इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     



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चाश्त की नमाज़

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चाश्त की नमाज़ का सही वक़्त आफ़ताब के ख़ूब तुलूअ हो जाने पर शुरू होता है. चाश्त में  कम से कम दो और ज़्यादा से ज़्यादा 12 अकअत पढ़ी जाती हैं.
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम चाश्त की चार रकअत पढ़ते थे और अल्लाह जिस क़द्र चाहता, उतनी पढ़ लेते. (सही मुस्लिम 719)

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया-"जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकअत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसे हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी दिन जन्म दिया हो. (मुसनद अहमद 2250)   

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स चाश्त की दो रकअत को हमेशा पढ़ता रहे, उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे, अगर्चे वोह समन्दर के झाग के बराबर हों."

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "चाश्त की दो रकअतें इंसान के बदन के हर जोड़ का सदक़ा अदा कर देती हैं."
(सही मुस्लिम 720) 


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अव्वाबीन की नमाज़

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अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जिसने मग़रिब की नमाज़ के बाद छह रकअतें अव्वाबीन की पढ़ीं, उसे बारह साल की इबादत का सवाब मिलेगा."   
(सुनन तिर्मिज़ी 435) 

नमाज़ अव्वाबीन के बारे में अमार बिन यासिर सहाबी रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है कि मैंने रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मग़रिब के बाद रकअतें पढ़ते हैं. हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो ये नमाज़ पढ़ता है, उसकी मग़फ़िरत हो जाती है, चाहे उसके गुनाह समन्दर के झाग के बराबर हों."

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स मग़रिब के बाद 20 रकअत पढ़ेगा, अल्लाह तअला उसके लिए जन्नत में एक महल तामीर करवाएगा. जन्नत के एक दरवाज़े का नाम अव्वाब है, जो क़यामत के दिन अल्लाह तअला से दरख़्वास्त करेगा कि ऐ अल्लाह ! जिसने मेरे नाम वाली नमाज़ पढ़ी, उसे मुझमें दाख़िल फ़रमा. अल्लाह उसकी दरख़्वास्त क़ुबूल करेगा. इसके कम से कम दो नफ़िल पढ़े जाते हैं. और ये नफ़िल मग़रिब की नमाज़ के बाद पढ़े जाते हैं."      


                 

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मधु मक्खियों की ख़िदमत

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सांझ ढलते वक़्त जो छोटी-छोटी मधुमक्खियाँ फूलों पर ठहरी हुई नज़र आती हैं, वो अक्सर बूढ़ी या कमज़ोर मधुमक्खियाँ होती हैं।
थकी हुई, बीमार या उम्रदराज़ मधुमक्खियाँ कई बार दिन के आखिर में छत्ते तक लौटने के बजाय किसी फूल पर ही रात गुज़ार देती हैं।
अगर अगली सुबह उन्हें फिर सूरज देखने का मौक़ा मिल जाए, तो वो दोबारा उड़ पड़ती हैं, पराग या रस इकट्ठा करके अपनी कॉलोनी के लिए कुछ आख़िरी ख़िदमत अंजाम देने।
मानो उन्हें अपने अंजाम का एहसास होता है। वह छत्ते पर बोझ नहीं बनना चाहतीं, आख़िरी दम तक काम करना चाहती हैं और ख़ामोशी से अपनी उम्र का बाक़ी हिस्सा ज़िम्मेदारी में गुज़ार देती हैं।
अगली बार जब शाम के वक़्त आपको किसी फूल पर चुपचाप बैठी हुई कोई नन्ही मधुमक्खी दिखाई दे तो उसे सिर्फ़ एक कीड़ा मत समझिए और उस नन्ही जान का शुक्रिया अदा कीजिए...जिसने उम्र भर बिना शोर किये दुनिया को फूलों से फल, खेतों से अनाज और इंसानों को अनगिनत नेअमतें पहुँचाईं। 
कई बार दुनिया की सबसे बड़ी नेअमतें पंखों की बहुत हल्की आवाज़ में आती हैं।
इंसानियत के लिए की गयी अकसर ख़िदमतें इतनी ख़ामोश होती हैं कि दुनिया उनका एहसान कभी ठीक से गिन ही नहीं पाती।
अरबों नाज़ुक मधुमक्खियाँ फूलों की गर्द-अफ़शानी करके एक अजीब ख़ूबसूरत ख़िदमत अंजाम देती हैं, जिनकी बदौलत मीठे-मीठे फल दुनिया में आते हैं।
वही शहद बनाती हैं, वही क़ीमती रॉयल जेली पैदा करती हैं, जो इंसानों के जिस्म और दिल दोनों को ग़िज़ा पहुँचाती है।
अपनी बहुत छोटी सी ज़िंदगी के दरमियान भी उन्होंने इंसानियत को मेहनत, पाबंदी, तर्तीब और लगन का सबक़ दिया है।
एक दिन जब बहुत कुछ हाथ में होते हुए भी खालीपन महसूस हो या कुछ भी हाथ में ना रहकर भी भीतर सुकून उतर आये, तब इंसान समझेगा कि ज़िंदगी का राज़ चीज़ों में नहीं, एहसास में था, नेकियाँ जमा करने में था।
मुमकिन है यह भी समझ आ जाए कि हम यहाँ हमेशा रहने नहीं आए थे, हम यहाँ सिर्फ़ सीखने, और लौटने से पहले अगले सफ़र के लिए ज़िंदगी बनाने आए थे।
अक्सर इंसान को हक़ीक़त तब समझ आती है, जब उसके पास उसे बदलने के लिए बहुत कम वक़्त बचा होता है।
-इलियास मख़दूम  

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ज़ालिम चार मरहलों से गुज़रता है

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बहुत से लोग यह गुमान करते हैं कि ज़ालिम के लिए अल्लाह की सज़ा ज़ुल्म के फ़ौरन बाद ही आ जाती है, हालाँकि यह सोच दुरुस्त नहीं है। दरअसल ज़ालिम चार मराहिल से गुज़रता है जिन्हें अच्छी तरह समझना ज़रूरी है:
पहला मरहला: मोहलत और ढील (الإمهال والإملاء)
इस मरहले में अल्लाह तआला ज़ालिम को मोहलत देता है ताकि शायद वह तौबा कर ले या अपने किए से बाज़ आ जाए। जैसा कि क़ुरआन में है:
{وَأُمْلِي لَهُمْ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ}
"और मैं उन्हें मोहलत देता हूँ, बेशक मेरी तदबीर बड़ी मज़बूत है।"

दूसरा मरहला: इस्तिदराज यानी रफ़्ता-रफ़्ता पकड़ना (الاستدراج)
इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया उस पर तंग कर दी जाए, बल्कि इसके बरअक्स उस पर दुनिया के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, उसका मरतबा बढ़ा दिया जाता है, उसे हर तरह की लज़्ज़तें मयस्सर होती हैं और अल्लाह उसे उसकी तलब और उम्मीद से बढ़कर अता फ़रमाता है। (अरबी लफ़्ज़ 'दरज' बुलंदी की तरफ़ चढ़ने को कहते हैं जबकि 'दरक' नीचे गिरने को)। इरशाद-ए-बारी तआला है:
{سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ}
"हम उन्हें इस तरह (तबाही की तरफ़) खींच लाएँगे कि उन्हें ख़बर भी न होगी।"

तीसरा मरहला: गुनाहों का ख़ुशनुमा लगना (التزيين)
इस मरहले में ज़ालिम का दिल मुर्दा हो जाता है, उसे अपने बुरे आमाल भी अच्छे लगने लगते हैं बल्कि वह उन्हें अपना फ़र्ज़ समझकर करने लगता है। उसके दिल में ज़िंदगी की कोई रमक बाक़ी नहीं रहती जो उसे उसके अफ़आल पर मलामत करे। जैसा कि फ़रमाया:
{وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ}
"और शैतान ने उनके (बद) आमाल उनके लिए ख़ुशनुमा बना दिए।"

चौथा मरहला: गिरफ़्त और पकड़ (الأخذ)
यह वह आख़िरी मरहला है जहाँ अल्लाह की तरफ़ से ज़ालिम पर सज़ा नाज़िल होती है और यह सज़ा निहायत सख़्त होती है। अल्लाह तआला का फ़रमान है:
{وَكَذَلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَى وَهِيَ ظَالِمَةٌ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ}
"और तेरे रब की पकड़ का यही तरीक़ा है जब वह बस्तियों को पकड़ता है जबकि वह ज़ुल्म कर रही होती हैं। बेशक उसकी पकड़ बड़ी दर्दनाक और सख़्त है।"
इन चारों मराहिल को अच्छी तरह याद रखें और अल्लाह के निज़ाम को समझें। यहूदियों पर जब अल्लाह तआला की तरफ़ से पकड़ आएगी तो दुनिया हैरान हो जाएगी... अब फ़िलिस्तीनी बहुत मज़लूम हैं।
-सनाउल्लाह हुसैन

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बेर के दरख़्त के अनोखे राज़

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)

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चादर मुबारक

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चादर ओढ़ा करते थे. उनका ये पहनावा अल्लाह को बहुत पसंद था. इसलिए क़ुरआन पाक में अल्लाह ने अपने महबूब को ‘या अय्योहल मुदस्सिर’ यानी चादर ओढ़ने वाले कहकर पुकारा है.

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यमन की धारीदार चादरें बहुत पसंद थीं.
(सही बुख़ारी
 : 358/3)  

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कितनी प्यारी दुआ है

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 कितनी प्यारी दुआ है-
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 
 إلهي كفى بي عِزًّا أن أكون لك عَبدًا، وكفى بي فخرًا أن تكون لي رَبًّا، أنت كما أُحب فاجعلني كما تُحب. 

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
इलाही कफ़ा बी इज़्ज़न, अन अकुना लका अबदन
वा कफ़ा बी फ़ख़रन, अन तकुना लि रब्बन 
अंता कमा उहिब्ब, फ़जअलनी कमा तोहिब
आमीन या रब्बुल आलेमीन 
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है.
ऐ मेरे रब ! मेरी इज़्ज़त के लिए यही काफ़ी है कि मैं तेरा बन्दा हूं. और मेरे फ़ख़्र करने के लिए ये काफ़ी है कि तू मेरा परवरदिगार है. तू वैसा ही है, जैसा मैं चाहता हूं. बस तू मुझे ऐसा बना दे, जैसा तू चाहता है.
आमीन या रब्बुल आलेमीन 

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اچھا خواب

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رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:

“اگر تم میں سے کوئی اچھا خواب دیکھے تو خوش ہو اور صرف اس کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہے۔”

حوالہ:  صحیح مسلم ، حدیث نمبر: 5902

اس حدیث میں رسول اللہ ﷺ نے اچھے خواب کے بارے میں رہنمائی فرمائی ہے، یعنی اگر کسی شخص کو کوئی اچھا اور خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو اسے چاہیے کہ وہ اللہ کا شکر ادا کرے اور خوش ہو، لیکن اس خواب کو ہر کسی کے سامنے بیان کرنے کے بجائے صرف ایسے شخص کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہو اور اس کے لیے خیر خواہ ہو، کیونکہ حسد یا غلط تعبیر کا اندیشہ بھی ہو سکتا ہے، اس سے یہ سبق ملتا ہے کہ مسلمان کو چاہیے کہ وہ اچھے خواب کو اللہ کی نعمت سمجھے اور اسے مناسب لوگوں کے ساتھ ہی بیان کرے، مثال کے طور پر اگر کسی کو کوئی نیک یا خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو وہ اپنے قریبی اور خیر خواہ شخص کو بتا سکتا ہے تاکہ وہ اس کے لیے دعا کرے یا اچھی تعبیر بیان کرے، یہ حدیث ہمیں یہ بھی سکھاتی ہے کہ اسلام انسان کو زندگی کے ہر معاملے میں حکمت اور احتیاط اختیار کرنے کی تعلیم دیتا ہے۔


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कामयाब हो गए ईमान वाले

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 लोग समझते हैं कि हुकूमत करने वाले कामयाब हो गए, आला ओहदे वाले कामयाब हो गए, दौलत वाले कामयाब हो गए.
लेकिन क़ुरआन कहता है-
قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ
क़द अफ़लहल मोमिनून
यानी कामयाब हो गए ईमान वाले

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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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