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रमज़ान और ग़रीबों का हक़

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-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
रमज़ान आ रहा है. जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लम्बे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं. इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं.
हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते.
ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम का फ़रमान है.
आप सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम फ़रमाते हैं- "रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं."
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें. अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है.

तस्वीर गूगल से साभार

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ग़ुज़ारिश : ज़रूरतमंदों को गोश्त पहुंचाएं

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ईद-उल-अज़हा का त्यौहार आ रहा है. जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं. तीन दिन तक एक ही घर में कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं. इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है. एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है..जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं.
ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती. ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं..राहे-हक़ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक गोश्त पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं.
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक पहुंचाएं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं. आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है.

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ज़कात से मदद

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रमज़ान में सब अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक़ ज़कात निकालते हैं... फ़ितरा निकालते हैं... इसके अलावा भी राहे-हक़ में पैसे ख़र्च करते हैं... हमने देखा है कि अकसर लोग इस बात को तरजीह देते हैं कि मस्जिद में ख़ूबसूरत टाइल्स लगवा दी जाएं, एसी लगवा दिया जाए...

बेशक मस्जिद में ख़ूबसूरत टाइल्स लगवाएं, एसी लगवाएं...  हमारा अपना मानना है कि क्यों न हम इन पैसों से उन लोगों की भी मदद करें, जो बेसहारा हैं, मजबूर हैं, बेबस हैं, जिनके यहां कोई कमाने वाला नहीं है, जो मेहनत-मशक़्क़त करके भी मुश्किल से ज़िन्दगी गुज़ार रही हैं... अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों ख़ासकर ऐसी मज़लूम औरतों का पता लगाकर इन पैसों से उनकी इतनी मदद कर दी जाए कि वे दो वक़्त भरपेट खाना खा सकें, अपना इलाज करा सकें, ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद सकें...

इसके अलावा जिन इलाक़ों में नल यानी हैंडपंप नहीं हैं, वहां नल लगवा दिए जाएं, ताकि लोगों को पानी मिल सके...

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पढ़ें, अमल करें और सवाब हासिल करें

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क़यमात के रोज़ इंसान एक-एक नेकी के लिए तरसेगा... उस वक़्त हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र होगी... कोई किसी को मांगने पर भी नेकी न देगा... इसलिए बेहतर यही है कि इंसान अपने आमाल से नेकियां हासिल करे, जो उसकी मग़फ़िरत का ज़रिया बन सकें...
पेश हैं कुछ तस्बीह, जिन्हें पढ़कर आप सवाब हासिल कर सकते हैं.

1. सवाल : क्या आज आप ने जन्नत में एक महल बनाया?
जवाब: दस बार सूरह इख़लास पढ़कर [अहमद]

2. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में खजूर के 100 दरख़्त लगाए ?
जवाब:  100 बार सुब्हानल्लाहिल-अज़ीम वबिहम्दिही पढ़कर. [तिर्मिजी]

3. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में 400 दरख़्त लगाए ?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर, पढ़कर. [इब़्न माजह]

4. सवाल : क्या आज आपने एक क़ुरआन मजीद पढ़ने का सवाब कमाया?
जवाब: तीन बार सूरह इख़लास पढ़कर. [मुस्लिम]

5. सवाल: क्या आज आपने करोड़ों नेकियां कमाईं?
जवाब: मोमिनों के लिए दुआ-ए-मग़फ़ित करके. [तबरानी]

6. सवाल: क्या आज आपने जन्नत मे एक घर बनाया?
जवाब: नमाज़ के लिए सफ़ की ख़ाली जगह को भरकर. [इब्न माजह]

7. सवाल: क्या आज आपने एक हज का सवाब कमाया?
जवाब: फ़र्ज़ नमाज़ के लिए घर से अच्छी तरह वज़ू करके जाकर. [अबु दाऊद]

8. सवाल: क्या आज आपने ज़मीन और आसमान की ख़ाली जगह भरकर नेकियां कमाईं?
जवाब: 100 बार ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़कर. [अहमद]

9. सवाल: क्या आज आपने अल्लाह की राह में 100 घोड़े देने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर. [अहमद]

10. सवाल: क्या आज आपने मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में 100 ऊंट क़ुर्बान करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्लाहु अकबर पढ़कर. [अहमद]

11. सवाल: क्या आज आपने 100 ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह पढ़कर. [अहमद]

12. सवाल: क्या आज आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत हासिल करने वाला अमल किया?
जवाब: सुबह व शाम दस-दस बार दुरूद शरीफ़ पढ़कर. [तबरानी]

13. सवाल: क्या आज आपने वह अमल किया, जिस जैसा अमल क़यामत के दिन लेकर आने वाला कोई न होगा सिवाय उसके जो इस जैसा अमल करे?
जवाब: 100 बार सुब्हानल्लाही वबिहम्दिही पढ़कर. [मुस्लिम]

14. सवाल: क्या आज आपने पूरी रात इबादत करने का सवाब कमाया?
जवाब: नमाज़-ए-इशा और नमाज़-ए-फ़ज्र बा जमाअत पढ़कर. [मुस्लिम]

15. सवाल : क्या आज आपने वज़ू के बाद वह दुआ पढ़ी, जिसके सवाब को क़यामत के दिन तक कोई चीज़ नहीं मिटा सकती?
जवाब: सुब्हाना कल्लाहुम्मा वबिहम्दिका अश-हदू अन ला इलाहा इल्ला अन्ता अस्तग़फ़िरूका वातुबू इलैक. [हाकिम]

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.




आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए. 
फ़िरदौस ख़ान


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गुर्दे की पत्थरी का इलाज

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शहद, नींबी के रस और ज़ैतून के तेल को एक-एक चम्मच आधे गिलास पानी में मिला लें और निहार मुंह पी लें. इंशा अल्लाह 15 से 20 दिन में पत्थरी रेत बनकर निकल जाएगी.



गुर्दे की पत्थरी का रूहानी इलाज
Treatment for kidney stones





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शुगर का इलाज...

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शुगर का इलाज
100 बादाम (कोई कड़वा न हो)
100 काली मिर्च के दाने
100 छोटी हरी इलायची (छिलके समेत)
100 नीम के पत्ते धुले हुए (ख़ुश्क कर लें)
250 ग्राम काले चने भुने हुए (छिलके समेत)

ये सारी चीज़ें पीस लें. दिन में किसी भी वक़्त आधा छोटा चम्मच खा लें. इंशा अल्लाह शुगर का यक़ीनी ख़ात्मा हो जाएगा.
Treatment for kidney sugar


Treatment for kidney sugar

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बैत होना (मुरीद होना)

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हम चिश्तिया सिलसिले से ताल्लुक़ रखते हैं... तक़रीबन दस साल पहले हम बैत हुए थे... बैत होने के बारे में एक तहरीर पेश है-
सूफ़िया किराम के यहां ये सब से अहम तरीन रूक्न है, जिसके ज़रिये तालिम व तरबियत, रशदो हिदायत और इस्लाह अहवाल का काम शुरू होता है.
बैअत-ए-शैख़ अल्लाह के हुक्म से और हुज़ुरे अकरम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल से साबित है. अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है कि बेशक जो तुम्हारे हाथों में बैअत करते हैं हक़ीक़तन वो अल्लाह के हाथों पर बैअत करते हैं, अल्लाह का हाथ उनके हाथों पर है. बैअत का अमल हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल "बैअत-अर-रिज़वान" से बतरिकए ऊला साबित है. कुछ अहले-इल्म में नज़दीक बैअत वाजिब है और कुछ ने बैअत को सुन्नत कहा है. बल्कि एक गिरोह कसीरा ने इसे सुन्नत ही कहा है.
बैअत की कई क़िस्में होती हैं- जैसे बैअत-ए-इस्लाम, बैअत-ए-ख़िलाफ़त, बैअत-ए-हिजरत, बैअत-ए-जिहाद, बैअत-ए-तक़वा वग़ैरह. लेकिन तज़किया-ए-नफ़्स और तसफ़िया-ए-बातिन के लिए जो सूफ़िया किराम बैअत करते हैं, वो कुरबे इलाही का ज़रिया बनते हैं और तसव्वुफ़ में इसी बैअत को "बैअत-ए-शैख़" कहते हैं.
जब कोई बैअत व इरादत का चाहने वाला हाज़िर होता है और इज़हारे-ग़ुलामी व बन्दगी के लिए हल्क-ए-मुरीदैन में शामिल होना चाहता है, तो उसको का हाथ अपने हाथ में लेकर हल्क-ए-इरादत और तरीक-ए-ग़ुलामी में दाख़िल किया जाता है.
फिर तालिब से पूछते हैं कि वो किस ख़ानवाद-ए-मारफ़त (क़ादिरिया, चिश्तिया, अबुलउलाई वग़ैरह) में बैअत कर रहा है और उससे सुनते हैं वो किस ख़ानवाद- ए-तरीकत में दाख़िल हुआ. शिजर-ए-मारफ़त के सरखेल का नाम लेते हुए सिलसिला ब सिलसिला अपने पीर के ज़रिये अपने तक पहुंचाते हैं और कहते हैं कि क्या तू इस फ़क़ीर को क़ुबूल किया? तालिब कहता है कि दिलो-जान से मैंने कुबूल किया, इस इक़रार के बाद उसे तालिमन कहते हैं कि हलाल को हलाल जानना और हराम को हराम समझना और शरीअते-मुहम्मदी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़दम जमाए रखना. (फ़िलहम्दोअलिल्लामह अला जुल्क)
अकाबिरों के नज़दीक वसीला से तवस्स‍ले मुर्शिद ही है. हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहीम, शाह वलीउल्लाह मुहद्दीस और शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दीस देहलवी साहेबान का भी यही मानना है. यहां तक कि वहाबियों के सरगना इस्माइल देहलवी का भी यह कहना है कि- 'क़ुरआन में सूरे बनी इसराइल के रुकूअ 6 में रब तआला ने शख़्स अकरब अलीउल्लाइह के लिए वसीले ही के लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया है.'
इसमें कोई शक नहीं है कि अल्लाह की बारगाह के मुकर्रेबीन का वसीला ही वो वसी है, जिसके हासिल करने की हिदायत, अल्लाह तआला ने क़ुरआन में फ़रमाई.

Courtesy : qhizr

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जन्नतुल फ़िरदौस का सवाल करो...

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जब तुम अल्लाह से सवाल करो, तो जन्नतुल फ़िरदौस का सवाल किया करो, क्योंकि वह जन्नत का आला और अफ़ज़ल हिस्सा है. (बुख़ारी फ़िल तारीख़ :4/146)
اللھم انی اسئلک الجنة الفردوس
अल्लाहुम्मा इन्नी असआलुकल जन्नतुल फ़िरदौस...
तर्जुमा- ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नतुल-फ़िरदौस का सवाल करता हूं.

जन्नत का सवाल और जहन्नम से पनाह
जो शख़्स अल्लाह पाक से तीन बार जन्नत का सवाल करे, तो जन्नत कहती है- ऐ अल्लाह ! इसको जन्नत में दाख़िल कर दे और जो  शख़्स तीन बार जहन्नम से पनाह मांगे, तो जहुन्नम कहती है- ऐ अल्लाह ! इसको जहन्नम से बचा ले. [सही तिर्मिज़ी]

اَللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ
तर्जुमा- ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जहन्नुम से पनाह मांगता हूं.

ऐ अल्लाह! हम तुझ से जन्नत का सवाल करते हैं और जहन्नम से तेरी पनाह मांगते हैं. आमीन




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तिब्बे-नबवी

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गर्म कपड़े

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हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ें वहीं अच्छी लगती हैं, जहां उनकी ज़रूरत होती है...

सबसे ख़ास बात... किसी को अपने कपड़े या दूसरी चीज़ें देते वक़्त इस बात का ख़्याल ज़रूर रखें कि जिन्हें चीज़ें दी जा रही हैं, उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास न हो... कपड़े ज़्यादा पुराने, फटे हुए या फिर रंग से बेरंग हुए न हों...  चीज़ें ऐसी होनी चाहिए, जिनका इस्तेमाल किया जा सके...

ख़ुदा को वो लोग बहुत पसंद हैं, जो उसके बंदों से मुहब्बत करते हैं...
फ़िरदौस ख़ान

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मानवता को समर्पित अब्दुल सत्तार ईधी

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फ़िरदौस ख़ान
ग़रीबों के मसीहा और इंसानियत परस्त अब्दुल सत्तार ईधी जनसेवा के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. उन्होंने जनसेवा को अपनी ज़िन्दगी का मक़सद बनाया और मानवता को अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी.  वे कहते थे, " मेरा मज़हब इंसानियत है, जो हर मज़हब का मूल है. लोग शिक्षित तो हो गए, लेकिन इंसान न बन सके." वे देश की सरहदों, मज़हब और जात-पांत की परवाह किए बग़ैर इंसानियत के काम करते थे. वे कहा करते थे, "आपको हर उस प्राणी की देखभाल करनी है, जिसे अल्लाह ने बनाया है. मेरा मक़सद हर ज़रूरतमंद की मदद करना है. उन्होंने भूखों को खाना दिया, बेघरों को छत दी, मरीज़ों का इलाज कराया. अपनी ज़िन्दगी में उन्होंने हज़ारों यतीम बच्चों की परवरिश की. सादगी पसंद ईधी दो जोड़े कपड़ों और एक जोड़ी चप्पल में बरसों गुज़ार देते थे.  अमेरिका ने उन्हें दुनिया के महान मानवतावादियों में शुमार क़रार दिया है.

उनका जन्म 1 जनवरी 1928 को गुजरात के बंटवा में हुआ था. उनके पिता अब्दुल शकूर ईधी का जूनाग़ढ़ में कपड़े का कारोबार था. अब्दुल सत्तार ईधी बचपन से ही दूसरों का भला चाहने वाले थे. बचपन में उनकी मां ग़ुरबा ईधी उन्हें दो पैसे दिया करती थीं. एक पैसे वे ख़ुद पर ख़र्च करते और एक पैसा किसी ज़रूरतमंद को दे दिया करते थे. वे जब सिर्फ़ 11 साल के थे, तब उनके मां को लकवा मार गया था, जिससे उनके दिमाग़ पर भी असर हुआ. उन्होंने अपनी मां की जी-जान से ख़िदमत की.

साल 1947 में बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. वहां उन्होंने ठेला लगाकर कपड़े बेचे, फेरी भी लगाई. फिर वे कराची के थोक बाज़ार में कपड़ों के एजेंट बन गए. कुछ वक़्त बाद उनकी मां का इंतक़ाल हो गया. मां की मौत का उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने काम छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी समाज को समर्पित कर दी. वे दिन रात मेहनत-मज़दूरी करके जनसेवा के लिए पैसे इकट्ठे करते. उनके एक दोस्त हाजी ग़नी उस्मान ने उनकी मदद की. उनसे मिलने वाले पैसों से उन्होंने एक गाड़ी ली, एक डिस्पेंसरी खोली और एक तंबू में चार बिस्तरों का अस्पताल स्थापित किया. उन्होंने गाड़ी चालनी सीखी और इसी गाड़ी को एम्बुलेंस के तौर पर इस्तेमाल करने लगे. वे कहते थे, "मैंने ज़िंदगी में कभी कोई और गाड़ी नहीं चलाई, 48 साल तक सिर्फ़ एंबुलेंस चलाई." अस्पताल में लोगों का मुफ़्त इलाज किया जाता था.  उन्हें दवाइयां भी मुफ़्त दी जाती थीं. वे अपनी एंबुलेंस में दिन भर शहर के चक्कर लगाते रहते और जब भी किसी ज़रूरतमंद या ज़ख़्मी को देखते, तो उसे फ़ौरन अपने अस्पताल ले आते. अस्पताल के ख़र्च पूरे करने के लिए वे रात को शादियों में जाकर बर्तन धोते थे, दूध बेचते थे, अख़बार बेचते थे. उन्हें लोगों की मदद मिलने लगी. उन्होंने पत्नी बिलकिस के साथ मिलकर ईधी फ़ाउंडेशन की स्थापना की. किसी भी तरह के भेदभाव के बिना फ़ाउंडेशन की सेवाओं सभी को दी जाती हैं.  वे कहते थे, " कई सालों तक लोग मुझसे शिकायत करते और पूछते थे कि " आप ईसाई और हिन्दुओ को क्यों अपनी एम्बुलेंस में ले जाते हो? और तब मैं कहता, " क्योंकि मेरी एम्बुलेंस तुम लोगो से ज़्यादा बड़ी मुस्लिम है." वे कहते थे, "सिर्फ़ मुसलमानों का काम न करो, तमाम इंसानियत का काम करो."
वे कहते थे, "मैंने कभी औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की. क्या फ़ायदा ऐसी शिक्षा का जब वह हमे एक इंसान नहीं बनाती? मेरा विद्यालय तो मानवता की सेवा है"

उनकी मदद की पहली सार्वजनिक अपील पर दो लाख रुपये का चंदा इकट्ठा हुआ था. उनका कहना था, "ये मेरी नीयत नहीं थी कि मैं किसी के पास जाकर मांगूं, बल्कि मैं चहता था कि क़ौम को देने वाला बनाऊं. फिर मैंने फ़ुटपाथों पर खड़ा रहकर भीख मांगी. थोड़ी मिली, लेकिन ठीक मिली. जल्द ही लोग आते गए और कारवां बनता गया.

साल 1997 में इदी फ़ाउंडेशन को गिनीज़ बुक में दर्ज किया गया. गिनीज विश्व कीर्तिमान के मुताबिक़ इदी फ़ाउंडेशन के पास दुनिया की सबसे बड़ी निजी एम्बुलेंस सेवा हैं. यह फ़ाउंडेशन पाकिस्तान समेत दुनिया के कई देशों में सेवाएं दे रही है. इदी फ़ाउंडेशन तक़रीबन 330 कल्याण केंद्र चला रही है, जिनमें अस्पताल, औषधालय, अनाथालय, महिला आश्रम, बुज़ुर्गों का आश्रम और कई पुनर्वास केंद्र शामिल है. ईधी फ़ाउंडेशन ने तक़रीबन 40 हज़ार नर्सों को प्रशिक्षण दिया है. फ़ाउंडेशन के अनाथालय में 50 हज़ार बच्चे हैं.

सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया. उन्हें साल 1986 रमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद उन्हें साल 1988 में लेनिन शांति पुरस्कार, 1992 में पाल हैरिस फ़ेलो रोटरी इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन सम्मान मिला. फिर उन्हें साल 2000 में अंतर्राष्ट्रीय बालजन पुरस्कार और 26 मार्च 2005 को आजीवन उपलब्धि पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित हुए. इस साल भी उन्हें नोबेल के लिए नामांकित किया गया था.

अब्दुल सत्तार ईधी दूसरे मज़हबों का सम्मान करते थे. वे कहते थे, मैंने कभी औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की. क्या फ़ायदा ऐसी शिक्षा का जब वह हमे एक इंसान नहीं बनाती? मेरा विद्यालय तो मानवता की सेवा है"

ग़लती से भारत से पाकिस्तान पहुंचने वाली मूक-बधिर गीता को ईधी फ़ाउंडेशन ने ही आसरा दिया था. ईधी ने गीता भारत वापसी में अहम मदद की थी. उन्होंने ही गीता को उनका नाम दिया था. गीता का कहना है कि ईधी साहब मुझसे पिता की तरह स्नेह करते थे और मेरा अच्छी तरह ख़्याल रखते थे. उन्होंने मुझे रहने के लिए अलग कमरा भी दिया था. इसके साथ ही मेरी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए मुझे हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें भी लाकर दी थीं, ताकि मैं पूजा-अर्चना कर सकूं.
गीता का ख़्याल रखने के लिए भारत के प्रधानमंत्री ने ईधी फ़ाउंडेशन को  एक करोड़ रुपये का दान देने की घोषणा की थी, लेकिन फ़ाउंडेशन के संस्थापक अब्दुल सत्तार ईधी ने इस रक़म को लेने से साफ़ इंकार कर दिया था. उनका कहना था कि वे ख़िदमत के बदले पैसे क़ुबूल नहीं कर सकते.

उन्होंने एक बार कहा था - "मैं पढ़ा-लिखा तो नहीं हूं, लेकिन मैंने मार्क्स और लेनिन की किताबें पढ़ी हैं. कर्बला वालों की ज़िन्दगी भी पढ़ी है. मैं तुम्हें बताता हूं असल जंग किसकी है. अस्ल जंग अमीर और ग़रीब की है, ज़ालिम और मज़लूम की है."

उन्होंने अपने अंगों को दान करने की भी वसीयत की थी. उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उनकी आंखें दान कर दी गईं, लेकिन जिस्म के दूसरे हिस्से दान करने लायक़ नहीं रह गए थे, इसलिए वे दान नहीं किए जा सके. साल 2013 से वे गुर्दों की बीमारी से पीड़ित थे. सिंध इंस्टीट्यूट ऑफ़ यूरोलॉजी एंड ट्रांसप्लांटेशन में उनका इलाज चल रहा था, जहां 8 जुलाई को उनका इंतक़ाल हो गया. अगले दिन 9 जुलाई को उन्हें राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया. उन्हें उसी क़ब्र में दफ़नाया गया, जो उन्होंने अपने लिए खोद कर रखी थी.  उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उन्हीं कपड़ों में उन्हें दफ़नाया गया, जिन कपड़ों में उनका इंतक़ाल हुआ था.  उन्होंने औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की थी. वे कहते थे, "दुनिया के ग़म ही मेरे उस्ताद हैं और ये ही मेरी बुद्धि और ज्ञान का स्त्रोत हैं."

अब्दुल सत्तार ईदी के नाम से संचालित अकाउंट से बताया गया कि उनके आख़िरी शब्द थे, “मेरे मुल्क के ग़रीबों का ख़्याल रखना.” एक और ट्वीट में कहा गया, "उन्होंने अपने एकमात्र सक्रिय अंग आंखों को दान कर दिया. अपना सबकुछ वो पहले ही दान कर चुके थे."

उनका कहना था, " पवित्र किताब सिर्फ़ हमारी गोद ही में खुली नहीं रहनी चाहिए, बल्कि वह हमारे दिमाग़ में भी खुली रहनी चाहिए. अपने दिल को खोलिये और अल्लाह के बनाये लोगो को देखिये, उनकी सेवा में तुम उसे पा लोगे. ख़ाली लफ़्ज़ और लम्बी दुआएं अल्लाह को मुतासिर नहीं करतीं. अपने आमाल से भी अपने ईमान को दिखाना चाहिए."

अब्दुल सत्तार ईदी को सच्ची ख़िराजे-अक़ीदत यही होगी कि उनकी तरह हम भी ख़ुदा के उन बंदों की मदद करें, जिन्हें मदद की ज़रूरत है और उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिल पा रही है. ख़ुदा की मख़्लूक की ख़िदमत करके ही खु़दा को पाया जा सकता है.

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पेट के मर्ज़ का रूहानी इलाज

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 पेट के मर्ज़ का रूहानी इलाज

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पेशाब में परेशानी का रूहानी इलाज

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पेशाब में परेशानी का रूहानी इलाज

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हर मुश्किल से निजात की दुआएं

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 हर मुश्किल का हल




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पांच नमाज़ों के बाद पढ़ने की तस्बीह

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फ़ज्र की नमाज़ के बाद हुवल हय्युल क़य्युम सौ बार पढ़ें
ज़ुहर की नमाज़ के बाद हुवल अलिउल अज़ीम  सौ बार पढ़ें
अस्र की नमाज़ के बाद हुवर रहमानुर्रहीम सौ बार पढ़ें
मग़रिब की नमाज़ के बाद हुवल ग़फ़ूरुर्रहीम सौ बार पढ़ें
इशा की नमाज़ के बाद हुवल लतिफ़ुल ख़बीर सौ बार पढ़ें

Paanch Namazon Ke Padhane Ki Tasheeb 
Fazr ki namaz ke baad : Huwal Haiyul Qayyum (100 baar)
Zohar ki namaz ke baad : Huwal Aliyul Azim (100 baar)
Asar ki namaz ke baad : Huwar Rahmanur Rahim (100 baar)
Maghrib ki namaz ke baad : Huwal-Gafurrur Rahim (100 baar)
Isha ki namaz ke baad : Huwal Latiful Khabir (100 baar)

साभार पाकिस्तानी पंजसूरह

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सवाब

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हम कोई आलिम नहीं हैं, आमिल नहीं हैं... बस हमारी यही कोशिश है कि हमने अपने बड़ों से जो अच्छी और दीनी बातें सीखी हैं, उन्हें दूसरों तक पहुंचा सकें... आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की तहरीरों को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाकर इस नेक मुहिम में हिस्सेदार बनें. ये काम भी सदक़ा-ए-जारिया है- फ़िरदौस ख़ान
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* प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.

* हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- जब आदमी मर जाता है, तो उसका अमल रुक जाता है, मगर तीन चीज़ों का सवाब जारी रहता है-
1. सदक़ा-ए-जारिया का
2. उस इल्म का, जिससे लोग फ़ायदा उठाएं.
3. नेक औलाद का, जो उसके लिए दुआ करे
(सहीह मुस्लिम, जिल्द 3, किताबुल-वसिया, हदीस 4005)

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याद्दाश्त के लिए दुआ

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 याद्दाश्त के लिए दुआ


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गुमशुदा चीज़ों के लिए दुआ

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कोई भी चीज़ रखते हुए एक ही सांस में तीन बार बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़कर चीज़ पर दम कर दें. इंशा अल्लाह वो चीज़ चोरी नहीं होगी.

गुमशुदा या चोरीशुदा चीज़ के लिए दुआ

कोई चीज़ गुम हो जाए, तो कोई सा भी दरूद शरीफ़ पढ़ते हुए उसे तलाशें... इंशा अल्लाह गुमशुदा चीज़ फ़ौरन मिल जाएगी


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तस्बीहे-फ़ातिमा

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तस्बीहे-फ़ातिमा... हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की तस्बीह है, जिसमें 34 बार अल्लाहु अकबर, 33 बार अलहम्दु लिल्लाह और 33 बार सुब्हान अल्लाह है.

ये तस्बीह हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहू अलैहि वसल्‍लम) ने अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) को बताई थी.
ये तस्बीह हर परेशानी का हल है... इसे पढ़ने से थकान भी उतर जाती है.
हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तस्बीहे-फ़ातिमा पढ़ें, इंशाअल्लाह इसकी बरकत से अल्लाह कामयाबी अता करेगा.

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क़ब्र के फ़ितने से बचाने वाले आमाल

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हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि से रिवायत है कि नबी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों से गुज़रे, तो आपने फ़रमाया – इन दोनों को (क़बों में) अज़ाब हो रहा है और किसी बड़ी बात पर नहें. फ़िर फ़रमाया- इनमें से एक चुग़ली खाता था और दूसरा पेशाब (की छीटों) से एहतियात नहीं करता था. (बुख़ारी)
क़ब्र के फ़ितने से बचाने वाले आमाल
फ़ितना-ए-क़ब्र से बचने के लिए अल्लाह के प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बहुत सी अहदीस मौजूद हैं, जिन पर अमल करके कब्र के फ़ितने से बचा जा सकता-
1. शहादत- अल्लाह के प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- अल्लाह की राह में जान देना इंसान को क़ब्र के फ़ितने से महफ़ूज़ रखेगा. (निसाई)
2. मरातिब- यानी इस्लामी रियासत की सरहदों लश्करे-इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए पहरा देना. (तिर्मिज़ी)
3. सूरह मुल्क की कसरत से तिलावत करना. (हाकिम) नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रोज़ाना सोने से पहले सूरह मुल्क की तिलावत फ़रमाया करते थे. (अहमद, तिर्मिज़ी, दारमी)
4- हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि. से रिवायत है कि नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जो मोमिन जुमा के दिन या जुमा की रात मरे, अल्लाह उसे क़ब्र के फ़ितने से बचा लेगा. (अहमद, तिर्मिज़ी)
5. हज़रत अब्दुल्लाह बिन यसार रज़ि. से रिवायत है कि मैं बैठा था. सुलेमान बिन सुरद रज़ि. और ख़ालिद बिन उरफ़ता रज़ि आए. लोगों ने कहा कि फ़ला इंसान पेट की तकलीफ़ से मर गया है. उन दोनों ने ख़्वाहिश की थी कि काश वह उस इंसान के जनाज़े मे शरीक होते फ़िर एक आदमी ने दूसरे आदमी से कहा- क्या नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ये बात इरशाद नहीं फ़रमाई कि जिस इंसान को पेट मार डाले, उसे क़ब्र में अज़ाब नहीं दिया जाएगा. दूसरे ने जवाब दिया- क्यों नहीं. (निसाई)
इसके अलावा ताऊन की बीमारी से मरने वाले, पेट की बीमारी से मरने वाले, पानी में डूबकर मरने वाले, दीवार के नीचे आकर मरने वाले (बुख़ारी) जचगी (बच्चे की पैदाइश) की हालत में मरने वाली औरत (इब्ने-माजा) वग़ैराह क़ब्र के फ़ितने से महफ़ूज़ रहेंगे.


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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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