नमाज़ की फ़ज़ीलत
Author: Admin Labels:: नमाज़, नमाज़ की फ़ज़ीलतनमाज़, रूह का सुकून है, चेहरे का नूर है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने बार-बार नमाज़ क़ायम करने का हुक्म दिया है.
आज हम नमाज़ से वाबस्ता चन्द हदीसें आप सबके साथ साझा कर रहे हैं.
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स इस हालत में अल्लाह से मुलाक़ात करे कि वह पाँचों नमाज़ें अदा करता था, तो उसे बख़्श दिया जाएगा/"
(मिश्कात-उल-मसाबीह 47)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स किसी मस्जिद में चालीस रातें बाजमात नमाज़ पढ़े और उसकी इशा की नमाज़ की पहली रकअत फ़ौत न हो, अल्लाह तआला इस अमल के बदले उसके लिए जहन्नुम से आज़ादी लिख देता है."
(सुनन इब्ने माजा 798)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " अगर लोग जान लें कि अज़ान देने और पहली सफ़ में नमाज़ पढ़ने का कितना सवाब है, फिर इसे हासिल करने के लिए क़िरआ अन्दाज़ी के सिवा कोई रास्ता न पायें, तो वो ज़रूर क़िरआ अन्दाज़ी करें."
(सही बुख़ारी 615)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स दो रकअत नमाज़ इस तरह अदा करे कि उनमें अपने दिल को दुनियावी ख़्यालात की तरफ मुतावज्जा न होने दे तो अल्लाह तआला उसके उसके पिछ्ते गुनाह बख़्श देता है."
(सही बुख़ारी 159)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स अच्छी तरह ग़ुस्ल करता है, जैसा कि उसे हुक्म दिया गया है. फिर वह अपने घर से निकलता है, यहाँ तक कि जुमे में आता है. और ख़ुत्बे के दौरान ख़ामोश रहता है, यहाँ तक कि वह अपनी नमाज़ ख़त्म कर ले, तो यह उसके उन गुनाहों का कफ़्फ़ारा होगा, जो उससे पहले के जुमे से इस जुमे तक हुए हैं."
(सुनन नसई 1404)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स पाबन्दी से नमाज़ पढ़ेगा, वह नमाज़ क़यामत के दिन उसके लिए नूर, दलील और निजात का सबब बनेगी."
(मुसनद अहमद 6576)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "बेशक मुसलमान बन्दा जब अल्लाह तआला की रज़ा के लिए नमाज़ अदा करता है, तो उसके गुनाह इस तरह झड़ जाते हैं जैसे दरख़्त के पत्ते झड़ते हैं."
(मिश्कात-उल-मसाबीह 576)
फ़ज्र
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की दो रकअतें (सुन्नत) दुनिया और जो कुछ दुनिया में हैं, उस सबसे बेहतर हैं."
(सही मुस्लिम 725)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ उस वक़्त पढ़ो, जब सुबह अच्छी तरह वाज़ेह हो जाए. क्योंकि इसमें ज़्यादा अज्र है."
(सुनन इब्ने माजा 672)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "फ़ज्र की नमाज़ बाजमात अदा करना सारी रात क़याम करने से अफ़ज़ल है."
(सही मुस्लिम 1491)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो शख़्स ठंडी नमाज़ें (फ़ज्र और अस्र) पढ़ेगा, वह जन्नत में दाख़िल होगा."
(मिश्कात-उल-मसाबीह 625)
ज़ुहर
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अगर किसी को मालूम हो जाए कि ज़ुहर अव्वल वक़्त पढ़ने का कितना सवाब है, तो वह उसकी तरफ़ एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिश करेंगे."
(सुनन निसाई 673)
अस्र
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "अस्र की नमाज़ तुमसे पहले लोगों पर पेश की गई थी, मगर उन्होंने इसे ज़ाया कर दिया, फिर जो शख़्स इसकी हिफ़ाज़त करेगा, उसे दोगुना अज्र मिलेगा."
(सही मुस्लिम 820)
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