ज़ालिम की पकड़ कैसे होगी

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-डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
कुछ रोज़ पहले एक शनासा ने हमसे कहा कि ज़ालिम ऐशो-आराम की ज़िन्दगी बसर करते हैं. परमेश्वर भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगा. हालांकि वे परमेश्वर से डरने वाले व्यक्ति हैं. शायद हालत से तंग आकर अवसाद में उन्होंने ऐसी बातें कहीं. ख़ैर, हमने उन्हें क़ुरआन के हवाले से जवाब दिया.      

दरअसल, बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि ज़ालिम लोगों पर मुसलसल ज़ुल्म करते रहते हैं. इसके बावजूद भी वे ऐशो-आराम की ज़िन्दगी बसर करते हैं. उनके पास दौलत और ताक़त दोनों ही होती है. ज़ालिम को देखकर उनका मन उदास हो जाता है और दिल में मुख़तलिफ़ क़िस्म के ख़्याल आते हैं. 

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने बार-बार फ़रमाया है कि हर जान को उसके आमाल का अज्र ज़रूर मिलेगा यानी जो नेकी करेगा, उसे बदले में नेअमतों वाली जन्नत मिलेगी और जो बदी करेगा, उसे दोज़ख़ का सख़्त अज़ाब मिलकर रहेगा. 

अपने बड़ों से भी हमने यही सुना है कि अल्लाह तआला ज़ालिमों को पहले ढील देता है और फिर अचानक ही अपनी रस्सी खींच लेता है. 

क़ुरआन करीम में उन चार मरहलों का ज़िक्र किया गया है, जिनसे ज़ालिम गुज़रता है. 
पहले मरहले में ज़ालिम को ख़बरदार किया जाता है और उसे मोहलत दी जाती है कि वह ज़ुल्म से बाज़ आ जाए और तौबा कर ले.
क़ुरआन की सूरह अल क़लम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- 
وَأُمْلِي لَهُمْ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ
"और हम उन्हें मोहलत दे रहे हैं. बेशक हमारी तदबीर बहुत मज़बूत है." 
(क़ुरआन 68:45) 
             
दूसरे मरहले में ज़ालिम को आहिस्ता-आहिस्ता तबाही की तरफ़ लाया जाता है. ज़ालिम ज़ुल्म करने में इस तरह ग़र्क़ हो जाता है कि उसे इसकी ख़बर तक नहीं होती. 
क़ुरआन करीम की सूरह अल आराफ़ में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- 
سَنَسْتَدْرِجُهُمْ مِنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
"हम अनक़रीब उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता हलाकत की तरफ़ इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं होगी."
(क़ुरआन 7:182) 
  
तीसरे मरहले में ज़ालिम को अपने गुनाह अच्छे लगने लगते हैं. यानी उसका ज़मीर मर चुका होता है. वह इंसान से हैवान बन जाता है. 
क़ुरआन करीम की सूरह अल अनफ़ाल में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है-  
وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ
"और जब शैतान ने उन काफ़िरों के लिए उनके आमाल आरास्ता करके दिखाए."
(क़ुरआन 8:48) 

चौथे मरहले में ज़ालिम अपने अंजाम को पहुंच जाता है. यहां उसके बचने के सब रस्ते बंद हो चुके होते हैं. वह सख़्त अज़ाब में मुब्तिला हो जाता है. 
क़ुरआन की सूरह हूद में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है-  
وَكَذَلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَى وَهِيَ ظَالِمَةٌ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ
"और इसी तरह तुम्हारे परवरदिगार की गिरफ़्त है. वह बस्तियों को उस वक़्त अज़ाब की गिरफ़्त में लेता है, जब वहां के बाशिन्दे ज़ुल्म करने लगते हैं. बेशक उसकी गिरफ़्त सख़्त और दर्दनाक होती है."
(क़ुरआन 11:102)     

इसलिए हमेशा अल्लाह तआला से डरते रहना चाहिए.   


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