कुफ़्र और दीन

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हमें किसी को काफ़िर नहीं कहना चाहिए. क्या मालूम ख़ुदा की नज़र में वही मोमिन हो, वो ख़ुदा को बहुत अज़ीज़ हो. इसी से मुताल्लिक़ एक वाक़िया पेश कर रहे हैं.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम एक दिन जंगल जा रहे थे. वहां उन्होंने एक चरवाहे की आवाज़ सुनी, जो बुलंद आवाज़ से कह रहा था- ऐ मेरे जान से प्यारे ख़ुदा ! तू कहां है? मेरे पास आ, मैं तेरे सिर में कंघी करूं, तेरा लिबास मैला हो गया है, तो धोऊं, तेरे मोज़े फट गए हों, तो वह भी सीऊं, तुझे ताज़ा-ताज़ा दूध पिलाऊं, तू बीमार हो जाए, तो तेरी तीमारदारी करूं, अगर मुझे मालूम हो कि तेरा घर कहां है, तो तेरे लिए रोज़ घी और दूध लाया करूं, मेरी सब बकरियां तुम पर क़ुर्बान ! अब तो आ जा.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उसके क़रीब गए और कहने लगे- अरे अहमक़ ! तू ये बातें किससे कर रहा है? 
चरवाहे ने जवाब दिया- उससे कर रहा हूं, जिसने तुझे और मुझे पैदा किया और ये ज़मीन आसमान बनाए.
ये सुन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ग़ज़बनाक होकर कहा- अरे बद बख़्त ! तू इस बेहूदा बकवास से कहीं का ना रहा. बजाय मोमिन के तू तो काफ़िर हो गया. ख़बरदार ! ऐसी बेमानी और फ़िज़ूल बकवास बंद कर. तेरे इस कुफ़्र की बदबू सारी दुनिया में फैल गई. अरे बेवक़ूफ़ ! ये दूध लस्सी हम मख़लूक़ के लिए है, कपड़ों के मोहताज हम हैं, हक़ तआला इन हाजतों से बेनयाज़ है. ना वो बीमार पड़ता है, ना उसे तीमारदारी की ज़रूरत है, ना उसका कोई रिश्तेदार है. तौबा कर और उससे डर. 
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब में भरे हुए ये अल्फ़ाज़ सुनकर चरवाहे के औसान ख़ता हो गए और वो ख़ौफ़ से थर-थर कांपने लगा. चेहरा ज़र्द पड़ गया. वह  बोला- ऐ ख़ुदा के जलील-उल-क़द्र नबी ! तूने ऐसी बात कही कि मेरा मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया और मारे नेदामत के मेरी जान हलाक़त में पड़ गई.
ये कहते ही चरवाहे ने सर्द आह खींची अपना गिरेबान तार-तार किया और दीवानों की तरह अपने सर पर ख़ाक उड़ाता हुआ ग़ायब हो गया.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम हक़ तआला से हमकलाम होने के लिए कोहे-तूर पर गए, तो ख़ुदा ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! तूने मेरे बंदे को हमसे जुदा क्यों किया? तू दुनिया में जुदाई के लिए आया है या मिलाप के लिए? ख़बरदार ! इस काम में एहतियात रख. मैंने अपनी मख़लूक़ में हर शख़्स की फ़ितरत अलग बनाई है  और हर फ़र्द को दूसरों से जुदा अक़ल बख़्शी है. जो बात एक के हक़ में अच्छी है, वो दूसरे के लिए बुरी है. जो एक के हक़ में तिरयाक़ का असर रखती है, वही दूसरे के लिए ज़हर है. एक के हक़ में नूर और दूसरे के हक़ में नार, हमारी ज़ात पाकी और नापाकी से मुबर्रा है. ऐ मूसा ! ये मख़लूक़ मैंने इसलिए पैदा नहीं फ़रमाई कि उससे मेरी ज़ात को कोई फ़ायदा पहुंचे, उसे पैदा करने का मक़सद ये है कि उस पर मैं अपने कमालात की बारिश करूं. जो शख़्स जिस ज़बान में भी मेरी हम्द-ओ-सना करता है, उससे मेरी ज़ात में कोई कमीबेशी वाक़े नहीं होती, ज़िक्र करने वाला ख़ुद ही पाक साफ़ होता है. मैं किसी के क़ौल और ज़ाहिर पर निगाह नहीं रखता, मैं तो बातिन और हाल देखता हूं. ऐ मूसा ! ख़िर्द-मंदों के आदाब और हैं, दिलजलों और जान हारों के आदाब और हैं.
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब ख़ुदा का ये इताब आमेज़ ख़िताब सुना, तो सख़्त पशेमान हुए और बारगाहे-इलाही में निहायत नेदामत और शर्मसारी से मुआफ़ी मांगी. फिर उसी इज़्तिराब और बेचैनी में उस चरवाहे को ढ़ूढने जंगल में गए.
सहरा-ओ-बियाबान की ख़ाक छान मारी, लेकिन चरवाहे का कहीं पता ना चला. इस क़द्र चले कि पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन तलाश जारी रखी. आख़िर आप उसे पा लेने में कामयाब हुए. चरवाहे ने उन्हें देखकर कहा- ऐ मूसा ! अब मुझसे क्या ख़ता हुई है कि यहां भी आ पहुंचे? 
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया- ऐ चरवाहे ! मैं तुझे मुबारक देने आया हूं. तुझे हक़ तआला ने अपना बंदा फ़रमाया और इजाज़त अता की कि जो तेरे जी में आए बिला-तक़ल्लुफ़ कहा कर.  तुझे किसी अदब-ओ-आदाब क़ायदे-ज़ाबते की ज़रूरत नहीं, तेरा कुफ़्र असल दीन है, और दीन नूर-ए-जां. तुझे सब कुछ माफ़ है, बल्कि तेरे सदक़े में तमाम दुनिया की हिफ़ाज़त होती है.
चरवाहे ने आंखों में आंसू भरकर कहा- ऐ पैग़म्बर-ए-ख़ुदा ! अब मैं इन बातों के क़ाबिल ही कहां रहा हूं कि कुछ कहूं. मेरे दिल का ख़ून हो चुका है, अब मेरी मंज़िल बहुत आगे है, तूने ऐसी ज़र्ब लगाई कि हज़ारों लाखों साल की राह तय कर चुका हूं. मेरा हाल बयान के क़ाबिल नहीं और ये जो कुछ मैं कह रहा हूं इसे भी मेरा अहवाल मत जान.
मौलाना रूमी इस हिकायत से हासिल ये निकालते हैं कि "ऐ शख़्स ! जो तू हक़ तआला की हमद-ओ-सना बयान करता है, क्या समझता है? तू तो इब्तिदा से इंतिहा तक नाक़िस और तेरा हाल-ओ-क़ाल भी नाक़िस, ये महज़ उस परवरदिगार रहमान-ओ-करीम का करम है कि वो तेरे नाक़िस और हक़ीर तोहफ़े को क़बूल फ़रमाता है.

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रब से गुफ़्तगू

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मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत गुनाहगार हूं.
जवाब मिला : अल्लाह की रहमत से मायूस न हो. अल्लाह सब गुनाह बख़्श देगा. बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला और बड़ा मेहरबान है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे तेरी मदद कैसे मिलेगी ?
जवाब मिला : सब्र और नमाज़ से मदद लिया करो.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे दिल को सुकून नहीं है.
जवाब मिला : बेशक अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून और इत्मीनान मिलता है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत तन्हा हूं.
जवाब मिला : बेशक हम तुम्हारी शह रग से भी ज़्यादा क़रीब हैं.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे कोई याद नहीं करता.
जवाब मिला : तुम हमें याद करो, हम तुम्हें याद करेंगे.

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अम्बिया इकराम

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दुनिया में कुल कितने अम्बिया इकराम आएं ? और उनमें से किन अम्बिया का ज़िक्र क़ुरआन में है ? जानिए
कमोबेश 124000 अम्बिया इकराम इस रूए ज़मीन पर आए, जिनमे से 313 या 315 ही रसूल हैं और बाक़ी नबी.  नबी उसे कहते हैं, जिसे वही आती हो, लेकिन तबलीग़ पर मामूर हो या ना हो और रसूल वह होता है जिस पर वही भी आती है और उसे तबलीग़ का हुक्म भी होता है.
इनमें से 26 रसूलों का ज़िक्र नाम के साथ क़ुरआन में आया है.
01. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम
02. हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम
03. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम
04. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम
05. हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम
06. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम
07. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
08. हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम
09. हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम
10. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम
11. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम
12. हज़रत ज़लकिफ़ली अलैहिस्सलाम
13. हज़रत शुऐबअलैहिस्सलाम
14. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
15. हज़रत हारुन अलैहिस्सलाम
16. हज़रत अलयसअ अलैहिस्सलाम
17. हज़रत इलियास अलैहिस्सलाम
19. हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम
20. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम
21. हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम
22. हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम
23. हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम
24. हज़रत यहया अलैहिस्सलाम
25. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
26. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और 3 का ज़िक्र इशारे के तौर पर हुआ
01. हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम
02. हज़रत यूशा अलैहिस्सलाम
03. हज़रत ख़िज्र अलैहिस्सलाम
इन तमाम नबियों में 5 बहुत ज़्यादा मर्तबे वाले हुए
1. हज़रत मुहम्मदसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
2. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
3. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
4. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
5. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम

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इस्लाम के स्तंभ

Author: फ़िरदौस ख़ान Labels:: , , , , , , ,


हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
इस्लाम पाँच स्तंभों पर आधारित है जिन्हें पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस फरमान के द्वारा स्पष्ट किया है :"इस्लाम की नीव पाँच चीज़ों पर आधारित है: इस बात की शहादत देना कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा पूज्य (मा’बूद) नहीं, और यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के पैगंबर हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज्ज करना और रमज़ान के महीने के रोज़े रखना।" (बुखारी हदीस संख्याः 8)
इस्लाम अक़ीदा (आस्था, विश्वास) और शरीअत (नियम, क़ानून, शास्त्र) का नाम है जिस में अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल और हराम (वैध और अवैद्ध), नैतिकता, शिष्टाचार, उपासना के कार्य, मामलात, अधिकारों और कर्तव्यों और क़ियामत के दृश्यों को स्पष्ट किया है। जब अल्लाह तआला ने इस धर्म को अपने पैग़म्बर के हाथ पर परिपूर्ण कर दिया, तो इसे इस बात के लिए पसंद कर लिया कि यह क़ियामत आने तक सर्व मानव जाति के लिए जीवन का दस्तूर बन जाये : "आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दीं और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसन्द कर लिया।" (सूरतुल-माईदा:3)
यह इस्लाम के स्तंभ और उसके सिद्धांत हैं जिन पर वह आधारित है :
पहला स्तंभ : शहादतैन (दो गवाहियाँ अर्थात "ला-इलाहा इल्लल्लाह" और "मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" की गवाही) :
इस का मतलब यह है कि मनुष्य यह विश्वास रखे कि अकेला अल्लाह ही परमेश्वर (पालनकर्ता) स्वामी, नियंत्रक, उत्पत्तिकर्ता और प्रदाता है, और उसके उन सभी सुंदर नामों और सर्वोच्च गुणों को साबित करे जिन्हें अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है, या उन्हें उसके लिए उसके रसूल ने साबित किया है, और यह आस्था और विश्वास रखे कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है :"वह (अल्लाह) आसमानों और ज़मीन का पैदा करने वाला है, उसके औलाद कहाँ हो सकती है? जब कि उसकी कोई बीवी नहीं है वह हर चीज़ का बनाने वाला और जानने वाला है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है, उस के सिवाय कोई माबूद नहीं, हर चीज़ का बनाने वाला है, इसलिए उसी की इबादत करो और वह हर चीज़ का निगराँ है।" (सूरतुल अंआम : 101-102)
तथा मनुष्य यह आस्था रखे कि अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना रसूल बनाकर भेजा है, और आप पर क़ुर्आन अवतरित किया है और आप को तमाम लोगों तक इस दीन को पहुँचाने का आदेश दिया है, तथा यह आस्था रखे कि अल्लाह और उसके रसूल से महब्बत करना और उनका आज्ञापालन करना हर एक पर वाजिब है, और अल्लाह से महब्बत करना रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी और ताबेदारी के बिना परिपूर्ण नहीं हो सकता: "कह दीजिए अगर तुम अल्लाह तआला से महब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी (अनुसरण) करो, स्वयं अल्लाह तआला तुम से महब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाह माफ कर देगा और अल्लाह तआला बड़ा माफ करने वाला और बहुत मेहरबान (दयालू) है।" (सुरत-आल इम्रान: 31)
दूसरा स्तंभ : नमाज़
इसका मतलब यह है कि आदमी यह अक़ीदा रखे कि अल्लाह ने हर बालिग बुद्धिमान मुसलमान पर दिन और रात में पाँच वक्त की नमाज़ें अनिवार्य की हैं जिसे वह पवित्रता की हालत में अदा करेगा, चुनाँचि वह अपने रब के सामने हर दिन पाकी हासिल करके नम्रता और खुशू के साथ खड़ा होता है, अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्र अदा करता है, उसके फज्ल़ (अनुकम्पा) का सवाल करता है, उस से अपने गुनाहों की माफी माँगता है, उस से जन्नत का प्रश्न करता है और जहन्नम से पनाह मांगता है।
दिन और रात में अनिवार्य नमाज़ें पाँच हैं : फज्र, ज़ुह्र, अस्र, मग्रिब और इशा। इसी तरह कुछ मस्नून (ऐच्छिक) नमाज़ें भी हैं जैसे क़ियामुल्लैल, तरावीह की नमाज़, चाश्त के वक्त की दो रक्अतें और इनके अलावा दूसरी सुन्नत नमाज़ें।
नमाज़, चाहे फज़Z हो या नफ्ल, सभी मामलों में केवल अकेले अल्लाह की ओर वास्तविक रूप से ध्यानगम्न (मुतवज्जिह) होने का प्रतिनिधित्व करता है, अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा समस्त मुसलमानों को जमाअत के साथ उसकी पाबन्दी करने का आदेश दिया है : "नमाज़ों की हिफाज़त करो विशेषकर बीच वाली नमाज़ की, और अल्लाह तआला के लिए विनम्रता के साथ (बा-अदब) खड़े रहा करो।" (सूरतुल बक़रा : 238)
पाँच समय की नमाज़ें दिन और रात में प्रत्येक पुरूष और स्त्री पर अनिवार्य हैं : "नि:सन्देह नमाज़ मुसलमानों पर निश्चित और नियत समय पर अनिवार्य की गई हैं।" (सूरतुन्निसा :103)
और जिस ने नमाज़ छोड़ दिया, उस आदमी का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं, अत: जिस ने जान बूझ कर उसे छोड़ दिया उस ने कुक्र किया जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "(लोगो !) अल्लाह की ओर ध्यान करते हुए उस से डरते रहो और नमाज़ को कायम रखो और मुश्रिकों (मूर्तिपूजकों) में से न हो जाओ।" (सूरतुर्रूम :31)
इस्लाम धर्म आपसी सहयोग, भाईचारे और प्यार पर आधारित है, इस्लाम ने इन नमाज़ों और इनके अलावा अन्य नमाज़ों के लिए एकत्र होने को इन्हीं प्रतिष्ठाओं (उद्देश्यों) को प्राप्त करने के लिए वैध किया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जमाअत की नमाज़ अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्ताईस दर्जा श्रेष्ठ है।" (मुस्लिम हदीस नं.:650)
कठिनाई और आपदा के समय नमाज़ बन्दे के लिए सहायक है, अल्लाह तआला का फरमान है : "और सब्र और नमाज़ के द्वारा मदद हासिल करो। और वास्तव में यह बहुत भारी है, लेकिन अल्लाह से डरने वालों के लिए नहीं।" (सूरतुल बक़रा :45)
पाँच दैनिक नमाज़ें गुनाहों को मिटा देती हैं, जैसा कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :"तुम्हारा क्या विचार है अगर तुम में से किसी के दरवाजे़ पर नदी हो जिस में वह प्रति दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर पर कुछ गंदगी (मैल) बाक़ी रहे गी? लोगों ने उत्तर दिया : उसकी गंदगी (मैल-कुचैल) बाकी नहीं रह जाये गी। आप ने फरमाया : तो इसी के समान पाँच दैनिक नमाज़ें भी हैं इनके द्वारा अल्लाह तआला गुनाहों को मिटा देता है।" (मुस्लिम हदीस नं.: 677)
मिस्जद में नमाज़ पढ़ना स्वर्ग में प्रवेश करने का कारण है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :"जो आदमी सुबह या शाम को मिस्जद में आता है तो अल्लाह तआला उसके लिए स्वर्ग में मेहमानी की व्यवस्था करता है जब भी वह सुबह या शाम के समय आता है।" (मुस्लिम हदीस नं. :669)
नमाज़ बन्दे को उसके उत्पत्तिकर्ता (खालिक़) से जोड़ती और मिलाती है, तथा वह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आँख की ठंढक थी। जब भी आप को कोई गंभीर मामला पेश आता था तो नमाज़ की तरफ भागते थे, अपने रब (प्रभु) से चुपके चुपके बातें करते, उस से विनती करते, उस से क्षमा मांगते और उसके फज्ल़ व मेहरबानी (दया और अनुकंपा) का प्रश्न करते।
विनम्रता और भय के साथ पढ़ी जाने वाली नमाज़ मुसलमान को उसके पालनहार (प्रभु) से क़रीब कर देती है, बेहयाई (अश्लीलता) और बुरे कामों से रोकती है जैसा कि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है :"आप पर जिस किताब की वह्य (प्रकाशना, ईश्वाणी) की गई है उसकी तिलावत कीजिये और नमाज़ स्थापित कीजिये, नि:सन्देह नमाज़ बेहयाई (अश्लीलता) और बुरी बातों से रोकती है।" (सूरतुल अंकबूत : 46)
तीसरा स्तंभ : ज़कात :
अल्लाह तआला ने लोगों को रंग, नैतिकता, व्यवहार, ज्ञान, कर्मों और जीविकाओं में भिन्न-भिन्न पैदा किया है, चुनाँचि उन्हीं में से कुछ को धन्वान और कुछ को निर्धन बनाया है, ताकि धन्वान की कृतज्ञता के द्वारा और निर्धन की धैर्य के द्वारा परीक्षा करे।
जब मोमिन लोग आपस में भाई-भाई हैं और यह भाईचारा, करूणा, हमदर्दी, स्नेह, दया, प्यार और मेहरबानी पर आधारित है, इसीलिए अल्लाह तआला ने मुसलमानों पर ज़कात को अनिवार्य किया है जो उनके मालदार लोगों से लेकर उनके निर्धन और दरिद्र लोगों में बांट दिया जायेगा, अल्लाह तआला का फरमान है : "आप उनके मालों में से सद्क़ा ले लीजिए जिस के द्वारा आप उन्हें पाक व साफ कर दीजिए, और उनके लिए दुआ कीजिए, बेशक आप की दुआ उनके लिए इत्मेनान का कारण है।" (सूरतुत्तौबा : 103)
ज़कात, धन को पवित्र करता और उस में बढ़ोतरी करता है, आत्मा को कंजूसी और लोभ (लालच) से पाक करता है, गरीबों और मालदारों के बीच प्यार को मज़बूत बनाता है, जिस के कारण कीना-कपट (द्वेष) समाप्त हो जाता है, शान्ति फैलती है और उम्मत को सौभाग्य प्राप्त होता है।
जो भी आदमी सोना, चाँदी या अन्य धातुओं और व्यापार के सामान में से निसाब भर (वह न्यूनतम राशि जिस पर ज़कात अनिवार्य होती है) का मालिक हो और उस पर एक साल बीत जाये, तो उस पर अल्लाह तआला ने चालीसवाँ हिस्सा (2.5%) ज़कात निकालना अनिवार्य किया है, जहाँ तक कृषि उपज और फलों का संबंध है तो यदि उसकी सिंचाई बिना खर्च के हुई है तो उस में दसवाँ भाग और अगर खर्च के द्वारा उसकी सिंचाई हुई है तो उस में बीसवाँ भाग उसकी कटाई के समय ज़कात निकालना अनिवार्य है, और पशुओं के ज़कात की मात्रा का विवरण किक्ह की किताबों में है। अत: जो इसे निकाले गा अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मिटा देगा, उसके धन में बरकत देगा और उसके लिए बहुत बड़ा अज्र (पुण्य) संग्रहित करके रखे गा, अल्लाह तआला का फरमान है : "तुम नमाज़ की अदायगी करो और ज़कात (धर्मदान) देते रहो, और जो भलाई तुम अपने लिये आगे भेजो गे सब कुछ अल्लाह के पास पा लोगे, बेशक अल्लाह तआला तुम्हारे अमल को देख रहा है।" (सूरतुल बक़रा : 110)
ज़कात को रोक लेना और उसकी अदायगी न करना उम्मत के लिए आपदाओं, मुसीबतों और बुराईयों को न्योता देता है, ज़कात रोकने वालों को अल्लाह तआला ने क़ियामत के दिन कष्टदायक अज़ाब की धमकी दी है, अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का फरमान है : "और जो लोग सोने चाँदी का खज़ाना रखते हैं और उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च नहीं करते उन्हें कष्टदायक सज़ा की सूचना पहुँचा दीजिए। जिस दिन उस खज़ाना को जहन्नम की आग में तपाया जायेगा, फिर उस से उन के माथे और पहलू और पीठें दागी जायेंगी (उन से कहा जायेगा) यह है जिसे तुम ने अपने लिए खज़ाना बना कर रखा था, तो अपने खज़ानों का मज़ा चखो।" (सूरतुत्तौबा : 34)
ज़कात को गुप्त रखना उसे लोगों के सामने ज़ाहिर करने से बेहतर है जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है : "अगर तुम सदक़ात (दान-पुण्य) को ज़ाहिर करो, तो वह अच्छा है, और अगर तुम उसे छिपा कर गरीबों को दे दो, तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है, और अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को मिटा देगा, और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उस से अवगत है।" (सूरतुल बक़रा : 27)
जब मुसलमान ज़कात निकाले तो उसके लिए उसे केवल उन्हीं चीज़ों में खर्च करना जाईज़ है जिनका अल्लाह तआला ने अपने इस कथन के द्वारा उल्लेख किया है : "ख़ैरात (ज़कात) तो बस फकीरों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 60)
चौथा स्तंभ : रमज़ान का रोज़ा रखना
रोज़ा रखने की नीयत (इच्छा) से फज्र के उदय होने से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों जैसे खाना पीना और संभोग से रूका रहना रोज़ा या 'सौम' कहलाता है।
ईमान के अंदर सब्र (धैर्य) का स्थान शरीर में सिर के समान है। अल्लाह तआला ने इस उम्मत पर साल भर में एक महीना रोज़ा रखना अनिवार्य किया है ताकि वह अल्लाह से डरे, अल्लाह की हराम की हुई चीज़ से बचाव करे और सब्र करने और अपने नफ्स को नियंत्रण में करने का आदी बने, दानशीलता, उदारता, आपसी सहयोग, हमदर्दी और दया में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करे। अल्लाह तआला का फरमान है : "ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े रखना अनिवार्य किया गया है जिस प्रकार तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किया गया था, ताकि तुम संयम और भय अनुभव करो।" (सूरतुल बक़रा: 183)
रमज़ान का महीना एक महान महीना है जिस में अल्लाह तआला ने क़ुर्आन अवतरित किया, और इस में अच्छे कर्म, दान (खैरात) और उपासनाओं के अज्र व सवाब (बदले) कई गुना बढ़ा दिये जाते हैं, इस महीने में लैलतुल-क़द्र भी है, जो एक हज़ार महीने से बेहतर है, इस महीने में आकाश (स्वर्ग) के द्वार खोल दिये जाते हैं और नरक के द्वार बंद कर दिये जाते हैं, और शैतानों को जकड़ दिया जाता है।
अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीना का रोज़ा रखना हर बुद्धिमान व्यस्क मुसलमान पुरूष एंव स्त्री पर अनिवार्य किया है, जैसाकि अल्लाह ताअला का फरमान है : "रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शक है और जिसमें मार्गदर्शन की और सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर की निशानियाँ हैं, तुम में से जो व्यक्ति इस महीना को पाए उसे रोज़ा रखना चाहिए। और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे, अल्लाह तआला तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ सख्ती नहीं चाहता है, वह चाहता है कि तुम गिनती पूरी कर लो और अल्लाह के प्रदान किए हुए मार्गदर्शन के अनुसार उसकी बड़ाई बयान करो और उसके शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) रहो।" (सूरतुल बक़रा: 185)
अल्लाह के पास रोज़े का सवाब (बदला) बहुत महान है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "आदम के बेटे का हर कर्म कई गुना कर दिया जाता है, नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ा दिया जाता है, अल्लाह अज्ज़ा व जल्ल का फरमान है कि सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा, वह (रोज़ादार) अपनी शह्वत और अपने खाने को मेरे कारण त्याग देता है।" (मुस्लिम)
पाँचवाँ स्तंभ : हज :
अल्लाह तआला ने मुसलमानों के लिए एक क़िब्ला नियुक्त कर दिया है जिसकी ओर वे अपनी नमाज़ों और प्रार्थनाओं में चेहरा करते हैं चाहे वे कहीं भी हों, और वह मक्का मुकर्रमा में अल्लाह का प्राचीन घर है : "आप अपना मुँह मिस्जदे हराम की तरफ फेर लें और आप जहाँ कहीं भी हों आप अपना मुँह उसी ओर फेरा करें।" (सूरतुल बक़रा : 144)
जब मुसलमानों के घर एक दूसरे से दूर हैं और इस्लाम उन्हें एकजुट होने और एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने का आह्वान करता है, जिस प्रकार कि नेकी और संयम के काम पर एक दूसरे का सहयोग करने, हक़ की वसीयत करने, अल्लाह की ओर बुलाने और अल्लाह के शआइर की ता'ज़ीम (सम्मान) करने की ओर बुलाता है, इसी कारण अल्लाह तआला ने हर बुद्धि वाले सामर्थी व्यस्क मुसलमान पर अपने प्राचीन घर की ज़ियारत करना, उसका तवाफ करना (परिक्रमा करना) अनिवार्य किया है, तथा हज्ज के मनासिक (कार्यकर्म) को उसी प्रकार अदा किया जायेगा जैसाकि अल्लाह और उसके रसूल ने बयान किया है। अल्लाह तआला ने फरमाया : "अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान : 97)
हज्ज एक ऐसा मौसम है जिस में मुसलमानों की एकजुटता, ताक़त और गौरव स्पष्ट होकर सामने आता है, चुनाँचि उनका रब (पालनहार) एक ही है, किताब एक है, पैगंबर एक है, उम्मत एक है, इबादत एक है और पोशाक एक ही है।
हज्ज के कुछ आदाब (शिष्टाचार) और शर्तें हैं जिन पर मुसलमान के लिए अमल करना अनिवार्य है, जैसे कि ज़ुबान, कान और आँख की अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों से सुरक्षा करना, नीयत का खालिस होना, खर्च का पाक (हलाल) होना, अच्छी नैतिकता से सुसज्जित होना, और हज्ज को खराब करने वाली सभी चीज़ों से दूर रहना जैसे कि कामुक बातें, नाफरमानी और लड़ाई झगड़ा, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु का फरमान है : "हज्ज के कुछ जाने पहचाने महीने हैं, अत: जिस ने इन महीनों में हज्ज को फर्ज़ कर लिया, तो हज्ज में कामुकता की बातें, फिस्क़ व फुजूर (अवहेलना) और लड़ाई-झगड़ा नहीं है, तुम जो भलाई (सवाब) का काम करोगे अल्लाह उसे जानने वाला है, और अपने साथ रास्ता का खर्च ले लिया करो, सब से बेहतर रास्ता का खर्च तो अल्लाह का डर है, और ऐ बुद्धिमानों! मुझ से डरते रहा करो।" (सूरतुल बक़रा :197)
जब मुसलमान हज्ज को शुद्ध धार्मिक तरीक़े पर अदा करता है, और वह अल्लाह के लिए खालिस होता है, तो वह उसके गुनाहों का कफ्फारा (प्रायश्चित) बन जाता है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने हज्ज किया और उसमें संभोग और उस से संबंधित कामुक चीज़ों और अवज्ञा से बचा रहा, तो वह उस दिन के समान वापस लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जना था।" (बुखारी हदीस नं.: 15210)
Courtesy islamqa

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह

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हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह 80 हिजरी कूफ़ा में पैदा हुए. नाम नोमान रखा गया. (अलख़ैरात अलहस्सान, अज़ अल्लामा शहाबुद्दीन अहमद बिन हिज्र मक्की रहमतुल्लाह अलैह).
नाम व नस्ब
नोमान बिन साबित बिन नोमान बिन महर ज़बान बिन साबित बिन यज़्द गर्द बिन शहरयार बिन परवेज़ बिन नौशेरवां और ये सिलसिला आगे जाकर हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम के वास्ते से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिल जाता है, जो आपकी शाने-रिफ़अत व अज़मत के लिए काफ़ी है.
तालीम
इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह इब्तेदाई तालीम हासिल करने के बाद तिजारत की तरफ़ मुतवज्जा हो गए थे, मगर उसी दरमियान एक रात आपने ख़्वाब में हुज़ूर नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाल जहांआरा की ज़ियारत फ़रमाई. हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया- ऐ अबु हनीफ़ा ! अल्लाह तअला ने तुम्हें मेरी सुन्नत के इज़हार के लिए पैदा किया है, तो दुनिया की किनाराकशी इख़्तियार ना करो. (तज़किरतुल अवलिया सफ़्हा- 126)
इन्हीं दिनों आप किसी काम से जा रहे थे कि इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि से मुलाक़ात हो गई. उन्होंने आपसे दरियाफ़्त फ़रमाया कि तुम किस दर्सगाह में पढ़ते हो? आपने फ़रमाया- मैं कपड़े की तिजारत करता हूं. इस पर इमाम शाबी रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया- मैं तुम में क़ाबिलियत के जौहर देख रहा हूं. तुम उल्मा की सोहबत में बैठो और इल्म हासिल करो. ( सीरतुल नोमान)
हज़रत हम्माद जिनका सिलसिला तलम्मुज़ हज़रत अबदुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हा से मिलता है, उस वक़्त बिलइत्तेफ़ाक़ कूफ़ा की सबसे बड़ी दर्सगाह उन्हीं की थी. वहीं आपने पढ़ना शुरू कर दिया. (अनवारे इमामे-आज़म, मर्तबा अल्लामा मंशा ताबिश क़ुसूरी, लाहौर)
इमामे आज़म का हुस्ने सुलूक
हज़रत सैय्यदना इमामे आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह निहायत रहम दिल थे. हर किसी के साथ निहायत ही फ़ैय्याज़ाना सुलूक फ़रमाते. चुनांचे मनक़ूल है कि आपके पड़ौस में एक मोची रहता था, जो निहायत ही आवारा क़िस्म का आदमी था. दिन भर तो मेहनत व मज़दूरी करता. शाम को जब काम से लौटता तो शराब और गोश्त ख़रीद लाता. रात जब कुछ ढल जाती, तो उसी की तरह कुछ और आवारा लोग उसके घर जमा हो जाते और ये अपने हाथों से कबाब बनाता और शराब का दौर चलता. फिर रक़्स व सरोद की महफ़िल गर्म होती, शोर शराबा होता, जिससे हज़रत इमामे -आज़म की इबादत में ख़लल वाक़े होता था. लेकिन यही उस शख़्स के रोज़ाना का मामूल था. हज़रत इमाम कमाल दर्जा का सब्र फ़रमाते और कुछ ना कहते. एक रात मोची और उसके दोस्तों की आवाज़ ना सुनाई दी. फ़ज्र के बाद आपने लोगों से दरयाफ़्त किया कि हमारे पड़ौस में जो मोची रहता है, क्या बात है कि रात उसकी आवाज़ सुनने को नहीं मिली? लोगों ने बताया कि कल रात कोतवाल और उसके कारिंदे जब मोची के घर के पास से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने मोची के घर से काफ़ी शोर व शराबा सुना. इस वजह से उसे गिरफ़्तार कर लिया गया है. ये सुनकर आप बहुत ग़मगीन हुए और सीधे दारुल एमारः गवर्नर कूफ़ा के पास पहुंचे. गवर्नर ईसा बिन मूसा ने तशरीफ़ आवरी का सबब दरयाफ़्त किया. आपने फ़रमाया- मेरे पड़ौस में एक मोची रहा करता है, जिसे कल रात कोतवाल गिरफ़्तार कर लाया है. मैं उसकी सिफ़ारिश के लिए आया हूं, उसे रिहा कर दिया जाए. उसी वक़्त गवर्नर ने हुक्म दिया और मोची को छोड़ दिया गया. जब आप लौटने लगे, तो मोची भी आप के साथ हो लिया. उसके दिल पर आपके सुलूक का ऐसा असर हुआ कि वो सच्चे दिल से ताएब हो गया और हज़रत की सोहबत में रहने लगा. यहां तक कि लोग उसे फ़कीह के मुअज़्ज़िज़ लक़ब से पुकारने लगे. (अलख़ैरात अलहस्सान)
इमामे-आज़म और तिजारत
हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह कूफ़ा में कपड़े के बड़े ताजिर थे और आप का कारोबार निहायत ही वसी पैमाने पर था. आपका माले तिजारत दूर दराज़ इलाक़ों में भी भेजा करते थे. ज़रूरी अशिया बाहर से मंगवाते भी थे. तिजारत व कारोबार में सच्चाई और दियानतदारी का ऐसा ख़्याल रखते थे कि इसकी मिसाल कम ही इस ज़मीन पर मिल सकती है. एक मर्तबा का वाक़िया है कि आपने दुकान से कहीं जाते वक़्त कपड़ों का थान नौकर के सुपुर्द किया और फ़रमाया- अगर कोई उसे ले, तो उसे कपड़ों का ऐबदार होना बता देना. फिर जब आप दुकान पर वापस आए, तो देखा कि कपड़े बिक चुके हैं. आपने मुलाज़िम से दरयाफ़्त फ़रमाया कि तुमने इन कपड़ों का ऐबदार होना ख़रीदने वाले को बता दिया था. इस पर ख़ादिम ने नेदामत का इज़हार करते हुए कहा कि मैं भूल गया था, मुझे याद ही ना था. इस पर इमाम साहब ने कपड़ों की पूरी क़ीमत जिसकी मालियत तीस हज़ार दिरहम थी, सदक़ा फ़रमा दी. अल्लाहो अकबर क्या इससे बढ़कर भी कोई दियानतदारी का सबूत पेश कर सकता है.
इमामे-आज़म और इबादत
हज़रत इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म रहमतुल्लाह अलैह ने चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी. रात भर आप क़ुरान शरीफ़ पढ़ा करते थे और ख़ौफ़े-ख़ुदा से इस क़द्रर रोते थे कि आप के हमसायों को आप पर रहम आता था.
हज़रत इमाम के शागिर्द हज़रत क़ाज़ी इमाम अबु यूसुफ़ फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म हर रात और दिन में एक ख़त्म क़ुरान पढ़ा करते थे और रमज़ान शरीफ़ में (दिन और रात मिला कर) बासठ क़ुरान ख़त्म फ़रमाया करते थे. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
हज़रत मिसअर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे-आज़म फ़ज्र से इशा तक तदरीसी कामों और इफ़्ता वग़ैरह में मसरूफ़ रहते थे. एक मर्तबा मैंने सोचा कि आख़िर आप इबादत कब करते हैं, उसे मालूम किया जाए. इस नीयत से मैं इस खोज में लग गया. जब रात हुई और लोग इशा की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर सो गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमामे-आज़म मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और पूरी रात फ़ज्र तक इबादत में गुज़ार दी. फिर फ़ज्र की नमाज़ के बाद हसबे-मामूल आप तदरीसी कामों में मसरूफ़ हो गए. यहां तक कि फिर रात आ गई, तो मैंने देखा कि आप मस्जिद आकर इबादत में मसरूफ़ हो गए. फिर सुबह हुई, तो अपने मुआमलात की तरफ़ मुतवज्जा हुए.
मैंने दिल में ख़्याल किया कि दो रातें तो हज़रत इमाम ने निशात के साथ इबादत में गुज़ार दी हैं. अब देखा जाए कि क्या करते हैं. चुनांचे मैंने देखा कि हसबे-मामूल आपने फिर पूरी रात इबादत में गुज़ार दी. इस पर मैंने ये अज़्म किया कि ज़िंदगी भर मैं ऐसे इबादतगुज़ार की सोहबत ना छोड़ूंगा, जो दिनों को रोज़े रखता है और रात को बेदार रहकर अल्लाह की इबादत में गुज़ारता है. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ्हा- 82)
इमामे-आज़म और ख़ुदातरसी
इमामे-आज़म के अंदर ख़शीयते-इलाही का वाफ़र हिस्सा मौजूद था. अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का नाम सुनते ही आप पर लर्ज़ा तारी हो जाता था. चुनांचे हज़रत यज़ीद बिन लैस बयान करते हैं कि एक मर्तबा इशा की जमात में इमाम ने इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पढ़ी. हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा जमात में शरीक थे. जब सारे लोग नमाज़ से फ़ारिग़ होकर चले गए, तो मैंने देखा कि हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा फ़िक्र में डूबे हुए हैं और ठंडी सांस ले रहे हैं. मैंने ख़्याल किया कि मेरी वजह से हज़रत के ज़िक्र व फ़िक्र में कोई ख़लल वाक़े ना हो. चिराग़ जलता हुआ छोड़कर आहिस्तगी के साथ मस्जिद से निकल गया. फ़ज्र के वक़्त जब मैं मस्जिद पहुंचा, तो देखा कि आप अपनी दाढ़ी पकड़े हुए हैं और इज़ाज़ुल॒ ज़िलतिल अर्दा पूरी सूरत की तिलावत फ़रमा रहे हैं और निहायत ही रक्तअंगेज़ और दर्द भरी आवाज़ में कह रहे हैं, ऐ मेरे मालिक व ख़ालिक़ ! जो ज़र्रा भर नेकी का अच्छा बदला देने वाला है और ज़र्रा भर बुराई की सज़ा देने वाला है अपने बंदे-नोमान को आग और उसके अज़ाब से बचाना और अपने जवाज़े-रहमत में दाख़िल फ़रमाना. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 86)
इसी तरह एक दिन मस्जिद के इमाम ने फ़ज्र की नमाज़ में ये आयते-करीमा पढ़ी ( तर्जुमा), तुम हरगिज़ अल्लाह ताला को इससे बेख़बर ना समझना, जो कुछ ज़ालिम करते हैं. ये सुनना था कि हज़रत हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह के जिस्म पर ख़ौफ़े-ख़ुदा की वजह से लर्ज़ा तारी हो गया, जिसे नमाज़ में शरीक लोगों ने भी महसूस किया. (अलख़ैरात अलहस्सान, सफ़्हा- 89)
तारीख़ विसाल
हज़रत इमामे-आज़म अबु हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह का विसाल सत्तर बरस की उम्र में 2 शाबानुल मोअज़्ज़म 150 हिजरी में हुआ. जामा मस्जिद बग़दाद में आपका आस्ताना मुबारका मरज्जा ख़लाइक़ है.
Hazrat imam abu hanifa (R.A.)
साभार

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पांचों नमाज़ों के बाद पढ़ने की तस्बीह

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फ़ज्र
हुवल हय्युल क़य्यूम
तर्जुमा : अल्लाह ही हमेशा ज़िन्दा और बाक़ी रहने वाला है
ज़ुहर
हुवल अलीयुल अज़ीम
तर्जुमा : अल्लाह ही बुलंद अज़मत वाला है
अस्र
हुवर रहमानुर्रहीम
तर्जुमा : अल्लाह ही निहायत रहम करने वाला और मेहरबान है
मग़रिब
हुवल ग़फ़ूरुर्रहीम
तर्जुमा : अल्लाह ही बड़ा बख़्शने वाला और मेहरबान है
इशा
हुवल लतीफ़ुल ख़बीर
तर्जुमा : अल्लाह ही हर छोटी बड़ी चीज़ से बाख़बर है

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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

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फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
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