चाश्त की नमाज़

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चाश्त की नमाज़ का सही वक़्त आफ़ताब के ख़ूब तुलूअ हो जाने पर शुरू होता है. चाश्त में  कम से कम दो और ज़्यादा से ज़्यादा 12 अकअत पढ़ी जाती हैं.
प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम चाश्त की चार रकअत पढ़ते थे और अल्लाह जिस क़द्र चाहता, उतनी पढ़ लेते. (मुस्लिम 719)
नबी हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- जो शख़्स चाश्त की दो रकअत को हमेशा पढ़ता रहे, उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे, अगर्चे वोह समन्दर के झाग के बराबर हों.

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اچھا خواب

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رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:

“اگر تم میں سے کوئی اچھا خواب دیکھے تو خوش ہو اور صرف اس کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہے۔”

حوالہ:  صحیح مسلم ، حدیث نمبر: 5902

اس حدیث میں رسول اللہ ﷺ نے اچھے خواب کے بارے میں رہنمائی فرمائی ہے، یعنی اگر کسی شخص کو کوئی اچھا اور خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو اسے چاہیے کہ وہ اللہ کا شکر ادا کرے اور خوش ہو، لیکن اس خواب کو ہر کسی کے سامنے بیان کرنے کے بجائے صرف ایسے شخص کو بتائے جو اس سے محبت کرتا ہو اور اس کے لیے خیر خواہ ہو، کیونکہ حسد یا غلط تعبیر کا اندیشہ بھی ہو سکتا ہے، اس سے یہ سبق ملتا ہے کہ مسلمان کو چاہیے کہ وہ اچھے خواب کو اللہ کی نعمت سمجھے اور اسے مناسب لوگوں کے ساتھ ہی بیان کرے، مثال کے طور پر اگر کسی کو کوئی نیک یا خوشی دینے والا خواب نظر آئے تو وہ اپنے قریبی اور خیر خواہ شخص کو بتا سکتا ہے تاکہ وہ اس کے لیے دعا کرے یا اچھی تعبیر بیان کرے، یہ حدیث ہمیں یہ بھی سکھاتی ہے کہ اسلام انسان کو زندگی کے ہر معاملے میں حکمت اور احتیاط اختیار کرنے کی تعلیم دیتا ہے۔


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कामयाब हो गए ईमान वाले

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 लोग समझते हैं कि हुकूमत करने वाले कामयाब हो गए, आला ओहदे वाले कामयाब हो गए, दौलत वाले कामयाब हो गए.
लेकिन क़ुरआन कहता है-
قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ
क़द अफ़लहल मोमिनून
यानी कामयाब हो गए ईमान वाले

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और अल्लाह ने खाना भेज दिया...

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साल 2005 का वाक़िया है. नवम्बर का महीना था. हम अपनी अम्मी के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में गए हुए थे. गांव के एक बुज़ुर्ग के साथ हम घूमने निकले. उनके साथ कांग्रेस के एक नेता और उनके चाचा नवाब साहब भी थे. दोपहर हो गई. सबको बहुत भूख लगी थी. बुज़ुर्ग ने कहा कि बहुत भूख लग रही है. घर वापस लौटने में बहुत देर हो जाएगी और यहां दूर-दूर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा, जहां जाकर कुछ खा-पी सकें. उनकी यह बात सुनकर हमारी अम्मी ने कहा- “मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.” इस पर वे बुज़ुर्ग तंज़िया मुस्कराने लगे. अभी चन्द घड़ियां ही गुज़री थीं कि साईकिल पर सफ़ेद लिबास में एक शख़्स आया. उसने सबको सलाम किया और उन बुज़ुर्ग के हाथ में एक थैली थमाकर चला गया. उन्होंने थैली खोली, तो उसमें गरमा-गरम समौसे थे. नवाब साहब ने बुज़ुर्ग से उस शख़्स के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि वे उसे नहीं जानते.
इस पर हमारी अम्मी ने बुज़ुर्ग से कहा- “क्या मैंने आपसे नहीं कहा था कि मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.”
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हमारी अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी
(शेख़ज़ादी का वाक़िया)
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया

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शेख़ज़ादी का वाक़िया

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कई बरस पहले का वाक़िया है. एक रोज़ हमारी छोटी बहन ने अम्मी को फ़ोन किया कि आपसे मिलने का दिल कर रहा है. अम्मी ने उससे मिलने का वादा कर लिया. चुनांचे ज़ुहर की नमाज़ के बाद अम्मी और हम उससे मिलने के लिए घर से निकले. वह शायद जेठ का महीना था. शिद्दत की गर्मी थी. सूरज आग बरसा रहा था. अम्मी कहने लगीं कि काश ! बादल होते. हमने आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि आसमान में दूर-दूर तक बादल का कोई नामो निशान तक नहीं है. हमारी बात ख़त्म भी न होने पाई थी कि हमने ज़मीन पर साया देखा. वह साया इतना वसीह था कि अम्मी और हम उसके नीचे थे. यानी हम घर से दस क़दम भी आगे नहीं बढ़े थे कि हम दोनों अब्र के सायेबान में थे. हम यूं ही बातें करते-करते बहन के घर गए. वहां कुछ वक़्त रुके और फिर वापस घर आ गए. जब हम घर आ गए, तो अम्मी ने हमसे पूछा- ये बताओ कि क्या तुम धूप में गई थीं या अब्र के साये में. हमने ग़ौर किया कि वाक़ई हम अब्र के साये में ही गए थे और अब्र के साये में ही घर वापस आए थे. जैसे-जैसे हम आगे क़दम बढ़ा रहे थे, वैसे-वैसे ही अब्र का साया भी आगे बढ़ता जा रहा था.
ये अल्लाह का एक बहुत बड़ा मौजिज़ा था. ऐसे थीं हमारी अम्मी. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे, आमीन
डॉ. फ़िरदौस ख़ान   
हमारी अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी        
(शेख़ज़ादी का वाक़िया) 
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया 

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मुतमईनी

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
मुतमईनी में ही सुकून है. इंसान को जो मिलता है, अगर वह उसी में ख़ुश रहना सीख ले, तो ज़िन्दगी आसान हो जाती है. वरना दुनिया के पीछे कितना ही भाग लो, चाह की कोई हद नहीं है. और इसी भागमभाग में एक दिन ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है.
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "तुम उस शख़्स की तरफ़ देखो जो दुनिया के ऐतबार से तुम से कमतर हो और उस शख़्स की तरफ़ मत देखो जो दुनिया के ऐतबार से तुमसे बड़ा हो, क्योंकि इस तरह तुम अल्लाह की नेअमतों को हक़ीर समझोगे."
(सही मुस्लिम 2963)

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लोगों पर धोखे से भरे साल भी आएंगे

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अबु हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-
लोगों पर धोखे से भरे ऐसे साल भी आएंगे, जिनमें
* झूठे को सच्चा समझा जाएगा और सच्चे को झूठा.
* बद दयानत को अमानतदार समझा जाएगा और अमानतदार को बद दयानत.
* नाहल और हक़ीर शख़्स अवाम की नुमाइंदगी करेगा.        

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मज़दूरी

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि आदमी के गुनाहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मातहतों की रोज़ी रोक कर रखे.
(सही मुस्लिम 996)


* अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मज़दूर की मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो.
(इब्ने माजा 2443)


* अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद sसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मैं क़यामत के दिन उस शख़्स के मुक़ाबिल रहूंगा, जो मज़दूर से पूरा काम ले और उसकी मज़दूरी न दे.
(सही बुख़ारी)

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क़ुरआन की तिलावत

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स क़ुरआन पढ़ता हो और उसमें माहिर हो, तो वह बड़ी इज़्ज़त वाले फ़रिश्तों और पैग़म्बरों के साथ होगा और जो शख़्स अटक-अटक कर परेशानी के साथ पढ़े, तो उसे दोहरा सवाब मिलेगा.
(अबू दाऊद)

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चादर मुबारक

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चादर ओढ़ा करते थे. उनका ये पहनावा अल्लाह को बहुत पसंद था. इसलिए क़ुरआन पाक में अल्लाह ने अपने महबूब को ‘या अय्योहल मुदस्सिर’ यानी चादर ओढ़ने वाले कहकर पुकारा है.

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यमन की धारीदार चादरें बहुत पसंद थीं.
(सही बुख़ारी
 : 358/3)  

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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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