मधु मक्खियों की ख़िदमत

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सांझ ढलते वक़्त जो छोटी-छोटी मधुमक्खियाँ फूलों पर ठहरी हुई नज़र आती हैं, वो अक्सर बूढ़ी या कमज़ोर मधुमक्खियाँ होती हैं।
थकी हुई, बीमार या उम्रदराज़ मधुमक्खियाँ कई बार दिन के आखिर में छत्ते तक लौटने के बजाय किसी फूल पर ही रात गुज़ार देती हैं।
अगर अगली सुबह उन्हें फिर सूरज देखने का मौक़ा मिल जाए, तो वो दोबारा उड़ पड़ती हैं, पराग या रस इकट्ठा करके अपनी कॉलोनी के लिए कुछ आख़िरी ख़िदमत अंजाम देने।
मानो उन्हें अपने अंजाम का एहसास होता है। वह छत्ते पर बोझ नहीं बनना चाहतीं, आख़िरी दम तक काम करना चाहती हैं और ख़ामोशी से अपनी उम्र का बाक़ी हिस्सा ज़िम्मेदारी में गुज़ार देती हैं।
अगली बार जब शाम के वक़्त आपको किसी फूल पर चुपचाप बैठी हुई कोई नन्ही मधुमक्खी दिखाई दे तो उसे सिर्फ़ एक कीड़ा मत समझिए और उस नन्ही जान का शुक्रिया अदा कीजिए...जिसने उम्र भर बिना शोर किये दुनिया को फूलों से फल, खेतों से अनाज और इंसानों को अनगिनत नेअमतें पहुँचाईं। 
कई बार दुनिया की सबसे बड़ी नेअमतें पंखों की बहुत हल्की आवाज़ में आती हैं।
इंसानियत के लिए की गयी अकसर ख़िदमतें इतनी ख़ामोश होती हैं कि दुनिया उनका एहसान कभी ठीक से गिन ही नहीं पाती।
अरबों नाज़ुक मधुमक्खियाँ फूलों की गर्द-अफ़शानी करके एक अजीब ख़ूबसूरत ख़िदमत अंजाम देती हैं, जिनकी बदौलत मीठे-मीठे फल दुनिया में आते हैं।
वही शहद बनाती हैं, वही क़ीमती रॉयल जेली पैदा करती हैं, जो इंसानों के जिस्म और दिल दोनों को ग़िज़ा पहुँचाती है।
अपनी बहुत छोटी सी ज़िंदगी के दरमियान भी उन्होंने इंसानियत को मेहनत, पाबंदी, तर्तीब और लगन का सबक़ दिया है।
एक दिन जब बहुत कुछ हाथ में होते हुए भी खालीपन महसूस हो या कुछ भी हाथ में ना रहकर भी भीतर सुकून उतर आये, तब इंसान समझेगा कि ज़िंदगी का राज़ चीज़ों में नहीं, एहसास में था, नेकियाँ जमा करने में था।
मुमकिन है यह भी समझ आ जाए कि हम यहाँ हमेशा रहने नहीं आए थे, हम यहाँ सिर्फ़ सीखने, और लौटने से पहले अगले सफ़र के लिए ज़िंदगी बनाने आए थे।
अक्सर इंसान को हक़ीक़त तब समझ आती है, जब उसके पास उसे बदलने के लिए बहुत कम वक़्त बचा होता है।
-इलियास मख़दूम  

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