फ़ज्र की दो रकअतें

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एक बार जिब्राईल (अस) ने अर्ज़ किया-
या अल्लाह मैं आपकी इबादत करना चाहता हूं.
अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने फ़रमाया- कर लो.
उन्होंने दो रकअत नमाज़ की नीयत बांधी. उन्होंने एहतराम के साथ नमाज़ अदा की और 40 साल के बाद सलाम फेरा.
अल्लाह ने फ़रमाया कि तुमने बहुत अच्छी नमाज़ पढ़ी, लेकिन एक उम्मत आने वाली है, जिसकी फ़ज्र की दो सुन्नतें, तेरी इन दो रकअतों से बढ़कर होंगी.

* हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-
फ़ज्र की नमाज़ से पहली की दो रकअतें (सुन्नत) दुनिया और दुनिया की तमाम चीज़ों से ज़्यादा बेहतर हैं.
(सही मुस्लिम)
आइये फ़ज्र की नमाज़ का एहतमाम करें, ताकि दुनिया की अफ़ज़ल चीज़ें हमें हासिल हो जाएं, आमीन

Ek Bar Jibrail (AS) Ne Arz Kiya
Ya Allah Mai Apki Ibadat Karna Chahta Hoon.
Allah Rab-ul-izzat Ne Farmaya Karlo.
Unhone 2 Rakat Namaz Ki Niyat Bandhi.
Unhone Is Ehtmam K Sath Namaz Ada Ki Aur 40,000 Sal K Bad Salam phera.
Allah Ne Farmaya K Tumne Bahut Achchhi Namaz Padh,i Lekin Ek UMMAT Aane wali Hai Jiski FAJAR Ki 2 Sunnaten Teri In 2 Rakaton Se Badkar hongi.

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हक़

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इंसान सोचता है कि वह दुखी है, परेशान है, तकलीफ़ में है... अगर वो उन लोगों को देख ले, जिनके सर पर छत होना तो दूर की बात है, उनके पास पेटभर खाना तक नहीं है, पीने के लिए साफ़ पानी तक नहीं है... य़क़ीनन उसे लगेगा कि वाक़ई वो बहुत ख़ुशहाल है...
इस दुनिया में जब तक एक भी इंसान भूखा है, बेघर है, हक़ीक़त में तब तक हम इंसान कहलाने के लायक़ नहीं हुए हैं...हमें इंसान बनना है अभी... हमारे खाने में, हमारी चीज़ों में उन लोगों का भी हक़ बनता है, जो बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों से महरूम हैं... हमें उनक़ा हक़ देना ही चाहिए...
फ़िरदौस ख़ान

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मुआफ़ करना सीखो

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ज़बान का एक बोल सब कुछ बर्बाद कर देता है या आबाद कर देता है. माफ़ करना सीखो. हमारे नबी को सब ज़्यादा दुख- तकलीफ़ ताएफ़ वालों ने दी. आप (सअस) को  पत्थरों से मार कर लहूलुहान कर दिया. आप (सअस) बेहोश हो गए. ख़ुद नबी (सअस) फ़रमाते- सारी ज़िन्दगी में जितनी तकलीफ़ ताएफ़ ने पहुंचाई और किसी ने नहीं पहुंचाई. मगर जब वे लोग ईमान लाने आए, तो आपने (सअस) ने उन्हें भी गले से लगाया. उनके साथ रोज़ रात का खाना खाते. एक रोज़ तिलावत की वजह से खाना नहीं खा सके, तो उनसे माफ़ी मांगी. ये वे लोग थे, जिन्होंने आपको (सअस)जिस्मानी तकलीफ़ दी थी.
अब दो लोग और आए, वे भी ईमान लाए. एक आप (सअस) के चाचा का बेटा अबु सुफ़यान बिन हारिस, दूसरा आप (सअस) की फुफी का बेटा अबदुल्लाह बिन अबी उमय्या. जब ये दोनों ईमान लाए आए, तो आप (सअस) ने मना कर दिया और कहा- मुझे नहीं मिलना इनसे. इन्होंने मुझे बहुत बुरा-भला कहा है. अबु सुफ़यान मेरे बारे में बुरे बुरे शेअर कहता था.
और अबी उमय्या ये वह है, जिसने हरम में खड़े होकर कहा था- तुम अल्लाह से क़ाग़ज़ पर लिख कर लाओ, साथ में चार फ़रिश्ते लाओ, तब भी मैं तुमको नबी नहीं मानूंगा. इन्होंने मेरा दिल दुखाया है. उम्मे-सलमा ने कहा या रसूल अल्लाह आपने तो ग़ैरों को भी माफ़ किया है. इन्हें भी माफ़ कर दें. आपने कहा- ठीक है.
ज़बान का निकला एक बोल बहुत गहरा ज़ख़्म देता है. बर्दाश्त करना सिखो, माफ़ करना सीखो. नबी (सअस) का हुकुम है. अमल करना सीखो.
कबीर अली

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हर मुश्किल से निजात की दुआएं

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 हर मुश्किल का हल




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पांच नमाज़ों के बाद पढ़ने की तस्बीह

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फ़ज्र की नमाज़ के बाद हुवल हय्युल क़य्युम सौ बार पढ़ें
ज़ुहर की नमाज़ के बाद हुवल अलिउल अज़ीम  सौ बार पढ़ें
अस्र की नमाज़ के बाद हुवर रहमानुर्रहीम सौ बार पढ़ें
मग़रिब की नमाज़ के बाद हुवल ग़फ़ूरुर्रहीम सौ बार पढ़ें
इशा की नमाज़ के बाद हुवल लतिफ़ुल ख़बीर सौ बार पढ़ें

Paanch Namazon Ke Padhane Ki Tasheeb 
Fazr ki namaz ke baad : Huwal Haiyul Qayyum (100 baar)
Zohar ki namaz ke baad : Huwal Aliyul Azim (100 baar)
Asar ki namaz ke baad : Huwar Rahmanur Rahim (100 baar)
Maghrib ki namaz ke baad : Huwal-Gafurrur Rahim (100 baar)
Isha ki namaz ke baad : Huwal Latiful Khabir (100 baar)

साभार पाकिस्तानी पंजसूरह

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ग़ौसे-आज़म और सलाम

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हज़रत ग़ौसे-आज़म रहमतुल्ला अलैह की जब पैदाइश हुई, तो आपके साथ जितने भी बच्चे पैदा हुए सब कामिल वली गुज़रे. उन्होंने अपनी मां के पेट में ही 11 पारे हिफ़्ज़ कर लिए थे.
आप एक बार घर के बाहर खड़े थे. उस वक़्त वहां से एक बुज़ुर्ग का गुज़र हुआ. बुज़ुर्ग हज़रत ने सुन्नत अदा करते हुए आपसे पहले सलाम किया, तो ग़ौसे-आज़म सैयद मोईनुद्दीन अब्दुल क़ादिर जिलानी सलाम सुनकर जवाब कुछ इस तरह देते हैं-
वालेकुम अस्सलाम वरहमतुल्लाही वबरकतुहु
वालेकुम अस्सलाम वरहमतुल्लाही वबरकतुहु
इस पर बुज़ुर्ग हज़रत हैरान होकर पूछते हैं- बेटे अब्दुल क़ादिर ! मैंने तो एक बार सलाम किया, फिर आपने दो बार जवाब क्यों दिया ?
इस पर ग़ौसे-आज़म इरशाद फ़रमाते हैं- मैंने दो बार जवाब इसलिए दिया, क्योंकि एक बार अभी आपपने सलाम किया. और याद कीजिए जब मैं अपनी मां के पेट में था, तब आप आए थे और आपने सलाम किया था.
बुज़ुर्ग हज़रत हैरान होकर अर्ज़ करते हैं- तो आपने उस वक़्त सलाम का जवाब क्यों नहीं दिया ?
ग़ौसे-आज़म इरशाद फ़रमाते हैं- उस वक़्त मैं अपनी मां के पेट में था. अगर उस वक़्त जवाब देता, तो मेरी अम्मी जान घबरा जातीं. इसलिए मैंने आज ये वाजिब अदा किया.
एक बार आप बाहर खेल रहे थे, तो अपनी मां से अर्ज़ करते हैं- अम्मी जान आपको याद है, जब मैं आपके पेट में था, तब आप अंगूर के बागीचे में अंगूर तोड़ रही थीं, तब आपके पेट में ज़ोर से दर्द होना शुरू हो गया था.
फिर दर्द रुक गया और फिर अंगूर तोड़ने लगीं, तो फिर दर्द होने लगा, तो आपने अंगूर तोडना छोड़ कर आप घर आ गईं.
आपकी वालिदा मोहतरमा बड़ी हैरानी के साथ पूछती हैं- हां, बेटे पर तुम्हें कैसे पता ?
ग़ौसे-आज़म मुस्कुराकर इरशाद फ़रमाते हैं- अम्मी जान वो दर्द मैंने ही जब बूझकर आपके पेट में हरकत करके पैदा किया था. इस पर आपकी अम्मी जान कहती हैं- बेटे आपको पता है कि मां को तकलीफ़ पहुंचाना कितना बड़ा गुनाह है.
ग़ौसे-आज़म इरशाद फ़रमाते हैं- अम्मी जान ! आपको उस वक़्त अंगूर नज़र आ रहे थे, लेकिन अंगूर के गुच्छे के अंदर छुपा काला स्याह बिच्छू नज़र नहीं आ रहा था. वो बिच्छू मैंने देख लिया था, तभी मैंने हरकत की, ताकि आपको दर्द हो, जिससे आप अंगूर को न तोड़ें और काले बिच्छू से बच जाएं. और ऐसा ही हुआ भी. 

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शाने-ग़ौसे आज़म

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ये हज़रत सैयद मोईनुद्दीन अब्दुल क़ादिर अल-जिलानी अल-हसनी अल-हुसैनी का महीना रबीउल आख़िर है. इस माह की ग्यारह तारीख़ को ग़ौस-ए-आज़म की नियाज़ दिलाई जाती है.
कौन हैं ग़ौसे-आज़म
* जिन्होंने मां के पेट में ही 11 पारे हिफ़्ज़ किए
* जिन्होंने फ़रमाया- मैं इंसानों का ही नहीं, बल्कि जिन्नात का भी पीर हूं
* जिन्होंने फ़रमाया- जो मुझे अपना पीर मानेगा, वो मेरा मुरीद है
* जिन्होंने फ़रमाया- मैं मशरिक़ में रहूं और मेरा मुरीद मगरिब में मुझे पुकारेगा, तो मैं फ़ौरन उसकी मदद को आऊंगा
* जिन्होंने एक पल में बारह साल पहले डूबी हुई कश्ती को ज़िन्दा बारातियों के साथ निकाला
* जिनके हुज़ूर-ए-पाक में एक चोर चोरी की नीयत से आया और वक़्त का क़ुतुब बन गया
* जिन्होंने एक हज़ार साल पुरानी क़ब्र में दफ़न मुर्दे को ज़िन्दा कर दिया
* जिन्होंने फ़रमाया- वक़्त मुझे सलाम करता है, तब आगे बढ़ता है
* जिन्होंने अपने धोबी को हुक़्म दिया कि क़ब्र में मुन्कर नक़ीर सवाल पूछे, तो कह देना मैं ग़ौसे-आज़म का धोबी हूं, तो बख़्शा जाएगा
* जो अपने मुरीदों के लिए इरशाद फ़रमाते हैं कि जब तक मेरा एक-एक मुरीद जन्नत में नहीं चला जाए, तब तक अब्दुल क़ादिर जन्नत में नहीं जाएगा.
* जिनका नाम अगर किसी सामान पर लिख दिया जाए, तो वो सामान कभी चोरी नहीं होता

होता है, होता ही रहेगा चर्चा ग़ौसे-आज़म का
बजता है, बजता ही रहेगा डंका ग़ौसे-आज़म का
देखने वालो, चल कर देखो आस्तान-ए-"अब्दुल क़ादिर"
चांद के जैसा चमक रहा है रौज़ा ग़ौसे-आज़म का

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सवाब

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हम कोई आलिम नहीं हैं, आमिल नहीं हैं... बस हमारी यही कोशिश है कि हमने अपने बड़ों से जो अच्छी और दीनी बातें सीखी हैं, उन्हें दूसरों तक पहुंचा सकें... आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की तहरीरों को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाकर इस नेक मुहिम में हिस्सेदार बनें. ये काम भी सदक़ा-ए-जारिया है- फ़िरदौस ख़ान
-----------
* प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.

* हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- जब आदमी मर जाता है, तो उसका अमल रुक जाता है, मगर तीन चीज़ों का सवाब जारी रहता है-
1. सदक़ा-ए-जारिया का
2. उस इल्म का, जिससे लोग फ़ायदा उठाएं.
3. नेक औलाद का, जो उसके लिए दुआ करे
(सहीह मुस्लिम, जिल्द 3, किताबुल-वसिया, हदीस 4005)

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याद्दाश्त के लिए दुआ

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 याद्दाश्त के लिए दुआ


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दरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत

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दरूद शरीफ़
* अल्ला हुम्म सल्लि अला सय्यिदिना व मौलाना मुहम्मदिव व अला आलि सय्यिदिना व मौलाना मुहम्मदिव
व बारिक वस्ल्लिम.



अल्लाह हम सबको कसरत से दरुद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन

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गुमशुदा चीज़ों के लिए दुआ

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कोई भी चीज़ रखते हुए एक ही सांस में तीन बार बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़कर चीज़ पर दम कर दें. इंशा अल्लाह वो चीज़ चोरी नहीं होगी.

गुमशुदा या चोरीशुदा चीज़ के लिए दुआ

कोई चीज़ गुम हो जाए, तो कोई सा भी दरूद शरीफ़ पढ़ते हुए उसे तलाशें... इंशा अल्लाह गुमशुदा चीज़ फ़ौरन मिल जाएगी


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तस्बीहे-फ़ातिमा

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तस्बीहे-फ़ातिमा... हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की तस्बीह है, जिसमें 34 बार अल्लाहु अकबर, 33 बार अलहम्दु लिल्लाह और 33 बार सुब्हान अल्लाह है.

ये तस्बीह हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहू अलैहि वसल्‍लम) ने अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) को बताई थी.
ये तस्बीह हर परेशानी का हल है... इसे पढ़ने से थकान भी उतर जाती है.
हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तस्बीहे-फ़ातिमा पढ़ें, इंशाअल्लाह इसकी बरकत से अल्लाह कामयाबी अता करेगा.

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بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये बलॊग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को समर्पित करते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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इस बलॊग में इस्तेमाल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं
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