ज़ालिम चार मरहलों से गुज़रता है

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बहुत से लोग यह गुमान करते हैं कि ज़ालिम के लिए अल्लाह की सज़ा ज़ुल्म के फ़ौरन बाद ही आ जाती है, हालाँकि यह सोच दुरुस्त नहीं है। दरअसल ज़ालिम चार मराहिल से गुज़रता है जिन्हें अच्छी तरह समझना ज़रूरी है:
पहला मरहला: मोहलत और ढील (الإمهال والإملاء)
इस मरहले में अल्लाह तआला ज़ालिम को मोहलत देता है ताकि शायद वह तौबा कर ले या अपने किए से बाज़ आ जाए। जैसा कि क़ुरआन में है:
{وَأُمْلِي لَهُمْ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ}
"और मैं उन्हें मोहलत देता हूँ, बेशक मेरी तदबीर बड़ी मज़बूत है।"

दूसरा मरहला: इस्तिदराज यानी रफ़्ता-रफ़्ता पकड़ना (الاستدراج)
इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया उस पर तंग कर दी जाए, बल्कि इसके बरअक्स उस पर दुनिया के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, उसका मरतबा बढ़ा दिया जाता है, उसे हर तरह की लज़्ज़तें मयस्सर होती हैं और अल्लाह उसे उसकी तलब और उम्मीद से बढ़कर अता फ़रमाता है। (अरबी लफ़्ज़ 'दरज' बुलंदी की तरफ़ चढ़ने को कहते हैं जबकि 'दरक' नीचे गिरने को)। इरशाद-ए-बारी तआला है:
{سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ}
"हम उन्हें इस तरह (तबाही की तरफ़) खींच लाएँगे कि उन्हें ख़बर भी न होगी।"

तीसरा मरहला: गुनाहों का ख़ुशनुमा लगना (التزيين)
इस मरहले में ज़ालिम का दिल मुर्दा हो जाता है, उसे अपने बुरे आमाल भी अच्छे लगने लगते हैं बल्कि वह उन्हें अपना फ़र्ज़ समझकर करने लगता है। उसके दिल में ज़िंदगी की कोई रमक बाक़ी नहीं रहती जो उसे उसके अफ़आल पर मलामत करे। जैसा कि फ़रमाया:
{وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ}
"और शैतान ने उनके (बद) आमाल उनके लिए ख़ुशनुमा बना दिए।"

चौथा मरहला: गिरफ़्त और पकड़ (الأخذ)
यह वह आख़िरी मरहला है जहाँ अल्लाह की तरफ़ से ज़ालिम पर सज़ा नाज़िल होती है और यह सज़ा निहायत सख़्त होती है। अल्लाह तआला का फ़रमान है:
{وَكَذَلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَى وَهِيَ ظَالِمَةٌ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ}
"और तेरे रब की पकड़ का यही तरीक़ा है जब वह बस्तियों को पकड़ता है जबकि वह ज़ुल्म कर रही होती हैं। बेशक उसकी पकड़ बड़ी दर्दनाक और सख़्त है।"
इन चारों मराहिल को अच्छी तरह याद रखें और अल्लाह के निज़ाम को समझें। यहूदियों पर जब अल्लाह तआला की तरफ़ से पकड़ आएगी तो दुनिया हैरान हो जाएगी... अब फ़िलिस्तीनी बहुत मज़लूम हैं।
-सनाउल्लाह हुसैन

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