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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "इशराक़ की नमाज़ तौबा करने वालों की नमाज़ है.
(सही मुस्लिम 748) 



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अव्वाबीन की नमाज़

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अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जिसने मग़रिब की नमाज़ के बाद छह रकअतें अव्वाबीन की पढ़ीं, उसे बारह साल की इबादत का सवाब मिलेगा."   
(सुनन तिर्मिज़ी 435) 

नमाज़ अव्वाबीन के बारे में अमार बिन यासिर सहाबी रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है कि मैंने रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मग़रिब के बाद रकअतें पढ़ते हैं. हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो ये नमाज़ पढ़ता है, उसकी मग़फ़िरत हो जाती है, चाहे उसके गुनाह समन्दर के झाग के बराबर हों."

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स मग़रिब के बाद 20 रकअत पढ़ेगा, अल्लाह तअला उसके लिए जन्नत में एक महल तामीर करवाएगा. जन्नत के एक दरवाज़े का नाम अव्वाब है, जो क़यामत के दिन अल्लाह तअला से दरख़्वास्त करेगा कि ऐ अल्लाह ! जिसने मेरे नाम वाली नमाज़ पढ़ी, उसे मुझमें दाख़िल फ़रमा. अल्लाह उसकी दरख़्वास्त क़ुबूल करेगा. इसके कम से कम दो नफ़िल पढ़े जाते हैं. और ये नफ़िल मग़रिब की नमाज़ के बाद पढ़े जाते हैं."      


                 

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अल्लाह के क़रीब

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एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?

अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहिवसल्लम की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें, भूखे पेट, इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा. 

मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.

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शब-ए-मेराज

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इस्लामी कलेंडर के रजब माह की 27 तारीख़ मुसलमानों के लिए अज़ीम मुक़ाम रखती है. इस तारीख़ को हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह) से मुलाक़ात के लिए गए थे.  इसी रात में आपकी उम्मत को नमाज़ का अज़ीम तोहफ़ा अता किया गया. एक हदीस में बताया गया है कि अगर नबी की मेराज अल्लाह से मुलाकात है, तो मोमिन की मेराज नमाज़ है.
इस तारीख़ को रात में इबादत और दिन में रोज़ा रखा जाता है, यानी आज की रात इबादत की रात है और कल रोज़ा रखा जाएगा. शब-ए-मेराज की फ़ज़ीलत को जितना बयां किया जाए, कम है.

मिस्बाह में शेख़ ने इमाम अबू जाफ़र जवाद (अस) से नक़ल किया है. फ़रमाया- रजब महीने में एक रात उन सब चीज़ों से बेहतर है, जिन पर सूरज चमकता है और वह 27 रजब की रात है, जिसकी सुबह रसूले आज़म (स:अ:व:व) मब'उस ब रिसालत हुए. हमारे पैरोकारों में जो इस रात अमल करेगा, तो उसको 60 साल के अमल का सवाब हासिल होगा. मैंने अर्ज़ किया, "इस रात का अमल क्या है?" आप (अस) ने फ़रमाया : नमाज़े-ईशा के बाद सो जाएं और फिर आधी रात से पहले उठकर 12 रकअत नमाज़ 2-2 रकअत करके पढ़ें और हर रकअत में सुरह अल-हम्द के बाद क़ुरान की आख़िरी मुफ़स्सिल सूरतों (सुरह मोहम्मद से सुरह नास) में से कोई एक सुरह पढ़ें. नमाज़ का सलाम देने के बाद यह सारी सुरतें पढ़े-
सुरह हम्द 7 मर्तबा
सुरह फ़लक़ 7 मर्तबा
सुरह नास 7 मर्तबा
सुरह तौहीद 7 मर्तबा
सुरह काफ़ेरून 7 मर्तबा
सुरह क़द्र 7 मर्तबा
आयतल कुर्सी 7 मर्तबा

अगले साल शब-ए-मेराज पर हम हों, न हों... इसलिए मेराज की रात और दिन इबादत में गुज़ार दें, अपनी ज़िन्दगी में से कुछ वक़्त तो अपने ख़ुदा के लिए रखें. अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन

-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह 80 हिजरी कूफ़ा में पैदा हुए. नाम नोमान रखा गया. (अलख़ैरात अलहस्सान, अज़ अल्लामा शहाबुद्दीन अहमद बिन हिज्र मक्की रहमतुल्लाह अलैह).
नाम व नस्ब
नोमान बिन साबित बिन नोमान बिन महर ज़बान बिन साबित बिन यज़्द गर्द बिन शहरयार बिन परवेज़ बिन नौशेरवां और ये सिलसिला आगे जाकर हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम के वास्ते से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिल जाता है, जो आपकी शाने-रिफ़अत व अज़मत के लिए काफ़ी है.
तालीम
इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह इब्तेदाई तालीम हासिल करने के बाद तिजारत की तरफ़ मुतवज्जा हो गए थे, मगर उसी दरमियान एक रात आपने ख़्वाब में हुज़ूर नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाल जहांआरा की ज़ियारत फ़रमाई. हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया- ऐ अबु हनीफ़ा ! अल्लाह तअला ने तुम्हें मेरी सुन्नत के इज़हार के लिए पैदा किया है, तो दुनिया की किनाराकशी इख़्तियार ना करो. (तज़किरतुल अवलिया सफ़्हा- 126)
इन्हीं दिनों आप किसी काम से जा रहे थे कि इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि से मुलाक़ात हो गई. उन्होंने आपसे दरियाफ़्त फ़रमाया कि तुम किस दर्सगाह में पढ़ते हो? आपने फ़रमाया- मैं कपड़े की तिजारत करता हूं. इस पर इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया- मैं तुम में क़ाबिलियत के जौहर देख रहा हूं. तुम उल्मा की सोहबत में बैठो और इल्म हासिल करो. ( सीरतुल नोमान)
हज़रत हम्माद जिनका सिलसिला तलम्मुज़ हज़रत अबदुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हा से मिलता है, उस वक़्त बिलइत्तेफ़ाक़ कूफ़ा की सबसे बड़ी दर्सगाह उन्हीं की थी. वहीं आपने पढ़ना शुरू कर दिया. (अनवारे इमामे-आज़म, मर्तबा अल्लामा मंशा ताबिश क़ुसूरी, लाहौर)
इमामे आज़म का हुस्ने सुलूक
हज़रत सैय्यदना इमामे आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह निहायत रहम दिल थे. हर किसी के साथ निहायत ही फ़ैय्याज़ाना सुलूक फ़रमाते. चुनांचे मनक़ूल है कि आपके पड़ौस में एक मोची रहता था, जो निहायत ही आवारा क़िस्म का आदमी था. दिन भर तो मेहनत व मज़दूरी करता. शाम को जब काम से लौटता तो शराब और गोश्त ख़रीद लाता. रात जब कुछ ढल जाती, तो उसी की तरह कुछ और आवारा लोग उसके घर जमा हो जाते और ये अपने हाथों से कबाब बनाता और शराब का दौर चलता. फिर रक़्स व सरोद की महफ़िल गर्म होती, शोर शराबा होता, जिससे हज़रत इमामे -आज़म की इबादत में ख़लल वाक़े होता था. लेकिन यही उस शख़्स के रोज़ाना का मामूल था. हज़रत इमाम कमाल दर्जा का सब्र फ़रमाते और कुछ ना कहते. एक रात मोची और उसके दोस्तों की आवाज़ ना सुनाई दी. फ़ज्र के बाद आपने लोगों से दरयाफ़्त किया कि हमारे पड़ौस में जो मोची रहता है, क्या बात है कि रात उसकी आवाज़ सुनने को नहीं मिली? लोगों ने बताया कि कल रात कोतवाल और उसके कारिंदे जब मोची के घर के पास से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने मोची के घर से काफ़ी शोर व शराबा सुना. इस वजह से उसे गिरफ़्तार कर लिया गया है. ये सुनकर आप बहुत ग़मगीन हुए और सीधे दारुल एमारः गवर्नर कूफ़ा के पास पहुंचे. गवर्नर ईसा बिन मूसा ने तशरीफ़ आवरी का सबब दरयाफ़्त किया. आपने फ़रमाया- मेरे पड़ौस में एक मोची रहा करता है, जिसे कल रात कोतवाल गिरफ़्तार कर लाया है. मैं उसकी सिफ़ारिश के लिए आया हूं, उसे रिहा कर दिया जाए. उसी वक़्त गवर्नर ने हुक्म दिया और मोची को छोड़ दिया गया. जब आप लौटने लगे, तो मोची भी आप के साथ हो लिया. उसके दिल पर आपके सुलूक का ऐसा असर हुआ कि वो सच्चे दिल से ताएब हो गया और हज़रत की सोहबत में रहने लगा. यहां तक कि लोग उसे फ़कीह के मुअज़्ज़िज़ लक़ब से पुकारने लगे. (अलख़ैरात अलहस्सान)
इमामे-आज़म और तिजारत
हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह कूफ़ा में कपड़े के बड़े ताजिर थे और आप का कारोबार निहायत ही वसी पैमाने पर था. आपका माले तिजारत दूर दराज़ इलाक़ों में भी भेजा करते थे. ज़रूरी अशिया बाहर से मंगवाते भी थे. तिजारत व कारोबार में सच्चाई और दियानतदारी का ऐसा ख़्याल रखते थे कि इसकी मिसाल कम ही इस ज़मीन पर मिल सकती है. एक मर्तबा का वाक़िया है कि आपने दुकान से कहीं जाते वक़्त कपड़ों का थान नौकर के सुपुर्द किया और फ़रमाया- अगर कोई उसे ले, तो उसे कपड़ों का ऐबदार होना बता देना. फिर जब आप दुकान पर वापस आए, तो देखा कि कपड़े बिक चुके हैं. आपने मुलाज़िम से दरयाफ़्त फ़रमाया कि तुमने इन कपड़ों का ऐबदार होना ख़रीदने वाले को बता दिया था. इस पर ख़ादिम ने नेदामत का इज़हार करते हुए कहा कि मैं भूल गया था, मुझे याद ही ना था. इस पर इमाम साहब ने कपड़ों की पूरी क़ीमत जिसकी मालियत तीस हज़ार दिरहम थी, सदक़ा फ़रमा दी. अल्लाहो अकबर क्या इससे बढ़कर भी कोई दियानतदारी का सबूत पेश कर सकता है.
इमामे-आज़म और इबादत
हज़रत इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म रहमतुल्लाह अलैह ने चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी. रात भर आप क़ुरान शरीफ़ पढ़ा करते थे और ख़ौफ़े-ख़ुदा से इस क़द्रर रोते थे कि आप के हमसायों को आप पर रहम आता था.
हज़रत इमाम के शागिर्द हज़रत क़ाज़ी इमाम अबु यूसुफ़ फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म हर रात और दिन में एक ख़त्म क़ुरान पढ़ा करते थे और रमज़ान शरीफ़ में (दिन और रात मिला कर) बासठ क़ुरान ख़त्म फ़रमाया करते थे. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
हज़रत मिसअर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म फ़ज्र से इशा तक तदरीसी कामों और इफ़्ता वग़ैरह में मसरूफ़ रहते थे. एक मर्तबा मैंने सोचा कि आख़िर आप इबादत कब करते हैं, उसे मालूम किया जाए. इस नीयत से मैं इस खोज में लग गया. जब रात हुई और लोग इशा की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर सो गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमामे-आज़म मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और पूरी रात फ़ज्र तक इबादत में गुज़ार दी. फिर फ़ज्र की नमाज़ के बाद हसबे-मामूल आप तदरीसी कामों में मसरूफ़ हो गए. यहां तक कि फिर रात आ गई, तो मैंने देखा कि आप मस्जिद आकर इबादत में मसरूफ़ हो गए. फिर सुबह हुई, तो अपने मुआमलात की तरफ़ मुतवज्जा हुए.
मैंने दिल में ख़्याल किया कि दो रातें तो हज़रत इमाम ने निशात के साथ इबादत में गुज़ार दी हैं. अब देखा जाए कि क्या करते हैं. चुनांचे मैंने देखा कि हसबे-मामूल आपने फिर पूरी रात इबादत में गुज़ार दी. इस पर मैंने ये अज़्म किया कि ज़िंदगी भर मैं ऐसे इबादतगुज़ार की सोहबत ना छोड़ूंगा, जो दिनों को रोज़े रखता है और रात को बेदार रहकर अल्लाह की इबादत में गुज़ारता है. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
इमामे-आज़म और ख़ुदातरसी
इमामे-आज़म के अंदर ख़शीयते-इलाही का वाफ़र हिस्सा मौजूद था. अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का नाम सुनते ही आप पर लर्ज़ा तारी हो जाता था. चुनांचे हज़रत यज़ीद बिन लैस बयान करते हैं कि एक मर्तबा इशा की जमात में इमाम ने इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पढ़ी. हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा जमात में शरीक थे. जब सारे लोग नमाज़ से फ़ारिग़ होकर चले गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा फ़िक्र में डूबे हुए हैं और ठंडी सांस ले रहे हैं. मैंने ख़्याल किया कि मेरी वजह से हज़रत के ज़िक्र व फ़िक्र में कोई ख़लल वाक़े ना हो. चिराग़ जलता हुआ छोड़कर आहिस्तगी के साथ मस्जिद से निकल गया. फ़ज्र के वक़्त जब मैं मस्जिद पहुंचा, तो देखा कि आप अपनी दाढ़ी पकड़े हुए हैं और इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पूरी सूरत की तिलावत फ़रमा रहे हैं और निहायत ही रक्तअंगेज़ और दर्द भरी आवाज़ में कह रहे हैं, ऐ मेरे मालिक व ख़ालिक़ ! जो ज़र्रा भर नेकी का अच्छा बदला देने वाला है और ज़र्रा भर बुराई की सज़ा देने वाला है अपने बंदे-नोमान को आग और उसके अज़ाब से बचाना और अपने जवाज़े-रहमत में दाख़िल फ़रमाना. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 86)
इसी तरह एक दिन मस्जिद के इमाम ने फ़ज्र की नमाज़ में ये आयते-करीमा पढ़ी ( तर्जुमा), तुम हरगिज़ अल्लाह ताला को इससे बेख़बर ना समझना, जो कुछ ज़ालिम करते हैं. ये सुनना था कि हज़रत हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के जिस्म पर ख़ौफ़े-ख़ुदा की वजह से लर्ज़ा तारी हो गया, जिसे नमाज़ में शरीक लोगों ने भी महसूस किया. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 89)
तारीख़ विसाल
हज़रत इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह का विसाल सत्तर बरस की उम्र में 2 शाबानुल मोअज़्ज़म 150 हिजरी में हुआ. जामा मस्जिद बग़दाद में आपका आस्ताना मुबारका मरज्जा ख़लाइक़ है.
Hazrat imam abu hanifa (R.A.)
साभार

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रमज़ान की फ़ज़ीलत

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हज़रत इब्राहिम-बिन-अदहम

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फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत इब्राहिम-बिन-अदहम पहले बलख़ के बादशाह थे. मगर सूफ़ियाना रंग उन पर इस तरह चढ़ा कि उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर फ़क़ीर की ज़िन्दगी अपना ली. बलख़ छोड़कर वे मक्का आ गए और वहीं लकड़ियां काटकर अपना गुज़ारा करने लगे. लकड़ियां बेचकर उन्हें जो कुछ मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते. उनका जीवन त्याग और जन कल्याण की एक बेहतरीन मिसाल है.

जब वे बलख़ के बादशाह थे, तो एक दिन छत पर सोते वक़्त उन्हें आहट सुनाई दी. इस पर उनकी नींद खुल गई और उन्होंने पूछा कि कौन है? तभी जवाब मिला कि तेरा परिचित. उन्होंने पूछा कि वह यहां क्या कर रहा है, तो जवाब मिला कि वह ऊंट ढूंढ रहा है. उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि छत पर ऊंट भला कैसे मिल सकता है? इस पर जवाब मिला कि जब तू बादशाह रहते हुए अल्लाह को पाने की कामना कर सकता है, तो फिर छत पर ऊंट भी मिल सकता है. उनका दिल अल्लाह की इबादत की तरफ़ लगाने वाले हज़रत ख़िज्र (देवदूत) थे. इसी तरह एक दिन जब इब्राहिम-बिन-अदहम अपने दरबार में बैठे थे, तो तभी हज़रत ख़िज्र वहां आए और इधर-उधर कुछ ढूंढने लगे. इस पर बादशाह ने पूछा कि वे क्या तलाश रह हैं? हज़रत ख़िज्र ने जवाब दिया कि मैं इस सराय में ठहरना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि यह सराय नहीं, बल्कि उनका महल है. हज़रत ख़िज्र ने सवाल किया कि इससे पहले यहां कौन रहता था. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके पूर्वज यहां रहते थे. फिर हज़रत ख़िज्र ने कहा कि इस स्थान पर इतने लोग रहकर जा चुके हैं, तो यह सराय ही है. यह कहकर वे चले गए.

जब बादशाह को उनकी बात का मतलब समझ आया, तो वे जंगल में चले गए. वहां उनकी मुलाक़ात एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग से हुई, जिन्होंने उन्हें इस्मे- आज़म की तालीम दी. वे हमेशा अल्लाह की इबादत में मशग़ू रहते. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हज़रत ख़िज्र से हुई, जिन्होंने बताया कि वे बुज़ुर्ग उनके भाई इलियास हैं. इसके बाद उन्होंने हज़रत ख़िज्र से दीक्षा ली.

एक बार की बात है कि बादशाह शिकार के लिए जंगल में गए. जब उन्होंने हिरण का शिकार करने के लिए हथियार उठाया, तो वह बोल पड़ा और उनसे कहने लगा कि क्या अल्लाह ने उन्हें यह जीवन दूसरों को सताने के लिए ही दिया है? हिरण की बात सुनकर उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कभी किसी को भी कष्ट न पहुंचाने का वादा करते हुए मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया. दरअसल, जड़ या बेज़ुबान चीज़ों का बोलना इंसान के ज़मीर की आवाज़ होती है, जो उसे किसी भी ग़लत काम को करने से रोकती है. जो व्यक्ति अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका अनुसरण करता है, वे बुराई के रास्ते पर जाने से बच जाता है. मगर जो लोग ज़मीर की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे मानवता को त्यागकर पशुवत प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो बाद में समाज और स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध होती है.

इब्राहिम-बिन-अदहम का राजपाट से मोह भंग हो गया था. वे अपनी पत्नी और दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर जंगल की तरफ़ चले गए. वहां उन्होंने एक लकड़हारे को अपने शाही वस्त्र देकर उसके मामूली कपड़े ले लिए. इन्हीं कपड़ों को धारण कर वे आगे की यात्रा पर निकल पड़े. घूमते-घूमते वे नेशापुर पहुंच गए और वहां की एक गुफ़ा में अपना डेरा जमाया. इस गुफ़ा में उन्होंने नौ साल तक अल्लाह की इबादत की. इसी दौरान हफ़्ते में एक दिन वे जंगल से लकड़ियां काटते और उन्हें बाज़ार में बेचकर जो कुछ मिलता उसके कुछ हिस्से से रोटी ख़रीदते और बाक़ी हिस्सा ज़रूरतमंदों में बांट देते.

वे मुरीदों को हमेशा यह हिदायत करते थे कि कभी किसी औरत या कमसिन लड़के को नज़र भरकर नहीं देखना और हज के दौरान तो बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि तवाफ़ में बहुत-सी औरतें और कमसिन लड़के भी शरीक होते हैं. एक बार तवाफ़ की हालत में एक लड़का सामने आ गया और न चाहते हुए भी उनकी निगाहें उस पर जम गईं. तवाफ़ के बाद मुरीदों ने कहा कि अल्लाह आप पर रहम करे, क्योंकि आपने हमें जिस चीज़ से रोकने की हिदायत की थी, आप ख़ुद उसमें शामिल हो गए. क्या आप इसकी वजह बयान कर सकते हैं?

उन्होंने फ़रमाया कि जब मैंने बल्ख़ छोड़ा था उस वक़्त मेरा बेटा छोटा बच्चा था और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह वही बच्चा है. इसके बाद उनके एक मुरीद ने बच्चे को तलाश किया और उससे उसके वालिद के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह बलख़ के बादशाह इब्राहिम-बिन-अदहम का बेटा है, जो बरसों पहले सल्तनत छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए कहीं चले गए हैं. मुरीद ने उनके बेटे और बीवी को इब्राहिम-बिन-अदहम से मिलवाया. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को गले से लगाया, तो उसकी मौत हो गई. जब मुरीद ने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ग़ैब से आवाज़ आई थी कि तू हमसे दोस्ती का दावा करता है और फिर अपने बेटे से भी मुहब्बत जताता है. यह सुनकर उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह ! या तो बेटे की जान ले ले या फिर मुझे मौत दे दे. अल्लाह ने बेटे के हक़ में दुआ क़ुबूल की.

एक बार की बात है कि इब्राहिम-बिन-अदहम दजला नदी के किनारे बैठे अपनी गुदड़ी सील रहे थे. तभी किसी आदमी ने आकर उनसे पूछा की बलख़ की सल्तनत छोडक़र आपको क्या मिला? उन्होंने एक सुई दरिया में डाल दी और इशारा किया. तभी हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक सोने की सुई लेकर सामने आ गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें तो केवल अपनी ही सुई चाहिए. फिर एक छोटी मछली मुंह में सुई लेकर सामने आ गई. उन्होंने उस आदमी को बताया कि सल्तनत छोड़ने के बाद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि इंसान को हक़ीक़त में किस चीज़ की ज़रूरत होती है.

एक बार उन्होंने पानी के लिए कुएं में डोल डाला, तो उसमें सोना भरकर आ गया. दोबारा डालने पर डोल चांदी से भरा हुआ मिला और तीसरी बार डाला, तो उसमें हीरे और जवाहारात भरे हुए थे. चौथी बार डोल कुएं में डालते वक़्त उन्होंने कहा कि उन्हें तो सिर्फ़ पानी ही चाहिए. इसके बाद डोल पानी से भरा हुआ मिला. उन्होंने उस आदमी को समझाया कि धन-दौलत और एश्वर्य नश्वर हैं. मनुष्य का जीवन इनके बिना भी गुज़र सकता है, लेकिन अल्लाह की इबादत और जन सेवा ही मनुष्य के हमेशा काम आती है. अल्लाह भी दूसरों के लिए जीने वाले लोगों को ही पसंद करता है. वे कहते थे कि अल्लाह पर हमेशा यक़ीन रखना चाहिए, क्योंकि वे कभी किसी को मायूस नहीं करता.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

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पढ़ें, अमल करें और सवाब हासिल करें

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क़यमात के रोज़ इंसान एक-एक नेकी के लिए तरसेगा... उस वक़्त हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र होगी... कोई किसी को मांगने पर भी नेकी न देगा... इसलिए बेहतर यही है कि इंसान अपने आमाल से नेकियां हासिल करे, जो उसकी मग़फ़िरत का ज़रिया बन सकें...
पेश हैं कुछ तस्बीह, जिन्हें पढ़कर आप सवाब हासिल कर सकते हैं.

1. सवाल : क्या आज आप ने जन्नत में एक महल बनाया?
जवाब: दस बार सूरह इख़लास पढ़कर [अहमद]

2. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में खजूर के 100 दरख़्त लगाए ?
जवाब:  100 बार सुब्हानल्लाहिल-अज़ीम वबिहम्दिही पढ़कर. [तिर्मिजी]

3. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में 400 दरख़्त लगाए ?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर, पढ़कर. [इब़्न माजह]

4. सवाल : क्या आज आपने एक क़ुरआन मजीद पढ़ने का सवाब कमाया?
जवाब: तीन बार सूरह इख़लास पढ़कर. [मुस्लिम]

5. सवाल: क्या आज आपने करोड़ों नेकियां कमाईं?
जवाब: मोमिनों के लिए दुआ-ए-मग़फ़ित करके. [तबरानी]

6. सवाल: क्या आज आपने जन्नत मे एक घर बनाया?
जवाब: नमाज़ के लिए सफ़ की ख़ाली जगह को भरकर. [इब्न माजह]

7. सवाल: क्या आज आपने एक हज का सवाब कमाया?
जवाब: फ़र्ज़ नमाज़ के लिए घर से अच्छी तरह वज़ू करके जाकर. [अबु दाऊद]

8. सवाल: क्या आज आपने ज़मीन और आसमान की ख़ाली जगह भरकर नेकियां कमाईं?
जवाब: 100 बार ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़कर. [अहमद]

9. सवाल: क्या आज आपने अल्लाह की राह में 100 घोड़े देने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर. [अहमद]

10. सवाल: क्या आज आपने मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में 100 ऊंट क़ुर्बान करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्लाहु अकबर पढ़कर. [अहमद]

11. सवाल: क्या आज आपने 100 ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह पढ़कर. [अहमद]

12. सवाल: क्या आज आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत हासिल करने वाला अमल किया?
जवाब: सुबह व शाम दस-दस बार दुरूद शरीफ़ पढ़कर. [तबरानी]

13. सवाल: क्या आज आपने वह अमल किया, जिस जैसा अमल क़यामत के दिन लेकर आने वाला कोई न होगा सिवाय उसके जो इस जैसा अमल करे?
जवाब: 100 बार सुब्हानल्लाही वबिहम्दिही पढ़कर. [मुस्लिम]

14. सवाल: क्या आज आपने पूरी रात इबादत करने का सवाब कमाया?
जवाब: नमाज़-ए-इशा और नमाज़-ए-फ़ज्र बा जमाअत पढ़कर. [मुस्लिम]

15. सवाल : क्या आज आपने वज़ू के बाद वह दुआ पढ़ी, जिसके सवाब को क़यामत के दिन तक कोई चीज़ नहीं मिटा सकती?
जवाब: सुब्हाना कल्लाहुम्मा वबिहम्दिका अश-हदू अन ला इलाहा इल्ला अन्ता अस्तग़फ़िरूका वातुबू इलैक. [हाकिम]

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.




आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए. 
फ़िरदौस ख़ान


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रजब की फ़ज़ीलत...

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माहे-रजब में दिन में रोज़ा रखने और रात में इबादत करने का सवाब सौ साल के रोज़े रखने के बराबर होता है... हो सके, तो इबादत करें... पता नहीं अगली मर्तबा ये मौक़ा मिले या न मिले...
अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

रजब इस्लामी साल का सातवां महीना है. यह बड़ा अज़मत वाला महीना है और इसमें नेकियों का सवाब दोगुना हो जाता है. रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है. इस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेशुमार रहमते और मग़फ़िरत की बारिश करता है. इस माह में बंदों की इबादतें और दुआएं क़ुबूल की जाती हैं. रजब को ताजीम यानी आदर का माह कहा जाता है. इस महीने की ताज़ीम करे, गुनाहों से दूर रहें, तौबा अस्तग़फ़ार करते रहें, अल्लाह तआला की इबादत करें, सदक़ा और ख़ैरात ज़्यादा ज़्यादा करें.

हज़रत सैयदुना अल्लामा सफ़्फ़ुरी रहमतुल्लाह अलैह रमाते हैं- रजब-उल-मुरज्जब बीज बोने का, शाबान-उल-मुअज़्ज़म आब-पाशी (यानि पानी देने) का और रमज़ान-उल-मुबारक फ़सल काटने का महीना है. लिहाज़ा जो रजब-उल-मुरज्जब में इबादत का बीज नहीं बोता और शाबान-उल-मुअज़्ज़म में आंसुओं से सैराब नहीं करता, वह रमजान-उल-मुबारक में फ़सले-रहेमत क्यूं कर काट सकेगा? मज़ीद फ़रमाते हैं : रजब-उल-मुरज्जब जिस्म को, शाबान-उल-मुअज़्ज़म दिल को और रमज़ान-उल-मुबारक रूह को पाक करता है. (Nuzhat-ul-Majalis, jild 1, safha 209)

अल्लाह तआला के नज़दीक 4 महीने खुसूसियात के साथ हुरमतवाले हैं. जुल कदा, जुल हिज्जाह, मुहर्रम और रजब.
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जिसने माहे-हराम (यानी हुरमतवाले महीने में) में तीन दिन जुमेरात, जुमा और हफ़्ता (यानि सनीचर) का रोज़ा रखा, उसके लिए दो साल की इबादत का सवाब लिखा जाएगा. (Al Mu’jam-ul-Awsat lit-Tabrani, jild 1, safha 485, Hadees 1789)

हज़रत सैयदुना अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- जन्नत में एक नहर है, जिसे रजब कहा जाता है, जो दूध से ज़्यादा सफ़ेद और शहद से ज़्यादा मीठी है. जो कोई रजब का एक रोज़ा रखे, तो अल्लाह तआला उसे इस नहर से सैराब करेगा. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 367, Hadees 3800)

ताबई बुज़ुर्ग हज़रत सैयदुना अबु क़िलाला रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- रजब के रोज़ादारों के लिए जन्नत में एक महल है. (Shu’ab ul-Imaan, jild 3, safha 368, Hadees 3802)

हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने भी रजब का रोज़ा रखा
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-  जिसने रजब का एक रोज़ा रखा, तो वह एक साल के रोज़ों की तरह होगा. जिसने सात रोज़े रखे, उसपर जहन्नुमम के सातों दरवाज़े बंद कर दिए जाएंगे. जिसने आठ रोज़े रखे, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएंगे. जिसने दस रोज़े रखे, वह अल्लाह से जो कुछ मांगेगा अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाएगा. और जिसने 15 रोज़े रखे, तो आसमान से एक मुनादी निदा (यानी ऐलान करने वाला ऐलान) करता है कि तेरे पिछले गुनाह बख़्श दिए गए, तू अज़ सर-ए-नौ अमल शुरू करके तेरी बुराइयां नेकी से बदल दी गईं. और जो ज़्यादा करे, तो अल्लाह उसे ज़्यादा दे. और रजब में नूह अलैहि सलाम कश्ती में सवार हुए, तो ख़ुद भी रोज़ा रखा और हमराहियों को भी रोज़े का हुक्म दिया. उनकी कश्ती 10 मुहर्रम तक 6 माह बरसरे-सफ़र रही. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 368, Hadees 3801)

परहेज़गारी से एक रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत
हज़रत शेख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह नक़ल करते हैं कि सुल्ताने-मदीना सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- माहे रजब हुरमत वाले महीनों में से है और छठे आसमान के दरवाज़े पर इस महीने के दिन लिखे हुए हैं. अगर कोई शख़्स रजब में एक रोज़ा रखे और उसे परहेज़गारी से पूरा करे, तो वह दरवाज़ा और वह (रोज़ेवाला) दिन उस बंदे के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत तलब करेंगे और अर्ज़ करेंगे- या अल्लाह तआला इस बंदे को बख़्श दे और अगर वह शख़्स बग़ैर परहेज़गारी के रोज़ा गुज़ारता है, तो फिर वह दरवाज़ा और दिन उसकी बख़्शीश की दरख़्वास्त नहीं करेंगे और उस शख़्स से कहते हैं- ऐ बंदे तेरे नफ़्स ने तुझे धोका दिया. (Ma-Sabata bis-Sunnah, safha 234, fazail Shahr-e-Rajab-lil Khallal, safha 3-4)

रसूले-अकरम ने फ़रमाया है कि रजब का महीना ख़ुदा के नज़दीक अज़मत वाला महीना है. इस माह में जंग करना हराम है. रिवायत है कि रजब में एक रोज़ा रखने वाले को ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल होती है . ख़ुदा का ग़ज़ब उससे दूर हो जाता है और जहन्नुम के दरवाज़े में एक दरवाज़ा उसके लिए बंद हो जाता है.
इमाम मूसा काजिम (अस ) फ़रमाते हैं कि रजब माह में एक रोज़ा रखने से जहन्नुम की आग एक साल की दूरी तक हो जाती है. जो इस माह में तीन रोज़े रखे, तो उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है .

इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) से रवायत है कि रसूले-अकरम ने फ़रमाया कि रजब मेरी उम्मत के लिए अस्तग़फ़ार का महीना है. इसलिए इस माह ख़ुदा से ज़्यादा से ज़्यादा मग़फ़िरत चाहो. ख़ुदा बड़ा मेहरबान है.
रसूले-अकरम फ़रमाते हैं कि रजब को असब भी कहते हैं, क्योंकि इस माह में ख़ुदा कि रहमत बहुत ज़्यादा बरसती है. इसलिए इस माह कसरत से अस्तग़फ़ार भेजो. जो इस माह के आख़िर में एक रोज़ा रखेगा, ख़ुदा उसको मौत की सख़्तियों, मौत के बाद की हौल्नकी और क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ रखेगा.
जो इस माह के आख़िर में दो रोज़े रखेगा, वह पुले-सरात से आसानी से गुज़र जाएगा.
जो तीन रोज़े रखेगा, उसे क़यामत की सख़्तियों से महफूज़ रखा जाएगा और उसको जहन्नुम की आज़ादी का परवाना अता होगा.

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शबे-बारात...

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शबे-बारात... यानी इबादत की रात... यह इबादत की रात है और अगले दिन रोज़ा रखकर अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने का दिन...
कहते हैं कि आज रात को उन लोगों का नाम ज़िन्दा लोगों की फ़ेहरिस्त से काट दिया जाता है, जो अगली शबे-बारात से पहले मरने वाले हैं... हो सकता है कि इनमें एक नाम हमारा भी हो और हम अगली शबे-बारात न देख पाएं...
इसलिए हम आप सबसे उन सब चीज़ों के लिए मुआफ़ी चाहते हैं, जिनसे आपका दिल दुखा हो... हम इस दुनिया से किसी भी तरह का कोई बोझ लेकर नहीं जाना चाहते... बस एक ऐसी लड़की के तौर पर यादें छोड़ कर जाना चाहते हैं, जिसने जानबूझ कर कभी किसी का दिल न दुखाया हो, किसी के साथ हक़तल्फ़ी न की हो... किसी का बुरा न किया हो... बस इतना ही... ज़िन्दगी से, इस दुनिया से हमें और कुछ नहीं चाहिए... हमारे लिए यही बहुत है...
आज दूसरों से माफ़ी मांगने के साथ ही क्यों न हम भी उन सभी लोगों को दिल से मुआफ़ कर दें, जिन्होंने हमारा दिल दुखाया है, हमारे साथ बुरा किया है, हमारी हक़तल्फ़ी की है ... भले ही वो हमसे माफ़ी न मांगें...
माफ़ी मांगने से इंसान छोटा नहीं होता, लेकिन मुआफ़ कर देने से ज़रूर बड़ा हो जाता है...
आप सबको इबादत की रात मुबारक हो..
दुआओं में याद रखना...
-फ़िरदौस ख़ान

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रजब का महीना

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Rajab is the seventh month in the Islamic lunar calendar. Rasul ul Allah (S.A.W) says that the month of Rajab is the month of great virtue. There is a reward of worship in this month.

10 Raka'ah on the first of it (month of Rajab) and in each Raka'ah recite Surah Al-Faatihah once, Surah Al Ikhlaas thrice and Surah Al Kafiroon thrice and after you do your Salaam (at the end of each 2 units) raise your hands and say:

la ilaha illa allahu wahdahu la shareka lahu, lahu almulku wa lahu alhamdu,yuhye wa yumetu,wa huwa hayyun la yamutu,biyadihi alkhayruwa huwa `ala kull shay‘in qaderun.Rasool maqbool (S.A.W) farmate hain keh mah rajab ki be shumar fazilat hai aur is mah mubarak ki ibadat buhat afzal hai.

Rajab ka Mahina
Rasool maqbool (S.A.W) farmate hain keh mah rajab ki be shumar fazilat hai aur is mah mubarak ki ibadat buhat afzal hai.

1-Is mahina ki 4 tareekh ko jung safeen pesh aayi.
2-Is mahina ki 27 tareekh raat ko mehboob khuda Hazrat Muhammad (S.A.W) ne Miraj Shareef ki. Jis mein aasmani sair Jannat aur Dozakh ka mulahiza karna aur didar nabi se musharraf hona tha.
3-Is mah mein Allah Tala apne bandon par rehmat o maghfarat undelta hai.
5-Is mein ibadatein maqbool aur duayein mustjab hoti hai.
6-Hazur Aqdas (S.A.W) ka irshad garami hai keh jab mah Rajab ka chand dekho to pehle aik martaba yeh dua parho.
rajab ki fazilat

Rajab ka Wazifa

1-Rozana 1000 martaba parhein
Ya Hayyu ya Qayyumu2-Pure mah mein 3 roze.

3-Rozanah aadha ghantah darood shareef.
4-Rozanah do rikat nafal

Do rikat nafal is tarah parhein keh Surah Fatiha ke baad Surah Ikhlas 21 martaba parhein. Namaz se farigh hone ke baad 10 martaba Darood Pak parhein aur phir Dua karein to Allah Tala is ki duya qabool farmaye ga aur jab doosron ke dil murda ho jayein gay to is ka dil zinda rakhe ga.

Rajab ki Namaz
Mah Rajab ki pehli shab qabal namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhe har rikat mein baad Surah Fatiha k Sura Kafaroon teen 3 martaba aur Suarah Ikhlas 3, 3 dafa parhe . Insha allah tala is namaz key parne wale ko Allah Pak Qiyamat key din shahidon mein shamil kare ga aur hazar darjah is key buland kare ga.

Hajat Qabool Hoga
Pehli shab baad namaz Isha 4 rikat namaz do salam se parhe. Har rikat mein baad Surah Fatiha k Surah Nashrah aik bar Surah Ikhlas aik bar, Surah Falaq aik bar, Surah Naas aik bar parhe. Jab do rikat ka salam pher de to Karmah Toheed 33 martaba aur Darood Shareef 33 dafa parh kar jo bhi hajat ho Allah Pak se talab kare. Insha allah tala har hajat qabool hogi.

Sehat Ata Farmaye Ga
Mah rajab ki pehli shab baad namaz Isha 2 rikat namaz parhe aur har rikat mein baad Surah Fatiha key Surah Iklas 5, 5 martab parhe baad salam key Surah Ikhlas 100 martaba parhni hai.

Insha allah tala is namaz ki barkat se Allah Pak ise sehat ata farmaye ga. Bimar ki sehat key liye yeh namaz buhat afzal hai.

Pehli Jumma ki Namaz
Mah rajab key pehle jumma ko Zuhar aur Asar key darmiyan 4 rikat namaz aik salam se parhe har rikat mein baad Surah Fatiha key Aayat ul Kursi 7 martaba Surah Ikhlas 5 martaba parhe baad salam k 25 maraba yeh parhe

Phir 100 martaba yeh astaghfar parhe.

Bad azan 100 martaba Darood Shareef parh kar jo bhi Dua kare kha woh dunyawi ya dini ho Insha Allah tala dargah e ilahi mein zaroor qabool hogi.

Mah rajab key kisi jumma ki shab ko baad namaz isha do rikat namaz parhe har do rikat mein baad Surah Fateha key Aayatul Kursi 11 martaba, Zulzal 11 martab, Surah Takasur 11 martaba parhe. Baad salam key Dargah Ilahi mein apne gunahon ki maghfarat talab kare. Insha Allah Tala is namaz parhne wale key tamam k tamam gunah muaf farma kar Allah Pak is ki bakhshish farmaye ga.


Baad azan 100 martaba Darood Shareef parh kar jo bhi dua kare khua woh dunyawi ya dini ho Insha Allah Tala dargah ilahi mein zaroor qabool hogi.

7, 15, 27 Tareekh ki Shab
Mah rajab ki 7, 15 aur 27 tareekh ki shab baad namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhe . Har rikat mein baad surah fatiha key surah ikhlas 1 bar parhe . Haq tala is namaz key parhne wale ko dunyawi aur dini tamam aafaton se mehfooz rakhe ga aur pul sarat ka rastah is par se aasan hoga.

15 Tareekh ki Namaz
15 tareekh ki shab ko baad namaz isha 20 rikat namaz 10 salam se parhni hai. Har rikat mein Surah Fatiha key baad Surah Ikhhlas 1,1 dafa parhe . Insha Allah Tala Allah Pak is namaz ka be had sawab ata farmayein gay aur is namaz key parhne wale key guanah aise jharein gay jaise darakht key sukhe patte jharte jate hain.

Courtesy : world136

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निस्बते-क़ुरआन

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जो लोग क़ुरआन को सिर्फ़ इसलिए नहीं खोलते, क्योंकि वे पढ़ना नहीं जानते, तो वे क़ुरआन पढ़ें.
दक्षिण अफ़्रीका में एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग मौलाना यूनुस साहब दावत-ए-हक़ दे रहे थे. जो शख़्स उनकी ख़िदमत में था, रात को उसका इंतक़ाल हो गया. जब बुज़ुर्ग को ख़बर दी गई, तो वह जनाज़े के साथ हो लिए. आप फ़रमाते हैं- जब क़ब्रिस्तान पहंचे, तो देखा कि उसकी क़ब्र से मुश्क की ख़ुशबू आ रही है. मैयत को दफ़नाने के बाद आप लौटे, तो आपने मक़ामी साथी से कहा कि अपनी बीवी को मरने वाले के घर भेजो और पता करो कि वह कौन सा आमाल था, जिसकी वजह से उसकी क़ब्र से मुश्क की ख़ुशबू आ रही है.

लिहाज़ा ऐसा ही हुआ. लौट कर उस साथी की बीवी ने ख़बर दी कि उसकी बीवी ने बताया कि वह क़ुरआन पढ़ना नहीं जानता था.  बस अलहम्द और क़ुल की सूरह ही जानता था और नमाज़ भी इन्हीं से ही पढ़ता था. हां, मगर वह रोज़ क़ुरआन लेकर बैठता और आयतों पर उंगली घुमाते हुए कहता- अल्लाह ये सही है, आगे-आगे उंगली घुमाता जाता और कहता जाता- अल्लाह ये भी सही है. इस तरह पूरा क़ुरआन ख़त्म होने पर मीठा लाता. क़ुरआन सिर पर रखकर कहता- अल्लाह तू भी सही है, तेरा दीन भी सही है, ये क़ुरआन भी सही है.  बस मैं ग़लत हूं. बस तू, इस किताब में मेरे हिस्से की जो हिदायत है, मुझे नसीब करके ग़लती माफ़ कर दे.

दोस्तों ! वो पढ़ना नहीं जानता था, मगर क़ुरआन की निस्बत, उसके शौक़, उसकी तड़प का अल्लाह ने ये सिला दिया कि उसकी क़ब्र को मुश्क की ख़ुशबू से महका दिया. अल्लाह हम सबको क़ुरआन पढ़ने की तड़प अता फ़रमा. उसमें जो हिदायत हमारे हिस्से की है, हमें नसीब कर दे, सारे आलम को हिदायत नसीब कर दे. आमीन
कबीर अली

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नमाज़ में की जाने वाली कुछ ग़लतियां

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इमाम के पीछे नमाज़ी का ऊंचे स्वर में क़ेराअत करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ों में ज़ोर ज़ोर से क़ेराअत करके दूसरे नमाज़ियों की नमाज़ में ख़लल डालते हैं. इमाम के पीछे सूरत ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर देंगे मानो वह यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उन्होंने उसे कंठस्थ कर रखा है. हालांकि नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सुन लो! तुम में से हर एक नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. इसलिए बिल्कुल कोई दूसरे को कष्ट न पहुंचाए, न कोई किसी के सामने अपनी आवाज़ को ऊंचा करे.” (अबू-दाऊद)
नमाज़ के बीच विभिन्न प्रकार की हरकतें करना
कुछ नमाज़ी अपनी नमाज़ों में श्रद्धा का ख़्याल किए बिना नमाज़ में विभिन्न प्रकार की हरकतें करते रहते हैं. कोई हाथ की घड़ी में देख रहा है, कोई दाढ़ी पर हाथ फेर रहा है, कोई कपड़े से मिट्टी झाड़ रहा है, कोई नाक से खेल रहा है, तो कोई पीठ खुजला रहा है इत्यादी. लगता ही नहीं कि वह अपने मालिक और संसार के सृष्टिकर्ता के सामने खड़े हुए हैं. ज़रा सोचिए कि उनमें से यदि कोई दुनिया के किसी बड़े आदमी के सामने खड़ें होते, तो ऐसी हरकतें कर सकते थे? कदापि नहीं, तो फिर अपने मालिक के सामने ऐसा क्यों.
आयतों के संदर्भ को समझे बिना इमाम की क़ेराअत पर रोना चिल्लाना
नमाज़ में कुछ आयतें जहन्नम, यातना और प्रलोक से सम्बन्धित होती हैं, जिन्हें सुन कर एक व्यक्ति का ह्रदय विनर्म पड़ जाता और आंखों से आंसू जारी हो जाते हैं और यह अच्छी बात है, लेकिन कुछ लोग हर नमाज़ में रोना और चीख़ना शूरू कर देते हैं, चाहे पढ़ी जाने वाली आयतें जन्नत और जहन्न से सम्बन्धित हों अथवा हैज़ या निफास से सम्बन्धित. विदित है कि इससे दूसरे नमाज़ियों को परेशानी होती है.
परागंदा छवि में मस्जिद आना
 निर्धनता कोई ऐब नहीं, कितने निर्धन साफ़-सुथरे कपड़े पहन कर मस्जिद जाते हैं, जबकि कितने ऐसे सुखी और सम्पन्न लोगों का हाल यह होता है कि जब बाज़ार जाएं, तो बड़े बन-संवर कर जाएं, लेकिन मस्जिद आना हो, तो फक़ीराना और परागंदा छवि बना लेते हैं. हालांकि ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं.
नमाज़ियों के आगे से गुज़रना
कुछ नमाज़ी नमाज़ समाप्त होते ही मस्जिद से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और उन लोगों का बिल्कुल लिहाज़ नहीं करते, जो अपनी छूटी हुई नमाज़ें अदा कर रहे होते हैं. यदि उन्हें नमाज़ियों के आगे से गुज़रने के पाप का सही ज्ञान हो जाए, तो कदापि ऐसा न करें और नमाज़ी की नमाज़ समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते रहें. नबी सल्ल. ने फ़रमायाः “यदि नमाज़ी के सामने से गुज़रने वाला यह जान ले कि उसका क्या पाप है, तो उसका चालीस (वर्ष) तक प्रतीक्षा में खड़े रहना उसके लिए बेहतर है.”  (सहीह बुख़ारी)
नमाज़ में आसमान की ओर निगाह उठाना
नबी सल्ल. ने इस बात से मना फ़रमाया कि नमाज़ी नमाज़ की स्थिति में अपनी निगाह आसमान की ओर उठाए, बल्कि आपने सख़्ती से फ़रमाया कि ऐसा करने वालों की निगाहें उचक न ली जाएं. (मुस्नद अहमद)
आपने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि नमाज़ में खड़े होते समय एक व्यक्ति की निगाह उसके सज्दे के स्थान पर टिकी होनी चाहिए, जबकि कुछ नमाज़ी नमाज़ में कभी छत की ओर देखते होते हैं, मानो अल्लाह को देख रहे हैं, तो कुछ लोग दाएं बाएं झाँक रहे होते हैं।
लम्बे स्वर में खींच कर देर तक आमीन कहना
जहरी नमाज़ों में ऊंची आवाज़ से आमीन कहना अल्लाह के रसूल सल्ल. की सुन्नत है, क्योंकि फ़रिश्ते भी इस पर आमीन कहते हैं और जिसकी आमीन फ़रिश्तों की आमीन से सहमत हो गई, उसके पाप क्षमा कर दिए जाते हैं. इसलिए होना यह चाहिए कि आमीन एक साथ कही जाए और ऊंचे स्वर में ताकि सुनी जा सके, जबकि देखा यह जाता है कि कुछ लोग बिल्कुल आमीन कहते ही नहीं, जबकि दूसरे कुछ लोग इतना लम्बा “आमीन” कहते हैं कि सब लोगों के आमीन से फ़ारिग़ होने के बावजूद वह आमीन को खींचते रहते हैं, जिससे अन्य नमाज़ियों को तकलीफ़ होती है.
नाफ़ के नीचे अथवा गर्दन के निकट हाथ बांधना
नमाज़ में हाथ बांधने के सम्बन्ध में सब से सही बात यह है कि दोनों हाथ सीने पर बांधे जाएं, इस प्रकार कि दायां हाथ बायें हाथ पर नाफ़ से ऊपर और छाती के नीचे हो.
हल्ब बिन ताई रज़ि. बयान करते हैं कि “मैंने नबी सल्ल. को देखा कि हाथों को सीने पर बांधे हुए थे.” (मुस्नद अहमद) लेकिन कुछ लोग इसके विपरीत नाफ़ के नीचे हाथ बांधते हैं, तो कुछ लोग गर्दन के बिल्कुल क़रीब और इन परिस्थितियों में आप स्वंय उनकी परेशानी का अनुभव कर सकते हैं.
पेशाब या पाख़ाना को रोक कर नमाज़ पढ़ना
एक ही वज़ू से बहुत सी नमाज़ें पढ़ने के कुछ इच्छुक कभी कभी पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने लगते हैं, जबकि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने पेशाब या पाख़ाना रोक कर नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमाया है. यदि किसी को ऐसी सूरत पेश आ जाए कि जमाअत खड़ी हो चुकी हो और उसे शौचालय जाने की आवश्यकता हो, तो वह पहले शौचालय जा कर अपनी ज़रूरत पूरी करे. नबी सल्ल. का फ़रमान है- ” जब खाना उपस्थित हो, तो नमाज़ नहीं होती और न उस समय जब पेशाब या पाख़ाना उसे धकेल (निकलने के लिए ज़ोर लगा) रहा हो”. (मुस्लिम)
इसलिए अल्लाह के रसूल सल्ल. के आदेश की मुख़ालफ़त करने की बजाय पहले शौचालय से फ़ारिग़ हो जाएं फिर नमाज़ शुरू करें, ताकि पूरी श्रद्धा से नमाज़ पढ़ सकें.
सफ़ों को बराबर न करना
सामान्य रूप में यह देखने को मिलता है कि नमाज़ी अपनी नमाज़ों में सफ़ें सीधी करने का ज़्यादा ख़्याल नहीं करते और अपने बीच में ख़ाली जगह छोड़ कर खड़े होते हैं. हालांकि यह तरीक़ा प्यारे नबी सल्ल. की नमाज़ के तरीक़े के विपरीत है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “सफ़ें ठीक कर लो, कंधे बराबर कर लो, सफ़ के बीच ख़ाली रह जाने वाले स्थान को भर लो, अपने भाइयों के लिए नरम हो जाओ और शैतान के लिए जगह न छोड़ो. जो व्यक्ति सफ़ को मिलाएगा अल्लाह उसको मिलाएगा और जो व्यक्ति सफ़ को तोड़ेगा अल्लाह उसको तोड़ेगा.” (अबू दाऊद)
एक मस्जिद में एक ही समय दो जमाअत करना
मस्जिद में प्रत्येक उपस्थितगणों का एक इमाम के पीछे नमाज़ की अदाएगी को जमाअत कहते हैं. लेकिन कभी- कभार यह देखने को मिलता है कि पहली जमाअत समाप्त होने के बाद दो-दो जमाअतें एक ही मस्जिद में एक ही समय क़ायम कर ली जाती हैं. और यह कभी तो इमाम की ग़लती के कारण होता है कि इमाम की आवाज़ धीमी होने के कारण देर से आने वालों को पता न चल सका कि दूसरी जमाअत खड़ी हुई है और कभी मुक़तदी की गलती के कारण होता है कि जल्दी दाख़िल होने के कारण यह विश्वास प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की कि जमाअत खड़ी हुई है, और इस तरह दूसरी जमाअत खड़ी कर ली.
रुकू में कमर और घुटने सीधा न रखना
 कुछ नमाज़ी रुकू के बीच या तो सर को नीचे झुकाए रखते हैं या फिर सर को बहुत ऊंचा रखते हैं, यह दोनो शक्लें ग़लत हैं. हालांकि सर को न ज़्यादा झुकाया जाए और न ज़्यादा उठाकर रखा जाए, बल्कि कमर और सर दोनों बराबर होना चाहिए कि यदि उस पर पानी बहाया जाए तो ठहर जाए. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “एक व्यक्ति साठ वर्ष नमाज़ें पढ़ता है, लेकिन उसकी एक नमाज़ भी स्वीकार नहीं की जाती, इसलिए कि वह कभी रुकू ठीक करता है, तो सजदा सही नहीं करता और अगर सजदा ठीक करता है तो रुकू सही नहीं करता.” (अत्तरगीब वत्तरहीब)
कुछ नमाज़ी रुकू की स्थिति में घुटने पर दोनों हाथ रखने की बजाए जांघ पर रखते हैं, जबकि कुछ दूसरे घुटने से बिल्कुल नीचे टख़ने के क़रीब तक दोनों हाथों को ले जाते हैं, जो कि ग़लत है. सही तरीक़ा यह है कि रुकू की स्थिति में कमर को बिल्कुल सीधा रखा जाए और दोनों हथेलियां घुटने पर टिकी हुई हों.
सजदे की स्थिति में कोहनियों को ज़मीन पर बिछाना या हथेलियों को बिल्कुल सीधा खड़ा रखना
 सजदे में कुछ लोग कोहनियों को ज़मीन पर बिछा लेते हैं. हालांकि नबी सल्ल. ने इस तरीक़े को कुत्ते से तशबीह देते हुए फ़रमाया कि “कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते के समान ज़मीन पर न फैलाए”.। (बुख़ारी, मुस्लिम) जबकि कुछ लोग अपनी हथेलियों को मोड़े हुए बिल्कुल खड़ा रखते हैं, जबकि सही तरीका़ यह है कि हथेलियां ज़मीन पर रखी जाएं इस प्रकार कि उंगलियां मिली हुई हों और क़िबला की ओर हों और कोहनियां ज़मीन से उठी हुई हों. उसी प्रकार पैर की उंगलियां भी क़िबला की ओर हों.
सलाम फेरते ही ज़ोर से बातें करने लगना
कुछ नमाज़ी सलाम फेरने के बाद यह भूल जाते हैं कि वह मस्जिद में हैं और अपने साथी के साथ वार्ता और हंसने- हंसाने में लग जाते हैं मानो किसी चाय की दुकान में बैठे हों. हालांकि उस समय कितने नमाज़ी अपनी नमाज़े पूरी कर रहे होते हैं, कितने सुन्नतें पढ़ रहे होते हैं. यदि कोई ऐसी स्थिति में उन्हें टोक दे, तो दिल मैला कर लेते हैं.
नियत का ज़बान से अदा करना
कुछ लोग जमाअत की नमाज़ में देर से आते हैं और ज़ोर से तकबीर कहते हुए नमाज़ में दाख़िल होते हैं, बल्कि कुछ लोग नियत के शब्द भी ज़बान से अदा करते हैं ” मैं इमाम के पीछे चार रकअत ज़ुहर की नमाज़ अदा करने की नियत करता हूं, मुंह मेरा क़िबला की ओर, अल्लाहु अकबर” हालांकि ऊंची आवाज़ से “अल्लाहु अकबर”कहना या नियत के शब्द ज़बान से बोलना प्यारे नबी सल्ल. और आपके साथियों से प्रमाणित नहीं. और इसलिए भी कि नियत दिल के संकल्प का नाम है. अतः जबान से नियत के शब्द बोलने की आवश्यकता ही नहीं. अल्लामा इब्ने तैमिया रहि. फ़रमाते हैं-
“ज़बान से नियत करना शास्त्र और बुद्धि दोनों के विपरीत है, शास्त्र के विपरीत इसलिए कि यह बिदअत है. और बुद्धि के विपरीत इसलिए कि उसकी उदाहरण ऐसे ही है जैसे कोई खाना खाना चाहता हो, तो कहे “मैं नियत करता हूं अपने हाथ को इस बर्तन में रखने की, मैं इससे एक लुक़मा लूंगा, फिर उसको मुंह में रखूंगा, फिर उसको चबाऊंगा, अंततः उसको निग़ल लूंगा, ताकि मैं तुष्टि पा सकूं. विदित है कि कोई बुद्धिमान इस प्रकार के शब्द नहीं बोलेगा, क्योंकि नियत करना इस बात का प्रमाण है कि नियत करने वाले को मआमले का पूरा-पूरा ज्ञान है- जब आदमी को पता है कि वह क्या कर रहा है, तो पक्की बात है कि उसने इस काम की नियत भी ज़रूर की होगी.”   (फतावा इब्ने तैमिया 1/232)
प्याज़ अथवा लहसुन खाकर मस्जिद जाना और डकार लेते रहना
यदि प्रत्येक नमाज़ी नहीं, तो अधिकतर लोग यह जानते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने प्याज़ या लहसुन आदि खाकर मस्जिद आने से मना किया है, ताकि वह अपने मुंह से निकलने वाली गंध से फ़रिश्तों और इंसानों को कष्ट पहुंचाने का कारण न बने. (मुस्लिम) उसके बावजूद आप कितने लोगों को देखेंगे कि वह मस्जिद में डकार लेकर अपने मुंह की गंध से दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं.

नमाज़ में इमाम का अनुसरण न करना
जमाअत की नमाज़ में न तो इमाम से आगे निकलना चाहिए और न ही इमाम के बिल्कुल पीछे रहना चाहिए कि इमाम सज्दा से उठ जाए और वह अभी सजदे ही में हो, इमाम रुकू में चला जाए और वह अभी क्याम ही में हो. क्योंकि यह तरीक़ा अल्लाह के नबी सल्ल. के आदेश के विपरीत है जिसमें आया है कि “इमाम इसलिए बनाया गया है, ताकि उसकी ताबेदारी की जाए”. सही तरीक़ा यह है कि इमाम के साथ रुकू, सजदा और क्याम किया जाए, ताकि वास्तव में जमाअत की नमाज़ कही जा सके. और जो कोई लम्बा रुकू या सजदा करने का इच्छुक हो वह नफ्ली नमाज़ों में जैसे चाहे कर सकता है.
ख़ुतब-ए-जुमा के समय बात करना
जुमा का ख़ुतबा नमाज़ का ही भाग है, इसलिए जुमा के दिन मस्जिद में बैठ कर इमाम का ख़ुतबा ख़ामोशी के साथ सुनना चाहिए, लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग अज्ञानता के कारण देर से आने वालों को सलाम करते हैं, तो कुछ लोग बच्चों को नसीहत करते हैं, जबकि कुछ लोग ख़तीब की बात पर टिप्पणी कर रहे होते हैं, मानो वह मस्जिद में नहीं किसी सिनेमा हॊल में हैं.
नमाज़ में जंभाई लेना
जंभाई ज़ाहिर में थकान और सुस्ती की निशानी होती है, इसका कारण जो भी हो हम में से हर व्यक्ति किसी विद्वान से भेंट करते समय उसे दूर करने का सम्भवतः प्रयास करता है. तो फिर उस समय इसका ज़्यादा ही ख़्याल रखना चाहिए, जबकि नमाज़ी नमाज़ में अपने रब से बात कर रहा होता है. नबी सल्ल. ने फ़रमाया- “जब नमाज़ के बीच किसी को जंभाई आ रही हो, तो सम्भवतः उसे रोक ले, क्योंकि जंभाई द्वारा शैतान अन्दर प्रवेश करता है.” (सहीह मुस्लिम, सहीह बुख़ारी) और जब शैतान नमाज़ी के अन्दर प्रवेश कर गया, तो फिर नमाज़ की ख़ैर नहीं, उसी प्रकार जंभाई लेने वाले पर शैतान हंसता है, इसलिए जिस हद तक सम्भव हो सके नमाज़ में जंभाई को रोकने का प्रयास करना चाहिए.
मुक़तदी के खड़ा होने का स्थान
पहली सफ़ पूरी होने के पश्चात मस्जिद में आने वाले जब दूसरी अथवा तीसरी सफ़ बनाना चाहते हों, तो कोई दायीं ओर की श्रेष्टा वाली हदीस के आधार पर इमाम के दायीं ओर खड़ा होने का प्रयास करते हैं, तो कोई बायीं ओर खड़े हो जाते हैं कि उस तरफ़ पंखा चल रहा होता है. हालांकि सही तरीक़ा यह है कि इमाम के बिल्कुल पीछे नई सफ़ बनाई जाए, चाहे इमाम के खड़ा होने की जगह बीच सफ़ हो या सफ़ का किनारा हो.
इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा की क़ेराअत ज़ोर से करनी
इमाम के पीछे जहरी नमाज़ों में सूरः फ़ातिहा पढ़ने की गुंजाइश ज़रूर है, परन्तु इमाम के साथ ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने लगना जिसके कारण दूसरे नमाज़ियों को कष्ट हो, किसी स्थिति में उचित नहीं. इसलिए जो लोग जमाअत में सूरह फ़ातिहा पढ़ें उन्हें चाहिए कि धीमी आवाज़ में पढ़ें, ताकि उनके साथ खड़े होने वाले नमाज़ी को तकलीफ़ न हो.

साभार ipcblogger  

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जन्नतुल फ़िरदौस का सवाल करो...

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जब तुम अल्लाह से सवाल करो, तो जन्नतुल फ़िरदौस का सवाल किया करो, क्योंकि वह जन्नत का आला और अफ़ज़ल हिस्सा है. (बुख़ारी फ़िल तारीख़ :4/146)
اللھم انی اسئلک الجنة الفردوس
अल्लाहुम्मा इन्नी असआलुकल जन्नतुल फ़िरदौस...
तर्जुमा- ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नतुल-फ़िरदौस का सवाल करता हूं.

जन्नत का सवाल और जहन्नम से पनाह
जो शख़्स अल्लाह पाक से तीन बार जन्नत का सवाल करे, तो जन्नत कहती है- ऐ अल्लाह ! इसको जन्नत में दाख़िल कर दे और जो  शख़्स तीन बार जहन्नम से पनाह मांगे, तो जहुन्नम कहती है- ऐ अल्लाह ! इसको जहन्नम से बचा ले. [सही तिर्मिज़ी]

اَللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ
तर्जुमा- ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जहन्नुम से पनाह मांगता हूं.

ऐ अल्लाह! हम तुझ से जन्नत का सवाल करते हैं और जहन्नम से तेरी पनाह मांगते हैं. आमीन




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रबीउल अव्वल

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पहली रबीउल अव्वल की रात
बेसत के तेरहवें साल इसी रात हज़रत रसूलुल्लाह स.अ के मक्क-ए-मुअज़्ज़मा से मदीना-ए-मुनव्वरा को हिजरत (पलायन) की शुरुआत हुई, इस रात आप सौर नामक गुफ़ा में रहे और हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम अपनी जान आप पर फिदा करने के लिए मुशरिक क़बीलों की तलवारों से बे परवाह हो कर पैग़म्मुबर हम्मद स.अ. के बिस्तर पर सो रहे थे.
इस तरह आपने अपनी फज़ीलत और हज़रत रसूलुल्लाह स.अ. के साथ अपनी वफ़ादारी व हमदर्दी की महानता को सारी दुनिया पर ज़ाहिर कर दिया. तो इसी रात अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की शान में आयत उतरी:
وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاء مَرْضَاتِ اللّهِ وَاللّهُ رَؤُوفٌ بِالْعِبَادِ (सूरा बक़रा आयत 207)
और लोगों में से कुछ हैं जो अल्लाह की मर्ज़ी हासिल करने के लिए जान देते हैं.
पहली रबीउल अव्वल का दिन
उल्मा का कहना है कि इस दिन हज़रत रसूले अकरम स. और अमीरुल अलैहिस्सलाम की जान बच जाने पर शुकराने का रोज़ा रखना मुस्तहब है और आज के दिन उन दोनों हस्तियों की ज़ियारत पढ़ना भी मुनासिब है.
सैयद ने इक़बाल नामक किताब में आज के दिन के दुआ भी लिखी है. शेख कफ़अमी के अनुसार आज ही के दिन इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की वफ़ात हुई, लेकिन मशहूर कथन है कि आपका निधन इस महीने की आठवीं तारीख़ को हुआ, लेकिन संभव है कि पहली तारीख़ से आपकी बीमारी शुरू हुई हो.
आठवीं रबीउल अव्वल का दिन
मशहूर कथन के अनुसार 260 हिजरी में इसी दिन इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की शहादत हुई और आपके बाद इमाम ज़माना अ.ज. की इमामत की शुरुआत हुई है, इसलिए उचित है कि इस दिन दोनों महान हस्तियों की ज़ियारत पढ़ी जाए.
नवीं रबीउल अव्वल का दिन
आज का दिन बहुत बड़ी ईद है, क्योंकि मशहूर कथन यही है कि आज के दिन उमर बिन साद मर कर जहन्नम मे दाख़िल हुआ, जो मैदाने कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में यज़ीद की फ़ौज का सेनापति था। रिवायत है कि जो इंसान आज के दिन अल्लाह के रास्ते में खर्च करे तो उसके गुनाह माफ कर दिए जाएंगे और यह कि आज के दिन मोमिन को खाने की दावत देना, उसे खुश करना, अपने परिवार के लिये दिल खोल के खर्च करना, अच्छा लिबास पहनना, अल्लाह की इबादत करना और का शुक्र बजा लाना, मुस्तहब है. आज वह दिन है जिस में ग़म दूर हुए और एक दिन पहले इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की शहादत हुई इसलिए आज इमाम ज़माना अ.ज. की इमामत का पहला दिन है इसलिए इसका सम्मान व महत्व और भी बढ़ जाता है.
बारहवीं रबीउल अव्वल का दिन
कुलैनी व मसऊदी के कथन और अहले सुन्नत भाईयों की मशहूर रिवायत के अनुसार इस दिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम की विलादत (जन्म) हुई. इस दिन दो रकअत नमाज़ मुस्तहब है कि जिसमें पहली रकअत में सूरए अलहम्द के बाद तीन बार सूरए काफ़ेरून पढ़े दूसरी रकअत में अल-हम्दो के बाद तीन बार सूरए तौहीद पढ़े. यही वह दिन है, जिसमें हिजरत के समय हज़रत रसूलुल्लाह स.अ. मदीने में दाखिल हुए. शेख ने कहा है कि 130 हिजरी में इसी दिन बनी मरवान की हुकूमत और बादशाहत का अंत हुआ.
चौदहवीं रबीउल अव्वल का दिन
64 हिजरी में इसी दिन, यज़ीद बिन मुआविया मर के जहन्नम में दाखिल हुआ, अखबारुद दुवल में लिखा है कि यज़ीद मलऊन दिल और आमाशय के बीच पर्दे की सूजन का शिकार था, जिससे वह होरान नामक जगह में मरा, वहां से उसकी लाश दमिश्क लाई गई और बाबुस् सग़ीर में गाड़ दिया गया, फिर लोग उस जगह कूड़ा करकट फेकते रहे. वह जहन्नमी 37 साल की उम्र में मौत का शिकार हुआ और उसकी अत्याचारी हुकूमत केवल तीन साल नौ महीने रही.
 सत्रहवीं रबीउल अव्वल की रात
यह हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के विलादत की रात और बड़ी ही बरकतों वाली रात है. सैयद ने रिवायत की है कि हिजरत से एक साल पहले इस रात में हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम को मेराज हुई.
सतरहवीं रबीउल अव्वल का दिन
शिया उल्मा में मशहूर नज़रिया यह है कि यह दिन हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम के जन्म का दिन है और उनके बीच यह भी तय बात है कि आपकी विलादत जुमे के दिन सुबह के समय उनके घर में हुई, जबकि आमुल फ़ील का पहला साल नोशेरवान आदिल की हुकूमत का दौर था और 83 हिजरी में इसी दिन इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की विलादत हुई. इसलिए इस दिन की महिमा और महानता में और बढ़ोत्तरी हो गई.
सारांश यह कि इस दिन को बड़ी फज़ीलत, सम्मान और श्रेष्ठता हासिल है, इसमें कुछ आमाल हैं:
1. ग़ुस्ल करें.
2. आज के दिन रोज़ा रखने की बड़ी फज़ीलत है, रिवायत है कि अल्लाह इस दिन रोज़ा रखने वाले को एक साल के रोज़े रखने का सवाब देता है. आज का दिन साल के उन चार दिनों में से एक है, जिसमें रोज़ा रखना ख़ास फज़ीलत और विशेषता रखता है.
3. आज के दिन हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम की ज़ियारत पढ़ें.
4. इस दिन हज़रत अमीरुल अली अलैहिस्सलाम की वह ज़ियारत पढ़ें, जो इमाम जाफ़र सादिक (अ) ने पढ़ी और मुहम्मद मुस्लिम को सिखाई थी.
5. जब सूरज जरा ऊंचा हो, तो दो रकअत नमाज़ पढ़े जिसकी हर रकअत में सूरए अलहम्द के बाद दस बार सूरह क़द्र (इन्ना अनज़लनाहो) और दस बार सूरह तौहीद (क़ुल हुवल्लाह) पढ़ें, नमाज़ का सलाम पढ़ने के बाद मुस्सले पर बैठा रहे और यह दुआ पढ़ें
اللھم انت حی لایموت الخ
ऐ अल्लाह! तू ज़िंदा है जिसे मौत नहीं
यह बहुत लम्बी दुआ है और सनद भी किसी इमाम मासूम तक पहुंचती दिखाई नहीं देती, इसलिए यहां हम इसे बयान नहीं कर रहे हैं, लेकिन जो इंसान पढ़ना चाहे वह “ज़ादुल मआद” में देख ले.
6. आज के दिन मुसलमानों को ख़ास अंदाज़ से खुशी मनानी चाहिए, उन्हें इस दिन का बहुत सम्मान करना चाहिये, सदक़ा और दान देना चाहिये और मोमेनीन को ख़ुशहाल करें और इमामों के रौज़ों की ज़ियारत करें. सैयद ने अपनी किताब “इकबाल” में आज के दिन के आदर, सम्मान को बयान किया है और कहा है कि नसरानी और मुसलमानों का एक ग्रुप हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत के दिन बहुत सम्मान करते हैं, लेकिन मुझे उन पर आश्चर्य होता है कि क्यों वह, हज़रत रसूलवे इस्लाम की विलादत के दिन का सम्मान नहीं करते जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में बहुत बुलंद और श्रेष्ठ हैं और उनका स्थान उनसे बढ़कर है.

साभार इस्लाम14

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दरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत

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दरूद शरीफ़
* अल्ला हुम्म सल्लि अला सय्यिदिना व मौलाना मुहम्मदिव व अला आलि सय्यिदिना व मौलाना मुहम्मदिव
व बारिक वस्ल्लिम.

अल्लाह हम सबको कसरत से दरुद-ओ-सलाम पढ़ने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन






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हज का तरीक़ा

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हज सर्वश्रेष्ठ उपासनाओं और महान आज्ञाकारिताओं में से है, और वह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, जिसके साथ अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा है और जिसके बिना बंदे का धर्म संपूर्ण नहीं हो सकता.
तथा दो चीज़ों के बिना किसी इबादत द्वारा अल्लाह तआला की निकटता प्राप्त नहीं होती और न ही वह इबादत स्वीकार होती है-
एक : अल्लाह सर्वशक्तिमान के लिए निःस्वार्थता (इख़्लास) है इस प्रकार कि उसके द्वारा उसका उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना और आख़िरत का दिन हो, वह उसके द्वारा दिखावा, पाखंड और सांसारिक लाभ का इच्छुक न हो.
दूसरा : करनी और कथन में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुपालन करना आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की जानकारी के बिना संपूर्ण नहीं हो सकती.

इसीलिए उस व्यक्ति पर, जो किसी इबादत हज या उसके अलावा के द्वारा अल्लाह की उपासना करना चाहता है, यह अनिवार्य है कि वह उसके अंदर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े को सीखे ताकि उसका कार्य सुन्नत के अनुसार हो.

हज के प्रकार
हज के तीन प्रकार हैं : तमत्तुअ, इफ्राद, क़िरान
तमत्तुअ : यह है कि हज करने वाला हज के महीनों में (और हज के महीने शव्वाल, ज़ुल-क़ादा, और ज़ुल-हिज्जा हैं. केवल उम्रा का एहराम बांधे. जब मक्का पहुंच जाए तो उम्रा के लिए तवाफ़ और सई करे, अपने सिर के बाल मुंडा ले या उन्हें छोटे करवा ले और अपने एहराम से हलाल हो जाए (अर्थात एहराम के कपड़े उतार दे और एहराम की पाबंदी ख़त्म कर दे). जब तर्विया अर्थात आठ ज़ुल-हिज्जा का दिन आए, तो केवल हज का एहराम बांधे और उसके सभी कार्यों को करे. तमत्तुअ करने वाला संपूर्ण उम्रा करता है और संपूर्ण हज करता है.
इफ्राद : हज करने वाला केवल हज का एहराम बांधे (अर्थात केवल हज की नीयत करे). जब मक्का पहुंच जाए, तो तवाफ़े-क़ुदूम (आगमन का तवाफ़) करे और हज के लिए सई करे, तथा सिर के बाल न मुंडाए और न उसे छोटा करवाए, और अपने एहराम से हलाल न हो, बल्कि वह मोहरमि बाक़ी रहे यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बा को कंकरी मारने के बाद हलाल हो, और यदि हज की सई को हज का तवाफ़ करने के बाद तक विलंब कर दे तो कोई आपत्ति की बात नहीं है.
क़िरान: हज करने वाला उम्रा और हज का एक साथ एहराम बांधे (अर्थात नीयत करे) या पहले उम्रा का एहराम बांधे फिर उसका तवाफ़ आरंभ करने से पहले उस के साथ हज को भी सम्मिलित कर ले, (इस प्रकार कि वह इस बात की नीयत करे कि उसका तवाफ़ और उसकी सई उसके हज और उम्रा की है).

क़िरान हज करने वाले का काम इफ्राद हज करने वाले के काम के समान है, केवल इतना अंतर है कि क़िरान करने वाले पर हदी (जानवर की क़ुर्बानी) अनिवार्य है और इफ्राद हज करने वाले पर हदी अनिवार्य नहीं है.

हज के इन तीनों प्रकार में सबसे श्रेष्ठ तमत्तुअ हज है, इसी का नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम को आदेश दिया था और इसी पर बल दिया था, यहां तक कि यदि मनुष्य क़िरान हज या इफ्राद हज की नीयत करे तब भी उसके लिए महत्वाकांक्षिक बात यह है कि वह अपने एहराम को उम्रा में परिवर्तित कर दे फिर वह हलाल हो जाए ताकि वह तमत्तुअ हज्ज करने वाला हो जाए, चाहे यह तवाफ़े- क़ुदूम और सई करने के बाद ही क्यों न हो, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब हज्जतुल वदाअ के साल तवाफ़ और सई कर लिया और आपके साथ आपके सहाबा भी थे, तो आपने हर उस व्यक्ति को जिसके पास हदी नहीं थी, अपने एहराम (हज की नीयत) को उम्रा में बदलने और बाल कटवाकर हलाल हो जाने का आदेश दिया और फरमाया : “यदि मैं अपने साथ हदी को न लाया होता, तो उसी तरह करता जिसका मैं ने तुम्हें आदेश दिया है.”
एहराम
यहां एहराम की उन सुन्नतों को किया जाएगा जैसे स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना.

फिर अपनी नमाज़ से फ़ारिग़ होने के बाद या अपनी सवारी पर बैठने के बाद एहराम बांधे (अर्थात हज की इबादत में प्रवेश करने की नीयत करे)
फिर यदि वह तमत्तुअ करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि- उम्रह” कहे.
यदि वह हज क़िरान करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा बि-हज्जतिन व उम्रह” कहे.
और यदि वह इफ्राद हज करने वाला है तो : “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” कहे.

फिर कहे : अल्लाहुम्मा हाज़िही हज्जतुन ला रियाआ फ़ीहा वला सुमअह (ऐ अल्लाह यह ऐसा हज है जिसमें कोई दिखावा और पाखंड नहीं है).

फिर वही तल्बिया पढ़े जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पढ़ी थी और वह यह है :
“लब्बैका, अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन्नेमता लका वल मुल्क, ला शरीका लक”
(मैं उपस्थित हूं, ऐ अल्लाह मैं उपस्थित हूं, मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं, हर प्रकार की स्तुति और सभी नेमतें तथा राज्य तेरा ही है, तेरा कोई साझी नहीं.)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तल्बिया में से ये शब्द भी हैं- “लब्बैका इलाहल हक़्क़” (ऐ सत्य पूज्य मैं उपस्थित हूं). तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु तल्बियह में इन शब्दों की वृद्धि करते थे- “लब्बैका व सा'दैक, वल-ख़ैरो बि-यदैक, वर्रग़्बाओ इलैका वल अमल”. पुरूष इसे ऊंचे स्वर में कहेगा, परंतु महिला इतनी आवाज़ में कहेगी कि अपनी बग़ल वाली को सुना सके, लेकिन यदि उसके बग़ल में कोई पुरूष है जो उसका महरम नहीं है, तो वह धीमी स्वर में तल्बिया पढ़ेगी.

यदि एहराम बांधने का इरादा रखने वाला आदमी किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है (जैसे- बीमारी, दुश्मन, या क़ैद इत्यादि) तो उसके लिए उचित यह है कि वह एहराम बांधते समय शर्त लगा ले और कहे-:
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)

अर्थात् यदि कोई रुकावट जैसे बीमारी या विलंब या कोई रुकावट ने मुझे अपने हज के कामों को पूरा करने से रोक दिया, तो मैं अपने एहराम से हलाल हो जाऊंगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बाअह बिंत ज़ुबैर को जबकि उन्हों ने एहराम बांधने का इरादा किया और वह बीमार थीं तो आपने उन्हें आदेश दिया कि वह शर्त लगा लें और फरमाया- तुम्हारे लिअ अपने पालनहार पर वह चीज़ है जिसे तुम मुस्तसना (अपवाद) कर दो.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5089) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1207) ने रिवायत किया है. अतः जब भी वह शर्त लगा ले और उसे वह रुकावट पेश आ जाए जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक दे तो वह अपने एहराम से हलाल हो जाएगा और उसके ऊपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है.

किंतु जो व्यक्ति किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर महसूस नहीं कर रहा है जो उसे उसके हज के कामों को पूरा करने से रोक सकती है, तो उसके लिए शर्त लगाना उचित नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शर्त नहीं लगाई और न तो हर एक को शर्त लगाने का आदेश ही दिया है, आपने ज़बाआ बिंत ज़ुबैर को उनके बीमारी से ग्रस्त होने के कारण इसका आदेश दिया था.

मेहरिम को चाहिए कि अधिक से अधिक तल्बियह पढ़े, विशेष रूप से स्थितियों और ज़माने के बदलने के समय उद्हारण के तौर पर जब किसी ऊंचाई पर चढ़े, यी नीची जगह उतरे, या रात या दिन आए. तथा उसके बाद अल्लाह तअला से उसकी प्रसन्नता और स्वर्ग का प्रश्न करे और उसकी दया व कृपा के द्वारा नरक से पनाह मांगे.

उम्रा के अंदर तल्बिया कहना एहराम से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक धर्म संगत है.
और हज में एहराम बांधने से लेकर ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने तक धर्म संगत है.

मक्का में प्रवेश करने के लिए स्नान करना
मोहरिम के लिए उचित है कि जब वह मक्का के निकट पहुंच जाए तो उसमें प्रवेश करने के लिए यदि उसके लिए आसान है तो स्नान कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का में प्रवेश करने के समय स्नान किया. इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1259) ने रिवायत किया है.

फिर जब मस्जिदुल हराम में प्रवेश करे तो अपने दाहिने पैर को पहले रखे और कहे- “बिस्मिल्लाह वस्सलातो वस्सलामो अला रसूलिल्लाह, अल्लाहुम्मग़ फिर्ली ज़ुनूबी वफ़-तह् ली अब्वाबा रहमतिक, अऊज़ो बिल्लाहिल अज़ीम वबि-वज्हेहिल करीम वबि-सुल्तानिहिल क़दीम मिनश्शैतानिर्रजीम” (मैं अल्लाह के नाम से - प्रवेश करता हूं - तथा दुरूद व सलाम हो अल्लाह के पैगंबर पर, ऐ अल्लाह ! तू मेरे लिए मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वारों को खोल दे, मैं महान अल्लाह, उसके दानशील चेहरे और उसके प्राचीन राज्य की शरण में आता हूं शापित शैतान से), फिर हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) की ओर जाए ताकि तवाफ़ शुरू करे.

फिर तवाफ़ करने और दो रक्अत नमाज़ पढ़ने के बाद सई करने के स्थल पर आए और सफ़ा व मर्वा के बीच सई करे.
जहां तक तमत्तुअ करने वाले का संबंध है तो वह उम्रा के लिए सई करेगा, लेकिन इफ्राद और क़िरान करने वाले हज के लिए सई करेंगे, तथा वे दोनों तवाफ़े-इफ़ाज़ा के बाद तक सई को विलंब भी कर सकते हैं.

सिर के बाल मुंडाना या छोटे करवाना
जब वह सात चक्कर अपनी सई पूरी कर ले तो यदि वह पुरुष है तो अपने सिर को मुंडाए, या उसके बालों को छोटा करवाए, तथा ज़रूरी है कि उसका सिर मुंडाना सिर के सभी बालों के लिए हो, इसी तरह बालों को सिर के सभी ओर से छोटा करवाया जाएगा. जबकि सिर के बालों को मुंडाना उन्हें छोटा करवाने से सर्वश्रेष्ठ है. क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने “सिर के बालों को मुंडाने वालों के लिए तीन बार दुआ की और बालों को छोटा करवाने वालों के लिए एक बार दुआ फ़रमाई.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1303) ने रिवायत किया है।

हां, यदि हज का समय इतना निकट हो कि सिर के बालों के उगने भर के लिए समय न हो तो सर्वश्रेष्ठ बालों को छोटा करवाना ही है, ताकि हज में मुंडाने के लिए उसके सिर में बाल बाक़ी रहें, इस प्रमाण के आधार पर कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्जतुल वदाअ़ के अवसर पर अपने साथियों (सहाबा) को उम्रा के लिए बाल छोटे करवाने का आदेश दिया था, इसलिए कि उन लोगों का आगमन ज़ुल-हिज्जा के चौथे दिन की सुबह को हुआ था. जहां तक महिला की बात है तो वह अपने बालो से उंगली के एक पोर के बराबर काट लेगी.

इन कामों के कर लेने से उम्रा संपूर्ण हो जाएगा और इसके बाद वह पूरी तरह हलाल हो जागा, और वह उसी तरह करेगा जिस तरह कि बिना एहराम वाले लोग कपड़े पहनते हैं, सुगंध लगाते हैं.

जहां तक क़िरान और इफ्राद हज करने वालों का संबंध है तो वे दोनों न सिर के बाल मुंडाएंगे न छोटे करवाएंगे और न ही वे दोनों अपने एहराम से हलाल होंगे (एहराम नहीं खोलेंगे), बल्कि वे दोनों अपने एहराम पर बाक़ी रहेंगे यहां तक कि ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारने और सिर मुंडाने या सिर के बाल छोटे करवाने के बाद हलाल होंगे.

फिर जब तर्वियह अर्थात ज़ुल-हिज्जा का आठवां दिन होगा तो तमत्तुअ हज करने वाला चाश्त के समय मक्का में अपने स्थान से ही हज का एहराम बांधेगा, और उसके लिए अपने हज का एहराम बांधते समय वही चीज़ें करना मुस्तहब (ऐच्छिक) है जो उसने अपने उम्रा का एहराम बांधते समय किया था जैसे- स्नान करना, सुगंध लगाना और नमाज़ पढ़ना, चुनांचे वह हज का एहराम बांधने की नीयत करेगा और तल्बियह कहेगा, वह कहेगा- “लब्बैका अल्लाहुम्मा हज्जा” (ऐ अल्लाह मैं हज्ज की नीयत से उपस्थित हूं).

और यदि वह किसी ऐसी रुकावट के पेश आने से डर रहा है जो उसे उसके हज को पूरा करने से रोक सकती है तो वह शर्त लगा ले और कहे-
“इन हबसनी हाबिसुन फ-महिल्ली हैसो हबस्तनी”
(यदि मुझे कोई रुकावट पेश आ गई तो मैं वहीं हलाल हो जाऊंगा जहां तू मुझे रोक दे.)
और यदि उसे किसी ररुकावट के पेश आने का भय न हो तो शर्त न लगाए. तथा उसके लिए ऊंचे स्वर में तल्बियह कहना मुस्तहब है यहां तक कि वह ईद के दिन जमरतुल अक़बह को कंकरी मारना शुरू कर दे.

मिना जाना
फिर वह मिना जाए और वहां ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ें क़स्र करके पढ़े, दो नमाज़ों को एक साथ न पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिना में क़स्र करते थे, दो नमाज़ों को एकत्र करके नहीं पढ़ते थे.” क़स्र कहते हैं : चार रक्अत वाली नमाज़ों को दो रक्अत करके पढ़ना, तथा मक्का वाले और उनके अलावा अन्य लोग मिना, अरफ़ह और मुज़दलिफ़ा में नमाज़ को क़स्र करके पढ़ेंगे, क्योंकि हज्जतुल वदाअ़ में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को नमाज़ पढ़ाते थे और आपके साथ मक्का वाले भी थे और आपने उन्हें नमाज़ पूरी करने का आदेश नहीं दिया, यदि नमाज़ पूरी पढ़ना उनके ऊपर अनिवार्य होता तो आप उन्हें इसका आदेश देते जिस तरह कि आपने उन्हें मक्का पर विजय के साल इसका आदेश दिया था. लेकिन क्योंकि मक्का की आबादी बढ़ गई और वह मिना को भी सम्मिलित हो गई और वह ऐसे हो गई कि मानो वह उसका एह मुहल्ला है इसलिए मक्का वाले उसमें नमाज़ क़स्र नहीं करते हैं.

अरफ़ह जाना
जब अरफह (नौ ज़ुल-हिज्जा) के दिन सूरज उग आए तो वह मिना से अरफ़ह की ओर प्रस्थान करेगा और ज़ुहर के समय तक यदि उसके लिए आसान है तो नमिरह में पड़ाव करेगा (नमिरह: अरफा से तुरंत पूर्व एक जगह है), नहीं तो कोई बात नहीं है, क्योंकि नमिरह में पड़ाव करना सुन्नत है अनिवार्य नहीं है. जब सूरज ढल जाए (अर्थात ज़ुहर की नमाज़ का समय शुरू हो जाए) तो ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें दो-दो रक्अत पढ़ेगा और उन दोनों के बीच जमा तक़दीम करेगा (अर्थात दोनों को ज़ुहर के समय में पढ़ेगा जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किया ताकि अरफ़ह में ठहरने और दुआ करने का समय लंबा हो जाए.

फिर नमाज़ के बाद ज़िक्र (जप), दुआ और अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने गिड़गिड़ाने (विनती करने) के लिए फ़ारिग़ हो जाए और उसे जो पसंद हो अपने दोनों हाथों को उठाकर क़िब्ला की ओर मुंह करके दुआ करे यद्यपि अरफ़ात की पहाड़ी उसके पीछे हो, क्योंकि सुन्नत क़िब्ला की ओर मुंह करना है पहाड़ी की ओर नहीं, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहाड़ी के पास ठहरे थे और फ़रमाया था- “मैं यहां ठहरा हूं और पूरा अरफ़ह ठहरने की जगह है.”

तथा उस महान ठहरने के स्थान पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अक्सर यह दुआ पढ़ते थे- “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्को व लहुल हम्द, वहुवा अला कुल्ले शैइन क़दीर” (अल्लाह के अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत (राज्य) है और उसी के लिए सभी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर शक्तिवान है.)

यदि उसे उकताहट और आलस्य लगे और वह अपने साथियों के साथ लाभदायक बातचीत के द्वारा या लाभदायक किताबों को पढ़कर विशेषकर जिनका संबंध अल्लाह सर्वशक्तिमान की दानशीलता और उसके व्यापक उपहारों से है, ताकि उस दिन में आशा का पहलू मज़बूत हो तो ऐसा करना अच्छा है. इसके बाद वह फिर से अल्लाह सर्वशक्तिमान से रोने, गिड़गिड़ाने और दुआ करने में व्यस्त हो जाए और दिन के अंतिम समय को दुआ में बिताने का इच्छुक और लालायित बने, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ दुआ अरफ़ह के दिन की दुआ है.

मुज़दलिफ़ा जाना
जब सूरज डूब जाए तो अरफ़ह की ओर रवाना हो. जब अरफ़ह पहुंच जाए तो एक अज़ान और दो इक़ामत से मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े.
और यदि उसे इस बात का भय हो कि वह मुज़दलिफ़ा आधी रात के बाद पहुंचेगा तो वह रास्ते में ही नमाज़ पढ़ लेगा, उसके लिए इशा की नमाज़ को आधी रात के बाद तक विलंब करना जाइज़ नहीं है.

और वह मुज़दलिफ़ा में रात बिताएगा, जब फ़ज्र स्पष्ट हो जाए तो अज़ान और इक़ामत के साथ फ़ज्र की नमाज़ सवेरे पढ़ेगा फिर मश्अरूल हराम का क़सद करेगा (और वह मुज़दलिफ़ा में मौजूद मस्जिद का स्थान है) तो अल्लाह की एकता का वर्णन करेगा और तक्बीर कहेगा और अपनी पसंदीदा दुआ करेगा यहां तक भली भांति रोशनी हो जाए (इस से अभिप्राय यह है कि सूरज उगने से पूर्व दिन की रोशनी स्पष्ट हो जाए)। यदि उसके लिए मश्अरूल हराम तक जाना आसान न हो तो वह अपने स्थान पर ही दुआ करेगा क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- मैं यहां ठहरा हूं और पूरा मुज़दलिफ़ा ठहरने की जगह है. ज़िक्र करने और दुआ करने की हालत में वह अपने दोनों हाथों को उठाए हुए क़िब्ला की ओर मुंह किए होगा.

मिना की तरफ़ प्रस्थान
जब अच्छी तरह रोशनी फैल जाए तो सूरज उगने से पहले वह मिना की ओर प्रस्थान करेगा, और वादी मुहस्सर (मुज़दलिफ़ा और मिना के बीच एक वादी है) में तेज़ी से चलेगा मिना पहुंचकर जमरतुल अक़बह को कंकरी मारेगा और वह मक्का के निकट सबसे अंतिम जमरह है (वह मक्का से सबसे निकट जमरह है) वह एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारेगा, हर कंकरी लगभग लूबिया के दाने के बराबर होगी, हर कंकरी के साथ तक्बीर कहेगा (जमरतुल अक़बह को कंकरी मारते समय सुन्नत यह है कि आदमी जमरह की ओर मुंह करे और मक्का को अपने बायें ओर और मिना को अपने दाहिने ओर कर ले). कंकरी मारने से फ़ारिग़ होने के बाद अपने हदी (क़ुर्बानी के जानवर) को ज़बह करे, फिर अपने सिर को मुंडाए या उसके बालों को छोटा करवाए यदि वह पुरुष है, रही बात महिला की तो वह अपने बालों से एक उंगल (पोर) के बराबर बाल काट लेगी. (इसके द्वारा मोहरिम को पहला तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा, अतः उसके लिए अपनी पत्नी से संभोग करने के अलावा एहराम की हालत में निषिद्ध हर चीज़ हलाल हो जाएगी) फिर वह मक्का जाए और हज का तवा और सई करे. (फिर उसे दूसरा तहल्लुल प्राप्त हो जाएगा तो उसके लिए हर वह चीज़ हलाल हो जाएगी जो एहराम के कारण उसके लिए हराम थी).

सुन्नत यह है कि जब वह कंकरी मारने और सिर मुंडाने के बाद तवाफ़ के लिए मक्का जाने का इरादा करे तो ख़ुशबू लगाए, क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का फ़रमान है कि “मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपके एहराम बांधने के समय तथा आपके हलाल होने के समय काबा का तवाफ़ करने से पूर्व ख़ुशबू लगाती थी.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1539) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1189) ने रिवायत किया है.

फिर तवाफ़ और सई करने के बाद मिना लौट आए और वहां ज़ुल-हिज्जा की ग्यारहवीं और बारहवीं तारीख़ की रात गुज़ारे और दोनों दिनों में सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे, सर्वश्रेष्ठ यह है कि वह कंकरी मारने के लिए पैदल चलकर जाए और यदि वह सवारी कर लेता है तो कोई पाप की बात नहीं है. वह सर्व प्रथम पहले जमरह को कंकरी मारेगा और वह मक्का से सबसे दूर का जमरह है और वही मस्जिदे ख़ैफ़ के निकट है, एक के बाद एक लगातार सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के बाद अल्लाहु अकबर कहे, फिर थोड़ा आगे बढ़कर अपनी पसंद के अनुसार लंबी दुआ करे, यदि उसके लिए देर तक ठहरना कष्टदायक हो तो जितना भी उसके लिए आसान हो दुआ करे चाहे थोड़ा ही सही, ताकि सुन्नत पर अमल हो जाए.

फिर मध्य जमरह (अल-जमरतुल वुस्ता) को एक के पीछे एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर बायें ओर हो जाए और क़िब्ला की ओर मुंह करके अपने दोनों हाथों को उठाकर खड़ा हो और यदि उसके लिए आसान हो तो लंबी दुआ करे, नहीं तो जितना उसके लिए आसान हो उतना ही ठहरे, और उसके लिए दुआ के लिए ठहरने को त्याग करना उचित नहीं है क्योंकि यह सुन्नत है, जबकि बहुत से लोग अज्ञानता के कारण या लापरवाही में उसे छोड़ देते हैं, और जब भी किसी सुन्नत को नष्ट कर दिया जाए तो उसको करना और लोगों के बीच उसको प्रकाशित करना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि उसे छोड़ा न जाए और वह मिटने न पाए.

फिर जमरतुल अक़बह को एक के बाद एक सात कंकरियां मारे और हर कंकरी के साथ अल्लाहु अकबर कहे, फिर वहां से चला जाए और उसके बाद दुआ न करे.

जब बारहवें दिन सभी जमरात को कंकरी मार ले तो यदि चाहे तो जल्दी करे और मिना से बाहर निकल जाए, और यदि चाहे तो विलंब करे और वहां तेरह ज़ुलहिज्जा की रात बिताए और सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मारे जैसा कि पीछे गुज़र चुका. जबकि विलंब करना सर्वश्रेष्ठ है, और ऐसा करना अनिवार्य नहीं है सिवाय इसके कि बारह ज़ुलहिज्जा को सूरज डूब जाए और वह मिना ही में हो, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य है यहां तक कि वह अगले दिन सूरज ढलने के बाद तीनों जमरात को कंकरी मार ले, किंतु यदि बारह ज़ुल-हिज्जा को उसके ऊपर मिना में सूरज उसकी इच्छा के बिना डूब जाए, उदाहरण के तौर पर उसने प्रस्थान कर दिया हो और सवारी पर बैठ गया हो, किंतु गाड़ियों की भीड़ इत्यादि के कारण विलंब हो जाए तो ऐसी स्थिति में उसके लिए विलंब करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि सूरज डूबने तक उसका विलंब होना उसकी इच्छा के बिना हुआ है.

फिर जब वह मक्का से निकल कर अपने देश जाने का इरादा करे तो वह बाहर न निकले यहां तक कि विदाई तवाफ़ कर ले, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है- “कोई व्यक्ति कूच न करे यहां तक कि उसका अंतिम काम अल्लाह के घर (काबा) का तवाफ़ हो.” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1327) ने रिवायत किया है, तथा एक रिवायत के शब्द यह हैं कि “लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम काम अल्लाह के घर का तवाफ़ करना हो सिवाय इसके कि मासिक धर्म वाली औरत के लिए रुख़्सत दी गई है.” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1755) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1328) ने रिवायत किया है.

चुनांचे मासिक धर्म और प्रसव वाली औरत पर विदाई तवाफ़ अनिवार्य नहीं है, तथा उन दोनों के लिए विदाई के लिए मस्जिदुल हराम के द्वार के पास खड़ा होना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित नहीं है.

तथा वह विदाई तवा को अल्लाह के घर का अंतिम काम बनाए, जब वह यात्रा के लिए कूच करने का इरादा करे, तो यदि वह विदाई तवाफ़ के बाद साथियों की प्रतीक्षा के लिए या अपनी सवारी को लादने के लिए ठहर जाए या रास्ते में कोई आवश्यकता की चीज़ ख़रीद ले तो उस पर कोई पाप नहीं है, और वह तवा को नहीं लौटाएगा सिवाय इसके  कि वह अपने सफ़र को स्थगित करने की नीयत कर ले, उदाहरण के तौर पर वह दिन के आरंभ में सफ़र करना चाहता है तो वह विदाई तवाफ़ कर ले फिर वह सफ़र को उदाहरण के तौर पर दिन के अंत तक निलंबित कर दे, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए तवाफ को लौटाना अनिवार्य है ताकि वह उसका अल्लाह के घर का अंतिम काम हो जाए.

लाभदायक जानकारी
हज या उम्रा का एहराम बांधने वाले पर निम्नलिखित बातें अनिवार्य हैं-
1. अल्लाह तअला ने अपने धर्म के जो प्रावधान उसके ऊपर अनिवार्य किए हैं जैसे कि जमाअत के साथ नमाज़ को उसके समय पर पढ़ना, उसका पालन करना.
2. अल्लाह तअला ने उसे जिन कामुक बातों, गुनाहों और उल्लंघनों से रोका है उनसे दूर रहे क्योंकि अल्लाह तअला का फ़रमान है-

﴿فمن فرض فيهن الحج فلا رفث ولا فسوق ولا جدال في الحج ﴾ [ البقرة: 197]
“अतः जिसने इन महीनों में हज को फ़र्ज़ कर लिया, तो हज में संभोग और कामुक बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवज्ञा और पाप) तथा लड़ाई-झगड़ा (वैध) नहीं है.” (सूरतुल बक़रा : 197)

3. मुसलमानों को अपने कथन या कर्म से, चाहे वह मशाइर के पास हो या उसके अलावा में, कष्ट पहुंचाने से बाज़ रहे.
4. एहराम की हालत में निषिद्ध सभी चीज़ों से बचना.
(क) - अपने बाल या नाख़ून से कोई चीज़ न काटे, जहां तक कांटे को निकालने की बात है तो उसमें कोई पाप की बात नही है, भले ही ख़ून निकल आए.
(ख) - अपना एहराम बांधने के बाद अपने शरीर, या कपड़े, या खाने या पीने की चीज़ में ख़ुशबू न लगाए और न ही ख़ुशबूदार साबून से सफ़ाई सुथराई करे, रही बात उस बाक़ी बचे सुगंध के प्रभाव की जो उसने अपने एहराम से पहले इस्तेमाल की थी तो उसमें कोई हानि नहीं है.
(ग) - शिकार को न मारे।
(घ) - अपनी पत्नी से संभोग न करे.
(ङ) - तथा कामुकता के साथ स्पर्श या चुंबन या आलिंग्न वग़ैरह न करे.
(च) - स्वयं अपना या किसी दूसरे का विवाह न करे, तथा किसी औरत से अपनी या किसी अन्य की मंगनी न करे.
(छ) - दस्ताने न पहने. रही बात दोनों हाथों को कपड़े (चीथड़े) से लपेटने की तो इसमें कोई बात नहीं है.

ये सातों निषिद्ध चीज़ें पुरुष और स्त्री दोनों के लिए निषिद्ध हैं.

जबकि निम्नलिखित चीज़ें पुरूष के लिए विशिष्ट हैं:
- अपने सिर को किसी चिपकने वाली (सिर से मिली या चिपकी हुई) चीज़ से न ढांपे, रही बात छत्री, गाड़ी की छत और खैमा से साया करने, सिर पर सामान उठाने की, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है.
- वह क़मीज, पगड़ी, टोपी (हैट) पायजामा और मोज़ा न पहने, सिवाय इसके कि यदि वह इज़ार (तहबंद) न पाए तो पायजामा पहन ले या यदि जूते न पाए तो मोज़े पहन ले.
- तथा कोई ऐसी चीज़ न पहने जो उन चीज़ों के अर्थ में हो जिनका पीछे उल्लेख किया गया है, चुनांचे वह बुरक़ा, कंटोप, बनियान इत्यादि न पहने.
-  तथा उसके लिए जूते, अंगूठी, चश्मा, हेड-फून पहनना जाइज़ है, तथा वह अपने हाथ में घड़ी पहने, या उसे अपनी गर्दन में लटका ले, तथा बेल्ट बांधना ताकि उसमें अपने ख़र्च का पैसा रख सके.
- तथा उसके लिए ऐसी चीज़ के द्वारा सफ़ाई करना जाइज़ है जिसमें सुगंध न हो, या अपने सिर या शरीर को धोना और खुजलाना जाइज़ है और यदि ऐसा करने से बिना इच्छा के कोई बाल गिर जाए तो उसके ऊपर कोई चीज़ नहीं है.

तथा महिला नक़ाब नहीं पहनेगी, नक़ाब उस कपड़े को कहते हैं जिस से वह अपना चेहरा छिपाती है जिसमें उसकी दोनों आंखों के लिए सूराख बना होता है, तथा वह बुरक़ा भी नहीं पहनेगी.
सुन्नत यह है कि वह अपने चेहरे को खोले रखे सिवाय इसके कि उसे उसके गैर मह्रम मर्द देख रहे हों तो ऐसी स्थिति में उसके ऊपर एहराम की हालत और उसके अलावा में भी चेहरा छिपाना अनिवार्य है.
साभार islamqa

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