एक विश मुहब्बत की

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फ़िरदौस ख़ान
क्रिसमस है... साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते हैं इस बड़े दिन का... बहुत ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं क्रिसमस से... बचपन से ही यह त्यौहार बहुत अच्छा लगता है... गुज़रते वक़्त के साथ इस त्यौहार से एक गहरा रिश्ता जुड़ गया... वो कहीं भी हों, इस दिन चर्च ज़रूर जाते हैं...
बचपन से सुनते आए हैं कि क्रिसमस के दिन सांता क्लाज आते हैं. अपने साथ बहुत सारे तोहफ़े और खुशियां लाते हैं. बचपन में बस संता क्लॊज़ को देखने की ख़्वाहिश थी. उनसे कुछ पाने का ख़्याल कभी ज़हन में आया तक नहीं, क्योंकि हर चीज़ मुहैया थी. जिस चीज़ की तरफ़ इशारा कर दिया कुछ ही पलों में मिल जाती थी. किसी चीज़ का अभाव किया होता है. कभी जाना ही नहीं. मगर अब सांता क्लाज़ से पाना चाहते हैं- मुहब्बत, पूरी कायनात के लिए, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए... हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो, आमीन.. संता क्लॊज़ वही हैं, मगर उम्र बढ़ने के साथ ख़्वाहिशें भी बढ़ जाती हैं...


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क्रिसमस की दिलचस्प दास्तां

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फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है. क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है.
भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है. यहां 'द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी' नाम से इसे मनाया जाता है. माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे.

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था. 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था.

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा. वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्म  हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे. उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं.

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.
पुरानी कैथोलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ. हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई. उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री. अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट  चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है. यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह.

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अक़ीदत के फूल...

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अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...
अक़ीदत के फूल...
मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम
प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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और क़ब्र तंग होती गई

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फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

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शुगर का देसी इलाज...

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गिलोय की बेल के पत्ते खाने से शुगर का स्तर कम हो जाता है... हमारी एक हमसाई की शुगर का स्तर हमेशा 250 से ज़्यादा रहता था... वो हमारे घर से हर रोज़ गिलोय के पत्ते ले जाया करती थीं... उन्होंने लगातार तीन माह निहार मुंह गिलोय का पत्ता चबाकर पानी पी लिया... अब उनकी शुगर नियंत्रित हो गई... शुगर के अलावा बुख़ार, हड्डियों के दर्द, कैंसर, पेट और आंखों आदि की बीमारी में गिलोय बेहद फ़ायदेमंद है...

हमारे घर गिलोय की बहुत-सी बेलें हैं... बहुत लोग इसके पत्ते ले जाते हैं... गिलोय की बेल तक़रीबन हर जगह पाई जाती है... एक बार लगाने पर ये कई साल तक पत्तों से भरी रहती है... गिलोय की बेल किसी भी नर्सरी में मिल सकती है... पार्क में भी मिल सकती है... सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर भी ये बेल ख़ूब देखी जा सकती है... हो सके, तो इसे अपने घर में ज़रूर लगाएं... इसे गमले में भी उगाया जा सकता है...

गिलोय का वैज्ञानिक नाम तिनोस्पोरा कार्डीफ़ोलिया है... इसे मधुपर्णी, अमृता, तंत्रिका, कुंडलिनी गुडूची भी कहा जाता है... फ़ारसी में इसे गिलाई कहते हैं... अंग्रेज़ी में गुलंच, मराठी में गुलबेल, कन्नड़ में अमरदवल्ली, तेलगू में गोधुची, तमिल में शिन्दिल्कोदी और गुजराती में गालो में आदि नामों से जाना जाता है... गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल और बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाए जाते है... मान्यता है कि देव और दानवों के युद्ध के दौरान जहां-जहां अमृत कलश की बूंदे गिरीं, वहां-वहां गिलोय की बेल उग आई...
-फ़िरदौस ख़ान

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हज़रत सरमद रहमतुल्लाह अलैहि

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फ़िरदौस ख़ान
दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों के क़रीब हज़रत साहब का मज़ार है... हम अकसर वहां जाते हैं... बहुत सुकून मिलता है... वहां से उठने को दिल नहीं करता...
फ़िलिस्तीन में जन्मे हज़रत सरमद, हज़रत अबुल क़ासिम उर्फ़ हरे-भरे सब्ज़वारी के मुरीद हैं... हज़रत सरमद से वाबस्ता एक वाक़िया पेश कर रहे हैं...
एक रात बादशाह औरंगज़ेब ने ख़्वाब में देखा कि जन्नत में एक बहुत ही ख़ूबसूरत और आलीशान महल है, जिस पर लिखा है- "शहज़ादी ज़ैबुन्निसा का ख़रीदा हुआ महल."
औरंगज़ेब उसमें जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन महल के पहरेदार उन्हें महल के अंदर नहीं जाने देते. अगली सुबह बादशाह ने अपनी 12 साल की बेटी ज़ैबुन्निसा से पूछा कि जन्नत का महल क्या है? इस पर बेटी ने जवाब दिया कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों के पास हज़रत सरमद एक मिट्टी का घरौंदा बनाकर बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा, "मैं जन्नत का महल बनाता हूं."   मैंने एक हुक़्क़ा तम्बाक़ू के बदले उस महल को ख़रीद लिया. ये बात सुनकर बादशाह बेचैन हो गए. अगले जुमे को वे जामा मस्जिद गए और हज़रत सरमद से पूछा, "जन्नत का एक महल हमें भी ख़रीदना है." हज़रत सरमद ने जवाब दिया, ख़रीद-फ़रोख़्त हर रोज़ नहीं होती."

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एक मुख़्तसर और पुरअसरार क़िस्सा...

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एक नेक और मालदार शख़्स ने अपना क़िस्सा लिखा है कि एक दिन मेरा दिल बहुत बैचैन हुआ. हर चंद कोशिश की कि दिल बहल जाए, परेशानी का बोझ उतरे और बेचैनी कम हो. मगर वह बढती ही गई. बिला आख़िर तंग आकर बाहर निकल गया और बेमक़सद इधर-उधर घूमने लगा. इसी दौरान एक मस्जिद के पास से गुज़रा, तो देखा कि दरवाज़ा खुला है. फ़र्ज़ नमाज़ों में से किसी का वक़्त नहीं था. मैं बेसाख़्ता मस्जिद में दाख़िल हुआ कि वज़ू करके दो चार रकअत नमाज़ अदा करता हूं, मुमकिन है दिल को राहत मिले. वज़ू के बाद मस्जिद में दाख़िल हुआ, तो एक साहब को देखा, ख़ूब रो-रोकर गिड़गिड़ाकर दुआ मांग रहे हैं और काफ़ी बेक़रार हैं. ग़ौर से इनकी दुआ सुनी तो क़र्ज़ा उतारने की फ़रियाद में थे. उनको सलाम किया, मुसाफ़ा हुआ, क़र्ज़े का पूछा बताने लगे कि आज अदा करने की आख़िरी तारीख़ है. अपने मालिक से मांग रहा हूं. उनका क़र्ज़ा चंद हज़ार रुपये का था. वो मैंने जेब से निकाल कर दे दिए. उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और मेरे दिल की बेचैनी सुकून में बदल गई. मैंने अपना विज़िटिंग कार्ड निकालकर पेश किया कि आइंदा जब ज़रूरत हो, मुझे फ़ोन कर लें. ये मेरा पता है और ये मेरा फ़ोन नम्बर है. उन्होंने बग़ैर देखे कार्ड को वापस कर दिया और फ़रमाया, "न जनाब ये नहीं. मेरे पास उनका पता मौजूद है, जिन्होंने आज आपको भेजा है.  मैं किसी का पता जेब में रखकर उनको नाराज़ नहीं कर सकता."
अनुवाद : रियाज़ अहमद



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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें हैं.
पहली शर्त
वे बहीमतुल अनआम (चौपायों) में से हों,  और वे ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है- "और हर उम्मत के लिए हमने क़ुर्बानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर किया है, ताकि वे उन बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों) पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है." (सूरतुल हज्ज : 34)
बहीमतुल अनआम (पशु) से मुराद ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं. अरब के बीच यही जाना जाता है, इसे हसन, क़तादा, और कई लोगों ने कहा है.

दूसरी शर्त
वे जानवर शरीअत में निर्धारित आयु को पहुंच गए हों. इस प्रकार कि भेड़ जज़आ हो, या दूसरे जानवर सनिय्या हों, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है- "तुम मुसिन्ना जानवर ही क़ुर्बानी करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे लिए कठिनाई हो, तो भेड़ का जज़आ़ क़ुर्बानी करो." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है.)

मुसिन्ना : सनिय्या या उस से बड़ी आयु के जानवर को कहते हैं, और जज़आ उससे कम आयु के जानवर को कहते हैं.
ऊंट में से सनिय्या : वह जानवर है जिस के पांच साल पूरे हो गए हों.
गाय में से सनिय्या : वह जानवर है जिसके दो साल पूरे हो गए हों.
बकरी में से सनिय्या : वह जानवर है जिसका एक साल पूरा हो गया हो.
और जज़आ : उस जानवर को कहत हैं, जो छह महीने का हो.

अत: ऊंट, गाय और बकरी में से सनिय्या से कम आयु के जानवर की क़ुर्बानी करना शुद्ध नहीं है, भेड़ में से जज़आ से कम आयु की कु़र्बानी नहीं है.

तीसरी शर्त
वे जानवर उन दोषों (ऐबों और कमियों) से मुक्त (ख़ाली) होने चाहिए, जिनके होते हुए वे जानवर क़ुर्बानी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, औ वे चार दोष हैं-
1. स्पष्ट कानापन : और वह ऐसा जानवर है जिसकी आंख धंस गई (अंधी हो गई) हो, या इस तरह बाहर निकली हुई हो कि वह बटन की तरह लगती हो, या इस प्रकार सफ़ेद हो गई हो कि साफ़ तौर पर उसके कानेपन का पता देती हो.
2. स्पष्ट बीमारी : ऐसी बीमारी जिसकी निशानियांपशु पर स्पष्ट हों जैसे कि ऐसा बुख़ार जो उसे चरने से रोक दे और उसकी भूख को मार दे, और प्रत्यक्ष खुजली जो उसके गोश्त को ख़राब कर दे या उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर दे,  और गहरा घाव जिस से उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए, इत्यादि.
3. स्पष्ट लंगड़ापन : जो पशु को दूसरे दोषरहित पशुओं के साथ चलने से रोक दे.
4. ऐसा लंगड़ापन जो गूदा को समाप्त करन वाला हो, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि क़ुर्बानी के जानवरों में किस चीज़ से बचा जाए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से संकेत करते हुए फ़रमाया : "चार : लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन स्पष्ट हो, काना जानवर जिसका कानापन स्पष्ट हो, रोगी जानवर जिसका रोग स्पष्ट हो, तथा लागर जानवर जिस की हड्डी में गूदा न हो. इसे इमाम मालिक ने मुवत्ता में बरा बिन आज़िब की हदीस से रिवायत किया है, और सुनन की एक रिवायत में बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि उन्होंने कहा- अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीच खड़े हुए और फ़रमाया- "चार चीज़ें (दोष और ख़ामियां) क़ुर्बानी के जानवर में जाइज़ नहीं हैं." और आप ने पहली हदीस के समान ही उल्लेख किया. इसे अल्बानी ने इर्रवाउल गलील (1148) में सही कहा है.

ये चार दोष और ख़ामियां क़ुर्बानी के जानवर के पर्याप्त होने में रुकावट हैं (अर्थात् इनमें से किसी भी दोष से पीड़ित जानवर की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है), इसी तरह जिन जानवरों में इन्हीं के समान या इन से गंभीर दोष और ख़ामियां होंगी उन पर भी यही हुक्म लागू होगा, इस आधार पर निम्नलिखित जानवरों की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है-
1. वह जानवर जो दोनों आंख का अंधा हो.
2. वह जानवर जिसका पेट अपनी क्षमता से अधिक खाने के कारण फूल गया हो, यहां तक कि वह पाखाना कर दे, और ख़तरे से बाहर हो जाए.
3. वह जानवर जो जने जाने के समय कठिनाई से पीड़ित हो जाए, यहां तक कि उस से ख़तरा टल जाए.
4. ऊंचे स्थान से गिरने या गला घुटने आदि के कारण मौत के ख़तरे का शिकार जानवर यहां तक कि वह ख़तरे से बाहर हो जाए.
5. किसी बीमारी या दोष के कारण चलने में असमर्थ जानवर.
6. जिस जानवर का एक हाथ या एक पैर कटा हुआ हो.

जब इन दोषों और ख़ामियों को उपर्युक्त चार नामज़द (मनसूस) ख़ामियों के साथ मिलाया जाए, तो उन ख़ामियों (ऐबों) की संख्या जिनके कारण क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है, दस हो जाती है. ये छह ख़ामियां और जो पिछली चार ख़ामियों से पीड़ित हो.

चौथी शर्त
वह जानवर क़ुर्बानी करने वाले की मिल्कियत (संपत्ति) हो, या शरीअत की तरफ़ से या मालिक की तरफ़ से उसे उस जानवर के बारे में अनुमति प्राप्त हो. अत: ऐसे जानवर की क़ुर्बानी शुद्ध नहीं है जिसका आदमी मालिक न हो जैसे कि हड़प किया हुआ, या चोरी किया हुआ, या झूठे दावा द्वारा प्राप्त किया गया जानवर इत्यादि, क्योंकि अल्लाह तआला की अवज्ञा के द्वारा उस का सामीप्य और नज़दीकी प्राप्त करना उचित नहीं है.
तथा अनाथ के संरक्षक (सरपरस्त) के लिए उसके धन से उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी करना वैध है. अगर उसकी परम्परा है और क़ुर्बानी न होने के कारण उसके दिल के टूटने का भय है.
तथा वकील (प्रतिनिधि) का अपने मुविक्कल के माल से उसकी अनुमति से क़ुर्बानी करना उचित है.

पांचवीं शर्त
उस जानवर के साथ किसी दूसरे का हक़ (अधिकार) संबंधित न हो, चुनांचे उस जानवर की क़ुर्बानी मान्य नहीं है, जो किसी दूसरे की गिरवी हो.

छठी शर्त
शरीअत में क़ुर्बानी का जो सीमित समय निर्धारित है उसी में उसकी क़ुर्बानी करे, और वह समय क़ुर्बानी (10 ज़ुलहिज्जा) के दिन ईद की नामज़ के बाद से अय्यामे तश्रीक़ अर्थात् 13वीं ज़ुलहिज्जा के दिन सूर्यास्त तक है. इस तरह बलिदान के दिन चार हैं- नमाज़ के बाद से ईद का दिन, और उस के बीद अतिरिक्त तीन दिन. जिसने ईद की नमाज़ से फ़ारिग़ होने से पहले, या तेरहवीं ज़ुलहिज्जा को सूरज डूबने के बाद क़ुर्बानी की, तो उसकी क़ुर्बानी शुद्ध और मान्य नहीं है , क्योंकि इमाम बुख़ारी ने बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "जिसने ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी की, तो उसने अपने घर वालों के लिए गोश्त तैयार किया है, और उस का धार्मिक परंपरा से (क़ुर्बानी की इबादत) से कोई संबंध नहीं है." तथा जुनदुब बिन सुफ़यान अल-बजली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा- "मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास उपस्थित था, जब आप ने फ़रमाया- "जिसने -ईद की- नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुर्बानी कर दी, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुर्बानी करे." तथा नुबैशा अल-हुज़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "तश्रीक़ के दिन खाने, पीने और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को याद करने के दिन हैं." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है)

किन्तु यदि किसी कारणवश तश्रीक़ के दिन (13 ज़ुलहिज्जा) से विलंब हो जाए, उदाहरण के तौर पर बिना उसकी कोताही के क़ुर्बानी का जानवर भाग जाए और समय बीत जाने के बाद ही मिले, या किसी को क़ुर्बानी करने के लिए वकील (प्रतिनिधि) बना दे और वकील भूल जाए यहां तक कि क़ुर्बानी का समय निकल जाए, तो उज़्र के कारण समय निकलने के बाद क़ुर्बानी करने में कोई बात नहीं है, तथा उस आदमी पर क़ियास करते हुए जो नमाज़ से सो जाए या उसे भूल जाए, तो वह सोकर उठने या उसके याद आने पर नमाज़ पढ़ेगा.

निर्धारित समय के अंदर दिन और रात में किसी भी समय क़ुर्बानी करना जाइज़ है, जबकि दिन में क़ुर्बानी करना श्रेष्ठ है, तथा ईद के दिन दोनों ख़ुत्बों के बाद क़ुर्बानी करना अफज़ल हैं, तथा हर दिन उसके बाद वाले दिन से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भलाई की तरफ़ पहल और जल्दी करना पाया जाता है.

साभार islamqa



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महबूब

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मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहता हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहता हूं…
-फ़िरदौस ख़ान

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सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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