बेर के दरख़्त के अनोखे राज़

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़ पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है. बेर के दरख़्त पर नेक जिन्नात का बसेरा होता है. बेर के पत्तों के ज़रिये जादू का इलाज हदीस मुबारक से साबित है. बेर के पत्तों, छाल और फल से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है. इसके पत्ते कई दिन तक ताज़े रहते हैं और काँटें होने की वजह से जानवर भी इसे नुक़सान नहीं पहुंचाते. 
  
बेर के पत्तों से मैयत को नहलाया जाता है. सही बुख़ारी की एक हदीस के मुताबिक़ जब एक आदमी की अराफ़ात के मैदान में ऊंट से गिरकर मौत हो गई, तो अ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उसे बेर के पत्तों के पानी से ग़ुस्ल करवाओ.
क़ब्रों के आसपास बेरी की टहनियां रखी जाती हैं. इनके काँटों की वजह से जानवर क़ब्र को नुक़सान नहीं पहुंचा पाते हैं. 

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये घास, पौधे, फूल आदि ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है.” 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है- “एक बार अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो क़ब्रों के पास से गुज़रे और फ़रमाया-“इन दोनों को किसी बड़े गुनाह के लिए नहीं, बल्कि किसी छोटे गुनाह के लिए अज़ाब दिया जा रहा है. इनमें से एक अपने पेशाब की छींटों से नहीं बचता था, जबकि दूसरा चुग़ली करता था. तब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खजूर के दरख़्त की हरी शाख़ ली और उसे दो टुकड़ों में तोड़ा और एक-एक टुकड़ा हर एक क़ब्र पर लगा दिया. सहाबियों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आपने ऐसा क्यों किया? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- मुझे उम्मीद है कि जब तक ये शाख़ सूख न जाएं, तब तक उनके अज़ाब में कमी की जाएगी.” ये वाक़िया सहीह बुख़ारी की हदीस संख्या 218 और सहीह मुस्लिम की हदीस संख्या 292 में दर्ज है.

अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- “जब तक ये ( फूल, पत्ते आदि) ताज़े रहते हैं, तब तक ये अल्लाह तआला का ज़िक्र करते हैं और इससे मैयत के दिल को तसल्ली मिलती है, और बेशक अल्लाह तआला के ज़िक्र से रहमत नाज़िल होती है. 

दरअसल बेर के दरख़्त को अर्शी निस्बत हासिल है. ये जन्नत का दरख़्त है. अल्लाह के अर्श पर बेरी का एक दरख़्त है, जिसे सिदरतुल मुनतहा कहते हैं. इसके आसपास फ़रिश्तों का हुजूम रहता है. ज़मीन से जो भी आमाल जाते हैं, वह सदरतुल मन्तहा पर जाकर ठहर जाते हैं और फिर वहां से अर्शे-माला पर जाते हैं. 
क़ुरआन करीम की सूरह अन नज्म के मुताबिक़ ये वही दरख़्त है, जिसे अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेराज की रात जन्नतुल मावा के क़रीब देखा था.

एक हदीस के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेर के दरख़्त ख़ासकर मक्का के हरम इलाक़े में को बेवजह काटने से मना किया है, क्योंकि ये लोगों को छाया और फल देता है.

ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि आबादी वाले इलाक़ों में खड़े बेरी के दरख़्तों के पास कूड़े-कर्कट के ढेर लगे रहते हैं. हवा से उड़कर प्लास्टिक की थैलियां काँटों की वजह से इनकी डालियों में फंस जाती हैं. बेरी के ये दरख़्त हमें फल और छाया देते हैं. बचपन में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो, जिसने इनके फल तोड़कर न खाये हों. जो चीज़ें हमें राहत देती हैं, हमें उनका ख़्याल रखना चाहिए. बेरी ही नहीं, बल्कि हर दरख़्त के आसपास सफ़ाई रखनी चाहिए.  
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)

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