जिस में अल्लाह तआला ने क़ुर्आन अवतरित किया, और इस में अच्छे कर्म, दान (खैरात) और उपासनाओं के अज्र व सवाब (बदले) कई गुना बढ़ा दिये जाते हैं, इस महीने में लैलतुल-क़द्र भी है, जो एक हज़ार महीने से बेहतर है, इस महीने में आकाश (स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं और नरक के द्वार बंद कर दिये जाते हैं, और शैतानों को जकड़ दिया जाता है।
अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीना का रोज़ा रखना हर बुद्धिमान व्यस्क मुसलमान पुरूष एंव स्त्री पर अनिवार्य किया है, जैसाकि अल्लाह ताअला का फरमान है : "रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शक है और जिसमें मार्गदर्शन की और सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर की निशानियाँ हैं, तुम में से जो व्यक्ति इस महीना को पाए उसे रोज़ा रखना चाहिए। और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे, अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है, वह चाहता है कि तुम गिनती पूरी कर लो और अल्लाह के प्रदान किए हुए मार्गदर्शन के अनुसार उसकी बड़ाई बयान करो और उसके शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) रहो।" (सूरतुल बक़रा: 185)
अल्लाह के पास रोज़े का सवाब (बदला) बहुत महान है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "आदम के बेटे का हर कर्म कई गुना कर दिया जाता है, नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ा दिया जाता है, अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल का फरमान है कि सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा, वह (रोज़ादार) अपनी शह्वत और अपने खाने को मेरे कारण त्याग देता है।" (मुस्लिम)
पाँचवाँ स्तंभ : हज :
अल्लाह तआला ने मुसलमानों के लिए एक क़िब्ला नियुक्त कर दिया है जिसकी ओर वे अपनी नमाज़ों और प्रार्थनाओं में चेहरा करते हैं चाहे वे कहीं भी हों, और वह मक्का मुकर्रमा में अल्लाह का प्राचीन घर है : "आप अपना मुँह मिस्जदे हराम की तरफ फेर लें और आप जहाँ कहीं भी हों आप अपना मुँह उसी ओर फेरा करें।" (सूरतुल बक़रा : 144)
जब मुसलमानों के घर एक दूसरे से दूर हैं और इस्लाम उन्हें एकजुट होने और एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने का आह्वान करता है, जिस प्रकार कि नेकी और संयम के काम पर एक दूसरे का सहयोग करने, हक़ की वसीयत करने, अल्लाह की ओर बुलाने और अल्लाह के शआइर की ता'ज़ीम (सम्मान) करने की ओर बुलाता है, इसी कारण अल्लाह तआला ने हर बुद्धि वाले सामर्थी व्यस्क मुसलमान पर अपने प्राचीन घर की ज़ियारत करना, उसका तवाफ करना (परिक्रमा करना) अनिवार्य किया है, तथा हज्ज के मनासिक (कार्यकर्म) को उसी प्रकार अदा किया जायेगा जैसाकि अल्लाह और उसके रसूल ने बयान किया है। अल्लाह तआला ने फरमाया : "अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान : 97)
हज्ज एक ऐसा मौसम है जिस में मुसलमानों की एकजुटता, ताक़त और गौरव स्पष्ट होकर सामने आता है, चुनाँचि उनका रब (पालनहार) एक ही है, किताब एक है, पैगंबर एक है, उम्मत एक है, इबादत एक है और पोशाक एक ही है।
हज्ज के कुछ आदाब (शिष्टाचार) और शर्तें हैं जिन पर मुसलमान के लिए अमल करना अनिवार्य है, जैसे कि ज़ुबान, कान और आँख की अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों से सुरक्षा करना, नीयत का खालिस होना, खर्च का पाक (हलाल) होना, अच्छी नैतिकता से सुसज्जित होना, और हज्ज को खराब करने वाली सभी चीज़ों से दूर रहना जैसे कि कामुक बातें, नाफरमानी और लड़ाई झगड़ा, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है : "हज्ज के कुछ जाने पहचाने महीने हैं, अत: जिस ने इन महीनों में हज्ज को फर्ज़ कर लिया, तो हज्ज में कामुकता की बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवहेलना) और लड़ाई-झगड़ा नहीं है, तुम जो भलाई (सवाब) का काम करोगे अल्लाह उसे जानने वाला है, और अपने साथ रास्ता का खर्च ले लिया करो, सब से बेहतर रास्ता का खर्च तो अल्लाह का डर है, और ऐ बुद्धिमानों! मुझ से डरते रहा करो।" (सूरतुल बक़रा :197)
जब मुसलमान हज्ज को शुद्ध धार्मिक तरीक़े पर अदा करता है, और वह अल्लाह के लिए खालिस होता है, तो वह उसके गुनाहों का कफ्फारा (प्रायश्चित) बन जाता है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने हज्ज किया और उसमें संभोग और उस से संबंधित कामुक चीज़ों और अवज्ञा से बचा रहा, तो वह उस दिन के समान वापस लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।" (बुखारी हदीस नं.: 15210)
Courtesy islamqa

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इस्लाम के स्तंभ

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हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
इस्लाम पाँच स्तंभों पर आधारित है जिन्हें पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस फरमान के द्वारा स्पष्ट किया है :"इस्लाम की नीव पाँच चीज़ों पर आधारित है: इस बात की शहादत देना कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा पूज्य (मा’बूद) नहीं, और यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पैगंबर हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज्ज करना और रमज़ान के महीने के रोज़े रखना।" (बुखारी हदीस संख्याः 8)
इस्लाम अक़ीदा (आस्था, विश्वास) और शरीअत (नियम, क़ानून, शास्त्र) का नाम है जिस में अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल और हराम (वैध और अवैद्ध), नैतिकता, शिष्टाचार, उपासना के कार्य, मामलात, अधिकारों और कर्तव्यों और क़ियामत के दृश्यों को स्पष्ट किया है। जब अल्लाह तआला ने इस धर्म को अपने पैग़म्बर के हाथ पर परिपूर्ण कर दिया, तो इसे इस बात के लिए पसंद कर लिया कि यह क़ियामत आने तक सर्व मानव जाति के लिए जीवन का दस्तूर बन जाये : "आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दीं और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसन्द कर लिया।" (सूरतुल-माईदा:3)
यह इस्लाम के स्तंभ और उसके सिद्धांत हैं जिन पर वह आधारित है :
पहला स्तंभ : शहादतैन (दो गवाहियाँ अर्थात "ला-इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" की गवाही) :
इस का मतलब यह है कि मनुष्य यह विश्वास रखे कि अकेला अल्लाह ही परमेश्वर (पालनकर्ता) स्वामी, नियंत्रक, उत्पत्तिकर्ता और प्रदाता है, और उसके उन सभी सुंदर नामों और सर्वोच्च गुणों को साबित करे जिन्हें अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है, या उन्हें उसके लिए उसके रसूल ने साबित किया है, और यह आस्था और विश्वास रखे कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है :"वह (अल्लाह) आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला है, उसके औलाद कहाँ हो सकती है? जब कि उसकी कोई बीवी नहीं है वह हर चीज़ का बनाने वाला और जानने वाला है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है, उस के सिवाय कोई माबूद नहीं, हर चीज़ का बनाने वाला है, इसलिए उसी की इबादत करो और वह हर चीज़ का निगराँ है।" (सूरतुल अंआम : 101-102)
तथा मनुष्य यह आस्था रखे कि अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना रसूल बनाकर भेजा है, और आप पर क़ुर्आन अवतरित किया है और आप को तमाम लोगों तक इस दीन को पहुँचाने का आदेश दिया है, तथा यह आस्था रखे कि अल्लाह और उसके रसूल से महब्बत करना और उनका आज्ञापालन करना हर एक पर वाजिब है, और अल्लाह से महब्बत करना रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और ताबेदारी के बिना परिपूर्ण नहीं हो सकता: "कह दीजिए अगर तुम अल्लाह तआला से महब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी (अनुसरण) करो, स्वयं अल्लाह तआला तुम से महब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा और अल्लाह तआला बड़ा माफ करने वाला और बहुत मेहरबान (दयालू) है।" (सुरत-आल इम्रान: 31)
दूसरा स्तंभ : नमाज़
इसका मतलब यह है कि आदमी यह अक़ीदा रखे कि अल्लाह ने हर बालिग बुद्धिमान मुसलमान पर दिन और रात में पाँच वक्त की नमाज़ें अनिवार्य की हैं जिसे वह पवित्रता की हालत में अदा करेगा, चुनाँचि वह अपने रब के सामने हर दिन पाकी हासिल करके नम्रता और खुशू के साथ खड़ा होता है, अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करता है, उसके फज्ल़ (अनुकम्पा) का सवाल करता है, उस से अपने गुनाहों की माफी माँगता है, उस से जन्नत का प्रश्न करता है और जहन्नम से पनाह मांगता है।
दिन और रात में अनिवार्य नमाज़ें पाँच हैं : फज्र, ज़ुह्र, अस्र, मग्रिब और इशा। इसी तरह कुछ मस्नून (ऐच्छिक) नमाज़ें भी हैं जैसे क़ियामुल्लैल, तरावीह की नमाज़, चाश्त के वक्त की दो रक्अतें और इनके अलावा दूसरी सुन्नत नमाज़ें।
नमाज़, चाहे फज़Z हो या नफ्ल, सभी मामलों में केवल अकेले अल्लाह की ओर वास्तविक रूप से ध्यानगम्न (मुतवज्जिह) होने का प्रतिनिधित्व करता है, अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा समस्त मुसलमानों को जमाअत के साथ उसकी पाबन्दी करने का आदेश दिया है : "नमाज़ों की हिफाज़त करो विशेषकर बीच वाली नमाज़ की, और अल्लाह तआला के लिए विनम्रता के साथ (बा-अदब) खड़े रहा करो।" (सूरतुल बक़रा : 238)
पाँच समय की नमाज़ें दिन और रात में प्रत्येक पुरूष और स्त्री पर अनिवार्य हैं : "नि:सन्देह नमाज़ मुसलमानों पर निश्चित और नियत समय पर अनिवार्य की गई हैं।" (सूरतुन्निसा :103)
और जिस ने नमाज़ छोड़ दिया, उस आदमी का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं, अत: जिस ने जान बूझ कर उसे छोड़ दिया उस ने कुक्र किया जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "(लोगो !) अल्लाह की ओर ध्यान करते हुए उस से डरते रहो और नमाज़ को कायम रखो और मुश्रिकों (मूर्तिपूजकों) में से न हो जाओ।" (सूरतुर्रूम :31)
इस्लाम धर्म आपसी सहयोग, भाईचारे और प्यार पर आधारित है, इस्लाम ने इन नमाज़ों और इनके अलावा अन्य नमाज़ों के लिए एकत्र होने को इन्हीं प्रतिष्ठाओं (उद्देश्यों) को प्राप्त करने के लिए वैध किया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जमाअत की नमाज़ अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्ताईस दर्जा श्रेष्ठ है।" (मुस्लिम हदीस नं.:650)
कठिनाई और आपदा के समय नमाज़ बन्दे के लिए सहायक है, अल्लाह तआला का फरमान है : "और सब्र और नमाज़ के द्वारा मदद हासिल करो। और वास्तव में यह बहुत भारी है, लेकिन अल्लाह से डरने वालों के लिए नहीं।" (सूरतुल बक़रा :45)
पाँच दैनिक नमाज़ें गुनाहों को मिटा देती हैं, जैसा कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :"तुम्हारा क्या विचार है अगर तुम में से किसी के दरवाजे़ पर नदी हो जिस में वह प्रति दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर पर कुछ गंदगी (मैल) बाक़ी रहे गी? लोगों ने उत्तर दिया : उसकी गंदगी (मैल-कुचैल) बाकी नहीं रह जाये गी। आप ने फरमाया : तो इसी के समान पाँच दैनिक नमाज़ें भी हैं इनके द्वारा अल्लाह तआला गुनाहों को मिटा देता है।" (मुस्लिम हदीस नं.: 677)
मिस्जद में नमाज़ पढ़ना स्वर्ग में प्रवेश करने का कारण है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जो आदमी सुबह या शाम को मिस्जद में आता है तो अल्लाह तआला उसके लिए स्वर्ग में मेहमानी की व्यवस्था करता है जब भी वह सुबह या शाम के समय आता है।" (मुस्लिम हदीस नं. :669)
नमाज़ बन्दे को उसके उत्पत्तिकर्ता (खालिक़) से जोड़ती और मिलाती है, तथा वह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आँख की ठंढक थी। जब भी आप को कोई गंभीर मामला पेश आता था तो नमाज़ की तरफ भागते थे, अपने रब (प्रभु) से चुपके चुपके बातें करते, उस से विनती करते, उस से क्षमा मांगते और उसके फज्ल़ व मेहरबानी (दया और अनुकंपा) का प्रश्न करते।
विनम्रता और भय के साथ पढ़ी जाने वाली नमाज़ मुसलमान को उसके पालनहार (प्रभु) से क़रीब कर देती है, बेहयाई (अश्लीलता) और बुरे कामों से रोकती है जैसा कि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है :"आप पर जिस किताब की वह्य (प्रकाशना, ईश्वाणी) की गई है उसकी तिलावत कीजिये और नमाज़ स्थापित कीजिये, नि:सन्देह नमाज़ बेहयाई (अश्लीलता) और बुरी बातों से रोकती है।" (सूरतुल अंकबूत : 46)
तीसरा स्तंभ : ज़कात :
अल्लाह तआला ने लोगों को रंग, नैतिकता, व्यवहार, ज्ञान, कर्मों और जीविकाओं में भिन्न-भिन्न पैदा किया है, चुनाँचि उन्हीं में से कुछ को धन्वान और कुछ को निर्धन बनाया है, ताकि धन्वान की कृतज्ञता के द्वारा और निर्धन की धैर्य के द्वारा परीक्षा करे।
जब मोमिन लोग आपस में भाई-भाई हैं और यह भाईचारा, करूणा, हमदर्दी, स्नेह, दया, प्यार और मेहरबानी पर आधारित है, इसीलिए अल्लाह तआला ने मुसलमानों पर ज़कात को अनिवार्य किया है जो उनके मालदार लोगों से लेकर उनके निर्धन और दरिद्र लोगों में बांट दिया जायेगा, अल्लाह तआला का फरमान है : "आप उनके मालों में से सद्क़ा ले लीजिए जिस के द्वारा आप उन्हें पाक व साफ कर दीजिए, और उनके लिए दुआ कीजिए, बेशक आप की दुआ उनके लिए इत्मेनान का कारण है।" (सूरतुत्तौबा : 103)
ज़कात, धन को पवित्र करता और उस में बढ़ोतरी करता है, आत्मा को कंजूसी और लोभ (लालच) से पाक करता है, गरीबों और मालदारों के बीच प्यार को मज़बूत बनाता है, जिस के कारण कीना-कपट (द्वेष) समाप्त हो जाता है, शान्ति फैलती है और उम्मत को सौभाग्य प्राप्त होता है।
जो भी आदमी सोना, चाँदी या अन्य धातुओं और व्यापार के सामान में से निसाब भर (वह न्यूनतम राशि जिस पर ज़कात अनिवार्य होती है) का मालिक हो और उस पर एक साल बीत जाये, तो उस पर अल्लाह तआला ने चालीसवाँ हिस्सा (2.5%) ज़कात निकालना अनिवार्य किया है, जहाँ तक कृषि उपज और फलों का संबंध है तो यदि उसकी सिंचाई बिना खर्च के हुई है तो उस में दसवाँ भाग और अगर खर्च के द्वारा उसकी सिंचाई हुई है तो उस में बीसवाँ भाग उसकी कटाई के समय ज़कात निकालना अनिवार्य है, और पशुओं के ज़कात की मात्रा का विवरण किक्ह की किताबों में है। अत: जो इसे निकाले गा अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मिटा देगा, उसके धन में बरकत देगा और उसके लिए बहुत बड़ा अज्र (पुण्य) संग्रहित करके रखे गा, अल्लाह तआला का फरमान है : "तुम नमाज़ की अदायगी करो और ज़कात (धर्मदान) देते रहो, और जो भलाई तुम अपने लिये आगे भेजो गे सब कुछ अल्लाह के पास पा लोगे, बेशक अल्लाह तआला तुम्हारे अमल को देख रहा है।" (सूरतुल बक़रा : 110)
ज़कात को रोक लेना और उसकी अदायगी न करना उम्मत के लिए आपदाओं, मुसीबतों और बुराईयों को न्योता देता है, ज़कात रोकने वालों को अल्लाह तआला ने क़ियामत के दिन कष्टदायक अज़ाब की धमकी दी है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का फरमान है : "और जो लोग सोने चाँदी का खज़ाना रखते हैं और उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च नहीं करते उन्हें कष्टदायक सज़ा की सूचना पहुँचा दीजिए। जिस दिन उस खज़ाना को जहन्नम की आग में तपाया जायेगा, फिर उस से उन के माथे और पहलू और पीठें दागी जायेंगी (उन से कहा जायेगा) यह है जिसे तुम ने अपने लिए खज़ाना बना कर रखा था, तो अपने खज़ानों का मज़ा चखो।" (सूरतुत्तौबा : 34)
ज़कात को गुप्त रखना उसे लोगों के सामने ज़ाहिर करने से बेहतर है जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "अगर तुम सदक़ात (दान-पुण्य) को ज़ाहिर करो, तो वह अच्छा है, और अगर तुम उसे छिपा कर गरीबों को दे दो, तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है, और अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को मिटा देगा, और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उस से अवगत है।" (सूरतुल बक़रा : 27)
जब मुसलमान ज़कात निकाले तो उसके लिए उसे केवल उन्हीं चीज़ों में खर्च करना जाईज़ है जिनका अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 60)
चौथा स्तंभ : रमज़ान का रोज़ा रखना
रोज़ा रखने की नीयत (इच्छा) से फज्र के उदय होने से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों जैसे खाना पीना और संभोग से रूका रहना रोज़ा या 'सौम' कहलाता है।
ईमान के अंदर सब्र (धैर्य) का स्थान शरीर में सिर के समान है। अल्लाह तआला ने इस उम्मत पर साल भर में एक महीना रोज़ा रखना अनिवार्य किया है ताकि वह अल्लाह से डरे, अल्लाह की हराम की हुई चीज़ से बचाव करे और सब्र करने और अपने नफ्स को नियंत्रण में करने का आदी बने, दानशीलता, उदारता, आपसी सहयोग, हमदर्दी और दया में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करे। अल्लाह तआला का फरमान है : "ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े रखना अनिवार्य किया गया है जिस प्रकार तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम संयम और भय अनुभव करो।" (सूरतुल बक़रा: 183)
रमज़ान का महीना एक महान महीना है जिस में अल्लाह तआला ने क़ुर्आन अवतरित किया, और इस में अच्छे कर्म, दान (खैरात) और उपासनाओं के अज्र व सवाब (बदले) कई गुना बढ़ा दिये जाते हैं, इस महीने में लैलतुल-क़द्र भी है, जो एक हज़ार महीने से बेहतर है, इस महीने में आकाश (स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं और नरक के द्वार बंद कर दिये जाते हैं, और शैतानों को जकड़ दिया जाता है।
अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीना का रोज़ा रखना हर बुद्धिमान व्यस्क मुसलमान पुरूष एंव स्त्री पर अनिवार्य किया है, जैसाकि अल्लाह ताअला का फरमान है : "रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शक है और जिसमें मार्गदर्शन की और सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर की निशानियाँ हैं, तुम में से जो व्यक्ति इस महीना को पाए उसे रोज़ा रखना चाहिए। और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे, अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है, वह चाहता है कि तुम गिनती पूरी कर लो और अल्लाह के प्रदान किए हुए मार्गदर्शन के अनुसार उसकी बड़ाई बयान करो और उसके शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) रहो।" (सूरतुल बक़रा: 185)
अल्लाह के पास रोज़े का सवाब (बदला) बहुत महान है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "आदम के बेटे का हर कर्म कई गुना कर दिया जाता है, नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ा दिया जाता है, अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल का फरमान है कि सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा, वह (रोज़ादार) अपनी शह्वत और अपने खाने को मेरे कारण त्याग देता है।" (मुस्लिम)
पाँचवाँ स्तंभ : हज :
अल्लाह तआला ने मुसलमानों के लिए एक क़िब्ला नियुक्त कर दिया है जिसकी ओर वे अपनी नमाज़ों और प्रार्थनाओं में चेहरा करते हैं चाहे वे कहीं भी हों, और वह मक्का मुकर्रमा में अल्लाह का प्राचीन घर है : "आप अपना मुँह मिस्जदे हराम की तरफ फेर लें और आप जहाँ कहीं भी हों आप अपना मुँह उसी ओर फेरा करें।" (सूरतुल बक़रा : 144)
जब मुसलमानों के घर एक दूसरे से दूर हैं और इस्लाम उन्हें एकजुट होने और एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने का आह्वान करता है, जिस प्रकार कि नेकी और संयम के काम पर एक दूसरे का सहयोग करने, हक़ की वसीयत करने, अल्लाह की ओर बुलाने और अल्लाह के शआइर की ता'ज़ीम (सम्मान) करने की ओर बुलाता है, इसी कारण अल्लाह तआला ने हर बुद्धि वाले सामर्थी व्यस्क मुसलमान पर अपने प्राचीन घर की ज़ियारत करना, उसका तवाफ करना (परिक्रमा करना) अनिवार्य किया है, तथा हज्ज के मनासिक (कार्यकर्म) को उसी प्रकार अदा किया जायेगा जैसाकि अल्लाह और उसके रसूल ने बयान किया है। अल्लाह तआला ने फरमाया : "अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान : 97)
हज्ज एक ऐसा मौसम है जिस में मुसलमानों की एकजुटता, ताक़त और गौरव स्पष्ट होकर सामने आता है, चुनाँचि उनका रब (पालनहार) एक ही है, किताब एक है, पैगंबर एक है, उम्मत एक है, इबादत एक है और पोशाक एक ही है।
हज्ज के कुछ आदाब (शिष्टाचार) और शर्तें हैं जिन पर मुसलमान के लिए अमल करना अनिवार्य है, जैसे कि ज़ुबान, कान और आँख की अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों से सुरक्षा करना, नीयत का खालिस होना, खर्च का पाक (हलाल) होना, अच्छी नैतिकता से सुसज्जित होना, और हज्ज को खराब करने वाली सभी चीज़ों से दूर रहना जैसे कि कामुक बातें, नाफरमानी और लड़ाई झगड़ा, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है : "हज्ज के कुछ जाने पहचाने महीने हैं, अत: जिस ने इन महीनों में हज्ज को फर्ज़ कर लिया, तो हज्ज में कामुकता की बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवहेलना) और लड़ाई-झगड़ा नहीं है, तुम जो भलाई (सवाब) का काम करोगे अल्लाह उसे जानने वाला है, और अपने साथ रास्ता का खर्च ले लिया करो, सब से बेहतर रास्ता का खर्च तो अल्लाह का डर है, और ऐ बुद्धिमानों! मुझ से डरते रहा करो।" (सूरतुल बक़रा :197)
जब मुसलमान हज्ज को शुद्ध धार्मिक तरीक़े पर अदा करता है, और वह अल्लाह के लिए खालिस होता है, तो वह उसके गुनाहों का कफ्फारा (प्रायश्चित) बन जाता है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने हज्ज किया और उसमें संभोग और उस से संबंधित कामुक चीज़ों और अवज्ञा से बचा रहा, तो वह उस दिन के समान वापस लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।" (बुखारी हदीस नं.: 15210)
Courtesy islamqa

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नमाज़

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  • "नमाज़ के वक़्त तवाफ़ काबा रुक सकता है" तो तेरा कारोबार और काम क्यों नहीं ?
  • इबलीस ने एक सजदे से इंकार क्या था, वो भी इंसान को... और हम अल्लाह का बुलावा अज़ान सुनकर भी नमाज़ नहीं पढ़ते, तो कितने सजदों से इंकार कर रहे हैं, कभी तो सोचिए...

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नमाज़ में की जाने वाली कुछ ग़लतियां

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इमाम के पीछे नमाज़ी का ऊंचे स्वर में क़ेराअत करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ों में ज़ोर ज़ोर से क़ेराअत करके दूसरे नमाज़ियों की नमाज़ में ख़लल डालते हैं. इमाम के पीछे सूरत ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर देंगे मानो वह यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उन्होंने उसे कंठस्थ कर रखा है. हालांकि नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सुन लो! तुम में से हर एक नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. इसलिए बिल्कुल कोई दूसरे को कष्ट न पहुंचाए, न कोई किसी के सामने अपनी आवाज़ को ऊंचा करे.” (अबू-दाऊद)
नमाज़ के बीच विभिन्न प्रकार की हरकतें करना
कुछ नमाज़ी अपनी नमाज़ों में श्रद्धा का ख़्याल किए बिना नमाज़ में विभिन्न प्रकार की हरकतें करते रहते हैं. कोई हाथ की घड़ी में देख रहा है, कोई दाढ़ी पर हाथ फेर रहा है, कोई कपड़े से मिट्टी झाड़ रहा है, कोई नाक से खेल रहा है, तो कोई पीठ खुजला रहा है इत्यादी. लगता ही नहीं कि वह अपने मालिक और संसार के सृष्टिकर्ता के सामने खड़े हुए हैं. ज़रा सोचिए कि उनमें से यदि कोई दुनिया के किसी बड़े आदमी के सामने खड़ें होते, तो ऐसी हरकतें कर सकते थे? कदापि नहीं, तो फिर अपने मालिक के सामने ऐसा क्यों.
आयतों के संदर्भ को समझे बिना इमाम की क़ेराअत पर रोना चिल्लाना
नमाज़ में कुछ आयतें जहन्नम, यातना और प्रलोक से सम्बन्धित होती हैं, जिन्हें सुन कर एक व्यक्ति का ह्रदय विनर्म पड़ जाता और आंखों से आंसू जारी हो जाते हैं और यह अच्छी बात है, लेकिन कुछ लोग हर नमाज़ में रोना और चीख़ना शूरू कर देते हैं, चाहे पढ़ी जाने वाली आयतें जन्नत और जहन्न से सम्बन्धित हों अथवा हैज़ या निफास से सम्बन्धित. विदित है कि इससे दूसरे नमाज़ियों को परेशानी होती है.
परागंदा छवि में मस्जिद आना
 निर्धनता कोई ऐब नहीं, कितने निर्धन साफ़-सुथरे कपड़े पहन कर मस्जिद जाते हैं, जबकि कितने ऐसे सुखी और सम्पन्न लोगों का हाल यह होता है कि जब बाज़ार जाएं, तो बड़े बन-संवर कर जाएं, लेकिन मस्जिद आना हो, तो फक़ीराना और परागंदा छवि बना लेते हैं. हालांकि ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं.
नमाज़ियों के आगे से गुज़रना
कुछ नमाज़ी नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और उन लोगों का बिल्कुल लिहाज़ नहीं करते, जो अपनी छूटी हुई नमाज़ें अदा कर रहे होते हैं. यदि उन्हें नमाज़ियों के आगे से गुज़रने के पाप का सही ज्ञान हो जाए, तो कदापि ऐसा न करें और नमाज़ी की नमाज़ समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते रहें. नबी सल्ल. ने फ़रमायाः “यदि नमाज़ी के सामने से गुज़रने वाला यह जान ले कि उसका क्या पाप है, तो उसका चालीस (वर्ष) तक प्रतीक्षा में खड़े रहना उसके लिए बेहतर है.”  (सहीह बुख़ारी)
नमाज़ में आसमान की ओर निगाह उठाना
नबी सल्ल. ने इस बात से मना फ़रमाया कि नमाज़ी नमाज़ की स्थिति में अपनी निगाह आसमान की ओर उठाए, बल्कि आपने सख़्ती से फ़रमाया कि ऐसा करने वालों की निगाहें उचक न ली जाएं. (मुस्नद अहमद)
आपने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि नमाज़ में खड़े होते समय एक व्यक्ति की निगाह उसके सज्दे के स्थान पर टिकी होनी चाहिए, जबकि कुछ नमाज़ी नमाज़ में कभी छत की ओर देखते होते हैं, मानो अल्लाह को देख रहे हैं, तो कुछ लोग दाएं बाएं झाँक रहे होते हैं।
लम्बे स्वर में खींच कर देर तक आमीन कहना
जहरी नमाज़ों में ऊंची आवाज़ से आमीन कहना अल्लाह के रसूल सल्ल. की सुन्नत है, क्योंकि फ़रिश्ते भी इस पर आमीन कहते हैं और जिसकी आमीन फ़रिश्तों की आमीन से सहमत हो गई, उसके पाप क्षमा कर दिए जाते हैं. इसलिए होना यह चाहिए कि आमीन एक साथ कही जाए और ऊंचे स्वर में ताकि सुनी जा सके, जबकि देखा यह जाता है कि कुछ लोग बिल्कुल आमीन कहते ही नहीं, जबकि दूसरे कुछ लोग इतना लम्बा “आमीन” कहते हैं कि सब लोगों के आमीन से फ़ारिग़ होने के बावजूद वह आमीन को खींचते रहते हैं, जिससे अन्य नमाज़ियों को तकलीफ़ होती है.
नाफ़ के नीचे अथवा गर्दन के निकट हाथ बांधना
नमाज़ में हाथ बांधने के सम्बन्ध में सब से सही बात यह है कि दोनों हाथ सीने पर बांधे जाएं, इस प्रकार कि दायां हाथ बायें हाथ पर नाफ़ से ऊपर और छाती के नीचे हो.
हल्ब बिन ताई रज़ि. बयान करते हैं कि “मैंने नबी सल्ल. को देखा कि हाथों को सीने पर बांधे हुए थे.” (मुस्नद अहमद) लेकिन कुछ लोग इसके विपरीत नाफ़ के नीचे हाथ बांधते हैं, तो कुछ लोग गर्दन के बिल्कुल क़रीब और इन परिस्थितियों में आप स्वंय उनकी परेशानी का अनुभव कर सकते हैं.
पेशाब या पाख़ाना को रोक कर नमाज़ पढ़ना
एक ही वज़ू से बहुत सी नमाज़ें पढ़ने के कुछ इच्छुक कभी कभी पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने लगते हैं, जबकि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमाया है. यदि किसी को ऐसी सूरत पेश आ जाए कि जमाअत खड़ी हो चुकी हो और उसे शौचालय जाने की आवश्यकता हो, तो वह पहले शौचालय जा कर अपनी ज़रूरत पूरी करे. नबी सल्ल. का फ़रमान है- ” जब खाना उपस्थित हो, तो नमाज़ नहीं होती और न उस समय जब पेशाब या पाख़ाना उसे धकेल (निकलने के लिए ज़ोर लगा) रहा हो”. (मुस्लिम)
इसलिए अल्लाह के रसूल सल्ल. के आदेश की मुख़ालफ़त करने की बजाय पहले शौचालय से फ़ारिग़ हो जाएं फिर नमाज़ शुरू करें, ताकि पूरी श्रद्धा से नमाज़ पढ़ सकें.
सफ़ों को बराबर न करना
सामान्य रूप में यह देखने को मिलता है कि नमाज़ी अपनी नमाज़ों में सफ़ें सीधी करने का ज़्यादा ख़्याल नहीं करते और अपने बीच में ख़ाली जगह छोड़ कर खड़े होते हैं. हालांकि यह तरीक़ा प्यारे नबी सल्ल. की नमाज़ के तरीक़े के विपरीत है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सफ़ें ठीक कर लो, कंधे बराबर कर लो, सफ़ के बीच ख़ाली रह जाने वाले स्थान को भर लो, अपने भाइयों के लिए नरम हो जाओ और शैतान के लिए जगह न छोड़ो. जो व्यक्ति सफ़ को मिलाएगा अल्लाह उसको मिलाएगा और जो व्यक्ति सफ़ को तोड़ेगा अल्लाह उसको तोड़ेगा.” (अबू दाऊद)
एक मस्जिद में एक ही समय दो जमाअत करना
मस्जिद में प्रत्येक उपस्थितगणों का एक इमाम के पीछे नमाज़ की अदाएगी को जमाअत कहते हैं. लेकिन कभी- कभार यह देखने को मिलता है कि पहली जमाअत समाप्त होने के बाद दो-दो जमाअतें एक ही मस्जिद में एक ही समय क़ायम कर ली जाती हैं. और यह कभी तो इमाम की ग़लती के कारण होता है कि इमाम की आवाज़ धीमी होने के कारण देर से आने वालों को पता न चल सका कि दूसरी जमाअत खड़ी हुई है और कभी मुक़तदी की गलती के कारण होता है कि जल्दी दाख़िल होने के कारण यह विश्वास प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की कि जमाअत खड़ी हुई है, और इस तरह दूसरी जमाअत खड़ी कर ली.
रुकू में कमर और घुटने सीधा न रखना
 कुछ नमाज़ी रुकू के बीच या तो सर को नीचे झुकाए रखते हैं या फिर सर को बहुत ऊंचा रखते हैं, यह दोनो शक्लें ग़लत हैं. हालांकि सर को न ज़्यादा झुकाया जाए और न ज़्यादा उठाकर रखा जाए, बल्कि कमर और सर दोनों बराबर होना चाहिए कि यदि उस पर पानी बहाया जाए तो ठहर जाए. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “एक व्यक्ति साठ वर्ष नमाज़ें पढ़ता है, लेकिन उसकी एक नमाज़ भी स्वीकार नहीं की जाती, इसलिए कि वह कभी रुकू ठीक करता है, तो सजदा सही नहीं करता और अगर सजदा ठीक करता है तो रुकू सही नहीं करता.” (अत्तरगीब वत्तरहीब)
कुछ नमाज़ी रुकू की स्थिति में घुटने पर दोनों हाथ रखने की बजाए जांघ पर रखते हैं, जबकि कुछ दूसरे घुटने से बिल्कुल नीचे टख़ने के क़रीब तक दोनों हाथों को ले जाते हैं, जो कि ग़लत है. सही तरीक़ा यह है कि रुकू की स्थिति में कमर को बिल्कुल सीधा रखा जाए और दोनों हथेलियां घुटने पर टिकी हुई हों.
सजदे की स्थिति में कोहनियों को ज़मीन पर बिछाना या हथेलियों को बिल्कुल सीधा खड़ा रखना
 सजदे में कुछ लोग कोहनियों को ज़मीन पर बिछा लेते हैं. हालांकि नबी सल्ल. ने इस तरीक़े को कुत्ते से तशबीह देते हुए फ़रमाया कि “कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते के समान ज़मीन पर न फैलाए”.। (बुख़ारी, मुस्लिम) जबकि कुछ लोग अपनी हथेलियों को मोड़े हुए बिल्कुल खड़ा रखते हैं, जबकि सही तरीका़ यह है कि हथेलियां ज़मीन पर रखी जाएं इस प्रकार कि उंगलियां मिली हुई हों और क़िबला की ओर हों और कोहनियां ज़मीन से उठी हुई हों. उसी प्रकार पैर की उंगलियां भी क़िबला की ओर हों.
सलाम फेरते ही ज़ोर से बातें करने लगना
कुछ नमाज़ी सलाम फेरने के बाद यह भूल जाते हैं कि वह मस्जिद में हैं और अपने साथी के साथ वार्ता और हंसने- हंसाने में लग जाते हैं मानो किसी चाय की दुकान में बैठे हों. हालांकि उस समय कितने नमाज़ी अपनी नमाज़े पूरी कर रहे होते हैं, कितने सुन्नतें पढ़ रहे होते हैं. यदि कोई ऐसी स्थिति में उन्हें टोक दे, तो दिल मैला कर लेते हैं.
नियत का ज़बान से अदा करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ में देर से आते हैं और ज़ोर से तकबीर कहते हुए नमाज़ में दाख़िल होते हैं, बल्कि कुछ लोग नियत के शब्द भी ज़बान से अदा करते हैं ” मैं इमाम के पीछे चार रकअत ज़ुहर की नमाज़ अदा करने की नियत करता हूं, मुंह मेरा क़िबला की ओर, अल्लाहु अकबर” हालांकि ऊंची आवाज़ से “अल्लाहु अकबर”कहना या नियत के शब्द ज़बान से बोलना प्यारे नबी सल्ल. और आपके साथियों से प्रमाणित नहीं. और इसलिए भी कि नियत दिल के संकल्प का नाम है. अतः जबान से नियत के शब्द बोलने की आवश्यकता ही नहीं. अल्लामा इब्ने तैमिया रहि. फ़रमाते हैं-
“ज़बान से नियत करना शास्त्र और बुद्धि दोनों के विपरीत है, शास्त्र के विपरीत इसलिए कि यह बिदअत है. और बुद्धि के विपरीत इसलिए कि उसकी उदाहरण ऐसे ही है जैसे कोई खाना खाना चाहता हो, तो कहे “मैं नियत करता हूं अपने हाथ को इस बर्तन में रखने की, मैं इससे एक लुक़मा लूंगा, फिर उसको मुंह में रखूंगा, फिर उसको चबाऊंगा, अंततः उसको निग़ल लूंगा, ताकि मैं तुष्टि पा सकूं. विदित है कि कोई बुद्धिमान इस प्रकार के शब्द नहीं बोलेगा, क्योंकि नियत करना इस बात का प्रमाण है कि नियत करने वाले को मआमले का पूरा-पूरा ज्ञान है- जब आदमी को पता है कि वह क्या कर रहा है, तो पक्की बात है कि उसने इस काम की नियत भी ज़रूर की होगी.”   (फतावा इब्ने तैमिया 1/232)
प्याज़ अथवा लहसुन खाकर मस्जिद जाना और डकार लेते रहना
यदि प्रत्येक नमाज़ी नहीं, तो अधिकतर लोग यह जानते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने प्याज़ या लहसुन आदि खाकर मस्जिद आने से मना किया है, ताकि वह अपने मुंह से निकलने वाली गंध से फ़रिश्तों और इंसानों को कष्ट पहुंचाने का कारण न बने. (मुस्लिम) उसके बावजूद आप कितने लोगों को देखेंगे कि वह मस्जिद में डकार लेकर अपने मुंह की गंध से दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं.

नमाज़ में इमाम का अनुसरण न करना
जमाअत की नमाज़ में न तो इमाम से आगे निकलना चाहिए और न ही इमाम के बिल्कुल पीछे रहना चाहिए कि इमाम सज्दा से उठ जाए और वह अभी सजदे ही में हो, इमाम रुकू में चला जाए और वह अभी क्याम ही में हो. क्योंकि यह तरीक़ा अल्लाह के नबी सल्ल. के आदेश के विपरीत है जिसमें आया है कि “इमाम इसलिए बनाया गया है, ताकि उसकी ताबेदारी की जाए”. सही तरीक़ा यह है कि इमाम के साथ रुकू, सजदा और क्याम किया जाए, ताकि वास्तव में जमाअत की नमाज़ कही जा सके. और जो कोई लम्बा रुकू या सजदा करने का इच्छुक हो वह नफ्ली नमाज़ों में जैसे चाहे कर सकता है.
ख़ुतब-ए-जुमा के समय बात करना
जुमा का ख़ुतबा नमाज़ का ही भाग है, इसलिए जुमा के दिन मस्जिद में बैठ कर इमाम का ख़ुतबा ख़ामोशी के साथ सुनना चाहिए, लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग अज्ञानता के कारण देर से आने वालों को सलाम करते हैं, तो कुछ लोग बच्चों को नसीहत करते हैं, जबकि कुछ लोग ख़तीब की बात पर टिप्पणी कर रहे होते हैं, मानो वह मस्जिद में नहीं किसी सिनेमा हॊल में हैं.
नमाज़ में जंभाई लेना
जंभाई ज़ाहिर में थकान और सुस्ती की निशानी होती है, इसका कारण जो भी हो हम में से हर व्यक्ति किसी विद्वान से भेंट करते समय उसे दूर करने का सम्भवतः प्रयास करता है. तो फिर उस समय इसका ज़्यादा ही ख़्याल रखना चाहिए, जबकि नमाज़ी नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “जब नमाज़ के बीच किसी को जंभाई आ रही हो, तो सम्भवतः उसे रोक ले, क्योंकि जंभाई द्वारा शैतान अन्दर प्रवेश करता है.” (सहीह मुस्लिम, सहीह बुख़ारी) और जब शैतान नमाज़ी के अन्दर प्रवेश कर गया, तो फिर नमाज़ की ख़ैर नहीं, उसी प्रकार जंभाई लेने वाले पर शैतान हंसता है, इसलिए जिस हद तक सम्भव हो सके नमाज़ में जंभाई को रोकने का प्रयास करना चाहिए.
मुक़तदी के खड़ा होने का स्थान
पहली सफ़ पूरी होने के पश्चात मस्जिद में आने वाले जब दूसरी अथवा तीसरी सफ़ बनाना चाहते हों, तो कोई दायीं ओर की श्रेष्टा वाली हदीस के आधार पर इमाम के दायीं ओर खड़ा होने का प्रयास करते हैं, तो कोई बायीं ओर खड़े हो जाते हैं कि उस तरफ़ पंखा चल रहा होता है. हालांकि सही तरीक़ा यह है कि इमाम के बिल्कुल पीछे नई सफ़ बनाई जाए, चाहे इमाम के खड़ा होने की जगह बीच सफ़ हो या सफ़ का किनारा हो.
इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा की क़ेराअत ज़ोर से करनी
इमाम के पीछे जहरी नमाज़ों में सूरः फ़ातिहा पढ़ने की गुंजाइश ज़रूर है, परन्तु इमाम के साथ ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने लगना जिसके कारण दूसरे नमाज़ियों को कष्ट हो, किसी स्थिति में उचित नहीं. इसलिए जो लोग जमाअत में सूरह फ़ातिहा पढ़ें उन्हें चाहिए कि धीमी आवाज़ में पढ़ें, ताकि उनके साथ खड़े होने वाले नमाज़ी को तकलीफ़ न हो.

साभार ipcblogger  

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तहज्जुद की नमाज़ की सुन्नतें

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कहते हैं, तहज्जुद की नमाज़ पढ़ने वाला 72 लोगों को बख़्शवाता है... क्यों न हम भी तहज्जुदगुज़ार बनकर 72 लोगों को बख़्शवाने का ज़रिया बनें...
अल्लाह हमें राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

तहज्जुद की नमाज़
और किसी वक़्त रात में तहज्जुद पढ़ा करो जो तेरे लिए बेहतर चीज़ है, क़रीब है की तेरा रब मक़ाम महमूद में पहुंचा दे. अल क़ुरान  17:19

हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा: (रमजान के रोज़े के बाद सबसे अच्छा रोज़ा अल्लाह के सम्मानित महीने "मुहर्रम" के रोज़े हैं,  और फ़र्ज़ नमाज़ के बाद सबसे अच्छी नमाज़ रात की नमाज़ (तहज्जुद) की नमाज़ है. इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है.
1. तहज्जुद की नमाज़ के लिए सब से अच्छी संख्या ग्यारह या तेरह  रकअत है, विशेष रूप से देर देर तक खड़े रह कर. क्योंकि हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- के विषय में एक हदीस में है कि : (हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो- ग्यारह रकअत पढ़ा करते थे, यही उनकी नमाज़ थी.) इसे बुखारी ने उल्लेख किया है.
एक और बयान में है कि:(वह रात में तेरह रकअत नमाज़ पढ़ा करते थे.) इसे भी बुखारी ने उल्लेख किया है.
2- और जब रात की नमाज़ के लिए उठे तो मिस्वाक करना सुन्नत है, इसी तरह यह भी सुन्नत है कि सुरह आले-इमरान की इस आयत को :

 ( إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآياتٍ لِأُولِي الْأَلْبَابِ ((آل عمران: 190 )
 (निस्संदेह आकाशों और  धरती की रचना में और रात और दिन के आगे-पीछे बारी-बारी आने में बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ हैं.) (आले-इमरान: 190)
से लेकर सूरा के अंत तक पढ़े.

3. इसी तरह यह भी सुन्नत है कि जो दुआएं हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-से साबित हैं वे दुआएं पढ़े जिन में यह दुआ भी शामिल है:
 (اللهم لك الحمد أنت قيم السموات والأرض ومن فيهن ، ولك الحمد أنت نور السموات والأرض ومن فيهن ، ولك الحمد أنت ملك السموات والأرض ، ولك الحمد أنت الحق ، ووعدك الحق ، ولقاؤك حق ، وقولك حق ، والجنة حق ، والنار حق ، والنبيون حق)
अल्लाहुम्मा लकल हमद, अन्ता क़य्येमुस-समावाति वल-अर्ज़ व मन फि हिन्ना, व लकल हमद अन्ता नुरुस-समावाति वल-अर्ज़ व मन फि हिन्ना, व लकल हमद अन्ता मलिकुस-समावाति वल-अर्ज़, व लकल हमद अन्तल-हक्क़, व वअदुकल- हक्क़, व लिक़ाउका हक्क़, वल-जन्नतु हक्क़, व क़ौलुका हक्क़, वल-जन्नतु-हक्क़, वन-नारू हक्क़, वन-नबिय्यूना हक्क़.

(हे अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरे लिए है, तू आकाशों का और पृथ्वी का सिरजनहार और रखवाला है और जो उनमें हैं, सारी प्रशंसा तेरे लिए है, तू प्रकाश है आकाशों का और पृथ्वी का और जो उनमें हैं, और सारी प्रशंसा तेरे लिए है  तू आकाशों का और पृथ्वी का मालिक है, और सारी प्रशंसा तेरे लिए है तू हक़ है, और तेरा वचन हक़ है, और तुझ से भेंट हक़ है, और तेरी बात हक़ है, और स्वर्ग हक़ है, और नरक हक़ है, और सब पैगंबर हक़ हैं.)

4. सुन्नतों में यह भी शामिल है कि रात की नमाजों को पहले दो हलकी-फुल्की रकअतों से शुरू की जाए, यह इसलिए ताकि उन दोनों रकअतों के द्वारा बाद की नमाजों के लिए चुस्त रह सके: हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-ने कहा:(जब तुम में से कोई रात की नमाज़ के लिए खड़ा हो तो दो हलकी-फुल्की रकआतों से शुरू करे.)   इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है.

5. इसी तरह यह भी सुन्नत है कि रात की नमाज़ को हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-से साबित दुआ से शुरू करे:जिन में से एक दुआ यह है:
(اللهم رب جبريل وميكائيل وإسرافيل ، فاطر السموات والأرض ، عالم الغيب والشهادة ، أنت تحكم بين عبادك فيما كانوا فيه يختلفون إهدني لما اختلف فيه من الحق بإذنك إنك تهدي من تشاء إلى صراط مستقيم )
(अल्लाहुम्मा रब्बा जिबरीला व मीकाईला व इसराफीला, फातिरस-समावाति वल-अर्ज़, आलिमल-ग़ैबि वश-शहादा, अन्ता तह्कुमु बैना इबादिका फीमा कानू फ़ीहि यख्तलिफून, एहदिनी लिमख-तुलिफा फीहि मिनल-हक्क़ि बिइज़निका इन्नका तह्दी मन तशाउ इला सिरातिम-मुस्ताक़ीम)
(हे अल्लह! जिबरील और मीकाईल और इसराफील का मालिक! आकाशों और पृथ्वी का रचयिता, खुली और ढकी का जानने वाला, तू अपने भक्तों के बीच ऐसी हक्क़ बातों में फैसला करता है जिन में विवाद किया गया, तू मुझे अपनी दया से विवाद वाले हक्क़ में मार्ग दे, निस्संदेह तू जिसे चाहता है, सीधे रास्ते पर लाता है.) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया है.

6.  रात की नमाज़ को लंबी करना भी सुन्नत में शामिल है, हज़रत पैगंबर-उन पर इश्वर की कृपा और सलाम हो-से प्रश्न किया गया कि कौन सी नमाज़ अधिक सराहनीय है? तो उन्होंने उत्तर दिया "तूलुल-क़ुनूत" यानी देर तक नमाज़ में ठहरना.) इसे इमाम मुस्लिम ने उल्लेख किया.  इस हदीस में जो: "तूलुल-क़ुनूत"
"طول القنوت"
है उसका अर्थ है: देर तक नमाज़ में ठहरे रहना.
7.– जब सज़ा से संबंधित क़ुरान की आयत आए तो अल्लाह की पनाह माँगना भी सुन्नत है, उस समय यह पढ़ना चाहिए:
[ أعوذ بالله من عذاب الله ]

(अऊज़ु बिल्लाहि मिन अज़ाबिल्लाहि)
[मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ अल्लाह की सज़ा से).
और जब दया से संबंधित आयत आए तो दया मांगनी चाहिए और यह पढ़ना चाहिए:
[ اللهم إني أسألك من فضلك ]
(अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मिन फज़लिका)
[हे अल्लाह! मैं तुझ से तेरी कृपा मांगता हूँ]
 और जब अल्लाह की पवित्रता से संबंधित आयत आए तो अल्लाह की पवित्रता व्यक्त करे.

Courtesy rasoulallah

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मुसाफ़िर की नमाज़ का बयान

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जो शख़्स तक़रीबन 92 किलोमीटर की दूरी के सफ़र का इरादा करके घर से निकला और अपनी बस्ती से बाहर चला गया, तो शरीअत में यह शख़्स मुसाफ़िर हो गया. अब इस पर वाजिब हो गया कि कसर करे यानी ज़ोहर, असर, इशा चार रकअत वाली फ़र्ज़ नमाज़ों को दो रकअत पढ़े,  क्योंकि उसके हक़ में दो ही रकअत पूरी नमाज़ है.

मुसाफ़िर अपनी बस्ती से बाहर निकलते ही कसर शुरू कर देगा और जब तक अपनी बस्ती मे दाख़िल न हो जाए या किसी बस्ती मे पन्द्रह दिन या इस ज़्यादा दिन ठहरने की नीयत न करे, तब तक बराबर कसर ही करता रहेगा.

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Dhuhaa Salaat - Chasht (Breakfast prayer)

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When the sun has risen high and there is heat in its rays, the performance of 2,4, 6,8 or 12 rakaats is called Namaaz-e-Chaast. This is full of countless rewards.

The Traditions says that the performance of 2 rakaats wipes away all ones sins. There are 360 joints in our body and to pay Sadakah for each is Wajib (obligatory) The 2 rakaaats is enough to pay all the Sadakah. Performance of 4 rakaats places the performer's name among the Abids and is the Sunnat of Saliheen and promise the performer protection until the evening. The performer of 6 rakaats is relieved of his day's worries. Performance of 8 rakaats places his name among the Parhezgaars and the performer of 12 rakaats ensures a Golden Mansion or castle for himself in Paradise. (Ref : Tirmizi, Ibne Majah, Ahmad and Abu Yala)

The Mustahabb (preferred) time of performing Salat al-Dhuhaa is after 1/4 of the day has passed. This is deduced from a Hadith of Muslim. (Halabi; Sharah Kabeer pg.390). From many Ahaadith, we understand that Salat al-Dhuhaa should be performed after the sun has risen quiet high. Because the Fuqahaa and Muhadditheen are of the opinion that the commencement of the time of Salat al-Dhuhaa is the same as that of Ishraaq (i.e. immediately after sunrise), the Ulama have stated that 'if due to lack of time, one performs the Salat of Ishraaq and Dhuhaa together at one time, that too will be correct.' (Our Namaas pg.44)

Rasulullah is reported to have said, 'Whoever offers 2 Rakaats of Salat al-Dhuhaa, all his sins will be forgiven even though they are as much as the foam of the sea.' (Ibid)

It is reported that Sayyidna Aaisha (Radhiallaahu Anha) used to perform 8 Rakaats of Salat al-Dhuhaa. She said that even if her parents arose from the grave, she would not leave Salat al-Dhuhaa to go and meet them. (Ibid).

'Salat al-Dhuhaa consists of 2 - 12 Rakaats and it is preferable to perform 8 Rakaats.' (Raddul Mukhtaar vol.1 pg.505)


The Prophet (sallallahu alaiyhi wassallam) is reported to have said that Whoever prayed twelve rakaats at the time of Chasht, then Allah will, as reward, prepare a palace of gold for him in Paradise. [Mishkat, Tirmizi, Ibn Majah]

Courtesy amazonintl

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Prayer of Ishraq (Sunrise prayer)

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The beloved Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) has said: Those who perform the Fajr prayer in congregation (Jamaa’at), read the Zikr (remembrance of Allah) till the sun has completely arisen (length of a spear from the horizon, after 20 minutes of sunrise) and read 2 Raka-at Nafil prayer, will have the benedictions (sawaab) equal to those of Haj-Umrah. It is recommended to read the Surah Fateha and Ayyat-uk-Kursi till Khaalidoon, in the first Raka-at, and in the second Raka-at to read, after Surah Fateha, Aamanar Rasul till the end of Suratul Baqarah. In the case that this verse cannot be read from memory, one can recite any other verse and then ask Duas. Woman should read all prayers of Farz and Nafil at home and will derive the same benefits (sawaab) that accrue from prayer performed at the  Masjid (Tirmizi Shareef).

The Prophet (sallallahu alaiyhi wassallam) is reported to have said that Whoever, after finishing Fajr salat, kept sitting at the place of prayer, and prayed the Ishraq salat before getting up from there, provided he did not engage in any worldly act or conversation during that time, and instead, remained in Allah's Zikr (remembrance), then all his sins are forgiven, even if they are as much as the foarn of the ocean. [Abu Da'ud] The scholars have written that during this time, the person should take care to sit facing the Qiblah. Sheikh Shahabuddin Soharwardi  (Rahmatullahi Allaih) used to say that the action whose reward is obtained right away in this world, is that a person, after Fajr salat, facing Qiblah, does Zikr of Allah until Ishraq. After a few days the person will gain inner spiritual light (Nuraniyat).

Rasulullah is reported to have said that Allah Ta'ala says, 'O son of Aadam, perform 4 Rakaats of Salat (Ishraaq) in the early part of the day. I shall help you in accomplishing all your responsibilities during the rest of the day.' (Mishkaat pg.116)

In another narration of Tirmidhi, Rasulullah is reported to have said, 'He who performs Fajr Salat with Jamaat and remains seated in the same place while engaging in Dhikr until after sunrise and thereafter performs 2 Rakaats Nafil Salat, (Ishraaq), he will obtain the Thawaab of one Hajj and one Umrah.' (Tirmidhi).

Courtesy amazonintl

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नमाज़ का तर्जुमा

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सूरह हम्द का तर्जुमा

بِسْمِ اللّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ«1»     शुरु करता हूँ, उस अल्लाह के नाम से जो दुनिया में मोमिनों व काफ़िरों सब पर रहम करता है और आख़ेरत में मोमिनों पर रहम करेगा।
الْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ «2»   सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये मख़सूस हैं जो जहानों की परवरिश करने वाला है।
اَلرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ «3» जो दुनिया में सब पर रहम करने वाला और आख़िरत में सिर्फ़ मोमिनीन पर रहम करने  वाला है।
مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ «4» जो क़ियामत के दिन का मालिक है।
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ «5» हम सिर्फ़ तेरी इबादत करते हैं और सिर्फ़ तुझ से मदद माँगते हैं।
اِهْدِنَا الصِّرَاطَ المُسْتَقِيمَ «6» हम को सिराते मुसतक़ीम पर साबित क़दम रख।
صِرَاطَ الَّذِينَ أَنعَمْتَ عَلَيهِمْ  ऐसे लोगों का रास्ता जिन पर तूने अपनी नेअमतें नाज़िल की है।( वह पैग़म्बर और ुनके जानशीन हैं)
غَيرِ المَغضُوبِ عَلَيهِمْ وَلاَ الضَّالِّينَ उन लोगों का रास्ता नही जिन पर तूने क़हर नाज़िल किया और न उन लोगों का रास्ता जो गुमराह हैं।

सूरः ए क़ुल हुवल्लाहु अहद का तर्जुमा

بِسْمِ اللّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ«1 शुरु करता हूँ, उस अल्लाह के नाम से जो दुनिया में मोमिनों व काफ़िरों सब पर रहम करता है और आख़ेरत में मोमिनों पर रहम करेगा।
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ «2» ऐ मेरे नबी आप कह दीजिए वह अल्लाह एक है।
اللَّهُ الصَّمَدُ «3»  वह सबसे बेनियाज़ है। ( उसे किसी की अवश्यक्ता नही है)
لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ «4» न उसके कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है। 
وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ «5» यानी तमाम मख़लूक़ात में कोई उसके जैसा नही है।

रूकूअ और सजदे के ज़िक्र की तर्जुमा

سبحان ربي العظيم و بحمده मेरा अज़ीम अल्लाह हर बुराई और कमी से पाक व पाकीज़ा है और मैं उसकी हम्द कर रहा हूँ।
سبحان ربي الاعلي و بحمده. मेरा अल्लाह जो सबसे बड़ा है, वह हर बुराई और कमी से पाक व पाक़ीज़ा है और मैं उसकी हम्द कर रहा हूँ।

रुकूअ और सजदे के बाद के ज़िक्र का तर्जुमा

سمع الله لمن حمده  यानी अल्लाह, तारीफ़ करने वालों की तारीफ़ को सुनता और क़बूल करता है।
استغفر الله ربي و اتوب اليه  मैं, उस अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी चाहता हूँ जो मेरा पालने वाला है और मैं उसकी तरफ़ पलटता हूँ।
بحول الله وقوته اقوم و اقعود     यानी मैं अल्लाह की मदद और ताक़त से उठता बैठता हूँ।

क़ुनूत का तर्जुमा

 لا اله الا  الله الحليم الكريم لا اله الا  الله العلي العظيم سبحان الله رب السموات السبع و الارضين السبع و ما بينهن ورب العرش العظيم و الحمد لله رب العلمين कोई इबादत के लायक़ नही है, सिवाए उस अल्लाह के जो हिल्म और करम वाला है और कोई बंदगी के लायक नही है सिवाए उस अल्लाह के जो बुलंद मर्तबा और बुज़ुर्गी व अज़मत वाला है।  पाक व पाक़ीज़ा है वह अल्लाह जो सात आसमानों व ज़मीनों और उन दोनो उनके दरमियान की हर चीज़ और अर्शे अज़ीम का परवरदिगार है। हम्द व तारीफ़, उस अल्लाह से मख़सूस है जो तमाम मौजूदात का मालिक है।

तसबीहात का तर्जुम

سبحان الله و الحمد لله ولا اله الا الله و الله اكبر   अल्लाह तअला पाक व पाक़ीज़ा है, हम्द व तारीफ़ उसी के लिये मख़सूस है, उसके अलावा कोई माबूद नही है, अल्लाह उससे कहीँ बड़ा है कि उसकी तारीफ़ की जाये।

तशह्हुद का तर्जुमा

اشهد ان لا اله الا الله وحده لا شريك له मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अलावा कोई इबादत के क़ाबिल नही है वह अकेला है उसका कोई शरीक नही है।
و اشهد ان محمدا عبده و رسوله   और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद(स) अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।
اللهم صل علي محمد وال محمد  ऐ अल्लाह, मुहम्मद और उनकी औलाद पर रहमतें नाज़िल कर।

सलाम का तर्जुमा

 السلام عليك ايها النبي و رحمة الله و بركاته ऐ नबी, आप पर सलाम हो और आप पर अल्लाह की रहमत व बरकत नाज़िल हो।
السلام علينا  وعلي عباد الله الصالحين   हम पर और अल्लाह के तमाम नेक बंदों पर सलाम हो।
السلام عليكم  و رحمة الله و بركاته   ऐ मोमिनों, तुम पर सलाम और तुम पर अल्लाह की रहमतें और बरकतें नाज़िल हों।

ताक़ीबाते नमाज़ (नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली चीज़ें)

1141.मुस्तहब है कि इंसान नमाज़ के बाद ज़िक्र व दुआ व तिलावते क़ुरआन करे और उसी चीज़ को "ताक़ीब" कहते हैं। बेहतर है कि अपनी जगह से उठने और वुज़ू टूटने से पहले क़िबले की तरफ़ मुँह करके ताक़ीबात पढ़े और यह ज़रूरी नही कि ताक़ीबात अरबी में पढ़े, लेकिन बेहतर है कि उन चीज़ों को पढ़े जिनके बारे में दुआओ की किताबों में बयान हुआ है। जिस ताक़ीब की सबसे ज़्यादा ताकीद की गई है वह हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की तस्बीह है जिसमें 34 बार अल्लाहु अकबर, 33 बार अलहम्दु लिल्लाह और 33 बार सुब्हान अल्लाह है। सुब्हान अल्लाह को अलहम्दु लिल्लाह से पहले पढ़ सकते हैं लेकिन बेहतर यही है कि सुब्हान अल्लाह को बाद में ही कहा जाये।
1142.मुस्तहब है कि इंसान नमाज़ के बाद एक सजद ए शुक्र करे और इसके लिए इतना काफ़ी है कि इंसान अपने सर को शुक्र की निय्यत से ज़मीन पर रखदे। लेकिन बेहतर है कि 100 बार या 3 बार या 1 बार शुकरन लिल्लाह,या शुकरन, या अफ़वन, कहे। इसी तरह यह भी मुसतहब है कि जब इंसान को कोई नेमत मिले या ुससे कोई मुसीबत टले तो फ़ौरन शुक्र का सजदा करे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) पर सलवात भेजना

1143.जब इंसान पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कोई नाम जैसे मुहम्मद, अहमद, या लक़ब व कूनिय्यत जैसे मुस्तफा, अबुल क़ासिम, वग़ैरह अपनी ज़बान से ले या किसी दूसरे से सुने, तो मुसतहब है कि आप पर सलवात भेजे, चाहे नमाज़ की हालत में ही हो।
1144.पैग़म्बरे इस्लाम (स) का नाम लिखते वक़्त सलवात का लिखना मुस्तहब है। बेहतर है कि जब भी हज़रत(स) को याद करे आप पर सलवात भेजे।
Courtesy lankarani

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Nafll salat

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Special Prayers
How to perform prayers of Ishraq, Duha (Chaasht), Awabeen, Tahajjud, Tasbeeh, Hajaat to the benefits of greatness that accrue from them.

Prayer of Ishraq
The beloved Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) has said: Those who perform the Fajr prayer in congregation (Jamaa’at), read the Zikr (remembrance of Allah) till the sun has completely arisen (length of a spear from the horizon, after 20 minutes of sunrise) and read 2 Raka-at Nafil prayer, will have the benedictions (sawaab) equal to those of Haj-Umrah. It is recommended to read the Surah Fateha and Ayyat-uk-Kursi till Khaalidoon, in the first Raka-at, and in the second Raka-at to read, after Surah Fateha, Aamanar Rasul till the end of Suratul Baqarah. In the case that this verse cannot be read from memory, one can recite any other verse and then ask Duas. Woman should read all prayers of Farz and Nafil at home and will derive the same benefits (sawaab) that accrue from prayer performed at the Mosque (Tirmizi Shareef).

Salatul Duha [Chaasht]
The beloved Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) has said: For the one that has read the 12 Raka-at Salatud Duha, Allah will build for him a golden castle in paradise, and the one that always reads the 2 Raka-ats of Chaasht will have his sins forgiven even though they may be of oceanic dimensions (Tirmizi and Then Maaja). The prayer of Chaasht consists of 2 Raka-at and of a maximum of 12 Raka-ats. It should be read between the time the sun has completely risen from the horizon and before Zawal (zenith of the sun).

Salatul Awwabeen
This Nafil prayer is read after the Farz (Fard) and Sunnat of Maghrib. It consist of a minimum of 6 Raka-ats and this Nafil prayer procures many benedictions (blessings) and mercy.
Prayer of Tahajjud
Our Master, the beloved Prophet Muhammad (sallal laahu alaihi wasallam) has said: In Paradise there is a castle reserved for those who read Tahajjud and the Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) further adds, those who pray at night will enter paradise without having to account for their acts in this life. The Nafils of Tahajjud are read after the Esha prayer, but it is important to sleep before performing Tahajjud. The prayer consists of a minimum of 2 Raka-ats, and a maximum of 8 or 12 Raka-ats (to be read according ones capacity).
After Esha prayers sleep for some time, then wake up any time during the night before the rise of morning for Tahajjud prayers. With the performance of 2 Rakats you have duly achieved your Tahajjud. However, the performance of 8 Rakats in Sunnat, and complying with the practice of the Holy Saints of Islam and performing 12 Rakats is commendable.
It is recommended that you recite in your prayers as much of the Sacred Quran as you know. If you happen to know by heart the whole of the Sacred Quran you may, in at least 3 nights or most 4 nights of Tahajjud effectuate the complete reading of the Sacred Quran.
Otherwise, you may recite 3 Surah Ikhlas (Qul Hu Allahu Ahad) after your "Alhamdu..." in every Rakat and you will thus derive full benefits of the full recital of the Sacred Quran in every Rakat.

Salatul Tasbih
Our beloved Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) had taught this Nafil prayer to his Uncle, Hazrat Abbas (RA) and told him; He who performs this prayer will have his past and future sins forgiven. The Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) has recommended to read this prayer daily on each Friday or once a month or once a year, in case of this not being possible, to read it even once in one’s life. This Nafil prayer provides limitless benefits both in the material and spiritual life.

How to perform this Nafil
After having pronounced one’s intention (Niyat), say Allaho-Akbar, read "Subhanaka-Alla humma" completely (Sana), read now 15 times "Subhaanallah wal hamdo Lillaah wala illaha Illallah Wallah-o-Akbar." Then read Aoozu billah and Bismillah (completely) and Surah Fateha. Then recite 10 times the Tasbih mentioned above and go to Ruku. Here also recite 10 times the Tasbih before raising yourself to read another 10 times the same Tasbih, this time in a standing position. Then prostrate (Sajdah) and read 10 times the Tasbih, sit now and read again 10 times this Tasbih (Jalsa) and prostrate again, Tasbish 10 times in the 2nd Raka-at begin by reading 15 times this Tasbih before reading "Bismillah" and Surah Fateha. After that read 10 times the Tasbih and then proceed as in the first Raka-at. To end the second Raka-at, read as usual "Attahiyat", "Durood" and "Duas". Then read 2 other Raka-ats. As in each Raka-at the Tasbih is recited 75 times, it means that in all 4 Raka-at the Tasbih is read 300 times. In the other 2 Raka-at, after "Subhana Rabbiyal-azeem", read the Tasbih 75 times and in the Sajdah (prostrations after Subhaan Rabbiyal-ala) read again 75 times the Tasbih.
Note: No fixed time has been prescribed for this prayer, a fact, which means that besides any time prohibited this prayer, can be read at any time.

Salatul Hajaat
In case of difficulty, illness or of authorized necessity this prayer is read. The beloved Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) had taught this to a blind person who, as soon as he performed it, regained his eyesight. (Tirmizi Shareef Tibrani)
To perform this prayer it is recommended to wear one’s best and clean clothes and to perform pleasingly one’s ablution (Wudu). Then 2 Raka-ta Nafil is read in the usual way, after salaam this dua is read:
Allahuma Inni As-aloka wa (Atawassalo) Wa Atawajjaaho ilaika be nabbiyeka Muhammadin nabi yir Rahmate ya Rasullulah. Inni tawajjahto be ka ila Rabbi fi hajaati haa-zehi (here we make our requests (le tuqza li) Allahumma fashaffiho fiya
Translation: O Allah I implore You and I come near You through the intermediary of Your Prophet (Nabee) Muhammad (sallal laahu alaihi wasallam) who is the Prophet of Grace. Ya Rasullullah, through your intercession I implore Allah to accept my request. O Allah grant the intercession of your Prophet (sallal laahu alaihi wasallam) in my favor.



Courtesy sunnirazvi

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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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