अक़ीदत के फूल...

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अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...
अक़ीदत के फूल...
मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम
प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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और क़ब्र तंग होती गई

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फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

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शुगर का देसी इलाज...

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गिलोय की बेल के पत्ते खाने से शुगर का स्तर कम हो जाता है... हमारी एक हमसाई की शुगर का स्तर हमेशा 250 से ज़्यादा रहता था... वो हमारे घर से हर रोज़ गिलोय के पत्ते ले जाया करती थीं... उन्होंने लगातार तीन माह निहार मुंह गिलोय का पत्ता चबाकर पानी पी लिया... अब उनकी शुगर नियंत्रित हो गई... शुगर के अलावा बुख़ार, हड्डियों के दर्द, कैंसर, पेट और आंखों आदि की बीमारी में गिलोय बेहद फ़ायदेमंद है...

हमारे घर गिलोय की बहुत-सी बेलें हैं... बहुत लोग इसके पत्ते ले जाते हैं... गिलोय की बेल तक़रीबन हर जगह पाई जाती है... एक बार लगाने पर ये कई साल तक पत्तों से भरी रहती है... गिलोय की बेल किसी भी नर्सरी में मिल सकती है... पार्क में भी मिल सकती है... सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर भी ये बेल ख़ूब देखी जा सकती है... हो सके, तो इसे अपने घर में ज़रूर लगाएं... इसे गमले में भी उगाया जा सकता है...

गिलोय का वैज्ञानिक नाम तिनोस्पोरा कार्डीफ़ोलिया है... इसे मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुंडलिनी गुडूची भी कहा जाता है... फ़ारसी में इसे गिलाई कहते हैं... अंग्रेज़ी में गुलंच, मराठी में गुलबेल, कन्नड़ में अमरदवल्ली, तेलगू में गोधुची, तमिल में शिन्दिल्कोदी और गुजराती में गालो में आदि नामों से जाना जाता है... गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल और बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाए जाते है... मान्यता है कि देव और दानवों के युद्ध के दौरान जहां-जहां अमृत कलश की बूंदे गिरीं, वहां-वहां गिलोय की बेल उग आई...
-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत सरमद रहमतुल्लाह अलैहि

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फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों के क़रीब हज़रत साहब का मज़ार है... हम अकसर वहां जाते हैं... बहुत सुकून मिलता है... वहां से उठने को दिल नहीं करता...
फ़िलिस्तीन में जन्मे हज़रत सरमद, हज़रत अबुल क़ासिम उर्फ़ हरे-भरे सब्ज़वारी के मुरीद हैं... हज़रत सरमद से वाबस्ता एक वाक़िया पेश कर रहे हैं...
एक रात बादशाह औरंगज़ेब ने ख़्वाब में देखा कि जन्नत में एक बहुत ही ख़ूबसूरत और आलीशान महल है, जिस पर लिखा है- "शहज़ादी ज़ैबुन्निसा का ख़रीदा हुआ महल."
औरंगज़ेब उसमें जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन महल के पहरेदार उन्हें महल के अंदर नहीं जाने देते. अगली सुबह बादशाह ने अपनी 12 साल की बेटी ज़ैबुन्निसा से पूछा कि जन्नत का महल क्या है? इस पर बेटी ने जवाब दिया कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों के पास हज़रत सरमद एक मिट्टी का घरौंदा बनाकर बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा, "मैं जन्नत का महल बनाता हूं."   मैंने एक हुक़्क़ा तम्बाक़ू के बदले उस महल को ख़रीद लिया. ये बात सुनकर बादशाह बेचैन हो गए. अगले जुमे को वे जामा मस्जिद गए और हज़रत सरमद से पूछा, "जन्नत का एक महल हमें भी ख़रीदना है." हज़रत सरमद ने जवाब दिया, ख़रीद-फ़रोख़्त हर रोज़ नहीं होती."

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एक मुख़्तसर और पुरअसरार क़िस्सा...

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एक नेक और मालदार शख़्स ने अपना क़िस्सा लिखा है कि एक दिन मेरा दिल बहुत बैचैन हुआ. हर चंद कोशिश की कि दिल बहल जाए, परेशानी का बोझ उतरे और बेचैनी कम हो. मगर वह बढती ही गई. बिला आख़िर तंग आकर बाहर निकल गया और बेमक़सद इधर-उधर घूमने लगा. इसी दौरान एक मस्जिद के पास से गुज़रा, तो देखा कि दरवाज़ा खुला है. फ़र्ज़ नमाज़ों में से किसी का वक़्त नहीं था. मैं बेसाख़्ता मस्जिद में दाख़िल हुआ कि वज़ू करके दो चार रकअत नमाज़ अदा करता हूं, मुमकिन है दिल को राहत मिले. वज़ू के बाद मस्जिद में दाख़िल हुआ, तो एक साहब को देखा, ख़ूब रो-रोकर गिड़गिड़ाकर दुआ मांग रहे हैं और काफ़ी बेक़रार हैं. ग़ौर से इनकी दुआ सुनी तो क़र्ज़ा उतारने की फ़रियाद में थे. उनको सलाम किया, मुसाफ़ा हुआ, क़र्ज़े का पूछा बताने लगे कि आज अदा करने की आख़िरी तारीख़ है. अपने मालिक से मांग रहा हूं. उनका क़र्ज़ा चंद हज़ार रुपये का था. वो मैंने जेब से निकाल कर दे दिए. उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और मेरे दिल की बेचैनी सुकून में बदल गई. मैंने अपना विज़िटिंग कार्ड निकालकर पेश किया कि आइंदा जब ज़रूरत हो, मुझे फ़ोन कर लें. ये मेरा पता है और ये मेरा फ़ोन नम्बर है. उन्होंने बग़ैर देखे कार्ड को वापस कर दिया और फ़रमाया, "न जनाब ये नहीं. मेरे पास उनका पता मौजूद है, जिन्होंने आज आपको भेजा है.  मैं किसी का पता जेब में रखकर उनको नाराज़ नहीं कर सकता."
अनुवाद : रियाज़ अहमद



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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें हैं.
पहली शर्त
वे बहीमतुल अनआम (चौपायों) में से हों,  और वे ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है- "और हर उम्मत के लिए हमने क़ुर्बानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर किया है, ताकि वे उन बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों) पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है." (सूरतुल हज्ज : 34)
बहीमतुल अनआम (पशु) से मुराद ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं. अरब के बीच यही जाना जाता है, इसे हसन, क़तादा, और कई लोगों ने कहा है.

दूसरी शर्त
वे जानवर शरीअत में निर्धारित आयु को पहुंच गए हों. इस प्रकार कि भेड़ जज़आ हो, या दूसरे जानवर सनिय्या हों, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है- "तुम मुसिन्ना जानवर ही क़ुर्बानी करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे लिए कठिनाई हो, तो भेड़ का जज़आ़ क़ुर्बानी करो." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है.)

मुसिन्ना : सनिय्या या उस से बड़ी आयु के जानवर को कहते हैं, और जज़आ उससे कम आयु के जानवर को कहते हैं.
ऊंट में से सनिय्या : वह जानवर है जिस के पांच साल पूरे हो गए हों.
गाय में से सनिय्या : वह जानवर है जिसके दो साल पूरे हो गए हों.
बकरी में से सनिय्या : वह जानवर है जिसका एक साल पूरा हो गया हो.
और जज़आ : उस जानवर को कहत हैं, जो छह महीने का हो.

अत: ऊंट, गाय और बकरी में से सनिय्या से कम आयु के जानवर की क़ुर्बानी करना शुद्ध नहीं है, भेड़ में से जज़आ से कम आयु की कु़र्बानी नहीं है.

तीसरी शर्त
वे जानवर उन दोषों (ऐबों और कमियों) से मुक्त (ख़ाली) होने चाहिए, जिनके होते हुए वे जानवर क़ुर्बानी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, औ वे चार दोष हैं-
1. स्पष्ट कानापन : और वह ऐसा जानवर है जिसकी आंख धंस गई (अंधी हो गई) हो, या इस तरह बाहर निकली हुई हो कि वह बटन की तरह लगती हो, या इस प्रकार सफ़ेद हो गई हो कि साफ़ तौर पर उसके कानेपन का पता देती हो.
2. स्पष्ट बीमारी : ऐसी बीमारी जिसकी निशानियांपशु पर स्पष्ट हों जैसे कि ऐसा बुख़ार जो उसे चरने से रोक दे और उसकी भूख को मार दे, और प्रत्यक्ष खुजली जो उसके गोश्त को ख़राब कर दे या उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर दे,  और गहरा घाव जिस से उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए, इत्यादि.
3. स्पष्ट लंगड़ापन : जो पशु को दूसरे दोषरहित पशुओं के साथ चलने से रोक दे.
4. ऐसा लंगड़ापन जो गूदा को समाप्त करन वाला हो, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि क़ुर्बानी के जानवरों में किस चीज़ से बचा जाए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से संकेत करते हुए फ़रमाया : "चार : लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन स्पष्ट हो, काना जानवर जिसका कानापन स्पष्ट हो, रोगी जानवर जिसका रोग स्पष्ट हो, तथा लागर जानवर जिस की हड्डी में गूदा न हो. इसे इमाम मालिक ने मुवत्ता में बरा बिन आज़िब की हदीस से रिवायत किया है, और सुनन की एक रिवायत में बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि उन्होंने कहा- अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीच खड़े हुए और फ़रमाया- "चार चीज़ें (दोष और ख़ामियां) क़ुर्बानी के जानवर में जाइज़ नहीं हैं." और आप ने पहली हदीस के समान ही उल्लेख किया. इसे अल्बानी ने इर्रवाउल गलील (1148) में सही कहा है.

ये चार दोष और ख़ामियां क़ुर्बानी के जानवर के पर्याप्त होने में रुकावट हैं (अर्थात् इनमें से किसी भी दोष से पीड़ित जानवर की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है), इसी तरह जिन जानवरों में इन्हीं के समान या इन से गंभीर दोष और ख़ामियां होंगी उन पर भी यही हुक्म लागू होगा, इस आधार पर निम्नलिखित जानवरों की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है-
1. वह जानवर जो दोनों आंख का अंधा हो.
2. वह जानवर जिसका पेट अपनी क्षमता से अधिक खाने के कारण फूल गया हो, यहां तक कि वह पाखाना कर दे, और ख़तरे से बाहर हो जाए.
3. वह जानवर जो जने जाने के समय कठिनाई से पीड़ित हो जाए, यहां तक कि उस से ख़तरा टल जाए.
4. ऊंचे स्थान से गिरने या गला घुटने आदि के कारण मौत के ख़तरे का शिकार जानवर यहां तक कि वह ख़तरे से बाहर हो जाए.
5. किसी बीमारी या दोष के कारण चलने में असमर्थ जानवर.
6. जिस जानवर का एक हाथ या एक पैर कटा हुआ हो.

जब इन दोषों और ख़ामियों को उपर्युक्त चार नामज़द (मनसूस) ख़ामियों के साथ मिलाया जाए, तो उन ख़ामियों (ऐबों) की संख्या जिनके कारण क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है, दस हो जाती है. ये छह ख़ामियां और जो पिछली चार ख़ामियों से पीड़ित हो.

चौथी शर्त
वह जानवर क़ुर्बानी करने वाले की मिल्कियत (संपत्ति) हो, या शरीअत की तरफ़ से या मालिक की तरफ़ से उसे उस जानवर के बारे में अनुमति प्राप्त हो. अत: ऐसे जानवर की क़ुर्बानी शुद्ध नहीं है जिसका आदमी मालिक न हो जैसे कि हड़प किया हुआ, या चोरी किया हुआ, या झूठे दावा द्वारा प्राप्त किया गया जानवर इत्यादि, क्योंकि अल्लाह तआला की अवज्ञा के द्वारा उस का सामीप्य और नज़दीकी प्राप्त करना उचित नहीं है.
तथा अनाथ के संरक्षक (सरपरस्त) के लिए उसके धन से उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी करना वैध है. अगर उसकी परम्परा है और क़ुर्बानी न होने के कारण उसके दिल के टूटने का भय है.
तथा वकील (प्रतिनिधि) का अपने मुविक्कल के माल से उसकी अनुमति से क़ुर्बानी करना उचित है.

पांचवीं शर्त
उस जानवर के साथ किसी दूसरे का हक़ (अधिकार) संबंधित न हो, चुनांचे उस जानवर की क़ुर्बानी मान्य नहीं है, जो किसी दूसरे की गिरवी हो.

छठी शर्त
शरीअत में क़ुर्बानी का जो सीमित समय निर्धारित है उसी में उसकी क़ुर्बानी करे, और वह समय क़ुर्बानी (10 ज़ुलहिज्जा) के दिन ईद की नामज़ के बाद से अय्यामे तश्रीक़ अर्थात् 13वीं ज़ुलहिज्जा के दिन सूर्यास्त तक है. इस तरह बलिदान के दिन चार हैं- नमाज़ के बाद से ईद का दिन, और उस के बीद अतिरिक्त तीन दिन. जिसने ईद की नमाज़ से फ़ारिग़ होने से पहले, या तेरहवीं ज़ुलहिज्जा को सूरज डूबने के बाद क़ुर्बानी की, तो उसकी क़ुर्बानी शुद्ध और मान्य नहीं है , क्योंकि इमाम बुख़ारी ने बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "जिसने ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी की, तो उसने अपने घर वालों के लिए गोश्त तैयार किया है, और उस का धार्मिक परंपरा से (क़ुर्बानी की इबादत) से कोई संबंध नहीं है." तथा जुनदुब बिन सुफ़यान अल-बजली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा- "मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास उपस्थित था, जब आप ने फ़रमाया- "जिसने -ईद की- नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुर्बानी कर दी, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुर्बानी करे." तथा नुबैशा अल-हुज़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "तश्रीक़ के दिन खाने, पीने और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को याद करने के दिन हैं." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है)

किन्तु यदि किसी कारणवश तश्रीक़ के दिन (13 ज़ुलहिज्जा) से विलंब हो जाए, उदाहरण के तौर पर बिना उसकी कोताही के क़ुर्बानी का जानवर भाग जाए और समय बीत जाने के बाद ही मिले, या किसी को क़ुर्बानी करने के लिए वकील (प्रतिनिधि) बना दे और वकील भूल जाए यहां तक कि क़ुर्बानी का समय निकल जाए, तो उज़्र के कारण समय निकलने के बाद क़ुर्बानी करने में कोई बात नहीं है, तथा उस आदमी पर क़ियास करते हुए जो नमाज़ से सो जाए या उसे भूल जाए, तो वह सोकर उठने या उसके याद आने पर नमाज़ पढ़ेगा.

निर्धारित समय के अंदर दिन और रात में किसी भी समय क़ुर्बानी करना जाइज़ है, जबकि दिन में क़ुर्बानी करना श्रेष्ठ है, तथा ईद के दिन दोनों ख़ुत्बों के बाद क़ुर्बानी करना अफज़ल हैं, तथा हर दिन उसके बाद वाले दिन से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भलाई की तरफ़ पहल और जल्दी करना पाया जाता है.

साभार islamqa



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महबूब

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मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहता हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहता हूं…
-फ़िरदौस ख़ान

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सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

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दस बीबियों की कहानी

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
कहते हैं, ये एक मौजज़ा है कि कोई कैसी ही तकलीफ़ में हो, तो नीयत करे कि मेरी मुश्किल ख़त्म होने पर दस बीबियों की कहानी सुनूंगी, तो इंशा अल्लाह मुसीबत से निजात मिलेगी और हाजत पूरी होगी.

मुश्किलों को दूर करो सुन कर कहानी सैयदा
बीबियों मांगो दुआ देकर सदा-ए-सैयदा
आफ़तें टल जाएंगी नाम से उन बीबियों के
लम्हा-लम्हा देखेंगी आप मौजज़ा सैयदा

दस बीबियों की कहानी
एक शहर में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई बहुत अमीर था और छोटा भाई बहुत नादार व मुफ़लिस था. वह अपनी मुफ़लिसी और नादारी से बहुत आज़िज़ आ गया था. वह अपनी बीवी से कहने लगा, यहां कब तक फ़िक्र व फ़ाक़ा की मुसीबत सहें. अब मैं परदेस जाता हूं. शायद मुझको कहीं नौकरी मिल जाए और ये मुसीबत के दिन कट जाएं.

यह कहकर वह शख़्स अपनी बीवी से रुख़्सत होकर रोज़गार की तलाश में परदेस चला गया. अब यहां उसकी बीवी बहुत परेशान थी. दिल में कहने लगी, ऐ पालने वाले ! तू ही रज़्ज़ाक़ है. अब मेरा शौहर भी चला गया. अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा, सिवाय तेरी ज़ात पाक के. ये मोमिना जब बहुत मजबूर हो गई, तो अपने शौहर के बड़े भाई के घर गई और अपने सब हालात बयान किए. तमाम हाल सुनकर उस शख़्स ने अपनी बीवी से कहा, ये मेरी भावज आई है. तुम इससे घर का काम कराओ. ये तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की ख़िदमत करेगी. तुम जो कुछ अपने खाने से बचे, इसे दे दिया करो. ग़र्ज़ कि ये मोमिना अपने शौहर के भाई के घर के तमाम काम करती. सारा दिन बच्चों की ख़िदमत करती. उस पर भी अमीर की बीवी उसे ताने देती और अपने आगे का बचा हुआ खाना उस ग़रीब को देती. इसी तरह एक मुद्दत गु़ज़र गई. हर रात ये मुसीबतज़द मोमिना अपने शौहर की वापसी की दुआ मांगती थी. इसी हालत में एक शब ये मोमिना रोते-रोते सो गई. उसने ख़्वाब में देखा कि एक बीबी नक़ाब पोश तशरीफ़ लाईं और फ़रमाया कि ऐ मोमिना तू अपने शौहर के लिए इस तरह परेशान न हो. इंशा अल्लाह तेरा शौहर सही सलामत तुझसे आकर मिलेगा. तू जुमेरात के दिन दस बीबियों की कहानी सुन, और जब तेरा शौहर आ जाए, तो मीठी रोटी का मलीदा बनाकर उसके दस लड्डू बनाना और उस पर दस बीबियो की नियाज़ देना.
इस औरत ने सवाल किया कि आप कौन हैं और आपका नाम क्या है और इन दस बीबियों के नाम क्या हैं, जिनकी नियाज़ दिलाऊं.

तब जनाब सैयदा ने फ़रमाया, मेरा नाम सैयदा ताहिरा फ़ातिमा ज़ोहरा दुख़्तर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है और नौ बीबियों के नाम हैं-
हज़रत मरियम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सायरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत आसिया (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत हाजरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत ज़ैनब (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा सोग़रा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा कूबरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सकीना (रज़ि अल्लाहु अन्हा). इन्हें ज़िन्दगी बहुत मुसीबतें सहनी पड़ीं और इन बीबियों ने सब्र किया. जो शख़्स इनकी तुफ़ैल में अल्लाह से जो भी हाजत तलब करेगा, ख़ुदावंद आलम उसकी हाजत पूरी करेगा.

कहानी यह है. एक दिन जनाब अमीरुल मोमेनीन ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना मेहमान किया. उस दिन घर में फ़ाक़ा था. आप थोड़ा-सा जौ का आटा कहीं से क़र्ज़ लाए और जनाब सैयदा को देकर कहा कि आज रसूले-ख़ुदा मेरे मेहमान हैं. जनाब सैयदा ने उसकी छह रोटियां पकाईं. मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तशरीफ़ लाए और दस्तरख़्वान पर बैठे. जनाब सैयदा ने एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को दी और पांच पंजतन पाक ने खाईं. जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो जनाब सैयदा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से अर्ज़ किया कि मुझे भी सरफ़राज़ फ़रमाएं. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली. इसी तरह नवासों हज़रत इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने भी अपने नाना हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दावत दी. शेरे-ख़ुदा हज़रत अली हर रोज़ सामान क़र्ज़ पर लाते. जनाब सैयदा अनाज पीसतीं और उसकी छह रोटियां पकातीं. एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को देतीं और पांच रोटियां पंजतन पाक नोश फ़रमाते.

हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की दावत के बाद जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि हज़रत फ़ज़ा दरवाज़े पर खड़ी हैं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दरयाफ़्त किया कि फ़ज़ा कुछ कहना चाहती हो. इस पर हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि कनीज़ इस क़ाबिल नहीं कि आपको दावत दे, लेकिन मैं भी उम्मीदवार हूं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली.
अगले दिन शाम को मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जनाब सैयदा के घर तशरीफ़ लाए. सबने उठकर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इस्तक़बाल किया. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि आज फ़ज़ा का मेहमान हूं.
हज़रत फ़ज़ा ने किसी से इसका ज़िक्र नहीं किया था. घर में फ़ाक़ा था. हज़रत अली ने कहा कि पहले से कह देतीं, तो सामान मुहैया करा देता. हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि आप परेशान न हों, अल्लाह मुसब्बेबल असबाब है. हज़रत फ़ज़ा एक गोशे में गईं और सजदे में गिर गईं. वह अल्लाह से दुआ करने लगीं, या क़ाज़ी अलहाजात, इस तंग दस्ती और नादारी में तू आलम दाना है. तेरे महबूब को मेहमान किया है. तुझे वास्ता आल मुहम्मद का मुझे शर्मिन्दा न करना. उन्होंने सजदे से सर उठाया, तो क्या देखती हैं कि जन्नत की हूरें खानों का तबाक़ लिए खड़ी हैं. हज़रत फ़ज़ा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने खाने का तबाक़ रखा और सबने मिलकर खाना खाया. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि ये खाना कहां से आया. गोया आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पहले से ही जानते थे. हज़रत जिब्राईल रास्ते में ही आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बता गए थे. लेकिन आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ये ज़ाहिर करना था कि हमारे घर की कनीज़ें भी अल्लाह को ऐसी प्यारी हैं कि उनके सवाल को भी अल्लाह रद्द नहीं करता.
अल्लाह के खज़ाने में किसी चीज़ की कमी नहीं है. अल्लाह पर यक़ीन रखने से सबकुछ मिल जाता है.

जब मोमिना ख़्वाब से बेदार हुई, तो वह दिन जुमेरात का था. वह अपने मुहल्ले में गई और कहने लगी कि मैंने ऐसा ख़्वाब में देखा है. तुम लोग पास बैठकर जनाब सैयदा की कहानी सुन लिया करो. मुहल्ले की औरतें उसके पास आकर जमा हो गईं. उस मोमिना ने दस बीबियों की कहानी पढ़नी शुरू की. नौ दिन गुज़र गए. जब दसवां दिन आया, तो मोमिना क्या देखती है कि उसका शौहर सही सलामत माल व ज़र के साथ उसके दरवाज़े पर खड़ा है.

वह बहुत ख़ुश हुई और फ़ौरन ग़ुस्ल कर मीठी रोटी का मलीदा बनाया और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलवाई. उसने नियाज़ के लड्डू तक़सीम किए. सबने बड़े ऐहतराम से लड्डू लिए. उसके बाद मोमिना एक लड्डू लेकर अपने शौहर की भावज के पास गई. उस मग़रूर औरत ने ये कहकर लड्डू वापस कर दिया कि हम ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें नहीं खाते. हमारे घर से ये लड्डू ले जाओ. वह लड्डू वापस ले आई और लड्डू खाकर अल्लाह का शुक्र अदा किया.

अब इस मग़रूर औरत का हाल सुनिए. रात को वह औरत सो गई. सुबह को क्या देखती है कि उसके बच्चे मर गए और सब सामान ग़ायब हो गया. ये देखकर उसके हवास जाते रहे. दोनों मियां-बीवी रोने लगे. जब कई वक़्त गुज़र गए, तो भूख से उनका बुरा हाल हो गया. घर में गेहूं की भूसी मिली. उस औरत ने सोचा कि इसे पकाकर खा लें. जैसे ही उसने भूसी को हाथ लगाया, उसमें बराबर के कीड़े नज़र आने लगे. जब उसके शौहर ने ये माजरा देखा, तो कहने लगा कि मेरी बहन के घर चलो, वहां खाना मिल जाएगा. घर बंद करके दोनों मियां-बीवी पैदल ही चल पड़े. चलते-चलते उनके पैरों में छाले पड़ गए. रास्ते में उन्हें चने का हराभरा खेत नज़र आया. शौहर ने अपनी बीवी से कहा कि तुम यहां बैठ जाओ, मैं चने की कुछ बालियां तोड़ लाऊं, ताकि उनको खाकर ताक़त आ जाए. ये कहकर वह बहुत-सी चने की बालियां तोड़ लाया. मगर जैसे ही उसकी बीवी ने चने की बालियों को हाथ लगाया, वे सूखकर घास बन गईं. दोनों घास को फेंक कर आगे चल पड़े. कुछ दूर चलने के बाद उन्हें रास्ते में बहुत बड़ा गन्ने का खेत नज़र आया. मियां-बीवी दोनों ही भूख और प्यास से बेताब थे. गन्ने को देखकर वे बेक़रार हो गए. शौहर बहुत से गन्ने तोड़ लाया और बीवी के हाथ में दिए. बीवी का हाथ लगते ही गन्ने भी घास बन गए. वे दोनों बहुत घबरा गए और घास को फेंक कर आगे चल दिए.

कुछ वक़्त बाद ये शख़्स बीवी के साथ अपनी बहन के घर पहुंच गया. उसकी बहन ने उनके लिए बिछौना बिछाया. जब दोनों ने आराम कर लिया, तो उसकी बहन ने उन्हें लाकर खाना दिया. ये लोग कई दिन के भूखे थे. खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए. जैसे ही उसकी बीवी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा, तो क्या देखती है कि खाने में से सख़्त बदबू आ रही है. खाना सड़ गया है. ये दोनों अपना सर पकड़ कर बैठ गए और कहने लगे कि अल्लाह हम कब तक भूखे-प्यासे रहेंगे. भूख से जान निकले जा रही है. उन्होंने खाने को दफ़न कर दिया. रात जिस तरह गुज़री, उन्होंने गुज़ारी. सुबह हुई, तो शौहर ने कहा कि यहां का बादशाह मेरा दोस्त है. उसके पास चलें, देखें इस मुसीबत के आलम में वह हमारी क्या मदद करता है.

दोनों बादशाह के पास गए. जब वे बादशाह के हुज़ूर में पहुंचे, तो बादशाह ने उन्हें पहचान लिया. उन्हें अलग कमरा दिया गया. बादशाह ने उनसे कहा कि तुम दोनों ग़ुस्ल करके आराम करो. बादशाह ने हुक्म दिया कि हमारे मेहमानों को सात रंग का खाना भेजो. बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ उनके लिए सात रंग का खाना लाया गया. दोनों खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए और दस्तरख़्वान पर आकर बैठ गए. वह औरत जिस खाने को हाथ लगाती, वह खाना सड़ जाता. ग़र्ज़ कि तमाम खाना सड़ गया और उसमें कीड़े नज़र आने लगे. उसका शौहर हैरान हो गया कि ये क्या माजरा है. अगर हम बादशाह से शिकायत करेंगे, तो बादशाह नाराज़ होगा कि ताज़ा खाना भेजा और तुम हमको बदनाम करते हो. वह बहुत घबराया और बीवी से कहने लगा कि अब मैं क्या करूं. इतना बहुत सा खाना सड़ गया. बादशाह कहेगा कि इन लोगों ने जादू कर दिया है.

अलग़र्ज़ दोनों खाना लेकर बाहर आए और ज़मीन में दफ़न कर दिया. शौहर बहुत हैरान था कि ये सब क्या हो रहा है. औरत भी बहुत घबराई हुई थी. वह सेहन में आकर बैठ गई. उसने देखा कि बादशाह की लड़की ग़ुस्ल के लिए जा रही है. बादशाह की बीवी ने कहा कि वह भी ग़ुस्ल करेगी. ग़र्ज़ ये है कि दोनों ग़ुस्ल के लिए जाने लगीं. उन दोनों ने अपने चंदन हार उतार के खूंटी पर टांग दिए. ज्यूं ही उन्होंने हार टांगे, फ़ौरन खूंटी हार निग़ल गई. ये माजरा देखकर उन्हें बेहद हैरानी हुई. वह औरत घबरा कर अपने शौहर के पास आई और कहने लगी कि अब ख़ुदा ख़ैर करे. उसके शौहर ने पूछा कि क्या हुआ? तब उसने चंदन हार का सारा वाक़िया सुनाया और कहा कि अब यहां से चलो, कहीं बादशाह इस इल्ज़ाम में हमें जेल भेज दे या क़त्ल करा दे. दोनों मियां-बीवी बग़ैर इत्तला किए वहां से चल दिए. चलते-चलते वे एक दरिया के किनारे पहुंचे. दोनों वहां जाकर बैठ गए. शौहर बीवी से कहने लगा कि नहीं मालूम हमसे ऐसी क्या ख़ता हुई है, जो हम पर ऐसा अज़ाब नाज़िल हुआ है.
यह सुनकर बीवी कहने लगी कि जब तुम्हारा भाई मुलाज़िमत के लिए परदेस गया था और उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था. तब तुम्हारी भावज बहुत परेशान रहती थी. उस वक़्त उसने ख़्वाब में देखा था कि एक नक़ाब पोश बीबी तशरीफ़ लाई और उन्होंने फ़रमाया कि तू दस बीबियों की कहानी सुन ले, जब तेरा शौहर आ जाए, तो दस बीबियों की नियाज़ दिलाना. जब तुम्हारा भाई आ गया, तो तुम्हारी भावज ने मीठी रोटी का मलीदा उसके दस लड्डू बनाए और दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. तुम्हारी भावज ने नियाज़ के लड्डू सबको तक़सीम किए और एक लड्डू मेरे लिए भी लेकर आई. लेकिन मैंने वह लड्डू ये कहकर लेने से मना कर दिया कि मैं ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें खाने वाली नहीं हूं. इस पर तुम्हारी भावज लड्डू वापस ले गई. ये गुनाह मुझसे ज़रूर हुआ है और तब से ही यह मुसीबत हम पर नाज़िल हुई है.

शौहर ने कहा कि ऐ कमबख़्त ! तूने ऐसे ग़ुरूर और तकब्बुर के अल्फ़ाज़ कहे. तू जल्दी से तौबा कर और मुआफ़ी मांग, ताकि हमको इस मुसीबत से निजात मिल सके. उस औरत ने ग़ुस्ल किया, नमाज़ पढ़ी और रो-रोकर अपनी ग़लती की मुआफ़ी मांगी और दुआ की कि ऐ बिन्ते रसूल ! इस मुसीबत के आलम में मेरी मदद कीजिए. इसके बाद उसने नहर से रेत निकाली और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. अल्लाह के करम और पाक बीबियों की तुफ़ैल में वे लड्डू मोती चूर के हो गए. उन्होंने लड्डू खाए, पाने पिया और अल्लाह का शुक्र अदा किया.

शौहर ने कहा कि अब घर चलो, हमारी ख़ता मुआफ़ हो गई. अब वे घर आकर क्या देखते हैं कि घर असली हालत में है. ग़ल्ला वग़ैरह जिस तरह भरा हुआ, था वैसा ही भरा हुआ है. नौकर घर के काम में मशग़ूल हैं. बच्चे ज़िन्दा हो गए. वे क़ुरान की तिलावत कर रहे हैं. मां-बाप को देखकर बच्चे बहुत ख़ुश हुए.

ऐ मेरी पाक बीबियों ! जिस तरह आपने इस औरत की ख़ता मुआफ़ की, उसी तरह हम सबकी ख़तायें मुआफ़ हों और दिल की मुरादें पूरी हों.
आमीन
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बाज़ार में मिलने वाली दस बीबियों की कहानी की किताबों में बहुत सी ग़लतियां हैं. इसलिए हमने  इसे दुरुस्त करके यहां पेश किया है.
-फ़िरदौस ख़ान

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पढ़ें, अमल करें और सवाब हासिल करें

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क़यमात के रोज़ इंसान एक-एक नेकी के लिए तरसेगा... उस वक़्त हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र होगी... कोई किसी को मांगने पर भी नेकी न देगा... इसलिए बेहतर यही है कि इंसान अपने आमाल से नेकियां हासिल करे, जो उसकी मग़फ़िरत का ज़रिया बन सकें...
पेश हैं कुछ तस्बीह, जिन्हें पढ़कर आप सवाब हासिल कर सकते हैं.

1. सवाल : क्या आज आप ने जन्नत में एक महल बनाया?
जवाब: दस बार सूरह इख़लास पढ़कर [अहमद]

2. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में खजूर के 100 दरख़्त लगाए ?
जवाब:  100 बार सुब्हानल्लाहिल-अज़ीम वबिहम्दिही पढ़कर. [तिर्मिजी]

3. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में 400 दरख़्त लगाए ?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर, पढ़कर. [इब़्न माजह]

4. सवाल : क्या आज आपने एक क़ुरआन मजीद पढ़ने का सवाब कमाया?
जवाब: तीन बार सूरह इख़लास पढ़कर. [मुस्लिम]

5. सवाल: क्या आज आपने करोड़ों नेकियां कमाईं?
जवाब: मोमिनों के लिए दुआ-ए-मग़फ़ित करके. [तबरानी]

6. सवाल: क्या आज आपने जन्नत मे एक घर बनाया?
जवाब: नमाज़ के लिए सफ़ की ख़ाली जगह को भरकर. [इब्न माजह]

7. सवाल: क्या आज आपने एक हज का सवाब कमाया?
जवाब: फ़र्ज़ नमाज़ के लिए घर से अच्छी तरह वज़ू करके जाकर. [अबु दाऊद]

8. सवाल: क्या आज आपने ज़मीन और आसमान की ख़ाली जगह भरकर नेकियां कमाईं?
जवाब: 100 बार ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़कर. [अहमद]

9. सवाल: क्या आज आपने अल्लाह की राह में 100 घोड़े देने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर. [अहमद]

10. सवाल: क्या आज आपने मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में 100 ऊंट क़ुर्बान करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्लाहु अकबर पढ़कर. [अहमद]

11. सवाल: क्या आज आपने 100 ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह पढ़कर. [अहमद]

12. सवाल: क्या आज आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत हासिल करने वाला अमल किया?
जवाब: सुबह व शाम दस-दस बार दुरूद शरीफ़ पढ़कर. [तबरानी]

13. सवाल: क्या आज आपने वह अमल किया, जिस जैसा अमल क़यामत के दिन लेकर आने वाला कोई न होगा सिवाय उसके जो इस जैसा अमल करे?
जवाब: 100 बार सुब्हानल्लाही वबिहम्दिही पढ़कर. [मुस्लिम]

14. सवाल: क्या आज आपने पूरी रात इबादत करने का सवाब कमाया?
जवाब: नमाज़-ए-इशा और नमाज़-ए-फ़ज्र बा जमाअत पढ़कर. [मुस्लिम]

15. सवाल : क्या आज आपने वज़ू के बाद वह दुआ पढ़ी, जिसके सवाब को क़यामत के दिन तक कोई चीज़ नहीं मिटा सकती?
जवाब: सुब्हाना कल्लाहुम्मा वबिहम्दिका अश-हदू अन ला इलाहा इल्ला अन्ता अस्तग़फ़िरूका वातुबू इलैक. [हाकिम]

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.




आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए. 
फ़िरदौस ख़ान


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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

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मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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