रमज़ान और ग़रीबों का हक़

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रमज़ान आ रहा है... जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े दस्तरख़्वान लगते हैं... इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो ग़रीब हैं, वो इन नेअमतों से महरूम रह जाते हैं...
हमें चाहिए कि हम अपने उन रिश्तेदारों और पड़ौसियों के घर भी इफ़्तार और सहरी के लिए कुछ चीज़ें भेजें, जिनके दस्तरख़्वान कुशादा नहीं होते...
ये हमारे हुज़ूर हज़रत मुहम्‍मद सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम का फ़रमान है...
आप (सल्‍लललाहू अलैहिवसल्‍लम) फ़रमाते हैं- रमज़ान सब्र का महीना है यानी रोज़ा रखने में कुछ तकलीफ़ हो, तो इस बर्दाश्‍त करें. फिर आपने कहा कि रमज़ान ग़म बांटने का महीना है यानी ग़रीबों के साथ अच्‍छा बर्ताव किया जाए. अगर दस चीज़ें अपने रोज़ा इफ़्तार के लिए लाए हैं, तो दो-चार चीज़ें ग़रीबों के लिए भी लाएं...
यानी अपने इफ़्तार और सहरी के खाने में ग़रीबों का भी ख़्याल रखें... अगर आपका पड़ौसी ग़रीब है, तो उसका ख़ासतौर पर ख़्याल रखें कि कहीं ऐसा न हो कि हम तो ख़ूब पेट भर कर खा रहे हैं और हमारा पड़ौसी थोड़ा खाकर सो रहा है...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर गूगल से साभार

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अल्लाह के क़रीब

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एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ?

अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! आख़िरी वक़्त में एक उम्मत आएगी, वह उम्मत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहिवसल्लम की उम्मत होगी. उस उम्मत को एक महीना ऐसा मिलेगा, जिसमें लोग सूखे होंठ, प्यासी ज़ुबान, सूखी आंख़ें, भूखे पेट, इफ़्तार करने बैठेंगे, तब मैं उनके बहुत क़रीब रहूंगा. 

मूसा हमारे और तुम्हारे बीच में 70 पर्दों का फ़ासला है, लेकिन इफ़्तार के वक़्त उस उम्मती और मेरे बीच में एक पर्दे का भी फ़ासला नहीं होगा और वो जो दुआ मागेंगे, उनकी दुआ क़ुबूल करना मेरी ज़िम्मेदारी है.

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कटा फटा दरूद मत पढ़ो

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डॉ. बहार चिश्ती नियामतपुरी  
रसूले-करीमص अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेरे पास कटा फटा दरूद मत भेजो।
इस हदीसे-मुबारक का मतलब कि तुम कटा फटा यानी कटा उसे कहते हैं, जिसमें रसूले करीम की आल यानी अहले बैत शामिल न हों, तो वह कटा फटा दरूद है। 
फटा दरूद का मतलब है कि जिसमें आल की आल यानी अहले बैत की औलादे-इमामीन न शामिल हों तो यह फटा दरूद है। 
अब दरूद पढ़ने में यह तरीक़ा अपनायें, बाद में  आप दरूद शरीफ़ में "व आलिही" लफ़्ज़ ज़रूर शामिल करें। ज़हनी तौर से आले रसूल की औलाद भी हज़रते मेहदी अलैहिस्सलाम तक शामिल रहें। तब आपका मुकम्मल दरूद शरीफ़ का पढ़ना ही पढ़ना होगा।

प्रैक्टिकल और थ्योरिकल दरूद का पढ़ना
प्रैक्टिकल और थ्योरिकल दरूद पढ़ने का मतलब है कि दरूद पाक का पढ़ना और अमल करना दोनों ही शामिल हैं, जैसे क़ुरआन पाक की तिलावत करना और उस पर अमल करना। दोनों ही काम अलग हैं, क़ुरआन पाक और दरूद शरीफ़ की रोज़ाना तिलावत तो करते हो और अमल नहीं करते हो, तो क़ुरआन पाक की उस तिलावत का क्या फ़ायदा है। 
जैसे आप पढ़ रहे हैं "इन्नल्लाह मा अस्साबिरीन।" हम जब इस आयत को पढ़ रहे हैं और सब्र बिलकुल नहीं  कर रहे हैं, तो पढ़ने से कुछ हासिल नहीं है। जिस तरह पानी-पानी कहने से प्यास नहीं बुझती है, जब तक पानी पिएंगे नहीं।
ठीक इसी तरह से हम दरूद शरीफ़ तो पढ़ते हैं, मगर अहले बैत को नहीं मानते हैं या अहले के मक़ाबिल दीगर शख़्सियात को पेश करते हो। और हाँ दरूद शरीफ़ भले ही न पढ़ो, मगर अहले बैते अतहार से मुहब्बत करो जैसा कि हक़ और हुक्मे-ख़ुदा है, तो आपने प्रैक्टिकल ही कर के थ्योरी भी कर ली, मगर थ्योरी पढ़ने से प्रैक्टिकल नहीं कर पाओगे।

अहले बैत से पीराने तरीक़त तक
अहले बैत से पीराने तरीक़त तक का मतलब यह है कि हर सिलसिला रूहानी चिश्ती, क़ादरी. सुहरवर्दी और नक़्शबंदी अल्लाह के हबीब और आपकी औलाद के इमामीन से जुड़ा हुआ है, यानी आपके अहले बैत से जुड़ा हुआ है। अब आप अगर किसी भी मुरशिद (इमाम) से रूहानी फ़ायदा पाते हैं, यानी मुरीद होते हैं तो औलादे रसूल की ग़ुलामी में आ जाते हैं। तो अब आप मुरशिदाने-हक़ (इमामीन) से मुहब्बत और हुस्ने-सुलूक करते हो, तो यह अमल अहले बैत तक पहुंचाता है, मगर इस शर्त के साथ के पंजतन पाक की मुहब्बत हमारे लिये मुवद्दत की सूरत में ही होनी चाहिए। लिहाज़ा आप अगर रसूले करीम से मुहब्बत तो करते हो मगर फूल, फल, पत्ती और शाख़ से मुहब्बत नहीं करते हैं, तो तुम्हें यह लाज़मी है कि उस दरख़्त से बे पनाह मुहब्बत के साथ अहले बैत से भी वैसी ही मुहब्बत होनी चाहिए, जैसी रसूले करीम से करते हो, तो आपका दरूद पाक पढ़ना कामियाब है, वरना नहीं। अहले बैत को मानना और मुहब्बत करना वसीले (निस्बत) के ज़रिये पंजतन पाक और अल्लाह तक पहुंचता है। इसके अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं है, जो अहले बैत की मुहब्बत और "अलीयुन वलीउल्लाह" की गवाही का गवाह बन सके।

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सलातुल तस्बीह

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*सलातुल तस्बीह*
सलातुल तस्बीह की नमाज़ की बहुत फ़ज़ीलतें हैं. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो इस नमाज़ को क़ायम करेगा, तो उसके अगले पिछले तमाम गुनाह मुआफ़ कर दिए जाएंगे. हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि अगर हो सके, तो इस नमाज़ को रोज़ाना एक बार पढ़ा करो. अगर रोज़ाना न पढ़ सको, तो हफ़्ते में एक बार पढ़ लिया करो. और अगर हफ़्ते में भी नहीं पढ़ सकते, तो महीने में एक बार पढ़ लिया करो. और अगर महीने में भी न पढ़ सकते, तो साल में एक बार पढ़ लिया करो. और अगर साल में भी नहीं पढ़ सकते, तो कम से कम उम्र में एक बार तो ज़रूर ही पढ़ लिया करो.
 
*सलातुल तस्बीह की नमाज़ का तरीक़ा*
सबसे पहले चार रकत नमाज़ की नियत बांधकर सना पढ़ें और फिर उसके बाद 15 बार ये दुआ पढ़ें-
* सुब्हानल्लाहि वल हम्दु लिल्लाहि वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर *
 
फिर अऊज़ु बिल्लाह और बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा और सूरत पढ़कर 10 बार दुआ पढ़ें.
उसके बाद रुकू करें और रुकू में 10 बार दुआ पढ़ें.
फिर रुकू से खड़े होकर 10 बार दुआ पढ़ें.
उसके बाद सजदा करें और सजदे में 10 बार दुआ पढ़ें
फिर सजदे से उठकर 10 बार दुआ पढ़ें.
फिर दूसरे सजदे में भी 10 बार दुआ पढ़ें
   
इस तरह एक रकअत पूरी हो गई और एक रकअत में 75 मर्तबा दुआ हो गई.
 
फिर दूसरी रकअत के लिए खड़े होकर 15 बार दुआ पढ़ें.
उसके बाद रुकू करें और रुकू में 10 बार दुआ पढ़ें.
फिर रुकू से खड़े होकर 10 बार दुआ पढ़ें.
उसके बाद सजदा करें और सजदे में 10 बार दुआ पढ़ें
फिर सजदे से उठकर 10 बार दुआ पढ़ें.
फिर दूसरे सजदे में भी 10 बार दुआ पढ़ें

इसके बाद बैठ जाएं और अत्तहिय्यात पढ़कर खड़े हो जाएं और बाक़ी तीसरी और चौथी रकअत इसी तरह पूरी करें. इस तरह चार रकअत में 300 मर्तबा दुआ हो गई.



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शैतान घर में कहां रहते हैं

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घर में सिर्फ़ इंसान ही नहीं रहते, बल्कि अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ भी रहती है. इनमें शैतान भी शामिल हैं. घर में तीन जगहें ऐसी हैं, जहां शैतान रहते हैं.  

पहला बिस्तर 
वह बिस्तर जिस पर कोई नहीं सोता. मिसाल के तौर पर मेहमानों का कमरा, जिसमें बिस्तर हो और लम्बे अरसे से उस पर कोई सोया और उसे वैसे ही बिछा छोड़ दिया गया हो. 
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"فِراشٌ للرجلِ، وَ فراشٌ لأهلِه، وَ الثالِثُ للضيفِ، وَ الرابِعُ للشيطانِ"

यानी एक बिस्तर आदमी के लिए है, एक उसके घरवालों के लिए, तीसरा मेहमान के लिए और चौथा शैतान के लिए है. (मुस्लिम)
इसलिए ऐसे बिस्तर को समेट देना चाहिए, ताकि शैतान उसका इस्तेमाल न कर सके. 

दूसरा बैतुल-ख़ला
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"إن هذه الحشوش محتضرة فإذا أتاها أحدكم فليقل : بسم الله أعوذ بالله من الخبث و الخبائث"
यानी ये बैतुल-ख़ला (जिन्नों की) मौजूदगी की जगहें हैं, इसलिए जब तुम में से कोई वहां दाख़िल हो तो कहे:
बिस्मिल्लाह, अऊज़ु बिल्लाहि मिनल ख़ुब्सि वल ख़बाइस. (मुस्लिम)

बेहतर है कि वहां सिर्फ़ ज़रूरत के वक़्त ही बात करने की जाए.

तीसरा लटके कपड़े 
वे कपड़े जो लम्बे वक़्त तक खुले में लटके रहें, न पहने जाएं और न साफ़ किए जाएं.
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"أُطووا ثيابكم فإن الشيطان يسكن كل ثياب منشورة"
यानी अपने कपड़ों को तह करके रखो, क्योंकि शैतान हर खुले (फैले हुए) कपड़े में रहने लगता है.
(इस हदीस को शेख़ अल्बानी रहमतुल्लाह अलैह  ने हसन क़रार दिया है)

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22 रजब कूंडों की नियाज़

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अलहम्दुलिल्लाह 
22 रजब कूंडों की नियाज़  
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम पर लाखों सलाम

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या हुसैन

या हुसैन

بسم الله الرحمن الرحيم

بسم الله الرحمن الرحيم

Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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  • उमरपुरा के सिख भाइयों ने बनवाई मस्जिद - *डॉ. फ़िरदौस ख़ान * हमारे प्यारे हिन्दुस्तान की सौंधी मिट्टी में आज भी मुहब्बत की महक बरक़रार है. इसलिए यहां के बाशिन्दे वक़्त-दर-वक़्त इंसानियत, प्रेम और भाई...
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