हर मर्ज़ का इलाज है

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
दुनिया में ऐसा कोई भी मर्ज़ नहीं है, जिसका इलाज न हो. मुख़तलिफ़ हदीसों से ये बात साबित है. इसलिए किसी भी मर्ज़ में मुब्तिला होने पर उसके इलाज पर ख़ास  तवज्जो देनी चाहिए.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक अल्लाह तआला ने बीमारी और उसकी दवा दोनों नाज़िल फ़रमाई हैं. और हर बीमारी के लिए दवा बनाई है. लिहाज़ा इलाज करो, लेकिन हराम चीज़ से इलाज न करो."
(सुनन अबी दाउद 3874) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अल्लाह तआला ने कोई बीमारी ऐसी नाज़िल नहीं की, जिसके लिए उसने शिफ़ा नाज़िल न फ़रमाई हो." 
(सही बुख़ारी 5678) 

चित्र गूगल से साभार 
   

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चटनी से शुगर कंट्रोल करें

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-डॉ फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जो जान के साथ ही जाता है. अभी तक इससे निजात की कोई दवा नहीं बनी. इसलिए शुगर का मरीज़ बहुत परेशान रहता है. उसके खाने-पीने पर भी हज़ार पाबंदियां लग जाती हैं. वह पेटभर रोटी या चावल भी नहीं खा सकता. हाँ, इतना ज़रूर है कि दवाओं और खान-पान पर ध्यान रखकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है. 
आज हम एक ऐसी चटनी का ज़िक्र कर रहे हैं, जिसके सेवन से शुगर को कंट्रोल किया जा सकता है. शुगर के कई मरीज़ों को इससे फ़ायदा हुआ है,

सामग्री : पुदीना, अदरक, लहसुन, अनारदाना. स्वादानुसार हरी मिर्च और नमक.
इन्हें दरदरा या महीन पीसकर चटनी बना लें और अपने भोजन में शामिल करें. इसके साथ ही खीरा, टमाटर, नीम्बू और दही को भी अपने भोजन में ज़रूर शामिल कर लें. इंशाअल्लाह इससे फ़ायदा होगा. 
हाँ, चिकित्सक के अनुसार दवाओं का सेवन नियमित रूप से करते रहें और शुगर की जाँच भी कराते रहें.

आपसे अनुरोध है कि अपने अनुभव भी लिखें, जिससे अन्य लोगों का भला हो सके.

चित्र : गूगल से साभार 


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आज़माइशें

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
ज़िन्दगी में सुख और दुख, धूप और छाँव की तरह होते हैं. ये सच है कि अच्छे लोगों को ही सबसे ज़्यादा दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है. बेशक आज़माइशें उन्हीं लोगों पर आती हैं, जिन्हें अल्लाह तआला पसंद करता है. और अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहने वाले लोग इन पर सब्र करते हैं और हर हाल में अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करते हैं.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मोमिन मर्द और औरत पर मुसलसल आज़माइशें आती रहती हैं. कभी उसकी ज़ात पर, तो कभी औलाद पर और कभी माल पर, यहाँ तक कि जब वह अल्लाह तआला से इस हाल में मुलाक़ात करता है कि उस पर कोई गुनाह बाक़ी नहीं रहता."    
(सुनन तिर्मिज़ी इब्ने माजा 2399) 

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आज़माइश जितनी सख़्त होती है, उसका सिला भी उतना ही बड़ा मिलता है, "    
(रवा अल तिर्मिज़ी 239) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जब कोई शख़्स किसी मुसीबत में मुब्तिला हो जाता है, तो अल्लाह तआला फ़रिश्तों से कहता है कि मेरा बन्दा जब तक मेरी आज़माइशों की क़ैद में है, तो तुम उस वक़्त तक उसके शब-व-रोज़ के नेकियों के मामलात लिखते रहो."
(मुसनद अहमद 8890)       

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि आज़माइश मोमिन की ज़ीनत है और अक़्लमन्द के लिए अज़मत है, क्योंकि आज़माइश का मोमिन के साथ रहना और मोमिन का उस पर सब्र करना और साबित क़दम रहना, उसके ईमान के सही होने की अलामत है.
(मुस्तदरक अल-वसाइल हदीस 2405)  

इसलिए जब की किसी तरह की कोई आज़माइश आए, तो अल्लाह से दुआ करें.    

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मज़दूरों का हक़

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मज़दूर का पसीना ख़ुश्क होने से पहले उसकी मज़दूरी अदा कर दो."
(सुनन इब्ने माजा 2443) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं क़यामत के दिन उस शख़्स के मुक़ाबिल रहूंगा, जो मज़दूर से पूरा काम ले और उसकी मज़दूरी न दे."  
(सही बुख़ारी 2227) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आदमी के गुनाहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मातहतों की रोज़ी रोक ले."
(सही मुस्लिम 996)   

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नमाज़ की फ़ज़ीलत

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अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स इस हालत में अल्लाह से मुलाक़ात करे कि वह पाँचों नमाज़ें अदा करता था, तो उसे बख़्श दिया जाएगा/"
(मिश्कात-उल-मसाबीह 47)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स किसी मस्जिद में चालीस रातें बाजमात नमाज़ पढ़े और उसकी इशा की नमाज़ की पहली रकअत फ़ौत न हो, अल्लाह तआला इस अमल के बदले उसके लिए जहन्नुम से आज़ादी लिख देता है."
(सुनन इब्ने माजा 798)      

फ़ज्र  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ उस वक़्त पढ़ो, जब सुबह अच्छी तरह वाज़ेह हो जाए. क्योंकि इसमें ज़्यादा अज्र है."  
(सुनन इब्ने माजा 672) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स ठंडी नमाज़ें (फ़ज्र और अस्र) पढ़ेगा, वह जन्नत में दाख़िल होगा." 
(मिश्कात-उल-मसाबीह 625)

ज़ुहर 
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अगर किसी को मालूम हो जाए कि ज़ुहर अव्वल वक़्त पढ़ने का कितना सवाब है, तो वह उसकी तरफ़ एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिश करेंगे."
(सुनन निसाई 673)    

अस्र
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अस्र की नमाज़ तुमसे पहले लोगों पर पेश की गई थी, मगर उन्होंने इसे ज़ाया लार दिया, फिर जो शख़्स इसकी हिफ़ाज़त करेगा, उसे दोगुना अज्र मिलेगा." 
(सही मुस्लिम 820)
 

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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "इशराक़ की नमाज़ तौबा करने वालों की नमाज़ है.
(सही मुस्लिम 748) 



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चाश्त की नमाज़

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चाश्त की नमाज़ का सही वक़्त आफ़ताब के ख़ूब तुलूअ हो जाने पर शुरू होता है. चाश्त में  कम से कम दो और ज़्यादा से ज़्यादा 12 अकअत पढ़ी जाती हैं.
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम चाश्त की चार रकअत पढ़ते थे और अल्लाह जिस क़द्र चाहता, उतनी पढ़ लेते. (सही मुस्लिम 719)

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया-"जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकअत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसे हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी दिन जन्म दिया हो. (मुसनद अहमद 2250)   


अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स चाश्त की नमाज़ के लिए निकले और उसका उस नमाज़ के सिवा कोई और मक़सद न हो, तो उसका अज्र उमरा करने वाले के अज्र के बराबर है. (सुनन अबू दाऊद 558) 

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "चाश्त की नमाज़ की हिफ़ाज़त सिर्फ़ वही शख़्स करता है, जो अल्लाह की तरफ़ बहुत ज़्यादा रुजू करने वाला हो. और ये नमाज़ अल्लाह की तरफ़ बहुत ज़्यादा रुजू करने वालों की नमाज़ है." 
(मुस्तदरक हाकिम 1182)

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स चाश्त की दो रकअत को हमेशा पढ़ता रहे, उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे, अगर्चे वोह समन्दर के झाग के बराबर हों."

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "चाश्त की दो रकअतें इंसान के बदन के हर जोड़ का सदक़ा अदा कर देती हैं."
(सही मुस्लिम 720) 


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आत्मा, भूत-प्रेत

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सबसे पहले हम बात करते हैं अकाल मौत की. हक़ीक़त ये है कि अल्लाह ने हर जानदार की मौत का एक वक़्त मुक़र्रर कर रखा है. जब, जहां, जैसे जिसकी मौत लिखी हुई है, उसी तरह उसे मौत आती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “फिर जब उनका वक़्त आ जाता है, तो वे न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं.”
इसीलिए हम कह सकते हैं कि कोई भी अकाल मौत नहीं मरता. सब अपने वक़्त पर ही मरते हैं.
जहां तक किसी की आत्मा द्वारा किसी को परेशान करने का सवाल है, तो ये बात भी बिल्कुल ग़लत है. जब मौत का फ़रिश्ता 'मलक अल-मौत’ किसी की रूह को क़ब्ज़ कर लेता है, तो इसके बाद रूह अपने अंजाम की तरफ़ चली जाती है यानी वह बरज़ख़ में रहती है. बरज़ख़ वह जगह है, जहां क़यामत तक रूहें रहती हैं. जब रूहें बरज़ख़ में पहुंच जाती हैं, तो उनके द्वारा किसी को परेशान करने का सवाल ही पैदा नहीं होता.
अब सवाल ये है कि कुछ लोगों को जो कथित भूत-प्रेत दिखाई देते हैं, आख़िर वे क्या हैं?
दरअसल जिन्हें लोग किसी की आत्मा, भूत या प्रेत समझते हैं, वे जिन्न होते हैं. जिन्न भी एक मख़लूक़ है. क़ुरआन करीम में जिन्नात का ज़िक्र आता है. ये आग से बने होते हैं. इनका काम ही इंसानों को परेशान करना है. हां, कुछ अच्छे जिन्न भी होते हैं.
जिन्न रूप बदलने में माहिर होते हैं.
हमज़ाद के बारे में भी इंशा अल्लाह कभी लिखेंगे.
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
तस्वीर गूगल से साभार 

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ऐ इत्मीनान पाने वाली जान

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 मौत जब भी आए, तो अपनों के बीच चहारदीवारी में आए. और रूह क़ब्ज़ करने वाला फ़रिश्ता ये पैग़ाम लेकर आए- 
ऐ इत्मीनान पाने वाली जान !
तू अपने परवरदिगार की तरफ़ इस हाल में लौट आ कि तू उससे राज़ी और वह तुझसे राज़ी है.
फिर तू हमारे बन्दों में शामिल हो जा.
और हमारी जन्नत में दाख़िल हो जा.
अल क़ुरआन सूरह 89 आयत 27-30 
#फ़हम_अल_क़ुरआन S

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान का परिचय

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक इस्लामी विदुषी, शायरा, कहानीकार, लेखिका, पटकथा लेखिका, निबंधकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं। उन्हें ‘लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी’ के नाम से जाना जाता है। उनके लेखन की ख़ासियत ये है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में बयां करती हैं। उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है। उन्हें जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है। उनका कलाम गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, और कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है। 

साहित्य 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं। वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने ‘फ़हम अल क़ुरआन’ लिखा है, जो उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है। वे कहती हैं- “हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं। हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया। उन्हें देखकर हमारी दिलचस्पी इबादत में हो गई। साथ ही बहुत कम उम्र से रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई। फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की। दरअसल, हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है।” 

उन्होंने सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था। यह किताब चर्चा में बनी हुई है। भक्ति और सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं। 

उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था। वे बताती हैं- “जब हम छठी जमात में पढ़ते थे। तब एक नज़्म लिखी थी। अम्मी और अब्बू को नज़्म सुनाई, तो उन्हें बहुत पसंद आई। अब्बू ने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई। नज़्म ख़ूब सराही गई। इस तरह लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है। सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया। 

उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा.

मीडिया 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र, आकाशवाणी और देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में कई सालों तक काम किया है। वे दूरदर्शन केन्द्र के समाचार अनुभाग की प्रख्यात सम्पादक और आकाशवाणी की मनोरंजन प्रसारक रह चुकी हैं।
वे कहती हैं- “आकाशवाणी से हमारा दिल का रिश्ता है। रेडियो सुनते हुए ही बड़े हुये। बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ। रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था। उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे। पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हुई हैं।  आज भी रेडियो से उतना ही लगाव है। इसी तरह दूरदर्शन के साथ भी हमारी ख़ूबसूरत यादें वाबस्ता हैं। बचपन में जब दूरदर्शन देखते थे, तब ये सोचा भी नहीं था कि कभी हम ख़ुद इसका हिस्सा बनेंगे। नवम्बर 2002 में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक के तौर पर दूरदर्शन से जुड़ना हुआ। वह वक़्त भी ज़िन्दगी का बहुत ख़ूबसूरत और यादगार वक़्त रहा।“    

इसके अलावा उन्होंने कई समाचार चैनलों में भी अपनी प्रतिभा का योगदान दिया है। उन्होंने कई वृत्तचित्र, टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटक भी लिखे हैं। वे देश और विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, समाचार और फ़ीचर एजेंसियों के लिए लिखती हैं। देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं।

मुशायरे और कवि सम्मेलन
डॉ. फ़िरदौस ख़ान मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं। कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली है। वे बताती हैं- “जब सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज के सम्पादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘गीतकार’ में गीत प्रकाशित हुआ, तो दूर-दूर से मुशायरों और कवि सम्मेलनों के लिए आमंत्रण आने लगे। भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने का भी मौक़ा मिला। इसके अलावा अनेक गोष्ठियों में भी हिस्सा लिया।”      

सम्मान
उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है। न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया था। राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन द्वारा उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ पत्रकार’ अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें दो डॉक्टरेट की मानद उपाधियां भी शामिल हैं। वे कहती हैं- “हमारे अल्फ़ाज़, हमारे जज़्बात और ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि हमारे लफ़्ज़ ही हमारी पहचान हैं। पाठक हमारे लिखे को पसंद करते हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।” 

अनुवाद 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान कई भाषाओं की जानकार हैं। वे उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखती हैं। विदेशों में उनकी अंग्रेज़ी कवितायें बहुत पसंद की जाती हैं। उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम् का पंजाबी अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ। वे राजकीय महाविद्यालय हिसार की पंजाबी की पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। उन्होंने राहुल गांधी पर एक नज़्म भी लिखी, जो ख़ूब सराही गई।   

ब्लॉग 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ब्लॉग भी लिखती हैं। उनके कई ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन करीम का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है। ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है। ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है। ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है। ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है। ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का ब्लॉग है। 
 
देश सेवा  
डॉ. फ़िरदौस ख़ान देश सेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन के तौर पर कई साल काम किया है। इसके अलावा वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं।   

देश के सुप्रसिद्ध लेखकों और पत्रकारों ने उनके बारे में कई बार लिखा है। हाल ही में प्रकाशित श्री यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक ऐसी लेखिका के रूप में शामिल किया गया है, जो अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं और समाज को एक नई दिशा दे रही हैं।    

अपनी अभिलाषाओं के बारे में वे कहती हैं- “हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला। ज़मीन चाही, तो आसमान मिला। इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की ‘चाह’ ही नहीं रही।” वे अपने बारे में कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…












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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

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मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
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उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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