तुम क़ब्र में हज़ारों साल तक क्या करोगे?

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
कई बरस पहले एक मुल्क के शहज़ादे ने हमसे कहा था कि नज़रिया बदलने से ज़िन्दगी बदल जाती है. हमने उनकी इस बात पर ग़ौर किया, तो पाया कि वाक़ई ये बात सौ फ़ीसद सही है. हाल ही में हमने डॉ. महमूद मुस्तफ़ा साहब की एक तहरीर पढ़ी, जिसमें उन्होंने क़ब्र के बारे में लिखा है. उन्होंने बहुत ही आसान अल्फ़ाज़ में ये समझा दिया कि ज़िन्दगी का मक़सद क्या होना चाहिए. 
आपके लिए ये तहरीर पोस्ट कर रहे हैं. बराय मेहरबानी ज़रूर पढ़ें और अपनी राय भी ज़ाहिर करें. 

तुम क़ब्र में हज़ारों साल तक क्या करोगे?

मैं तुम्हें एक तरीक़ा बताता हूं, जो मेरे लिए बहुत कारगर साबित हुआ और जिससे मैं अल्लाह से अपने रिश्ते पर ज़्यादा ध्यान देने लगा हूं।

क़ब्र डरावनी है, ज़ाहिर है कि नेक लोगों के अलावा।

मैंने इसके बारे में सोचा, और अब मेरी उम्र 54 साल है। और मैं दुनिया से और इसकी चीज़ों से तंग आ चुका हूं। अच्छा, तो जब मैं क़ब्र में जाकर अकेला रहूंगा, सैकड़ों-हज़ारों साल तक, तो मैं क्या करूंगा?

क्या तुमने कभी इसका तसव्वुर किया है?

इसलिए मैंने इन तरीक़ों पर अमल करना शुरू कर दिया है-

देखो, मैं मर जाऊंगा, और मेरे पास एक ख़ाली, बिल्कुल अंधेरी क़ब्र होगी।

इस क़ब्र को सामान की ज़रूरत होगी, इसलिए मैं हर इस्तग़फ़ार को ऐसे तसव्वुर करने लगा, जैसे मैं इसे अपनी क़ब्र की तरफ़ भेज रहा हूं, ताकि वो वहां मेरा इंतज़ार करे और मेरी तन्हाई का साथी बने।

अल्लाह की क़सम, मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा।

मैंने अपनी क़ब्र को पूरी तरह सजाने का अमल शुरू कर दिया है।

क़ब्र के एक कोने को मैं हज़ारों तस्बीहात से भर रहा हूं।

यहां मेरे सिर के क़रीब कम से कम तीन सौ ख़त्म-ए-क़ुरआन होंगे, जो मेरे लिए आरामदेह बिस्तर की वजह बनेंगे।

हर रुकू को मैं ये सोचकर अदा करता हूं कि मैं इसे क़ब्र में अपना ज़ख़ीरा बना रहा हूं।

हर कोई मुझे छोड़कर अपने घर चला जाएगा, और मैं अकेला रह जाऊंगा, शायद हज़ारों सालों तक। मेरे बच्चे कुछ सालों में मुझे भूल चुके होंगे।

इसलिए मुझे क़ब्र में साथियों, रौशनी और जन्नत जैसे मंज़रों की ज़रूरत होगी।

मैं तस्बीहात, ज़िक्र, क़ुरआन, नमाज़ और सदक़ा— सबको अपने साथ तसव्वुर करता हूं कि वो मेरे दोस्त होंगे, मेरे साथ वहां मुस्कुरा रहे होंगे और बातें कर रहे होंगे।

नबी करीम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद पढ़ना मैंने अपने मामूलात का अहम हिस्सा बना लिया है। ये वहां हमारी महफ़िलों में भी शामिल होगा—ठंडे पानी की तरह, ख़ूबसूरत लिबास की तरह।

मैं ये चाहता हूं कि मेरी क़ब्र की ज़िन्दगी इस दुनिया की ज़िन्दगी से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हो, इंशाअल्लाह।

क्या ये बेहतर नहीं है कि मैं वहां जाकर ग़ीबत, चुग़ली, हसद और दूसरे दुनियावी गुनाहों के नतीजे में बदबूदार लिबास, दीमक लगे फ़र्नीचर और सख़्त पथरीले बिस्तर के बजाय अपनी क़ब्र को बेहतरीन चीज़ों से सजाकर रखूं?

मैंने दुनिया में अपना घर बनाने के लिए सारी ज़िन्दगी कड़ी मेहनत की, लेकिन ये घर तो मेरे वारिसों का हो जाएगा। असल में तो मेरी सारी मेहनत अपने लिए है ही नहीं, सारे फ़ायदे तो और लोग उठाएंगे। फिर मैंने सोचा कि बस बहुत हो गया, मुझे अपना घर बनाना है, जहां सिर्फ़ मैं ही रहूंगा और मुझे वहां लम्बा वक़्त गुज़ारना है।

अगर मेरे सारे आमाल दुनिया की ज़रूरतों के लिए थे और अपनी क़ब्र के लिए कुछ भी नहीं था, तो फिर मेरी क़ब्र के घर के लिए सिवाय अज़ाब के फ़र्नीचर, हमेशा का अंधेरा और सख़्त हिसाब के अलावा कुछ भी नहीं होगा। और मैं ऐसे घर में अकेला कैसे रहूंगा?

मेरी आपको भी नसीहत है कि आज से अपनी क़ब्र को अपना बैंक अकाउंट बनाओ। इसमें ज़्यादा से ज़्यादा नेकियां जमा करो और लम्बे वक़्त वाली पॉलिसी लो।

अपनी इबादतों का ख़ूब ख़्याल रखो। अल्लाह की क़सम, जब तुम क़ब्र में होगे, तो तुम मुझे वहां से भी शुक्रिया अदा करोगे।

अपनी क़ब्र के घर का इस दुनिया के घर से ज़्यादा ख़्याल रखो।

अभी तुम अपने घरवालों के बीच हो, पहन रहे हो, खा-पी रहे हो, आराम से सो रहे हो, और तुम्हारी सारी ज़रूरतें पूरी हो रही हैं, फिर भी तुम अपनी हालत से ख़फ़ा रहते हो, हर वक़्त शिकायत करते रहते हो।

तो सोचो, जब तुम ज़मीन के नीचे होगे और सैकड़ों-हज़ारों सालों तक होगे, तो वहां तुम्हारे साथ कौन होगा?

तुम्हारे पसंदीदा सियासदां, खिलाड़ी, अदाकार, ताजिर— ये तो तुम्हें यहां भी नहीं जानते, और न ही इन्हें तुम्हारी कोई फ़िक्र है। तुम ही इनके पीछे बेवक़ूफ़ों की तरह अपना वक़्त बर्बाद करते हो।

तुम्हारे वो बच्चे जिनकी शादियों पर तुम लाखों रुपये फ़िज़ूल ख़र्च कर देते हो— यक़ीन करो, ये ख़र्च तुम्हारे लिए बोझ बन चुका होगा, और बच्चे मुकर जाएंगे कि हमारे बाप और माँ ने ख़ुद अपने लिए और हमारे लिए मुसीबत खड़ी की।

इसलिए आज से अपनी जान की फ़िक्र करो, अपना ख़्याल ख़ुद रखो।

ऐ अल्लाह, हमें हुस्न-ए-ख़ातिमा अता फरमा।

आमीन, आमीन, आमीन

ऐ अल्लाह, हमारी आख़िरत को बेहतर बना दे और हमें क़ब्र के अज़ाब से बचा।

आमीन, आमीन, आमीन

ऐ अल्लाह, हमें अपना ज़िक्र, शुक्र और हुस्न-ए-इबादत की तौफ़ीक़ अता फ़रमा, ताकि तू हम पर अपनी रज़ा और जन्नतुल फ़िरदौस में नेमतें नाज़िल करे, जहां हम तेरे नबी हज़रत मुहम्मद  सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत में हों।

आमीन, सुम्मा आमीन, अल्लाहुम्मा आमीन   


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अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
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