क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें

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क़ुर्बानी के जानवर की छह शर्तें हैं.
पहली शर्त
वे बहीमतुल अनआम (चौपायों) में से हों,  और वे ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है- "और हर उम्मत के लिए हमने क़ुर्बानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर किया है, ताकि वे उन बहीमतुल अनआम (चौपाये जानवरों) पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है." (सूरतुल हज्ज : 34)
बहीमतुल अनआम (पशु) से मुराद ऊंट, गाय और भेड़-बकरी हैं. अरब के बीच यही जाना जाता है, इसे हसन, क़तादा, और कई लोगों ने कहा है.

दूसरी शर्त
वे जानवर शरीअत में निर्धारित आयु को पहुंच गए हों. इस प्रकार कि भेड़ जज़आ हो, या दूसरे जानवर सनिय्या हों, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है- "तुम मुसिन्ना जानवर ही क़ुर्बानी करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे लिए कठिनाई हो, तो भेड़ का जज़आ़ क़ुर्बानी करो." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है.)

मुसिन्ना : सनिय्या या उस से बड़ी आयु के जानवर को कहते हैं, और जज़आ उससे कम आयु के जानवर को कहते हैं.
ऊंट में से सनिय्या : वह जानवर है जिस के पांच साल पूरे हो गए हों.
गाय में से सनिय्या : वह जानवर है जिसके दो साल पूरे हो गए हों.
बकरी में से सनिय्या : वह जानवर है जिसका एक साल पूरा हो गया हो.
और जज़आ : उस जानवर को कहत हैं, जो छह महीने का हो.

अत: ऊंट, गाय और बकरी में से सनिय्या से कम आयु के जानवर की क़ुर्बानी करना शुद्ध नहीं है, भेड़ में से जज़आ से कम आयु की कु़र्बानी नहीं है.

तीसरी शर्त
वे जानवर उन दोषों (ऐबों और कमियों) से मुक्त (ख़ाली) होने चाहिए, जिनके होते हुए वे जानवर क़ुर्बानी के लिए पर्याप्त नहीं हैं, औ वे चार दोष हैं-
1. स्पष्ट कानापन : और वह ऐसा जानवर है जिसकी आंख धंस गई (अंधी हो गई) हो, या इस तरह बाहर निकली हुई हो कि वह बटन की तरह लगती हो, या इस प्रकार सफ़ेद हो गई हो कि साफ़ तौर पर उसके कानेपन का पता देती हो.
2. स्पष्ट बीमारी : ऐसी बीमारी जिसकी निशानियांपशु पर स्पष्ट हों जैसे कि ऐसा बुख़ार जो उसे चरने से रोक दे और उसकी भूख को मार दे, और प्रत्यक्ष खुजली जो उसके गोश्त को ख़राब कर दे या उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर दे,  और गहरा घाव जिस से उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए, इत्यादि.
3. स्पष्ट लंगड़ापन : जो पशु को दूसरे दोषरहित पशुओं के साथ चलने से रोक दे.
4. ऐसा लंगड़ापन जो गूदा को समाप्त करन वाला हो, क्योंकि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि क़ुर्बानी के जानवरों में किस चीज़ से बचा जाए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से संकेत करते हुए फ़रमाया : "चार : लंगड़ा जानवर जिसका लंगड़ापन स्पष्ट हो, काना जानवर जिसका कानापन स्पष्ट हो, रोगी जानवर जिसका रोग स्पष्ट हो, तथा लागर जानवर जिस की हड्डी में गूदा न हो. इसे इमाम मालिक ने मुवत्ता में बरा बिन आज़िब की हदीस से रिवायत किया है, और सुनन की एक रिवायत में बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि उन्होंने कहा- अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे बीच खड़े हुए और फ़रमाया- "चार चीज़ें (दोष और ख़ामियां) क़ुर्बानी के जानवर में जाइज़ नहीं हैं." और आप ने पहली हदीस के समान ही उल्लेख किया. इसे अल्बानी ने इर्रवाउल गलील (1148) में सही कहा है.

ये चार दोष और ख़ामियां क़ुर्बानी के जानवर के पर्याप्त होने में रुकावट हैं (अर्थात् इनमें से किसी भी दोष से पीड़ित जानवर की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है), इसी तरह जिन जानवरों में इन्हीं के समान या इन से गंभीर दोष और ख़ामियां होंगी उन पर भी यही हुक्म लागू होगा, इस आधार पर निम्नलिखित जानवरों की क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है-
1. वह जानवर जो दोनों आंख का अंधा हो.
2. वह जानवर जिसका पेट अपनी क्षमता से अधिक खाने के कारण फूल गया हो, यहां तक कि वह पाखाना कर दे, और ख़तरे से बाहर हो जाए.
3. वह जानवर जो जने जाने के समय कठिनाई से पीड़ित हो जाए, यहां तक कि उस से ख़तरा टल जाए.
4. ऊंचे स्थान से गिरने या गला घुटने आदि के कारण मौत के ख़तरे का शिकार जानवर यहां तक कि वह ख़तरे से बाहर हो जाए.
5. किसी बीमारी या दोष के कारण चलने में असमर्थ जानवर.
6. जिस जानवर का एक हाथ या एक पैर कटा हुआ हो.

जब इन दोषों और ख़ामियों को उपर्युक्त चार नामज़द (मनसूस) ख़ामियों के साथ मिलाया जाए, तो उन ख़ामियों (ऐबों) की संख्या जिनके कारण क़ुर्बानी जाइज़ नहीं है, दस हो जाती है. ये छह ख़ामियां और जो पिछली चार ख़ामियों से पीड़ित हो.

चौथी शर्त
वह जानवर क़ुर्बानी करने वाले की मिल्कियत (संपत्ति) हो, या शरीअत की तरफ़ से या मालिक की तरफ़ से उसे उस जानवर के बारे में अनुमति प्राप्त हो. अत: ऐसे जानवर की क़ुर्बानी शुद्ध नहीं है जिसका आदमी मालिक न हो जैसे कि हड़प किया हुआ, या चोरी किया हुआ, या झूठे दावा द्वारा प्राप्त किया गया जानवर इत्यादि, क्योंकि अल्लाह तआला की अवज्ञा के द्वारा उस का सामीप्य और नज़दीकी प्राप्त करना उचित नहीं है.
तथा अनाथ के संरक्षक (सरपरस्त) के लिए उसके धन से उसकी तरफ़ से क़ुर्बानी करना वैध है. अगर उसकी परम्परा है और क़ुर्बानी न होने के कारण उसके दिल के टूटने का भय है.
तथा वकील (प्रतिनिधि) का अपने मुविक्कल के माल से उसकी अनुमति से क़ुर्बानी करना उचित है.

पांचवीं शर्त
उस जानवर के साथ किसी दूसरे का हक़ (अधिकार) संबंधित न हो, चुनांचे उस जानवर की क़ुर्बानी मान्य नहीं है, जो किसी दूसरे की गिरवी हो.

छठी शर्त
शरीअत में क़ुर्बानी का जो सीमित समय निर्धारित है उसी में उसकी क़ुर्बानी करे, और वह समय क़ुर्बानी (10 ज़ुलहिज्जा) के दिन ईद की नामज़ के बाद से अय्यामे तश्रीक़ अर्थात् 13वीं ज़ुलहिज्जा के दिन सूर्यास्त तक है. इस तरह बलिदान के दिन चार हैं- नमाज़ के बाद से ईद का दिन, और उस के बीद अतिरिक्त तीन दिन. जिसने ईद की नमाज़ से फ़ारिग़ होने से पहले, या तेरहवीं ज़ुलहिज्जा को सूरज डूबने के बाद क़ुर्बानी की, तो उसकी क़ुर्बानी शुद्ध और मान्य नहीं है , क्योंकि इमाम बुख़ारी ने बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "जिसने ईद की नमाज़ से पहले क़ुर्बानी की, तो उसने अपने घर वालों के लिए गोश्त तैयार किया है, और उस का धार्मिक परंपरा से (क़ुर्बानी की इबादत) से कोई संबंध नहीं है." तथा जुनदुब बिन सुफ़यान अल-बजली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्हों ने कहा- "मैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास उपस्थित था, जब आप ने फ़रमाया- "जिसने -ईद की- नमाज़ पढ़ने से पहले क़ुर्बानी कर दी, वह उसके स्थान पर दूसरी क़ुर्बानी करे." तथा नुबैशा अल-हुज़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया- "तश्रीक़ के दिन खाने, पीने और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल को याद करने के दिन हैं." (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है)

किन्तु यदि किसी कारणवश तश्रीक़ के दिन (13 ज़ुलहिज्जा) से विलंब हो जाए, उदाहरण के तौर पर बिना उसकी कोताही के क़ुर्बानी का जानवर भाग जाए और समय बीत जाने के बाद ही मिले, या किसी को क़ुर्बानी करने के लिए वकील (प्रतिनिधि) बना दे और वकील भूल जाए यहां तक कि क़ुर्बानी का समय निकल जाए, तो उज़्र के कारण समय निकलने के बाद क़ुर्बानी करने में कोई बात नहीं है, तथा उस आदमी पर क़ियास करते हुए जो नमाज़ से सो जाए या उसे भूल जाए, तो वह सोकर उठने या उसके याद आने पर नमाज़ पढ़ेगा.

निर्धारित समय के अंदर दिन और रात में किसी भी समय क़ुर्बानी करना जाइज़ है, जबकि दिन में क़ुर्बानी करना श्रेष्ठ है, तथा ईद के दिन दोनों ख़ुत्बों के बाद क़ुर्बानी करना अफज़ल हैं, तथा हर दिन उसके बाद वाले दिन से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भलाई की तरफ़ पहल और जल्दी करना पाया जाता है.

साभार islamqa



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महबूब

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मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहता हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहता हूं…
-फ़िरदौस ख़ान

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सबके लिए दुआ...

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मेरा ख़ुदा बड़ा रहीम और करीम है... बेशक हमसे दुआएं मांगनी नहीं आतीं...
हमने देखा है कि जब दुआ होती है, तो मोमिनों के लिए ही दुआ की जाती है... हमसे कई लोगों ने कहा भी है कि मोमिनों के लिए ही दुआ की जानी चाहिए...
हमारे ज़ेहन में सवाल आता है कि जब सब मोमिनों के लिए ही दुआ करेंगे, तो फिर हम जैसे गुनाहगारों के लिए कौन दुआ करेगा...?
इसलिए हम कुल कायनात के लिए दुआ करते हैं... अल्लाह के हर उस बंदे के लिए दुआ करते हैं, जिसे उसने पैदा किया है... मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम हो... इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... सब मेरे ख़ुदा की मख़्लूक का ही हिस्सा हैं...
अल्लाह सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

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दस बीबियों की कहानी

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
कहते हैं, ये एक मौजज़ा है कि कोई कैसी ही तकलीफ़ में हो, तो नीयत करे कि मेरी मुश्किल ख़त्म होने पर दस बीबियों की कहानी सुनूंगी, तो इंशा अल्लाह मुसीबत से निजात मिलेगी और हाजत पूरी होगी.

मुश्किलों को दूर करो सुन कर कहानी सैयदा
बीबियों मांगो दुआ देकर सदा-ए-सैयदा
आफ़तें टल जाएंगी नाम से उन बीबियों के
लम्हा-लम्हा देखेंगी आप मौजज़ा सैयदा

दस बीबियों की कहानी
एक शहर में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई बहुत अमीर था और छोटा भाई बहुत नादार व मुफ़लिस था. वह अपनी मुफ़लिसी और नादारी से बहुत आज़िज़ आ गया था. वह अपनी बीवी से कहने लगा, यहां कब तक फ़िक्र व फ़ाक़ा की मुसीबत सहें. अब मैं परदेस जाता हूं. शायद मुझको कहीं नौकरी मिल जाए और ये मुसीबत के दिन कट जाएं.

यह कहकर वह शख़्स अपनी बीवी से रुख़्सत होकर रोज़गार की तलाश में परदेस चला गया. अब यहां उसकी बीवी बहुत परेशान थी. दिल में कहने लगी, ऐ पालने वाले ! तू ही रज़्ज़ाक़ है. अब मेरा शौहर भी चला गया. अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा, सिवाय तेरी ज़ात पाक के. ये मोमिना जब बहुत मजबूर हो गई, तो अपने शौहर के बड़े भाई के घर गई और अपने सब हालात बयान किए. तमाम हाल सुनकर उस शख़्स ने अपनी बीवी से कहा, ये मेरी भावज आई है. तुम इससे घर का काम कराओ. ये तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की ख़िदमत करेगी. तुम जो कुछ अपने खाने से बचे, इसे दे दिया करो. ग़र्ज़ कि ये मोमिना अपने शौहर के भाई के घर के तमाम काम करती. सारा दिन बच्चों की ख़िदमत करती. उस पर भी अमीर की बीवी उसे ताने देती और अपने आगे का बचा हुआ खाना उस ग़रीब को देती. इसी तरह एक मुद्दत गु़ज़र गई. हर रात ये मुसीबतज़द मोमिना अपने शौहर की वापसी की दुआ मांगती थी. इसी हालत में एक शब ये मोमिना रोते-रोते सो गई. उसने ख़्वाब में देखा कि एक बीबी नक़ाब पोश तशरीफ़ लाईं और फ़रमाया कि ऐ मोमिना तू अपने शौहर के लिए इस तरह परेशान न हो. इंशा अल्लाह तेरा शौहर सही सलामत तुझसे आकर मिलेगा. तू जुमेरात के दिन दस बीबियों की कहानी सुन, और जब तेरा शौहर आ जाए, तो मीठी रोटी का मलीदा बनाकर उसके दस लड्डू बनाना और उस पर दस बीबियो की नियाज़ देना.
इस औरत ने सवाल किया कि आप कौन हैं और आपका नाम क्या है और इन दस बीबियों के नाम क्या हैं, जिनकी नियाज़ दिलाऊं.

तब जनाब सैयदा ने फ़रमाया, मेरा नाम सैयदा ताहिरा फ़ातिमा ज़ोहरा दुख़्तर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है और नौ बीबियों के नाम हैं-
हज़रत मरियम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सायरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत आसिया (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत हाजरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत ज़ैनब (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा सोग़रा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत फ़ातिमा कूबरा (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत उम्मे कुलसुम (रज़ि अल्लाहु अन्हा)
हज़रत सकीना (रज़ि अल्लाहु अन्हा). इन्हें ज़िन्दगी बहुत मुसीबतें सहनी पड़ीं और इन बीबियों ने सब्र किया. जो शख़्स इनकी तुफ़ैल में अल्लाह से जो भी हाजत तलब करेगा, ख़ुदावंद आलम उसकी हाजत पूरी करेगा.

कहानी यह है. एक दिन जनाब अमीरुल मोमेनीन ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को अपना मेहमान किया. उस दिन घर में फ़ाक़ा था. आप थोड़ा-सा जौ का आटा कहीं से क़र्ज़ लाए और जनाब सैयदा को देकर कहा कि आज रसूले-ख़ुदा मेरे मेहमान हैं. जनाब सैयदा ने उसकी छह रोटियां पकाईं. मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तशरीफ़ लाए और दस्तरख़्वान पर बैठे. जनाब सैयदा ने एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को दी और पांच पंजतन पाक ने खाईं. जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो जनाब सैयदा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से अर्ज़ किया कि मुझे भी सरफ़राज़ फ़रमाएं. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली. इसी तरह नवासों हज़रत इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने भी अपने नाना हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दावत दी. शेरे-ख़ुदा हज़रत अली हर रोज़ सामान क़र्ज़ पर लाते. जनाब सैयदा अनाज पीसतीं और उसकी छह रोटियां पकातीं. एक रोटी हज़रत फ़ज़ा को देतीं और पांच रोटियां पंजतन पाक नोश फ़रमाते.

हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की दावत के बाद जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि हज़रत फ़ज़ा दरवाज़े पर खड़ी हैं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दरयाफ़्त किया कि फ़ज़ा कुछ कहना चाहती हो. इस पर हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि कनीज़ इस क़ाबिल नहीं कि आपको दावत दे, लेकिन मैं भी उम्मीदवार हूं. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दावत क़ुबूल कर ली.
अगले दिन शाम को मग़रिब की नमाज़ के बाद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जनाब सैयदा के घर तशरीफ़ लाए. सबने उठकर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इस्तक़बाल किया. हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि आज फ़ज़ा का मेहमान हूं.
हज़रत फ़ज़ा ने किसी से इसका ज़िक्र नहीं किया था. घर में फ़ाक़ा था. हज़रत अली ने कहा कि पहले से कह देतीं, तो सामान मुहैया करा देता. हज़रत फ़ज़ा ने कहा कि आप परेशान न हों, अल्लाह मुसब्बेबल असबाब है. हज़रत फ़ज़ा एक गोशे में गईं और सजदे में गिर गईं. वह अल्लाह से दुआ करने लगीं, या क़ाज़ी अलहाजात, इस तंग दस्ती और नादारी में तू आलम दाना है. तेरे महबूब को मेहमान किया है. तुझे वास्ता आल मुहम्मद का मुझे शर्मिन्दा न करना. उन्होंने सजदे से सर उठाया, तो क्या देखती हैं कि जन्नत की हूरें खानों का तबाक़ लिए खड़ी हैं. हज़रत फ़ज़ा ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने खाने का तबाक़ रखा और सबने मिलकर खाना खाया. आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि ये खाना कहां से आया. गोया आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पहले से ही जानते थे. हज़रत जिब्राईल रास्ते में ही आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बता गए थे. लेकिन आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ये ज़ाहिर करना था कि हमारे घर की कनीज़ें भी अल्लाह को ऐसी प्यारी हैं कि उनके सवाल को भी अल्लाह रद्द नहीं करता.
अल्लाह के खज़ाने में किसी चीज़ की कमी नहीं है. अल्लाह पर यक़ीन रखने से सबकुछ मिल जाता है.

जब मोमिना ख़्वाब से बेदार हुई, तो वह दिन जुमेरात का था. वह अपने मुहल्ले में गई और कहने लगी कि मैंने ऐसा ख़्वाब में देखा है. तुम लोग पास बैठकर जनाब सैयदा की कहानी सुन लिया करो. मुहल्ले की औरतें उसके पास आकर जमा हो गईं. उस मोमिना ने दस बीबियों की कहानी पढ़नी शुरू की. नौ दिन गुज़र गए. जब दसवां दिन आया, तो मोमिना क्या देखती है कि उसका शौहर सही सलामत माल व ज़र के साथ उसके दरवाज़े पर खड़ा है.

वह बहुत ख़ुश हुई और फ़ौरन ग़ुस्ल कर मीठी रोटी का मलीदा बनाया और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलवाई. उसने नियाज़ के लड्डू तक़सीम किए. सबने बड़े ऐहतराम से लड्डू लिए. उसके बाद मोमिना एक लड्डू लेकर अपने शौहर की भावज के पास गई. उस मग़रूर औरत ने ये कहकर लड्डू वापस कर दिया कि हम ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें नहीं खाते. हमारे घर से ये लड्डू ले जाओ. वह लड्डू वापस ले आई और लड्डू खाकर अल्लाह का शुक्र अदा किया.

अब इस मग़रूर औरत का हाल सुनिए. रात को वह औरत सो गई. सुबह को क्या देखती है कि उसके बच्चे मर गए और सब सामान ग़ायब हो गया. ये देखकर उसके हवास जाते रहे. दोनों मियां-बीवी रोने लगे. जब कई वक़्त गुज़र गए, तो भूख से उनका बुरा हाल हो गया. घर में गेहूं की भूसी मिली. उस औरत ने सोचा कि इसे पकाकर खा लें. जैसे ही उसने भूसी को हाथ लगाया, उसमें बराबर के कीड़े नज़र आने लगे. जब उसके शौहर ने ये माजरा देखा, तो कहने लगा कि मेरी बहन के घर चलो, वहां खाना मिल जाएगा. घर बंद करके दोनों मियां-बीवी पैदल ही चल पड़े. चलते-चलते उनके पैरों में छाले पड़ गए. रास्ते में उन्हें चने का हराभरा खेत नज़र आया. शौहर ने अपनी बीवी से कहा कि तुम यहां बैठ जाओ, मैं चने की कुछ बालियां तोड़ लाऊं, ताकि उनको खाकर ताक़त आ जाए. ये कहकर वह बहुत-सी चने की बालियां तोड़ लाया. मगर जैसे ही उसकी बीवी ने चने की बालियों को हाथ लगाया, वे सूखकर घास बन गईं. दोनों घास को फेंक कर आगे चल पड़े. कुछ दूर चलने के बाद उन्हें रास्ते में बहुत बड़ा गन्ने का खेत नज़र आया. मियां-बीवी दोनों ही भूख और प्यास से बेताब थे. गन्ने को देखकर वे बेक़रार हो गए. शौहर बहुत से गन्ने तोड़ लाया और बीवी के हाथ में दिए. बीवी का हाथ लगते ही गन्ने भी घास बन गए. वे दोनों बहुत घबरा गए और घास को फेंक कर आगे चल दिए.

कुछ वक़्त बाद ये शख़्स बीवी के साथ अपनी बहन के घर पहुंच गया. उसकी बहन ने उनके लिए बिछौना बिछाया. जब दोनों ने आराम कर लिया, तो उसकी बहन ने उन्हें लाकर खाना दिया. ये लोग कई दिन के भूखे थे. खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए. जैसे ही उसकी बीवी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा, तो क्या देखती है कि खाने में से सख़्त बदबू आ रही है. खाना सड़ गया है. ये दोनों अपना सर पकड़ कर बैठ गए और कहने लगे कि अल्लाह हम कब तक भूखे-प्यासे रहेंगे. भूख से जान निकले जा रही है. उन्होंने खाने को दफ़न कर दिया. रात जिस तरह गुज़री, उन्होंने गुज़ारी. सुबह हुई, तो शौहर ने कहा कि यहां का बादशाह मेरा दोस्त है. उसके पास चलें, देखें इस मुसीबत के आलम में वह हमारी क्या मदद करता है.

दोनों बादशाह के पास गए. जब वे बादशाह के हुज़ूर में पहुंचे, तो बादशाह ने उन्हें पहचान लिया. उन्हें अलग कमरा दिया गया. बादशाह ने उनसे कहा कि तुम दोनों ग़ुस्ल करके आराम करो. बादशाह ने हुक्म दिया कि हमारे मेहमानों को सात रंग का खाना भेजो. बादशाह के हुक्म के मुताबिक़ उनके लिए सात रंग का खाना लाया गया. दोनों खाना देखकर बहुत ख़ुश हुए और दस्तरख़्वान पर आकर बैठ गए. वह औरत जिस खाने को हाथ लगाती, वह खाना सड़ जाता. ग़र्ज़ कि तमाम खाना सड़ गया और उसमें कीड़े नज़र आने लगे. उसका शौहर हैरान हो गया कि ये क्या माजरा है. अगर हम बादशाह से शिकायत करेंगे, तो बादशाह नाराज़ होगा कि ताज़ा खाना भेजा और तुम हमको बदनाम करते हो. वह बहुत घबराया और बीवी से कहने लगा कि अब मैं क्या करूं. इतना बहुत सा खाना सड़ गया. बादशाह कहेगा कि इन लोगों ने जादू कर दिया है.

अलग़र्ज़ दोनों खाना लेकर बाहर आए और ज़मीन में दफ़न कर दिया. शौहर बहुत हैरान था कि ये सब क्या हो रहा है. औरत भी बहुत घबराई हुई थी. वह सेहन में आकर बैठ गई. उसने देखा कि बादशाह की लड़की ग़ुस्ल के लिए जा रही है. बादशाह की बीवी ने कहा कि वह भी ग़ुस्ल करेगी. ग़र्ज़ ये है कि दोनों ग़ुस्ल के लिए जाने लगीं. उन दोनों ने अपने चंदन हार उतार के खूंटी पर टांग दिए. ज्यूं ही उन्होंने हार टांगे, फ़ौरन खूंटी हार निग़ल गई. ये माजरा देखकर उन्हें बेहद हैरानी हुई. वह औरत घबरा कर अपने शौहर के पास आई और कहने लगी कि अब ख़ुदा ख़ैर करे. उसके शौहर ने पूछा कि क्या हुआ? तब उसने चंदन हार का सारा वाक़िया सुनाया और कहा कि अब यहां से चलो, कहीं बादशाह इस इल्ज़ाम में हमें जेल भेज दे या क़त्ल करा दे. दोनों मियां-बीवी बग़ैर इत्तला किए वहां से चल दिए. चलते-चलते वे एक दरिया के किनारे पहुंचे. दोनों वहां जाकर बैठ गए. शौहर बीवी से कहने लगा कि नहीं मालूम हमसे ऐसी क्या ख़ता हुई है, जो हम पर ऐसा अज़ाब नाज़िल हुआ है.
यह सुनकर बीवी कहने लगी कि जब तुम्हारा भाई मुलाज़िमत के लिए परदेस गया था और उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था. तब तुम्हारी भावज बहुत परेशान रहती थी. उस वक़्त उसने ख़्वाब में देखा था कि एक नक़ाब पोश बीबी तशरीफ़ लाई और उन्होंने फ़रमाया कि तू दस बीबियों की कहानी सुन ले, जब तेरा शौहर आ जाए, तो दस बीबियों की नियाज़ दिलाना. जब तुम्हारा भाई आ गया, तो तुम्हारी भावज ने मीठी रोटी का मलीदा उसके दस लड्डू बनाए और दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. तुम्हारी भावज ने नियाज़ के लड्डू सबको तक़सीम किए और एक लड्डू मेरे लिए भी लेकर आई. लेकिन मैंने वह लड्डू ये कहकर लेने से मना कर दिया कि मैं ऐसी ईंट-पत्थर की चीज़ें खाने वाली नहीं हूं. इस पर तुम्हारी भावज लड्डू वापस ले गई. ये गुनाह मुझसे ज़रूर हुआ है और तब से ही यह मुसीबत हम पर नाज़िल हुई है.

शौहर ने कहा कि ऐ कमबख़्त ! तूने ऐसे ग़ुरूर और तकब्बुर के अल्फ़ाज़ कहे. तू जल्दी से तौबा कर और मुआफ़ी मांग, ताकि हमको इस मुसीबत से निजात मिल सके. उस औरत ने ग़ुस्ल किया, नमाज़ पढ़ी और रो-रोकर अपनी ग़लती की मुआफ़ी मांगी और दुआ की कि ऐ बिन्ते रसूल ! इस मुसीबत के आलम में मेरी मदद कीजिए. इसके बाद उसने नहर से रेत निकाली और उसके दस लड्डू बनाकर दस बीबियों की नियाज़ दिलाई. अल्लाह के करम और पाक बीबियों की तुफ़ैल में वे लड्डू मोती चूर के हो गए. उन्होंने लड्डू खाए, पाने पिया और अल्लाह का शुक्र अदा किया.

शौहर ने कहा कि अब घर चलो, हमारी ख़ता मुआफ़ हो गई. अब वे घर आकर क्या देखते हैं कि घर असली हालत में है. ग़ल्ला वग़ैरह जिस तरह भरा हुआ, था वैसा ही भरा हुआ है. नौकर घर के काम में मशग़ूल हैं. बच्चे ज़िन्दा हो गए. वे क़ुरान की तिलावत कर रहे हैं. मां-बाप को देखकर बच्चे बहुत ख़ुश हुए.

ऐ मेरी पाक बीबियों ! जिस तरह आपने इस औरत की ख़ता मुआफ़ की, उसी तरह हम सबकी ख़तायें मुआफ़ हों और दिल की मुरादें पूरी हों.
आमीन
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बाज़ार में मिलने वाली दस बीबियों की कहानी की किताबों में बहुत सी ग़लतियां हैं. इसलिए हमने  इसे दुरुस्त करके यहां पेश किया है.
-फ़िरदौस ख़ान

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पढ़ें, अमल करें और सवाब हासिल करें

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क़यमात के रोज़ इंसान एक-एक नेकी के लिए तरसेगा... उस वक़्त हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ही फ़िक्र होगी... कोई किसी को मांगने पर भी नेकी न देगा... इसलिए बेहतर यही है कि इंसान अपने आमाल से नेकियां हासिल करे, जो उसकी मग़फ़िरत का ज़रिया बन सकें...
पेश हैं कुछ तस्बीह, जिन्हें पढ़कर आप सवाब हासिल कर सकते हैं.

1. सवाल : क्या आज आप ने जन्नत में एक महल बनाया?
जवाब: दस बार सूरह इख़लास पढ़कर [अहमद]

2. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में खजूर के 100 दरख़्त लगाए ?
जवाब:  100 बार सुब्हानल्लाहिल-अज़ीम वबिहम्दिही पढ़कर. [तिर्मिजी]

3. सवाल : क्या आज आपने जन्नत में 400 दरख़्त लगाए ?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर, पढ़कर. [इब़्न माजह]

4. सवाल : क्या आज आपने एक क़ुरआन मजीद पढ़ने का सवाब कमाया?
जवाब: तीन बार सूरह इख़लास पढ़कर. [मुस्लिम]

5. सवाल: क्या आज आपने करोड़ों नेकियां कमाईं?
जवाब: मोमिनों के लिए दुआ-ए-मग़फ़ित करके. [तबरानी]

6. सवाल: क्या आज आपने जन्नत मे एक घर बनाया?
जवाब: नमाज़ के लिए सफ़ की ख़ाली जगह को भरकर. [इब्न माजह]

7. सवाल: क्या आज आपने एक हज का सवाब कमाया?
जवाब: फ़र्ज़ नमाज़ के लिए घर से अच्छी तरह वज़ू करके जाकर. [अबु दाऊद]

8. सवाल: क्या आज आपने ज़मीन और आसमान की ख़ाली जगह भरकर नेकियां कमाईं?
जवाब: 100 बार ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़कर. [अहमद]

9. सवाल: क्या आज आपने अल्लाह की राह में 100 घोड़े देने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर. [अहमद]

10. सवाल: क्या आज आपने मक्का-ए-मुअज़्ज़मा में 100 ऊंट क़ुर्बान करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार अल्लाहु अकबर पढ़कर. [अहमद]

11. सवाल: क्या आज आपने 100 ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब कमाया?
जवाब: 100 बार सुब्हानअल्लाह पढ़कर. [अहमद]

12. सवाल: क्या आज आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत हासिल करने वाला अमल किया?
जवाब: सुबह व शाम दस-दस बार दुरूद शरीफ़ पढ़कर. [तबरानी]

13. सवाल: क्या आज आपने वह अमल किया, जिस जैसा अमल क़यामत के दिन लेकर आने वाला कोई न होगा सिवाय उसके जो इस जैसा अमल करे?
जवाब: 100 बार सुब्हानल्लाही वबिहम्दिही पढ़कर. [मुस्लिम]

14. सवाल: क्या आज आपने पूरी रात इबादत करने का सवाब कमाया?
जवाब: नमाज़-ए-इशा और नमाज़-ए-फ़ज्र बा जमाअत पढ़कर. [मुस्लिम]

15. सवाल : क्या आज आपने वज़ू के बाद वह दुआ पढ़ी, जिसके सवाब को क़यामत के दिन तक कोई चीज़ नहीं मिटा सकती?
जवाब: सुब्हाना कल्लाहुम्मा वबिहम्दिका अश-हदू अन ला इलाहा इल्ला अन्ता अस्तग़फ़िरूका वातुबू इलैक. [हाकिम]

प्यारे नबी हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लललाहु अलैहि वसल्‍लम) ने फ़रमाया है- अल्लाह उसके चेहरे को रौशन करे, जो हदीस सुनकर आगे पहुंचाता है.




आपसे ग़ुज़ारिश है कि राहे-हक़ की हमारी कोई भी तहरीर आपको अच्छी लगे, तो उसे दूसरों तक ज़रूर पहुंचाएं... हो सकता है कि हमारी और आपकी कोशिश से किसी का भला हो जाए. 
फ़िरदौस ख़ान


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रजब की फ़ज़ीलत...

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माहे-रजब में दिन में रोज़ा रखने और रात में इबादत करने का सवाब सौ साल के रोज़े रखने के बराबर होता है... हो सके, तो इबादत करें... पता नहीं अगली मर्तबा ये मौक़ा मिले या न मिले...
अल्लाह हम सबको राहे-हक़ पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे... आमीन

रजब इस्लामी साल का सातवां महीना है. यह बड़ा अज़मत वाला महीना है और इसमें नेकियों का सवाब दोगुना हो जाता है. रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि रजब अल्लाह का महीना है, शाबान मेरा महीना है और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है. इस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेशुमार रहमते और मग़फ़िरत की बारिश करता है. इस माह में बंदों की इबादतें और दुआएं क़ुबूल की जाती हैं. रजब को ताजीम यानी आदर का माह कहा जाता है. इस महीने की ताज़ीम करे, गुनाहों से दूर रहें, तौबा अस्तग़फ़ार करते रहें, अल्लाह तआला की इबादत करें, सदक़ा और ख़ैरात ज़्यादा ज़्यादा करें.

हज़रत सैयदुना अल्लामा सफ़्फ़ुरी रहमतुल्लाह अलैह रमाते हैं- रजब-उल-मुरज्जब बीज बोने का, शाबान-उल-मुअज़्ज़म आब-पाशी (यानि पानी देने) का और रमज़ान-उल-मुबारक फ़सल काटने का महीना है. लिहाज़ा जो रजब-उल-मुरज्जब में इबादत का बीज नहीं बोता और शाबान-उल-मुअज़्ज़म में आंसुओं से सैराब नहीं करता, वह रमजान-उल-मुबारक में फ़सले-रहेमत क्यूं कर काट सकेगा? मज़ीद फ़रमाते हैं : रजब-उल-मुरज्जब जिस्म को, शाबान-उल-मुअज़्ज़म दिल को और रमज़ान-उल-मुबारक रूह को पाक करता है. (Nuzhat-ul-Majalis, jild 1, safha 209)

अल्लाह तआला के नज़दीक 4 महीने खुसूसियात के साथ हुरमतवाले हैं. जुल कदा, जुल हिज्जाह, मुहर्रम और रजब.
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जिसने माहे-हराम (यानी हुरमतवाले महीने में) में तीन दिन जुमेरात, जुमा और हफ़्ता (यानि सनीचर) का रोज़ा रखा, उसके लिए दो साल की इबादत का सवाब लिखा जाएगा. (Al Mu’jam-ul-Awsat lit-Tabrani, jild 1, safha 485, Hadees 1789)

हज़रत सैयदुना अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- जन्नत में एक नहर है, जिसे रजब कहा जाता है, जो दूध से ज़्यादा सफ़ेद और शहद से ज़्यादा मीठी है. जो कोई रजब का एक रोज़ा रखे, तो अल्लाह तआला उसे इस नहर से सैराब करेगा. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 367, Hadees 3800)

ताबई बुज़ुर्ग हज़रत सैयदुना अबु क़िलाला रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- रजब के रोज़ादारों के लिए जन्नत में एक महल है. (Shu’ab ul-Imaan, jild 3, safha 368, Hadees 3802)

हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने भी रजब का रोज़ा रखा
हज़रत सैयदुना अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-  जिसने रजब का एक रोज़ा रखा, तो वह एक साल के रोज़ों की तरह होगा. जिसने सात रोज़े रखे, उसपर जहन्नुमम के सातों दरवाज़े बंद कर दिए जाएंगे. जिसने आठ रोज़े रखे, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएंगे. जिसने दस रोज़े रखे, वह अल्लाह से जो कुछ मांगेगा अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाएगा. और जिसने 15 रोज़े रखे, तो आसमान से एक मुनादी निदा (यानी ऐलान करने वाला ऐलान) करता है कि तेरे पिछले गुनाह बख़्श दिए गए, तू अज़ सर-ए-नौ अमल शुरू करके तेरी बुराइयां नेकी से बदल दी गईं. और जो ज़्यादा करे, तो अल्लाह उसे ज़्यादा दे. और रजब में नूह अलैहि सलाम कश्ती में सवार हुए, तो ख़ुद भी रोज़ा रखा और हमराहियों को भी रोज़े का हुक्म दिया. उनकी कश्ती 10 मुहर्रम तक 6 माह बरसरे-सफ़र रही. (Shu’ab-ul-Iman, jild 3, safha 368, Hadees 3801)

परहेज़गारी से एक रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत
हज़रत शेख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह नक़ल करते हैं कि सुल्ताने-मदीना सल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- माहे रजब हुरमत वाले महीनों में से है और छठे आसमान के दरवाज़े पर इस महीने के दिन लिखे हुए हैं. अगर कोई शख़्स रजब में एक रोज़ा रखे और उसे परहेज़गारी से पूरा करे, तो वह दरवाज़ा और वह (रोज़ेवाला) दिन उस बंदे के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत तलब करेंगे और अर्ज़ करेंगे- या अल्लाह तआला इस बंदे को बख़्श दे और अगर वह शख़्स बग़ैर परहेज़गारी के रोज़ा गुज़ारता है, तो फिर वह दरवाज़ा और दिन उसकी बख़्शीश की दरख़्वास्त नहीं करेंगे और उस शख़्स से कहते हैं- ऐ बंदे तेरे नफ़्स ने तुझे धोका दिया. (Ma-Sabata bis-Sunnah, safha 234, fazail Shahr-e-Rajab-lil Khallal, safha 3-4)

रसूले-अकरम ने फ़रमाया है कि रजब का महीना ख़ुदा के नज़दीक अज़मत वाला महीना है. इस माह में जंग करना हराम है. रिवायत है कि रजब में एक रोज़ा रखने वाले को ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल होती है . ख़ुदा का ग़ज़ब उससे दूर हो जाता है और जहन्नुम के दरवाज़े में एक दरवाज़ा उसके लिए बंद हो जाता है.
इमाम मूसा काजिम (अस ) फ़रमाते हैं कि रजब माह में एक रोज़ा रखने से जहन्नुम की आग एक साल की दूरी तक हो जाती है. जो इस माह में तीन रोज़े रखे, तो उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है .

इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) से रवायत है कि रसूले-अकरम ने फ़रमाया कि रजब मेरी उम्मत के लिए अस्तग़फ़ार का महीना है. इसलिए इस माह ख़ुदा से ज़्यादा से ज़्यादा मग़फ़िरत चाहो. ख़ुदा बड़ा मेहरबान है.
रसूले-अकरम फ़रमाते हैं कि रजब को असब भी कहते हैं, क्योंकि इस माह में ख़ुदा कि रहमत बहुत ज़्यादा बरसती है. इसलिए इस माह कसरत से अस्तग़फ़ार भेजो. जो इस माह के आख़िर में एक रोज़ा रखेगा, ख़ुदा उसको मौत की सख़्तियों, मौत के बाद की हौल्नकी और क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ रखेगा.
जो इस माह के आख़िर में दो रोज़े रखेगा, वह पुले-सरात से आसानी से गुज़र जाएगा.
जो तीन रोज़े रखेगा, उसे क़यामत की सख़्तियों से महफूज़ रखा जाएगा और उसको जहन्नुम की आज़ादी का परवाना अता होगा.

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शबे-बारात...

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शबे-बारात... यानी इबादत की रात... यह इबादत की रात है और अगले दिन रोज़ा रखकर अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने का दिन...
कहते हैं कि आज रात को उन लोगों का नाम ज़िन्दा लोगों की फ़ेहरिस्त से काट दिया जाता है, जो अगली शबे-बारात से पहले मरने वाले हैं... हो सकता है कि इनमें एक नाम हमारा भी हो और हम अगली शबे-बारात न देख पाएं...
इसलिए हम आप सबसे उन सब चीज़ों के लिए मुआफ़ी चाहते हैं, जिनसे आपका दिल दुखा हो... हम इस दुनिया से किसी भी तरह का कोई बोझ लेकर नहीं जाना चाहते... बस एक ऐसी लड़की के तौर पर यादें छोड़ कर जाना चाहते हैं, जिसने जानबूझ कर कभी किसी का दिल न दुखाया हो, किसी के साथ हक़तल्फ़ी न की हो... किसी का बुरा न किया हो... बस इतना ही... ज़िन्दगी से, इस दुनिया से हमें और कुछ नहीं चाहिए... हमारे लिए यही बहुत है...
आज दूसरों से माफ़ी मांगने के साथ ही क्यों न हम भी उन सभी लोगों को दिल से मुआफ़ कर दें, जिन्होंने हमारा दिल दुखाया है, हमारे साथ बुरा किया है, हमारी हक़तल्फ़ी की है ... भले ही वो हमसे माफ़ी न मांगें...
माफ़ी मांगने से इंसान छोटा नहीं होता, लेकिन मुआफ़ कर देने से ज़रूर बड़ा हो जाता है...
आप सबको इबादत की रात मुबारक हो..
दुआओं में याद रखना...
-फ़िरदौस ख़ान

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इल्मे-सीना

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इल्मे-सीना के बारे में बहुत कम लोग जानना चाहते हैं... दरअसल, इल्मे-सीना आपको किताबों में नहीं मिलता... इसे समझना पड़ता है... और इसे समझने के लिए एक रौशन ज़ेहन और वसीह दिल चाहिए...
जिस तरह पानी को साफ़ रखने के लिए साफ़ बर्तन की ज़रूरत होती है, उसी तरह इल्मे-सीना के लिए भी दिल का साफ़ होना बेहद ज़रूरी है... इसके लिए एक ऐसा दिल चाहिए, जो ख़ुदग़र्ज़ न हो, कमज़र्फ़ न हो... इतनी समझ चाहिए कि इंसान समझ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत है...
 इसके लिए ऊंच-नीच, जात-पांत और किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठना होगा... ख़ुदा की मख़लूक से नफ़रत करके ख़ुदा को नहीं पाया जा सकता...
कबीर चचा कह गए हैं-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय...
यक़ीन करें, जिसने प्रेम के ढाई आखर पढ़ लिए और समझ लिए, उसका बेड़ा पार हो गया...

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हज़रत अली अलैहिस्सलाम

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सुनहरे अक़वाल
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं-
* अपने ख़्यालों की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे अल्फ़ाज़ बन जाते हैं
अपने अल्फ़ाज़ की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारे आमाल बन जाते हैं
अपने आमाल की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि ये तुम्हारा किरदार बन जाते हैं
अपने किरदार की हिफ़ाज़त करो, क्योंकि तुम्हारा किरदार तुम्हारी पहचान बन जाता है.

* अपनी सोच को पानी के कतरों से भी ज़्यादा साफ़ रखो, क्योंकि जिस तरह क़तरों से दरिया बनता है उसी तरह सोच से ईमान बनता है.

रब 
* सारी दुनिया के सारे लोग तुझे अपने फ़ायदे के लिए चाहते हैं, सिर्फ़ तेरा रब ही है, जो तुझे तेरे फ़ायदे के लिए चाहता है. 

क़ुरआन 
* क़ुरआन पढ़ा करो. बेशक रब ने इसमें हर मसले का हल रखा है.   

मुहब्बत
* नमाज़ में किसी के लिए दुआ करना और उसे इल्म भी न हो, बस यही सच्ची मुहब्बत है.  
* जिससे मुहब्बत की जाए, उसका फ़रमाबरदार होना पड़ता है 
* जिस्मानी रिश्ते मुख़्तसर ज़िन्दगी तक महदूद होते हैं. आख़िरत में हम उनके साथ होंगे, जिनसे हमें रूहानी मुहब्बत होगी.   
* किसी मुकम्मल शख़्स की तलाश में मुहब्बत न करो, बल्कि किसी अधूरे को मुकम्मल करने के लिए मुहब्बत करो.
* ख़ूबसूरत इंसान से मुहब्बत नहीं होती, बल्कि जिस इंसान से मुहब्बत होती है वो ख़ूबसूरत लगने लगता है.
*जिससे मुहब्बत की जाती है, उससे मुक़ाबला नहीं किया जाता. किसी को पा लेना मुहब्बत नहीं, बल्कि उसके दिल में जगह बना लेना मुहब्बत है.
* हमेशा उस इंसान के क़रीब रहो जो तुम्हे ख़ुश रखे, लेकिन उस इंसान के और भी क़रीब रहो जो तुम्हारे बग़ैर ख़ुश ना रह पाए.

अल्लाह से माँगना 
* अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी होने से बड़ी मुश्किलें भी आसान हो जाती हैं.
* ख़ालिक से मांगना शुजाअत है. अगर दे तो रहमत और न दे तो हिकमत. मखलूक से मांगना ज़िल्लत है. अगर दे तो एहसान और ना दे तो शर्मिंदगी.

ज़िन्दगी
* अगर ज़िन्दगी को ख़ूबसूरत बनाना है, तो बर्दाश्त करना सीखो, नज़र अंदाज़ करना सीखो, ख़ामोश रहना सीखो और अकेले जीना सीखो.  
* ज़िन्दगी जब भी रुलाये तो समझ लेना कि गुनाह माफ़ हो गए और ज़िन्दगी जब भी हंसाये तो समझ लेना कि दुआ क़ुबूल हो गईं.  

* जो शख़्स दुनिया में कम हिस्सा लेता है, वो अपने लिए राहत का सामान बढ़ा लेता है. और जो दुनिया को ज़्यादा समेटता है, वो अपने लिए तबाहकुन चीज़ों का इज़ाफ़ा कर लेता है.
* जिसकी अमीरी उसके लिबास में हो, वो हमेशा फ़क़ीर रहेगा और जिसकी अमीरी उसके दिल में हो वो हमेशा सुखी रहेगा.

बेहतरीन इंसान 
* नेक अमल जैसी कोई तिजारत नहीं और सवाब जैसा कोई मुनाफ़ा नहीं. 
* बेहतरीन इंसान अपने अमल से पहचना जाता है, वरना अच्छी बातें तो बुरे लोग भी करते हैं.  
* मुश्किलतरीन काम बेहतरीन लोगों के हिस्से में आते हैं, क्योंकि वो उसे हल करने की सलाहियत रखते हैं.

दोस्ती 
* अच्छे वक़्त से ज़्यादा अच्छा दोस्त अज़ीज़ रखो, क्योंकि अच्छा दोस्त बुरे वक़्त को भी अच्छा बना देता है.
* दोस्तों का इंतख़ाब सोच-समझकर किया करो, क्योंकि तुम अपने जनाज़े की पहली सफ़ का इंतख़ाब कर रहे हो.
* दुनिया में हज़ार रिश्ते बनाओ, लेकिन एक रिश्ता ऐसा भी बनाओ जब हज़ार रिश्ते आपके ख़िलाफ़ खड़े हों, तो वह एक आपके साथ हो.
* लम्बी दोस्ती के लिए दो चीज़ों पर अमल करो
- अपने दोस्त से ग़ुस्से में बात मत करो
- अपने दोस्त की ग़ुस्से में कही हुई बात दिल पर मत लो.

आज़माना 
* अगर किसी का जर्फ़ आज़माना हो, तो उसको ज़्यादा इज़्ज़त दो. वह आला ज़र्फ़ हुआ तो आपको और ज़्यादा इज़्ज़त देगा और कम ज़र्फ़ हुआ तो ख़ुद को आला समझेगा.
* अगर किसी के बारे मे जानना चाहते हो तो पता करो के वह शख्स किसके साथ उठता बैठता है

इल्म 
* इल्म की वजह से दोस्तों में इज़ाफ़ा होता है, दौलत की वजह से दुशमनों में इज़ाफ़ा होता है.
* दौलत, हुक़ूमत और मुसीबत में आदमी के अक़्ल का इम्तेहान होता है कि आदमी सब्र करता है या ग़लत क़दम उठाता है.
* दौलत को क़दमों की ख़ाक बनाकर रखो, क्यूकि जब ख़ाक सर पर लगती है तो वो क़ब्र कहलाती है.

सब्र
* सब्र एक ऐसी सवारी है, जो सवार को अभी गिरने नहीं देती. 
* सब्र से जीत तय हो जाती है.
* ऐसा बहुत कम होता है कि जल्दबाज़ नुक़सान न उठाए, और ऐसा हो ही नहीं सकता कि सब्र करने वाला नाक़ाम हो.

* झूठ बोलकर जीतने से बेहतर है सच बोलकर हार जाओ.

मुक़ाम 
* जब तुम्हरी मुख़ालफ़त हद से बढ़ने लगे, तो समझ लो कि अल्लाह तुम्हें कोई मुक़ाम देने वाला है.
*इस सोच के साथ ज़िन्दगी में आगे बढ़ो कि अल्लाह ने यक़ीनन बेहतरीन ही सोचा होगा. 
* ज़िन्दगी में आगे बढ़ना है, तो बहरे हो जाओ, क्योंकि बाज़ लोगों की बातें मायूसी में इज़ाफ़ा कर देती हैं. 

नींद 
* सुबह की नींद इंसान के इरादों को कमज़ोर करती है. मंज़िलों को हासिल करने वाले कभी देर तक सोया नहीं करते. 

लालच 
* जहां तक हो सके लालच से बचो, लालच में ज़िल्लत ही ज़िल्लत है.

कम खाना 
* कम खाने में सेहत है, कम बोलने में समझदारी है और कम सोना इबादत है.


आँसू 
* किसी की आंख तुम्हारी वजह से नम न हो, क्योंकि तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा 
* तुम्हारा एक रब है फिर भी तुम उसे याद नहीं करते, लेकिन उस के कितने बंदे हैं फिर भी वह तुम्हे नहीं भूलता.

* सूरत बग़ैर सीरत के ऐसा फूल है, जिसमे कांटे ज़्यादा हों और ख़ुशबू बिलकुल न हो.
* आज का इंसान सिर्फ़ दोलत को ख़ुशनसीबी समझता है और ये ही उसकी बदनसीबी है.
 * कभी भी किसी के ज़वाल को देखकर ख़ुश मत हो, क्योंकि तुम्हे पता नहीं है मुस्तक़बिल में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है.

सलीक़ा 
* बात तमीज़ से और ऐतराज़ दलील से करो, क्योंकि जबान तो हैवानो में भी होती है मगर वह इल्म और सलीक़े से महरूम होते हैं.

* अक़्लमंद अपने आप को नीचा रखकर बुलंदी हासिल करता है और नादान अपने आप को बड़ा समझकर ज़िल्लत उठाता है.

लफ़्ज़ 
* लफ़्ज़ आपके गुलाम होतें हैं. मगर सिर्फ़ बोलने से पहले तक, बोलने के बाद इंसान अपने अल्फ़ाज़ का ग़ुलाम बन जाता है. अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त इस तरह करो, जिस तरह तुम अपने माल की करते हो. एक लफ़्ज़ ज़लील कर सकता है और आपके सुख को ख़त्म कर सकता है.

*दिल का रोज़ा ज़ुबान के रोज़े से और ज़ुबान का रोज़ा पेट के रोज़े से बेहतर है.

इज़्ज़त
* लोगों से डरना छोड़ दो, क्योंकि रिज़्क़ और इज़्ज़त किसी के हाथ में नहीं, अल्लाह जिसे चाहे बेहिसाब देता है.     

ज़ुल्म 
* जो ज़ुल्म के ज़रिये इज़्ज़त चाहता है, अल्लाह उसे इंसाफ़ के ज़रिये ज़लील करता है.



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लाइलाज बीमारियों और जादू-जिन्नात का इलाज

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 लाइलाज बीमारियों और जादू-जिन्नात का इलाज

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या हुसैन

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بسم الله الرحمن الرحيم

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Allah hu Akbar

Allah hu Akbar
अपना ये रूहानी ब्लॉग हम अपने पापा मरहूम सत्तार अहमद ख़ान और अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान 'चांदनी' को समर्पित करते हैं.
-फ़िरदौस ख़ान

This blog is devoted to my father Late Sattar Ahmad Khan and mother Late Khushnudi Khan 'Chandni'...
-Firdaus Khan

इश्क़े-हक़ी़क़ी

इश्क़े-हक़ी़क़ी
फ़ना इतनी हो जाऊं
मैं तेरी ज़ात में या अल्लाह
जो मुझे देख ले
उसे तुझसे मुहब्बत हो जाए

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