रब से गुफ़्तगू

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मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत गुनाहगार हूं.
जवाब मिला : अल्लाह की रहमत से मायूस न हो. अल्लाह सब गुनाह बख़्श देगा. बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला और बड़ा मेहरबान है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे तेरी मदद कैसे मिलेगी ?
जवाब मिला : सब्र और नमाज़ से मदद लिया करो.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे दिल को सुकून नहीं है.
जवाब मिला : बेशक अल्लाह की याद से ही दिलों को सुकून और इत्मीनान मिलता है.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं बहुत तन्हा हूं.
जवाब मिला : बेशक हम तुम्हारी शह रग से भी ज़्यादा क़रीब हैं.

मैंने कहा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे कोई याद नहीं करता.
जवाब मिला : तुम हमें याद करो, हम तुम्हें याद करेंगे.

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नमाज़ की फ़ज़ीलत

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
नमाज़, रूह का सुकून है, चेहरे का नूर है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने बार-बार नमाज़ क़ायम करने का हुक्म दिया है.   
आज हम नमाज़ से वाबस्ता चन्द हदीसें आप सबके साथ साझा कर रहे हैं.   

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स इस हालत में अल्लाह से मुलाक़ात करे कि वह पाँचों नमाज़ें अदा करता था, तो उसे बख़्श दिया जाएगा/"
(मिश्कात-उल-मसाबीह 47)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "वक़्त पर अदा की हुई नमाज़ अल्लाह तआला को सब कामों से ज़्यादा पसंद है."
(मुसनद निसाई 867) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स किसी मस्जिद में चालीस रातें बाजमात नमाज़ पढ़े और उसकी इशा की नमाज़ की पहली रकअत फ़ौत न हो, अल्लाह तआला इस अमल के बदले उसके लिए जहन्नुम से आज़ादी लिख देता है."
(सुनन इब्ने माजा 798)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " अगर लोग जान लें कि अज़ान देने और पहली सफ़ में नमाज़ पढ़ने का कितना सवाब है, फिर इसे हासिल करने के लिए क़िरआ अन्दाज़ी के सिवा कोई रास्ता न पायें, तो वो ज़रूर क़िरआ अन्दाज़ी करें."
(सही बुख़ारी 615)       

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स दो रकअत नमाज़ इस तरह अदा करे कि उनमें अपने दिल को दुनियावी ख़्यालात की तरफ मुतावज्जा न होने दे तो अल्लाह तआला उसके उसके पिछ्ते गुनाह बख़्श देता है."
(सही बुख़ारी 159)        

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स अच्छी तरह  ग़ुस्ल करता है, जैसा कि उसे हुक्म दिया गया है. फिर वह अपने घर से निकलता है, यहाँ तक कि जुमे में आता है. और ख़ुत्बे के दौरान ख़ामोश रहता है, यहाँ तक कि वह अपनी नमाज़ ख़त्म कर ले, तो यह उसके उन गुनाहों का  कफ़्फ़ारा होगा, जो उससे पहले के जुमे से इस जुमे तक हुए हैं."
(सुनन नसई 1404)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स पाबन्दी से नमाज़ पढ़ेगा, वह नमाज़ क़यामत के दिन उसके लिए नूर, दलील और निजात का सबब बनेगी."
(मुसनद अहमद 6576)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक मुसलमान बन्दा जब अल्लाह तआला की रज़ा के लिए नमाज़ अदा करता है, तो उसके गुनाह इस तरह झड़ जाते हैं जैसे दरख़्त के पत्ते झड़ते हैं."  
(मिश्कात-उल-मसाबीह 576)

फ़ज्र  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की दो रकअतें (सुन्नत) दुनिया और जो कुछ दुनिया में हैं, उस सबसे बेहतर हैं."
(सही मुस्लिम 725)   

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ उस वक़्त पढ़ो, जब सुबह अच्छी तरह वाज़ेह हो जाए. क्योंकि इसमें ज़्यादा अज्र है."  
(सुनन इब्ने माजा 672) 

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ बाजमात अदा करना सारी रात क़याम करने से अफ़ज़ल है." 
(सही मुस्लिम 1491)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जिसने फ़ज्र की नमाज़ पढ़ी, वह अल्लाह की पनाह में है, तो तुम अल्लाह की पनाह हाथ से जाने न दो."
(जामा तिमिज़ी 222)  

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स ठंडी नमाज़ें (फ़ज्र और अस्र) पढ़ेगा, वह जन्नत में दाख़िल होगा." 
(मिश्कात-उल-मसाबीह 625)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र और अस्र की नमाज़ों में फ़रिश्ते बारी-बारी आते हैं और अल्लाह को जाकर तुम्हारे बारे में बताते हैं."
(सही बुख़ारी 555) 

ज़ुहर 
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अगर किसी को मालूम हो जाए कि ज़ुहर अव्वल वक़्त पढ़ने का कितना सवाब है, तो वह उसकी तरफ़ एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिश करेंगे."
(सुनन निसाई 673)    

अस्र
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अस्र की नमाज़ तुमसे पहले लोगों पर पेश की गई थी, मगर उन्होंने इसे ज़ाया कर दिया, फिर जो शख़्स इसकी हिफ़ाज़त करेगा, उसे दोगुना अज्र मिलेगा." 
(सही मुस्लिम 820)
 

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हर मर्ज़ का इलाज है

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
दुनिया में ऐसा कोई भी मर्ज़ नहीं है, जिसका इलाज न हो. मुख़तलिफ़ हदीसों से ये बात साबित है. इसलिए किसी भी मर्ज़ में मुब्तिला होने पर उसके इलाज पर ख़ास  तवज्जो देनी चाहिए.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक अल्लाह तआला ने बीमारी और उसकी दवा दोनों नाज़िल फ़रमाई हैं. और हर बीमारी के लिए दवा बनाई है. लिहाज़ा इलाज करो, लेकिन हराम चीज़ से इलाज न करो."
(सुनन अबी दाउद 3874) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अल्लाह तआला ने कोई बीमारी ऐसी नाज़िल नहीं की, जिसके लिए उसने शिफ़ा नाज़िल न फ़रमाई हो." 
(सही बुख़ारी 5678) 

चित्र गूगल से साभार 
   

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चटनी से शुगर कंट्रोल करें

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-डॉ फ़िरदौस ख़ान
शुगर एक ऐसा मर्ज़ है, जो जान के साथ ही जाता है. अभी तक इससे निजात की कोई दवा नहीं बनी. इसलिए शुगर का मरीज़ बहुत परेशान रहता है. उसके खाने-पीने पर भी हज़ार पाबंदियां लग जाती हैं. वह पेटभर रोटी या चावल भी नहीं खा सकता. हाँ, इतना ज़रूर है कि दवाओं और खान-पान पर ध्यान रखकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है. 
आज हम एक ऐसी चटनी का ज़िक्र कर रहे हैं, जिसके सेवन से शुगर को कंट्रोल किया जा सकता है. शुगर के कई मरीज़ों को इससे फ़ायदा हुआ है,

सामग्री : पुदीना, अदरक, लहसुन, अनारदाना. स्वादानुसार हरी मिर्च और नमक.
इन्हें दरदरा या महीन पीसकर चटनी बना लें और अपने भोजन में शामिल करें. इसके साथ ही खीरा, टमाटर, नीम्बू और दही को भी अपने भोजन में ज़रूर शामिल कर लें. इंशाअल्लाह इससे फ़ायदा होगा. 
हाँ, चिकित्सक के अनुसार दवाओं का सेवन नियमित रूप से करते रहें और शुगर की जाँच भी कराते रहें.

आपसे अनुरोध है कि अपने अनुभव भी लिखें, जिससे अन्य लोगों का भला हो सके.

चित्र : गूगल से साभार 


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आज़माइशें

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डॉ फ़िरदौस ख़ान 
ज़िन्दगी में सुख और दुख, धूप और छाँव की तरह होते हैं. ये सच है कि अच्छे लोगों को ही सबसे ज़्यादा दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है. बेशक आज़माइशें उन्हीं लोगों पर आती हैं, जिन्हें अल्लाह तआला पसंद करता है. और अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहने वाले लोग इन पर सब्र करते हैं और हर हाल में अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करते हैं.  

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मोमिन मर्द और औरत पर मुसलसल आज़माइशें आती रहती हैं. कभी उसकी ज़ात पर, तो कभी औलाद पर और कभी माल पर, यहाँ तक कि जब वह अल्लाह तआला से इस हाल में मुलाक़ात करता है कि उस पर कोई गुनाह बाक़ी नहीं रहता."    
(सुनन तिर्मिज़ी इब्ने माजा 2399) 

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आज़माइश जितनी सख़्त होती है, उसका सिला भी उतना ही बड़ा मिलता है, "    
(रवा अल तिर्मिज़ी 239) 

अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जब कोई शख़्स किसी मुसीबत में मुब्तिला हो जाता है, तो अल्लाह तआला फ़रिश्तों से कहता है कि मेरा बन्दा जब तक मेरी आज़माइशों की क़ैद में है, तो तुम उस वक़्त तक उसके शब-व-रोज़ के नेकियों के मामलात लिखते रहो."
(मुसनद अहमद 8890)       

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि आज़माइश मोमिन की ज़ीनत है और अक़्लमन्द के लिए अज़मत है, क्योंकि आज़माइश का मोमिन के साथ रहना और मोमिन का उस पर सब्र करना और साबित क़दम रहना, उसके ईमान के सही होने की अलामत है.
(मुस्तदरक अल-वसाइल हदीस 2405)  

इसलिए जब की किसी तरह की कोई आज़माइश आए, तो अल्लाह से दुआ करें.    

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मज़दूरों का हक़

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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मज़दूर का पसीना ख़ुश्क होने से पहले उसकी मज़दूरी अदा कर दो."
(सुनन इब्ने माजा 2443) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं क़यामत के दिन उस शख़्स के मुक़ाबिल रहूंगा, जो मज़दूर से पूरा काम ले और उसकी मज़दूरी न दे."  
(सही बुख़ारी 2227) 

 अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "आदमी के गुनाहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मातहतों की रोज़ी रोक ले."
(सही मुस्लिम 996)   

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इशराक़ की नमाज़

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इशराक़ की नमाज़ हज और उमरा का सवाब
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-" जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज्र बा-जमाअत अदा करे, फिर अपनी जगह पर बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे. फिर दो रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है."

हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज्र की नमा पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशग़ूल रहता है. फिर दो या चार रकअत इशराक़ की नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी.

हज़रत मुआज़ बिन अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर उसी जगह बैठा रहता है और ख़ैर के अलावा कोई बात नहीं करता और फिर इशराक़ की दो रकअत पढ़ता है, तो उसके तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहें वो समन्दर के झाग के बराबर हों."
(अबू दाऊद 1287)     

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "इशराक़ की नमाज़ तौबा करने वालों की नमाज़ है.
(सही मुस्लिम 748) 



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चाश्त की नमाज़

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चाश्त की नमाज़ का सही वक़्त आफ़ताब के ख़ूब तुलूअ हो जाने पर शुरू होता है. चाश्त में  कम से कम दो और ज़्यादा से ज़्यादा 12 अकअत पढ़ी जाती हैं.
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम चाश्त की चार रकअत पढ़ते थे और अल्लाह जिस क़द्र चाहता, उतनी पढ़ लेते. (सही मुस्लिम 719)

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया-"जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकअत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसे हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी दिन जन्म दिया हो. (मुसनद अहमद 2250)   


अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स चाश्त की नमाज़ के लिए निकले और उसका उस नमाज़ के सिवा कोई और मक़सद न हो, तो उसका अज्र उमरा करने वाले के अज्र के बराबर है. (सुनन अबू दाऊद 558) 

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "चाश्त की नमाज़ की हिफ़ाज़त सिर्फ़ वही शख़्स करता है, जो अल्लाह की तरफ़ बहुत ज़्यादा रुजू करने वाला हो. और ये नमाज़ अल्लाह की तरफ़ बहुत ज़्यादा रुजू करने वालों की नमाज़ है." 
(मुस्तदरक हाकिम 1182)

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स चाश्त की दो रकअत को हमेशा पढ़ता रहे, उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे, अगर्चे वोह समन्दर के झाग के बराबर हों."

अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्‍लम ने फ़रमाया- "चाश्त की दो रकअतें इंसान के बदन के हर जोड़ का सदक़ा अदा कर देती हैं."
(सही मुस्लिम 720) 


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आत्मा, भूत-प्रेत

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सबसे पहले हम बात करते हैं अकाल मौत की. हक़ीक़त ये है कि अल्लाह ने हर जानदार की मौत का एक वक़्त मुक़र्रर कर रखा है. जब, जहां, जैसे जिसकी मौत लिखी हुई है, उसी तरह उसे मौत आती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “फिर जब उनका वक़्त आ जाता है, तो वे न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं.”
इसीलिए हम कह सकते हैं कि कोई भी अकाल मौत नहीं मरता. सब अपने वक़्त पर ही मरते हैं.
जहां तक किसी की आत्मा द्वारा किसी को परेशान करने का सवाल है, तो ये बात भी बिल्कुल ग़लत है. जब मौत का फ़रिश्ता 'मलक अल-मौत’ किसी की रूह को क़ब्ज़ कर लेता है, तो इसके बाद रूह अपने अंजाम की तरफ़ चली जाती है यानी वह बरज़ख़ में रहती है. बरज़ख़ वह जगह है, जहां क़यामत तक रूहें रहती हैं. जब रूहें बरज़ख़ में पहुंच जाती हैं, तो उनके द्वारा किसी को परेशान करने का सवाल ही पैदा नहीं होता.
अब सवाल ये है कि कुछ लोगों को जो कथित भूत-प्रेत दिखाई देते हैं, आख़िर वे क्या हैं?
दरअसल जिन्हें लोग किसी की आत्मा, भूत या प्रेत समझते हैं, वे जिन्न होते हैं. जिन्न भी एक मख़लूक़ है. क़ुरआन करीम में जिन्नात का ज़िक्र आता है. ये आग से बने होते हैं. इनका काम ही इंसानों को परेशान करना है. हां, कुछ अच्छे जिन्न भी होते हैं.
जिन्न रूप बदलने में माहिर होते हैं.
हमज़ाद के बारे में भी इंशा अल्लाह कभी लिखेंगे.
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
तस्वीर गूगल से साभार 

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ऐ इत्मीनान पाने वाली जान

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 मौत जब भी आए, तो अपनों के बीच चहारदीवारी में आए. और रूह क़ब्ज़ करने वाला फ़रिश्ता ये पैग़ाम लेकर आए- 
ऐ इत्मीनान पाने वाली जान !
तू अपने परवरदिगार की तरफ़ इस हाल में लौट आ कि तू उससे राज़ी और वह तुझसे राज़ी है.
फिर तू हमारे बन्दों में शामिल हो जा.
और हमारी जन्नत में दाख़िल हो जा.
अल क़ुरआन सूरह 89 आयत 27-30 
#फ़हम_अल_क़ुरआन S

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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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