नमाज़ की फ़ज़ीलत ख़्याल

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
नमाज़, रूह का सुकून है, चेहरे का नूर है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने बार-बार नमाज़ क़ायम करने का हुक्म दिया है.   
आज हम नमाज़ से वाबस्ता चन्द हदीसें आप सबके साथ साझा कर रहे हैं.   

सातवें आसमान पर अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को बैतूल मामूर से टेक लगाए बैठा देखा. हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने बताया कि बैतूल मामूर में रोज़ाना सत्तर हज़ार फ़रिश्ते नमाज़ पढ़ते हैं और एक बार निकलने के बाद दुबारा उनकी बारी नहीं आती. हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि ख़ुशआमदीद नेक बेटे, नेक नबी.
(सही मुस्लिम 16)       

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स इस हालत में अल्लाह से मुलाक़ात करे कि वह पाँचों नमाज़ें अदा करता था, तो उसे बख़्श दिया जाएगा/"
(मिश्कात-उल-मसाबीह 47)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "वक़्त पर अदा की हुई नमाज़ अल्लाह तआला को सब कामों से ज़्यादा पसंद है."
(मुसनद निसाई 867) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स किसी मस्जिद में चालीस रातें बाजमात नमाज़ पढ़े और उसकी इशा की नमाज़ की पहली रकअत फ़ौत न हो, अल्लाह तआला इस अमल के बदले उसके लिए जहन्नुम से आज़ादी लिख देता है."
(सुनन इब्ने माजा 798)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स अल्लाह के लिए चालीस दिन तक जमात के साथ नमाज़ पढ़े और तकबीरे उला पाता रहे, उसके लिए दो बराअतें लिख दी जाती हैं. एक जहन्नुम की आग से बराअत और निफ़ाक़ से बराअत."
(जामा तिर्मिज़ी)
      
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " अगर लोग जान लें कि अज़ान देने और पहली सफ़ में नमाज़ पढ़ने का कितना सवाब है, फिर इसे हासिल करने के लिए क़िरआ अन्दाज़ी के सिवा कोई रास्ता न पायें, तो वो ज़रूर क़िरआ अन्दाज़ी करें."
(सही बुख़ारी 615)       

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स दो रकअत नमाज़ इस तरह अदा करे कि उनमें अपने दिल को दुनियावी ख़्यालात की तरफ मुतावज्जा न होने दे तो अल्लाह तआला उसके उसके पिछ्ते गुनाह बख़्श देता है."
(सही बुख़ारी 159)        

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स अच्छी तरह  ग़ुस्ल करता है, जैसा कि उसे हुक्म दिया गया है. फिर वह अपने घर से निकलता है, यहाँ तक कि जुमे में आता है. और ख़ुत्बे के दौरान ख़ामोश रहता है, यहाँ तक कि वह अपनी नमाज़ ख़त्म कर ले, तो यह उसके उन गुनाहों का  कफ़्फ़ारा होगा, जो उससे पहले के जुमे से इस जुमे तक हुए हैं."
(सुनन नसई 1404)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स पाबन्दी से नमाज़ पढ़ेगा, वह नमाज़ क़यामत के दिन उसके लिए नूर, दलील और निजात का सबब बनेगी."
(मुसनद अहमद 6576)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक मुसलमान बन्दा जब अल्लाह तआला की रज़ा के लिए नमाज़ अदा करता है, तो उसके गुनाह इस तरह झड़ जाते हैं जैसे दरख़्त के पत्ते झड़ते हैं."  
(मिश्कात-उल-मसाबीह 576)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़र्ज़ नमाज़ जानबूझकर तर्क न करना, क्योंकि जिस शख़्स ने जानबूझकर फ़र्ज़ नमाज़ तर्क कर दी, उससे अल्लाह तआला की ज़िम्मेदारी अमान उठ गई."
(मिश्कात-उल-मसाबीह 61)
   
हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जब नमाज़ की इक़ामत हो जाए तो तुम दौड़ते हुए मत आओ, बल्कि सुकून को लाज़िम पकड़ो. जितनी नमाज़ पा लो, पढ़ लो. और जो नमाज़ तुमसे रह जाए, उसे मुकम्मल कर लो, क्योंकि तुम उस वक़्त भी नमाज़ में होते हो, जब तुम नमाज़ का इरादा करते हो."
(सही बुख़ारी 908, सही मुस्लिम 602, सुनन अल कुब्रा अल बयहक़ी 5871)   


अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "नमाज़ का ख़्याल रखों 
नमाज़ का ख़्याल रखो और अपने ज़ेरे-दस्त लोगों के बारे में अल्लाह से डरो."
(सुनन इब्ने माजा 2698)
   
फ़ज्र  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की दो रकअतें (सुन्नत) दुनिया और जो कुछ दुनिया में हैं, उस सबसे बेहतर हैं."
(सही मुस्लिम 725)   

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ उस वक़्त पढ़ो, जब सुबह अच्छी तरह वाज़ेह हो जाए. क्योंकि इसमें ज़्यादा अज्र है."  
(सुनन इब्ने माजा 672) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ बाजमात अदा करना सारी रात क़याम करने से अफ़ज़ल है." 
(सही मुस्लिम 1491)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जिसने फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी, वह अल्लाह की पनाह में है, तो तुम अल्लाह की पनाह हाथ से जाने न दो."
(जामा तिमिज़ी 222)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स ठंडी नमाज़ें (फ़ज्र और अस्र) पढ़ेगा, वह जन्नत में दाख़िल होगा." 
(मिश्कात-उल-मसाबीह 625)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र और अस्र की नमाज़ों में फ़रिश्ते बारी-बारी आते हैं और अल्लाह को जाकर तुम्हारे बारे में बताते हैं."
(सही बुख़ारी 555) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र और इशा मुनाफ़िक़ों पर सबसे भारी नमाज़े हैं."
(सही बुख़ारी 657)

ज़ुहर 
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अगर किसी को मालूम हो जाए कि ज़ुहर अव्वल वक़्त पढ़ने का कितना सवाब है, तो वह उसकी तरफ़ एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिश करेंगे."
(सुनन निसाई 673)    

अस्र
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अस्र की नमाज़ तुमसे पहले लोगों पर पेश की गई थी, मगर उन्होंने इसे ज़ाया कर दिया, फिर जो शख़्स इसकी हिफ़ाज़त करेगा, उसे दोगुना अज्र मिलेगा." 
(सही मुस्लिम 820)
 

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ज़िक्रे इलाही की फ़ज़ीलत

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
इंसान सुकून की तलाश में न जाने कहां-कहां भटकता है, लेकिन सुकून उसे सिर्फ़ अल्लाह की पनाह में ही मिलता है. अल्लाह के ज़िक्र से मिलता है. जिस तरह बारिश की बूंदें प्यासी सूखी धरती को सराबोर कर देती हैं, उसी तरह ज़िक्रे इलाही से दिल को क़रार मिलता है, रूह को तस्कीन मिलती है. 
ज़िक्रे इलाही की बेशुमार फ़ज़ीलतें हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है.   
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- "याद रखो कि अल्लाह ही की याद से दिलों को इत्मीनान नसीब होता है." (क़ुरआन 13:28)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम हमारा ज़िक्र किया करो, तो हम भी तुम्हारा ज़िक्रे खै़र किया करेंगे. और हमारा शुक्र अदा करते रहा करो और नाशुक्री न किया करो.
(क़ुरआन 2:152)

अल्लाह की कायनात की तमाम मख़लूक़ात ज़िक्रे इलाही में ही मसरूफ़ रहती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और आसमानों और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही को सजदा करती है, कुछ ख़ुशी से कुछ नागवारी से. और उनके साये भी सुबह व शाम उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 13:15) 

“सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके दरम्यान है, सब अल्लाह की तस्बीह करते हैं. और कोई शय ऐसी नहीं है, जो उसकी हम्दो सना की तस्बीह न करती हो.”
(क़ुरआन : 17:44)

“और जो आसमानों और जो ज़मीन में हैं, सब अल्लाह ही की मख़लूक़ है. और जो क़ुर्बे इलाही में रहते हैं, वे न उसकी इबादत का तकब्बुर करते हैं और न उसकी इताअत से थकते हैं.
वे रात और दिन अल्लाह ही की तस्बीह किया करते हैं और कभी काहिली नहीं करते.”
(क़ुरआन 21:19-20)

“क्या तुमने नहीं देखा कि आसमानों और ज़मीन की हर शय अल्लाह ही की तस्बीह करती है. और परिन्दे भी फ़ज़ाओं में पर फैलाए हुए उसी की तस्बीह करते हैं. हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा जानता है.”
(क़ुरआन 24:41)
     
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है- “और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू किया करो.” (क़ुरआन 2:43)

“अपने परवरदिगार का कसरत से ज़िक्र करो और शाम और सुबह अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 3:41)

“और अपने परवरदिगार का अपने दिल में ज़िक्र किया करो, आजिज़ी से और ख़ौफ़ से और बुलंद आवाज़ के बग़ैर यानी धीमी आवाज़ से सुबह और शाम. और उसकी याद से ग़ाफ़िल न होना. 
बेशक जो लोग यानी फ़रिशते तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में हैं, वे भी उसकी इबादत से तकब्बुर नहीं करते और उसकी तस्बीह करते रहते हैं और उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 7: 205-206)

“तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो और उसकी बारगाह में सजदा करने वालों में से हो जाओ.”
(क़ुरआन 15:98)

“तुम लोग सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन : 19:11)
 
“और सूरज के तुलूअ होने से पहले यानी फ़ज्र की नमाज़ में और सूरज के ग़ुरूब होने से पहले यानी अस्र की नमाज़ में अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात के इब्तियाई लम्हों में भी यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ों में भी तस्बीह किया करो और दिन के किनारों यानी ज़ुहर की नमाज़ में भी तस्बीह किया करो,
(क़ुरआन 20:130)

“इंसान और जिन्न ही नहीं दीगर बेजान चीज़ें भी अल्लाह की ही तस्बीह करती हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और हमने पहाड़ों और परिन्दों को दाऊद अलैहिस्सलाम के ताबे कर दिया था. वे उनके साथ अल्लाह की तस्बीह किया करते थे. और हम ही यह सब करने वाले थे.”
(क़ुरआन 21:79)

जिस जगह अल्लाह तआला का ज़िक्र किया जाता है, वह जगह नूर से मुनव्वर हो जाती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “अल्लाह का यह नूर उन घरों में है, जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है और सुबह व शाम अल्लाह के नाम की तस्बीह की जाती है.” 
(क़ुरआन 24:36)

अल्लाह की तमाम मख़लूक़ का ये फ़र्ज़ है कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ माबूदे यकता की हम्दो सना के साथ तस्बीह करती रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “उसकी हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 25:58)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है.” 
(क़ुरआन 29:45)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया रहो. और आसमानों और ज़मीन में अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. और तुम तस्बीह किया करो तीसरे पहर और दोपहर में भी.”
(क़ुरआन 30:17-18)

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ ईमान वालो ! तुम कसरत से अल्लाह का ज़िक्र किया करो. 
और सुबह व शाम उसकी तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 33:41-42)

“जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो उसके अतराफ़ हैं, वे सब अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों के लिए मग़फ़िरत की दुआएं मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ का अहाता किए हुये है. फिर जिन लोगों ने तौबा की और तेरे रास्ते की पैरवी की. और तू उन्हें जहन्नुम के अज़ाब से बचा ले.
(क़ुरआन 40:7)

“सुबह व शाम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 40:55)

“जो फ़रिश्ते तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं, वे रात दिन उसकी तस्बीह करते रहते हैं और वे कभी थकते भी नहीं हैं.”
(क़ुरआन 41:38)
 
“फ़रिश्ते अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और ज़मीन में रहने वाले लोगों के लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगते रहते हैं.”
(क़ुरआन 42:5)

“और सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 48:9)

“और तुम सूरज निकलने से पहले और सूरज छुपने से पहले अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात में भी कुछ वक़्त तस्बीह करो और सजदों यानी नमाज़ों के बाद भी उसकी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 50:39-40)

“जब तुम उठा करो, तो अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो.
और तुम रात में कुछ वक़्त और सितारों के ग़़ुरूब होने के बाद भी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 52:48-49)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:74)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:86)

“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 57:1)

“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:1)

“आसमानों और ज़मीन की हर शय उसी की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:24)

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 61:1) 

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है, जो हक़ीक़ी बादशाह है, पाक है.”
(क़ुरआन 62:1)

“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 64:1)

“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह करते रहो.” 
69:52

“और तुम सुबह और शाम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो. और रात में कुछ वक़्त उसकी बारगाह में सजदा करो और रात के बाक़ी तवील हिस्से में उसकी तस्बीह किया.”
(क़ुरआन 76: 25-26)

“ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! अपने परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो, जो सबसे आला है.” 
(क़ुरआन 87:1) 

“फिर तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करो.”
(क़ुरआन 110:3)

*
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अपनी ज़ुबान को हर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र से तर रखो.”
(सुनन तिर्मिज़ी : 3375)

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तअला के कुछ फ़रिश्ते ज़मीन में चक्कर लगाते रहते हैं, वे अल्लाह के ज़िक्र की मजलिसें तलाश करते हैं, जब वे ऐसी कपि मजलिस तलाश कर लेते हैं, जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो रहा होता है, तो वे उन लोगों के साथ बैठ जाते हैं.”
(सही मुस्लिम : 6839)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए जमा होते हैं फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं, रहमत उन्हें ढांप लेती है, सकीनत नाज़िल होती है और अल्लाह उनका ज़िक्र अपने पास मौजूद फ़रिश्तों में फ़रमाता है."
(सही मुस्लिम : 2700, जामा तिर्मिज़ी 3378) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बन्दा जब नमाज़ पढ़ रहा होता है, तो उसके सिर पर रहमतों की बारिश हो रही होती है.
(तिर्मिज़ी : 2911)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह फ़रमाता है कि अगर मेरा बन्दा एक हाथ मेरे क़रीब आता है, तो मैं दोनों हाथ की पूरी लम्बाई के बराबर उसके क़रीब आता हूं.”
(सही मुस्लिम : 6806) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जब तक कोई शख़्स अपनी नमाज़ की जगह पर बैठा रहता है, फ़रिश्ते उसके लिए अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करते रहते हैं- ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, ऐ अल्लाह! इस पर रहम कर.”
(सही बुख़ारी : 445)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर सूरज निकलने तक ज़िक्रे इलाही में मशग़ूल रहे, फिर वह दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसे पूरे हज और उमराह का अज्र मिलता है."
(सुनन तिर्मिज़ी : 586)    

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं ऐसे लोगों के साथ बैठा रहूं जो अस्र की नमाज़ से सूरज ग़ुरूब होने तक अल्लाह का ज़िक्र करें. ये उससे ज़्यादा पसंदीदा है कि वे चार ग़ुलाम आज़ाद करें."
(सुनन अबू दाऊद : 3667)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो मुसलमान मर्द नमाज़ और ज़िक्रे इलाही के लिए पाबंदी से मस्जिद में हाज़िर होता है, तो अल्लाह तआला उससे इस तरह ख़ुश होता है, जिस तरह मुसाफ़िर के घरवाले उसके घर आपने पर ख़ुश होते हैं.”
(सुनन इब्ने माजा : 800)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम इबादत और नेकी में देर न करो और ये न सोचो कि बाद में कर लेंगे, क्योंकि ज़िन्दगी में ऐसे हालात आ सकते हैं जो इंसान को अल्लाह की इताअत से रोक देते हैं.”
(मिश्कात-उल-मसाबीह : 5175)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अल्लाह अपने रब का ज़िक्र करे और जो अल्लाह का ज़िक्र न करे उनकी मिसाल ज़िन्दा और मुर्दे की तरह हैं.” कहने का मतलब ये है कि अल्लाह का ज़िक्र करने वाला ज़िन्दा है और ज़िक्र न करने वाला मुर्दे की तरह है. इस बात से अल्लाह के ज़िक्र की अहमियत का पता चलता है.  
(सही बुख़ारी : 6407)   

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “क्या मैं तुम्हें तुम्हारे आमाल में से बेहतरीन और तुम्हारे मालिक के नज़दीक सबसे पाकीज़ा अमल न बताऊं? वह अल्लाह का ज़िक्र करना है, जो सोना और चाँदी ख़र्च करने से भी बेहतर है.”     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह के नज़दीक सबसे पसंदीदा वो लोग हैं, जो अल्लाह का ज़िक्र कसरत से करते हैं.”
(जामा अल ज़ायद: 16748)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो, जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसा हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी वक़्त जन्म दिया हो.”
(मुसनद अहमद : 2250)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत की कुंजी नमाज़ है और नमाज़ की कुंजी पाकी है.” 
(सही मुस्लिम)
  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बेशक तुममें से कोई जब नमाज़ के लिए खड़ा होता है, तो शैतान उसे शुब्ह में डाल देता है. यहां तक कि वह नहीं जानता कि उसने कितनी रकआत पढ़ी हैं. तुममें से जब कोई कोई ये कैफ़ियत तो बैठे हुए दो सजदे कर ले.” (मुस्लिम : 1265)
     
हज़रत हातिम रहमतुल्लाह अलैह जब नमाज़ पढ़ते थे, तो ये तसव्वुर बांध लेते थे-
निगाहों के सामने काबा है.
नीचे पुल सिरात है.
दायें जन्नत है.
बायें जहन्नुम है.
पीछे मौत का फ़रिश्ता है.
और ये नमाज़ ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ है.
अल्लाह की रहमत से अपनी नमाज़ क़ुबूल होने की उम्मीद रखते थे. 
और अपने बदआमालों से नमाज़ के मरदूद होने का ख़ौफ़ रखते थे. 

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ईमान

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
हमारी एक आशनाई हैं. उन्हें बात-बात पर क़सम खाने की आदत है. हर बात पर कहती हैं कि अगर वे झूठ बोलें, तो उन्हें मरते वक़्त ईमान नसीब न हो. ’ईमान से’ तो उनका तकिया कलाम है.

हमने उनसे कई बार कहा कि इस तरह बात-बात पर क़सम न खाया करें. जिसे आपकी बात पर यक़ीन करना होगा, वो बिना क़सम के भी कर लेगा और जिसे यक़ीन नहीं करना होगा, वो यक़ीन नहीं करेगा, भले ही आप कितनी ही क़सम क्यों न खाएं. लेकिन उन्होंने अपनी आदत नहीं छोड़ी.

कुछ रोज़ पहले जब वह हमसे बात करते हुए क़सम खाने लगीं, तो हमने उनसे पूछा कि ईमान क्या है?
वह सकपका गईं और कहने लगीं कि ईमान, ईमान होता है. और क्या होता है.

हमने कहा कि ये बात तो हम भी जानते हैं कि ईमान, ईमान होता है, जैसे सूरज, सूरज होता है, पर आख़िर ईमान होता क्या है?

अब उन्हें ग़ुस्सा आ गया और कहने लगीं कि उन्हें नहीं पता कि ईमान क्या होता है. बस उन्होंने बचपन से सुना है कि ईमान होता है.
 
हमने कहा कि जब आपको ये ही नहीं पता कि ईमान होता क्या है, तो आप यूं ही ईमान की क़सम खाती रहती हैं.
हमने यही सवाल एक और शख़्स से किया तो, उन्होंने जवाब दिया कि जिसका ईमान कमज़ोर होता है, वही ऐसे सवाल करता है, यानी उन्हें भी नहीं पता था कि ईमान होता क्या है ?
बहरहाल, जब तक इंसान को ये ही नहीं पता होगा कि ईमान आख़िर है क्या, तो वो ईमान की क्या ख़ाक हिफ़ाज़त करेगा.

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क़ुरआन पढ़ने की फ़ज़ीलत

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
अल्लाह तआला की पाक किताब क़ुरआन करीम पढ़ने बेहिसाब सवाब है.   
आज हम क़ुरआन करीम से वाबस्ता चन्द हदीसें आप सबके साथ साझा कर रहे हैं.   

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स क़ुरआन पढ़ता हो और उसमें माहिर हो, तो वह बड़ी इज़्ज़त वाले फ़रिश्तों और पैग़म्बरों के साथ होगा और जो शख़्स अटक-अटक कर परेशानी के साथ पढ़े, तो उसे दोहरा सवाब मिलेगा."
(अबू दाऊद)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "सुन लो तुममें से जो शख़्स मस्जिद जाता है और वहाँ अल्लाह की किताब की दो आयतें किसी को सिखाता है या ख़ुद पढ़ता है, तो उसके लिए दो ऊंटों से बेहतर हैं. इसी तरह तीन आयतें तीन ऊंटों से और चार आयतें चार ऊंटों से बेहतर हैं." 
(मिश्कात-उल-मसाबीह 522/2)


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रब से गुफ़्तगू

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मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत गुनाहगार हूं.
जवाब मिला : अल्लाह की रहमत से मायूस न हो. अल्लाह सब गुनाह बख़्श देगा. बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला और बड़ा मेहरबान है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे तेरी मदद कैसे मिलेगी ?
जवाब मिला : सब्र और नमाज़ से मदद लिया करो.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे दिल को सुकून नहीं है.
जवाब मिला : बेशक अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून और इत्मीनान मिलता है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत तन्हा हूं.
जवाब मिला : बेशक हम तुम्हारी शह रग से भी ज़्यादा क़रीब हैं.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे कोई याद नहीं करता.
जवाब मिला : तुम हमें याद करो, हम तुम्हें याद करेंगे.

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हर मर्ज़ का इलाज है

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
दुनिया में ऐसा कोई भी मर्ज़ नहीं है, जिसका इलाज न हो. मुख़तलिफ़ हदीसों से ये बात साबित है. इसलिए किसी भी मर्ज़ में मुब्तिला होने पर उसके इलाज पर ख़ास  तवज्जो देनी चाहिए.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक अल्लाह तआला ने बीमारी और उसकी दवा दोनों नाज़िल फ़रमाई हैं. और हर बीमारी के लिए दवा बनाई है. लिहाज़ा इलाज करो, लेकिन हराम चीज़ से इलाज न करो."
(सुनन अबी दाउद 3874) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अल्लाह तआला ने कोई बीमारी ऐसी नाज़िल नहीं की, जिसके लिए उसने शिफ़ा नाज़िल न फ़रमाई हो." 
(सही बुख़ारी 5678) 

चित्र गूगल से साभार 
   

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चटनी से शुगर कंट्रोल करें

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-डॉ फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जो जान के साथ ही जाता है. अभी तक इससे निजात की कोई दवा नहीं बनी. इसलिए शुगर का मरीज़ बहुत परेशान रहता है. उसके खाने-पीने पर भी हज़ार पाबंदियां लग जाती हैं. वह पेटभर रोटी या चावल भी नहीं खा सकता. हाँ, इतना ज़रूर है कि दवाओं और खान-पान पर ध्यान रखकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है. 
आज हम एक ऐसी चटनी का ज़िक्र कर रहे हैं, जिसके सेवन से शुगर को कंट्रोल किया जा सकता है. शुगर के कई मरीज़ों को इससे फ़ायदा हुआ है,

सामग्री : पुदीना, अदरक, लहसुन, अनारदाना. स्वादानुसार हरी मिर्च और नमक.
इन्हें दरदरा या महीन पीसकर चटनी बना लें और अपने भोजन में शामिल करें. इसके साथ ही खीरा, टमाटर, नीम्बू और दही को भी अपने भोजन में ज़रूर शामिल कर लें. इंशाअल्लाह इससे फ़ायदा होगा. 
हाँ, चिकित्सक के अनुसार दवाओं का सेवन नियमित रूप से करते रहें और शुगर की जाँच भी कराते रहें.

आपसे अनुरोध है कि अपने अनुभव भी लिखें, जिससे अन्य लोगों का भला हो सके.

चित्र : गूगल से साभार 


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आज़माइशें

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
ज़िन्दगी में सुख और दुख, धूप और छाँव की तरह होते हैं. ये सच है कि अच्छे लोगों को ही सबसे ज़्यादा दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है. बेशक आज़माइशें उन्हीं लोगों पर आती हैं, जिन्हें अल्लाह तआला पसंद करता है. और अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहने वाले लोग इन पर सब्र करते हैं और हर हाल में अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करते हैं.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मोमिन मर्द और औरत पर मुसलसल आज़माइशें आती रहती हैं. कभी उसकी ज़ात पर, तो कभी औलाद पर और कभी माल पर, यहाँ तक कि जब वह अल्लाह तआला से इस हाल में मुलाक़ात करता है कि उस पर कोई गुनाह बाक़ी नहीं रहता."    
(सुनन तिर्मिज़ी इब्ने माजा 2399) 

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आज़माइश जितनी सख़्त होती है, उसका सिला भी उतना ही बड़ा मिलता है, "    
(रवा अल तिर्मिज़ी 239) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जब कोई शख़्स किसी मुसीबत में मुब्तिला हो जाता है, तो अल्लाह तआला फ़रिश्तों से कहता है कि मेरा बन्दा जब तक मेरी आज़माइशों की क़ैद में है, तो तुम उस वक़्त तक उसके शब-व-रोज़ के नेकियों के मामलात लिखते रहो."
(मुसनद अहमद 8890)       

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि आज़माइश मोमिन की ज़ीनत है और अक़्लमन्द के लिए अज़मत है, क्योंकि आज़माइश का मोमिन के साथ रहना और मोमिन का उस पर सब्र करना और साबित क़दम रहना, उसके ईमान के सही होने की अलामत है.
(मुस्तदरक अल-वसाइल हदीस 2405)  

इसलिए जब की किसी तरह की कोई आज़माइश आए, तो अल्लाह से दुआ करें.    

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मज़दूरों का हक़

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मज़दूर का पसीना ख़ुश्क होने से पहले उसकी मज़दूरी अदा कर दो."
(सुनन इब्ने माजा 2443) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं क़यामत के दिन उस शख़्स के मुक़ाबिल रहूंगा, जो मज़दूर से पूरा काम ले और उसकी मज़दूरी न दे."  
(सही बुख़ारी 2227) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आदमी के गुनाहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मातहतों की रोज़ी रोक ले."
(सही मुस्लिम 996)   

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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "इशराक़ की नमाज़ तौबा करने वालों की नमाज़ है.
(सही मुस्लिम 748) 



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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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  • When I am unwell - When I am unwell—my body drained by fever and the very act of resting becoming wearisome—everything outside my room suddenly seems so appealing. I long t...
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